Author : Niranjan Sahoo

Published on Aug 24, 2022 Updated 26 Days ago
भारत की न्याय वितरण व्यवस्था (justice delivery system) में सुधार: बुनियादी ढांचा क्यों है महत्वपूर्ण!

भारत की न्याय वितरण  व्यवस्था के सामने मौजूद अनेक संकट उस बात से जुड़े हुए हैं, जिसे मुख्य न्यायाधीश नेध्वस्तबुनियादी ढांचा कहा है. हकीकत में यह अनुभवजन्य रूप से ज्ञात है कि न्याय प्रदान करने में उत्पादकता में बुनियादी ढांचे की पर्याप्तता, चाहे वह अदालती कक्ष, चेंबर्स, सफाई व्यवस्था अथवा डिजिटल कनेक्टिीविटी हो, के बीच एक सकारात्मक संबंध है. यह संक्षिप्त विवरण बुनियादी ढांचे की भारी कमी के कारण लंबित मामलों से जूझ रहे भारत के जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में मूलभूत बुनियादी ढांचे की कमी को उजागर करता है. यह विवरण, 30 साल पहले इन कमियों को ठीक करने के लिए शुरू की गई केंद्रीय योजना की कमियों का अध्ययन करता है और इसके समक्ष पेश आने वाली चुनौतियों पर काबू पाने की सिफारिशों का सुझाव देता है.


एट्रीब्यूशन: निरंजन साहू और जिब्रान ए. खान, इंप्रूविंग इंडियाजजस्टिस डिलीवरी सिस्टम: व्हाय इंफ्रास्ट्रक्चर मैटर्स, ओआरएफ इश्यू ब्रीफ नंबर 562, जुलाई 2022, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन.


प्रस्तावना

अदालतों में बुनियादी ढांचे की स्थिति का न्याय प्रदान करने पर व्यापक असर पड़ सकता है. उदाहरण के तौर पर एक सुंदर डिजाइन युक्त सभी सुविधाओं से लैस अदालत कक्ष की वजह से न्यायाधीश के बैठने की उत्पादकता में इजाफा हो सकता है. यही बात अपने मामले की पूर्व तैयारी में जुटे अधिवक्ता और उनके कक्ष के लिए भी लागू हो सकती है. संभवत: इस बात को वर्तमान में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) एन. वी. रामन्ना से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. वे इस वक्त देश की न्यायालयीन व्यवस्था के जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में बुनियादी ढांचे की व्यवस्था को सुधारने के अभियान में जुटे हुए हैं. [a] अक्तूबर 2021 में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में बुनियादी ढांचे में सुधार को लेकर चल रही योजनाओं की धीमी गति पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए सीजेआई ने कहा था कि “भारत में अदालतों में बेहतर बुनियादी ढांचा हमेशा से हाशिए पर ही रहा है. इस मानसिकता की वजह से ही जजर्र इमारतों में काम करने वाली अदालतों के सामने अपने कर्तव्य पर प्रभावी अमल को लेकर मुश्किलें पेश आती रहती हैं.”[i][i]

अनुभवजन्य रूप से यह बात अच्छी तरह से स्थापित है कि न्यायिक बुनियादी ढांचे की उपलब्धता और न्याय प्रदान करने के बीच सकारात्मक सहसंबंध है. नेशनल मिशन फॉर जस्टिस डिलीवरी एंड लीगल रिफॉर्मस्‌ के अनुसार, मामलों के निपटान में होने वाली देरी को कम करने के लिए पर्याप्त न्यायिक बुनियादी ढांचा होना बेहद आवश्यक है

इसके बावजूद इस मसले की ओर ध्यान आकर्षित करने वाले रामन्ना पहले सीजेआई नहीं हैं. उनके पहले भी अनेक सीजेआई ने भारत की न्यायालयीन व्यवस्था के बुनियादी ढांचे की दशा की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया है. 2016 में सीजेआई टी. एस. ठाकुर अदालतों में अनेक मामले लंबित रहने, न्यायालयीन पद रिक्त रहने और बुनियादी ढांचे की खामियों की वजह से प्रभावित होने वाली न्याय वितरण  व्यवस्था और न्यायालयीन विश्वसनीयता को लेकर काफी नाराज थे. [ii][ii] मामलों के निपटारे में इस वजह से होने वाली देरी का गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. ऐसे लोगों के पास मामला लंबा खिंच जाने पर उस देरी का सामना करने के लिए वित्तीय संसाधन नहीं होते और न ही उनके पास सामाजिक और राजनीतिक संबंध होते हैं, जिनके दम पर वह लंबी कानूनी लड़ाई को झेल सकें.

अनुभवजन्य रूप से यह बात अच्छी तरह से स्थापित है कि न्यायिक बुनियादी ढांचे की उपलब्धता और न्याय प्रदान करने के बीच सकारात्मक सहसंबंध है. नेशनल मिशन फॉर जस्टिस डिलीवरी एंड लीगल रिफॉर्मस्‌ के अनुसार, मामलों के निपटान में होने वाली देरी को कम करने के लिए पर्याप्त न्यायिक बुनियादी ढांचा होना बेहद आवश्यक है [iii] [iii] सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित राष्ट्रीय न्यायालय प्रबंधन प्रणाली (एनसीएमएस) [iv] [iv]  ने भौतिक बुनियादी ढांचे, कर्मियों की ताकत और डिजिटल टल बुनियादी ढांचे और मामलों के लंबित रहने के बीच सीधा संबंध पाया था. हकीकत में, आंकड़े यह बताते हैं कि भारत की अधीनस्थ न्यायपालिका, अदालतों, सचिवीय और सहायक कर्मचारियों और न्यायाधीशों के लिए आवास की भारी कमी के कारण लंबित मामलों से जूझ रही है.

2020 की शुरुआत में कोविड-19 महामारी ने भी इस बात को और साफ कर दिया कि न्यायिक व्यवस्था के सुचारू कार्य करने में बुनियादी ढांचा, विशेषत: डिजिटल टल ढांचा काफी अहम है. अदालतों को अपना काम वचरुअल मोड में जारी रखना पड़ा, लेकिन केवल एक तिहाई निचली अदालतों में ही यथोचित अथवा ठीक डिजिटल व्यवस्था मौजूद थी. [b] इस वजह से न्याय प्रदान करने को झटका लगा. कोविड-19 की वजह से पेश आने वाली रुकावटों के कारण ही मार्च 2020 से अदालतों में लंबित मामलों में 19 प्रतिशत की वृद्धि हुई [v] [v] और इनकी संख्या बढ़कर 4.4 करोड़ पहुंच गई.

यह संक्षेप देश की निचली अदालतों में बुनियादी ढांचे की खामी, भौतिक और डिजिटल, की समस्या के विस्तार को समझने का प्रयास करता है. इसमें सन् 1993 में केंद्र सरकार की ओर से शुरू की गई उस योजना पर हुए अमल की स्थिति की समीक्षा की गई है, जिसमें जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में बुनियादी ढांचे के निर्माण की बात की गई थी. यह इस योजना के अमल में आने वाली रुकावटों का विश्लेषण करते हुए सबूत आधारित सिफारिशें पेश करता है, ताकि इस योजना को ज्यादा प्रभावशाली बनाया जा सके.

भारत की न्यायिक बुनियादी ढांचे की स्थिति

बुनियादी न्यायिक ढांचे में मोटे तौर पर तीन आयाम शामिल होते हैं: (i) भौतिक अथवा ठोस सुविधाएं जैसे कि अदालती कक्ष, वकीलों के कक्ष और न्यायिक अधिकारियों और उनके सहायक कर्मचारियों के लिए आवासीय व्यवस्था; (ii) डिजिटल सुविधाएं, जिसमें वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग डिवाइस और इंटरनेट कनेक्टिविटी शामिल हैं और (iii) मानव संसाधन, जिसमें न्यायाधीश और उनके सहायक कर्मचारी शामिल होते हैं. इन तीनों ही आयामों में चुनौतियां हैं, लेकिन इस संक्षेप में भौतिक और डिजिटल बुनियादी ढांचे को ही केंद्र में रखा गया है.

भौतिक सुविधाएं

न्यायिक इकोसिस्टम के सही ढंग से काम करने के लिए जो भौतिक घटक जरूरी होते हैं, वे घटक भौतिक सुविधाओं में शामिल होते हैं. इसमें अदालत सभागार, अधिवक्ताओं के कमरे और न्यायालयीन कर्मचारियों के लिए आवासीय इमारतें शामिल हैं. न्यायालयीन अफसरों को यह सुविधाएं उपलब्ध करवाने का लक्ष्य होना चाहिए, ताकि वह प्रत्येक को न्याय प्रदान करने का अपना रोजमर्रा का काम कर सकें. आखिरकार कार्य करने की बेहतर जगह से ही कार्य कुशलता सुनिश्चित होती है.

जमीनी स्तर पर दिखाई देने वाले सबूतों, खासकर जिला और अधीनस्थ अदालतों से यह संकेत मिलता है कि वहां भौतिक सुविधाओं की भारी कमी है. नेशनल ज्युडिशियल डेटा ग्रीड, [vi] [vi] के आंकड़ों के अनुसार न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 24,280 है. वर्तमान में केवल 20,140 अदालती कक्ष उपलब्ध हैं और उसमें से 620 किराए पर लिए गए हैं. 2,423 अदालती कक्ष का निर्माण चल रहा है. इस बीच न्यायालयीन अधिकारियों के लिए 17,800 आवासीय यूनिटस उपलब्ध हैं, जिसमें से 3,988 किराए पर लिए गए हैं. महज 2 प्रतिशत निचली और अधीनस्थ अदालतों में नेत्रहीनों के लिए स्पर्श मार्ग की व्यवस्था है, जबकि महज 20 प्रतिशत में गाइड मैप मौजूद हैं तथा 45 प्रतिशत में ही हेल्प डेस्क हैं. इसके अलावा, 68 प्रतिशत निचली अदालतों में रिकॉर्ड रखने के लिए विशेष कमरा नहीं है और उनमें से लगभग आधे में पुस्तकालय ही मौजूद नहीं है.

जमीनी स्तर पर दिखाई देने वाले सबूतों, खासकर जिला और अधीनस्थ अदालतों से यह संकेत मिलता है कि वहां भौतिक सुविधाओं की भारी कमी है. नेशनल ज्युडिशियल डेटा ग्रीड, [vi] के आंकड़ों के अनुसार न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 24,280 है. वर्तमान में केवल 20,140 अदालती कक्ष उपलब्ध हैं और उसमें से 620 किराए पर लिए गए हैं. 2,423 अदालती कक्ष का निर्माण चल रहा है.

ठोस सुविधाओं में शामिल और बेहद जरूरी घटक है सार्वजनिक परिवहन तक आसान पहुंच. कानूनी थिंक टैंक विधि की एक गहन रिपोर्ट के अनुसार,[vii][vii] गुजरात, सिक्किम और त्रिपुरा में अधिकांश निचली अदालतों तक सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से पहुंचा नहीं जा सकता. सिक्किम में, चार निचले न्यायालयों में पार्किंग सुविधा नहीं है, जबकि केवल एक न्यायालय तक ही सार्वजनिक परिवहन से पहुंचा जा सकता है. उधर त्रिपुरा में पांच न्यायालयों में से चार में पार्किंग सुविधा तो है, लेकिन वहां किसी भी न्यायालय तक सार्वजनिक परिवहन से पहुंचा नहीं जा सकता.

ज़िला और अधीनस्थ न्यायालयों पर विधि की इसी रिपोर्ट के अनुसार जिन न्यायालयों का सर्वेक्षण किया गया (665 कोर्ट परिसरों में से 266 अथवा 40 प्रतिशत) उसमें से आधे से कम न्यायालयों में ही संपूर्ण रूप से काम करने वाले शौचालय पाए गए. केवल आधे से थोड़े ज्यादा (665 कोर्ट परिसरों में से 354) में ही हर मंजिल पर एक शौचालय उपलब्ध है. ज्य़ादा उल्लेखनीय बात तो यह है कि 26 प्रतिशत जिला अदालतों में महिलाओं के शौचालयों के नलों में पानी नहीं आता और दिव्यांगों के लिए केवल 11 प्रतिशत सुलभ शौचालय हैं.

2021 में सीजेआई कार्यालय ने एक अध्ययन, जिसमें बड़ी संख्या में कोर्ट परिसर (3,028) में शामिल थे, में पाया गया कि उनमें से 30 प्रतिशत से भी कम में दिव्यांगों के लिए शौचालय उपलब्ध थे (फिगर 1 देखें). [viii] [viii] गोवा, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मिजोरम में काम में आने लायक शौचालयों वाले कोर्ट परिसरों का प्रतिशत सबसे कम था (टेबल 1 देखें). [ix] [ix] गोवा में किसी भी अदालत परिसर में पूरी तरह से काम करने वाले शौचालय नहीं थे. इतना ही नहीं वहां पानी सप्लाई  या नियमित सफाई के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी. झारखंड में, 24 अदालत परिसरों में से केवल दो (8 प्रतिशत) पूरी तरह काम करने लायक थे, उत्तर प्रदेश के 74 अदालत परिसरों में से आठ अथवा 11 प्रतिशत और मिजोरम में आठ अदालत परिसरों में से 1 या 13 प्रतिशत में पूरी तरह से काम करने वाले शौचालय पाए गए.

इसी अध्ययन के अनुसार, सर्वेक्षण में शामिल 665 जिला अदालतों में से केवल 27 प्रतिशत में दिव्यांगों के लिए रैंप थे.

चित्र-1. भारत के निचले न्यायालयों में स्वच्छता सुविधाएं

 

स्त्रोत : प्रशांत रेड्डी, एट अल., 2022. सुप्रीम कोर्ट के 2021 में करवाए गए 3,028 अदालत परिसरों के सर्वेक्षण पर आधारित

डिजिटल सुविधाएं

डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर अथवा सुविधाएं न केवल वादियों को उनकी सुनवाई (ऑनलाइन कार्यवाही की स्थिति में) तक पहुंच पाने में मदद करता है बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि जनता के लिए मामले और उनकी अध्यक्षता करने वाले न्यायाधीशों के बारे में प्रासंगिक जानकारी सुलभता से उपलब्ध हो सके. कोविड-19 महामारी के दौरान जब अदालतों को अपना काम वर्चुअल तरीके से करने को मजबूर होना पड़ा तो इन महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की कमी इसमें एक बड़ी बाधा साबित हुई. उस वक्त केवल 27 प्रतिशत अधीनस्थ न्यायालय में ही न्यायाधीश के मंच तक वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा वाला कंप्यूटर लगाया जा सका, जिसकी वजह से न्याय प्रदान करने का काम प्रभावित हुआ.[x][x]

2019 की विधि रिपोर्ट ने पाया कि 89 प्रतिशत निचली अदालतों की वेबसाइट्स पर ही केस लिस्ट, केस ऑर्डर्स और केस स्टेटस अपलोड किए जाते हैं. [xi][xi] हालांकि केवल 36 प्रतिशत वेबसाइट्स पर ही कोर्ट का मैप दिखाई देता था और सिर्फ 32 प्रतिशत वेबसाइट्स पर ही अवकाश पर गए न्यायाधीशों के नाम प्रदर्शित होते थे.

2019 की विधि रिपोर्ट ने पाया कि 89 प्रतिशत निचली अदालतों की वेबसाइट्स पर ही केस लिस्ट, केस ऑर्डर्स और केस स्टेटस अपलोड किए जाते हैं. [xi] हालांकि केवल 36 प्रतिशत वेबसाइट्स पर ही कोर्ट का मैप दिखाई देता था और सिर्फ 32 प्रतिशत वेबसाइट्स पर ही अवकाश पर गए न्यायाधीशों के नाम प्रदर्शित होते थे.

इस बीच, 2021 में सीजेआई कार्यालय की ओर से करवाए गए सव्रेक्षण के अनुसार 72 प्रतिशत निचली अदालत परिसरों में डिजिटल  डिस्प्ले बोर्ड थे, जबकि 41 प्रतिशत के पास ही स्टूडियो आधारित वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) की सुविधा उपलब्ध थी. इसी सव्रेक्षण ने पाया कि 38 प्रतिशत निचली अदालत परिसरों में ही जेल के साथ वीडियो लिंक उपलब्ध थी, जबकि 14 प्रतिशत के पास मेडिकल ऑफिसर्स के साथ वीडियो लिंक मौजूद थी. (देखें फिगर 2)

फिगर-2. भारत की निचली अदालतों में उपलब्ध तकनीकी सुविधाएं

 

स्त्रोत : प्रशांत रेड्डी, एट अल., 2022. सुप्रीम कोर्ट के 2021 में करवाए गए 3,028 अदालत परिसरों के सर्वेक्षण पर आधारित

विधि के सर्वे को भारत के विभिन्न क्षेत्रों और राज्यों में डिजिटल विभाजन के सबूत मिले. उदाहरण के लिए, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड के न्यायालय परिसरों की तुलना में चंडीगढ़ और दिल्ली के सभी निचले न्यायालय परिसरों में ऐसी वेबसाइट्स थीं, जो उपयोगकर्ताओं के लिए ज्यादा सहायक थीं. मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और पुडुचेरी की वेबसाइटों में कोर्ट की तस्वीर और नक्शा तो था, लेकिन वहां उपयोगकर्ता के काम को आसान करने वाली अन्य कोई विशेषता नहीं थी, जिसकी वजह से उसका नेविगेशन सुविधाजनक हो पाता. खास बात तो यह थी कि उत्तरपूर्व क्षेत्र के अधिकांश राज्यों में अधिकांश जिला अदालतों के पास सुचारू वेबसाइट भी नहीं है. केवल कुछ चुनिंदा राज्य जैसे आंध्र प्रदेश, गोवा, हरियाणा, महाराष्ट्र और पंजाब के पास अपनी वेबसाइट्स में पर्याप्त नेविगेटिंग फीचर्स देखे गए.

बुनियादी सुविधाओं की उपेक्षा का लंबा इतिहास

सच तो यह है कि न्यायिक व्यवस्था में बुनियादी सुविधाओं का अभाव कोई हाल फिलहाल में पैदा नहीं हुआ है. विधि विशेषज्ञ  एम. पी. जैन इसकी जड़ 1790 में लॉर्ड कॉर्नवॉलिस के दौर में देखते हैं. अंग्रेजों का प्रशासन भी “आपराधिक अदालतों की अपर्याप्तता, न्यायाधीशों पर काम का दबाव, भारतीय न्यायाधीशों की अनुपस्थिति, अनिश्चित और विलंबित न्याय की संभावना से पीड़ित लोगों की अपराधियों पर मुकदमा चलाने की अनिच्छा की समस्या से निपटने में विफल रहा था.”[xii] [xii]

समकालीन युग में, 1988 में 127 वें विधि आयोग की रिपोर्ट ने भारत के न्यायिक बुनियादी ढांचे में, विशेषत: जिला स्तर पर, सुधार के लिए तत्काल उपाय करने पर बल दिया.[xiii][xiii] तब से, लगभग प्रत्येक विधि आयोग की रिपोर्टों ने इसी तरह बुनियादी ढांचे में सुधार का आह्वान किया है. ढांचागत मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए कई न्यायिक निर्देश भी दिए गए हैं. उदाहरण के लिए 2017 के इम्तियाज अहमद बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. और अन्य मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने विधि आयोग को “तत्काल ऐसे उपायों पर सिफारिशें करने का निर्देश दिया, जो अतिरिक्त अदालतों का निर्माण करें ताकि अदालती मामले और अन्य संबद्ध मामलों में होने वाली देरी को समाप्त करने में मदद करें और बकाया मामलों की त्वरित निकासी और इस पर आने वाली लागत में कमी लाए.”[xiv] [xiv] राज्यों की सरकारों ने अपने स्तर पर तो खर्च किया ही, लेकिन केंद्र सरकार ने 1993-94 में उस वक्त एक उल्लेखनीय कदम उठाया, जब उसने एक केंद्रीय योजना की शुरुआत की.

बुनियादी न्यायिक ढांचे में सुधार के लिए केंद्रीय योजना पर चर्चा

1993-94 में जिलों और अधीनस्थ न्यायपालिका के बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए केंद्र प्रायोजित योजना (सीएसएस) बनाई गई थी. [xv][xv] 1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद देश की विस्तारित न्याय वितरण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यह योजना तैयार की गई थी. केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय के तहत आने वाले न्याय विभाग द्वारा नियोजित और संचालित इस योजना के मार्फत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) को केंद्र की ओर से वित्तीय सहायता देने के प्रावधान को अनिवार्य किया गया था. इसका उद्देश्य जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए कोर्ट हॉल और न्यायिक अधिकारियों और न्यायाधीशों के लिए आवासीय इकाइयों का निर्माण किया जाना था. वित्त पोषण की इस योजना में केंद्र और राज्य के बीच 60:40 का अनुपात होता है. इसमें पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्य अपवाद हैं, जहां केंद्र सरकार 90 प्रतिशत वित्त पोषण उपलब्ध करवाती है और केंद्र शासित प्रदेश को 100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता देती हैं.

1993 में इसकी शुरुआत से लेकर 2020 तक, केंद्र सरकार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 7,460 करोड़ आवंटित कर चुकी है.[xvi][xvi] केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस योजना को और पांच वर्षों (2021-26) के लिए विस्तारित करने का निर्णय लेकर इसके लिए 5,357 करोड़ रुपए की वित्तीय प्रतिबद्धता स्वीकार की है.[xvii][xvii] हालांकि, हाल के वर्षो में केंद्र सरकार की ओर से मुहैया करवाए गए केंद्रीय धन के बावजूद, जिला और निचले स्तर की न्यायपालिका में बुनियादी ढांचे की कमी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है. ऐसे में केंद्रीय योजना अनेक चुनौतियों से घिरी हुई है.

फिगर 3. राज्य और केंद्र शासित प्रदेशवार सीएसएस फंड. (2019-20, करोड़ रुपये में)

स्त्रोत: केंद्रीय न्याय विभाग, भारत सरकार

फिगर 4. सीएसएस के लिए केंद्रीय अनुदान, 1993-94 से 2018-19 (करोड़ रुपए में)

स्त्रोत: विधि रिपोर्ट 2019

स्थायी बाधाएं

निचली अदालतों में मजबूत बुनियादी सुविधाओं में सुधार के लिए केंद्रीय योजना सुनिश्चित धन मुहैया कराने में सफल रही है. अनेक राज्य सरकारें, जो अपने दम पर ऐसा करने में सफल नहीं हो पाती थी, उनके लिए अब बेहतर न्यायालय परिसर और अन्य सुविधाओं का निर्माण करना इस वजह से संभव हो सका है. यदि सीएसएस इसे धीमा करने वाली बाधाओं को दूर करने में सफल हो जाए तो उसके माध्यम से कुछ और ज्यादा काम किया जा सकता है.

एक महत्वपूर्ण बाधा इसे मिलने वाला अनियमित अनुदान है. 1993-94 और 1996-97 के बीच आठवीं पंचवर्षीय योजना के तहत इसको केंद्रीय आवंटन मात्र 180 करोड़ रुपए का किया गया था. [xviii] [xviii] बाद के वर्षो में हालांकि इसमें थोड़ी बढ़ोत्तरी की गई और 2011 के अंत तक यह बढ़कर 1,245 करोड़ रुपए पहुंच गया था. इस हिसाब से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सालाना फंडिंग की औसत 69.18 करोड़ रुपये प्रति वर्ष आती है.

12 वीं पंचवर्षीय योजना के एक कार्य बल की रिपोर्ट के अनुसार, ‘न्यायपालिका की जरूरतों को देखते हुए सीएसएस के माध्यम से दिया जा रहा केंद्रीय वित्तपोषण बेहद अपर्याप्त और अनुपात में कम है. अपनी बात को साबित करने के लिए इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया गया कि 11 वीं पंचवर्षीय योजना में केवल 701.08 करोड़ का प्रावधान किया गया था. इसके हिसाब से सभी 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पांच वर्षो में केवल (लगभग) औसतन 20 करोड़ रुपए प्रति राज्य ही उपलब्ध करवाए गए. जिला और अधीनस्थ न्यायालयों की आवश्यकताओं का ताजा आकलन करने के बाद साफ हुआ कि उन्हें लगभग 7346 करोड़ रुपए की आवश्यकता थी. [xix][xix]

2011-12 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील मोर्चे (यूपीए) की सरकार के तहत केंद्रीय योजना को दिए जाने वाले आवंटन में थोड़ी वृद्धि हुई और यह 595.74 करोड़ रुपए हो गया. इसके बाद 2011 से लगातार केंद्र सरकार ने औसतन 693 करोड़ रुपए राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को जारी किए. अब भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चे (एनडीए) की सरकार ने इस योजना के तहत 9,000 करोड़ रुपए का आवंटन (इसमें राज्य सरकारों का 40 प्रतिशत आवंटन भी शामिल है) किया है, जिसकी वजह से न्यायालयीन बुनियादी ढांचे के विकास को गति मिल सकेगी.

हालांकि वित्तपोषण उपलब्ध करवाना ही काफी नहीं है. इस मामले में राज्य सरकारों की उदासीनता सबसे बड़ी चुनौती है. यह इस बात से साबित होता है कि उपलब्ध करवाए गए पैसे को खर्च भी नहीं किया गया, जिसकी वजह से यह पैसा अंतत: वापस चला गया. उदाहरण के तौर पर 2019-20 सीएसएस के तहत आवंटित 91 प्रतिशत आवंटन का उपयोग ही नहीं किया गया. अर्थात इसके लिए राज्यों को आवंटित 981.98 करोड़ में से केवल पांच राज्यों ने ही 84.9 करोड़ रुपए खर्च किए थे.[xx] [xx]

2011-12 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील मोर्चे (यूपीए) की सरकार के तहत केंद्रीय योजना को दिए जाने वाले आवंटन में थोड़ी वृद्धि हुई और यह 595.74 करोड़ रुपए हो गया. इसके बाद 2011 से लगातार केंद्र सरकार ने औसतन 693 करोड़ रुपए राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को जारी किए. 

सीएसएस के तहत आवंटित राशि को खर्च न करने के अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन इसमें सबसे पहला कारण यह है कि राज्यों की वित्तीय हालत ठीक नहीं है. सीएसएस के नियमानुसार केंद्र सरकार की ओर से मिलने वाली राशि की तुलना में राज्य सरकारों को भी 40 प्रतिशत राशि अपनी ओर से देनी है. और अधिकांश राज्य सरकारें लगातार इस शर्त को पूरा करने में विफल रही हैं.[xxi][xxi] परिणामस्वरूप आवंटित राशि या तो खर्च नहीं होती अथवा वापस चली जाती है. अध्ययन से यह भी पता चला है कि कुछ राज्य सरकारों ने न्यायालयीन सुविधाओं में सुधार के लिए आवंटित राशि को किसी अन्य परियोजना पर खर्च कर दिया. तीसरी समस्या विभिन्न प्राधिकारों के बीच समन्वय का अभाव रुकावट बन जाता है. 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार जिला अदालतों के लिए जारी की गई राशि प्रमुख विभागों, वित्त, कानून, गृह मंत्रालय, जिलाधिकारी, सार्वजनिक निर्माण, के बीच समन्वय के अभाव की वजह से खर्च नहीं हो सकी. [xxii] [xxii] उदाहरण के तौर पर केरल के इड्डकी में एक ट्रायल कोर्ट परिसर का काम 1997 से चल रहा है, लेकिन प्रशासनिक लालफीताशाही और संस्थागत निष्क्रियता की वजह से काम पूर्ण नहीं हो रहा है.[xxiii][xxiii]

सीएसएस में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को लेकर ज्य़ादा ज़ोर नहीं दिए जाने की वजह से भी परेशानी बढ़ी है. आरंभ से ही इस बात को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि क्यों कुछ राज्यों को अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा पैसा दिया गया. यह योजना 1993 से ही लागू है, लेकिन इसके माध्यम से होने वाले खर्च पर निगरानी रखने के लिए कोई भी जानकारी सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध नहीं है.

सीएसएस में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को लेकर ज्य़ादा ज़ोर नहीं दिए जाने की वजह से भी परेशानी बढ़ी है. आरंभ से ही इस बात को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि क्यों कुछ राज्यों को अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा पैसा दिया गया. यह योजना 1993 से ही लागू है, लेकिन इसके माध्यम से होने वाले खर्च पर निगरानी रखने के लिए कोई भी जानकारी सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध नहीं है. विधि [xxiv][xxiv] की ओर से किए गए एक आकलन के अनुसार केंद्रीय योजना के तहत अब तक कितने अदालती कक्षों का निर्माण किया गया इस बात की कोई जानकारी जनता के लिए सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है. इतना ही नहीं, इस योजना के तहत ही जिला, राज्य और केंद्रीय स्तर पर निगरानी करने वाली समिति की व्यवस्था की गई है, लेकिन इन समितियों की रिपोर्ट, यदि कोई है, को सार्वजनिक नहीं किया जाता. दशकों के बाद न्याय विभाग ने 2018 में एक एजेंसी को नियुक्त कर इस योजना का मूल्यांकन करने की जिम्मेदारी सौंपी. इस एजेंसी की रिपोर्ट ने अधिकांश दोष राज्य सरकारों के माथे पर थोप दिया.[xxv][xxv]

अंत में, जैसा कि विधि की रिपोर्ट में  कहा गया है, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की खामियां, इसकी अकार्यक्षमता में वृद्धि करती है.[xxvi] [xxvi]  केंद्र सरकार अपने पास उपलब्ध वित्तीय संसाधनों को देखकर अपने हिस्से की राशि जारी कर देती है और फिर यह उम्मीद करती है कि उस वक्त लागू अनुपात के हिसाब से राज्य सरकार भी इसके लिए राशि की व्यवस्था करें. हालांकि अधिकांश राज्य सरकारें यह मानती हैं कि उसने केंद्र सरकार को जो अपनी कार्य योजना  सौंपी है, केंद्र उसे ध्यान में रखकर अपने हिस्से की राशि आवंटित कर देगा. विधि की रिपोर्ट के अनुसार यह भ्रम केंद्रीय न्याय विभाग और राज्य सरकारों के बीच होने वाले पत्रचार से स्पष्ट हो जाता है.[xxvii][xxvii] ऐसे में सीएसएस का दृष्टिकोण साफ होने और केंद्र में लगातार आने वाली सरकारों द्वारा इसके लिए पर्याप्त राशि भी आवंटित होने के बावजूद, इस योजना को बनाने के दौरान रह गई त्रुटियां और राज्य सरकारों के हिस्से में रुचि की कमी और इसे अपनाने की अनिच्छा इसकी प्रभावशीलता को लड़खड़ाने पर मजबूर कर देती हैं.

अनुपस्थित समाधान: संस्थागत परवाह़

केंद्रीय योजना और उसकी सीमाओं से परे जाकर, न्यायपालिका में ढांचागत सुविधाओं के संकट को सरकार की अपनी ही एक प्रमुख शाखा में आवश्यक परिवर्तन लाने संबंधी राजनीतिक उदासीनता के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. न्यायालय की ऐतिहासिक उपेक्षा के कारण, जैसा कि सीजेआई रामन्ना ने कहा,[xxviii][xxviii] अपर्याप्त संस्थागत परवाह की वजह से इन खामियों को लेकर ध्यान नहीं दिया गया और परिणामस्वरूप न्याय प्रदान करने की व्यवस्था, विशेषत: गरीबों के मामले में प्रभावित हुई. न्यायिक शाखा के लिए बजट में किया जाने वाला वित्तीय आवंटन इस बात की गवाही देता है. आजादी के बाद के सात दशकों में न्यायपालिका के लिए बजट में किया जाने वाला वित्तीय आवंटन (इसमें राज्य सरकार का आवंटन भी शामिल है) अभी भी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1 प्रतिशत से काफी नीचे ही है.

2011-12 और 2015-2016 के बीच भारत के वार्षिक बजट में न्यायपालिका पर होने वाला वार्षिक औसत खर्च सकल घरेलू उत्पाद का महज 0.08 प्रतिशत था. [xxix][xxix] केंद्र सरकार ने 13 वें और 14 वें वित्त आयोग में इसमें थोड़ी वृद्धि की है, लेकिन फिर भी यह चिंता का विषय ही बना हुआ है.[xxx] [xxx] इतना ही नहीं, केंद्रीय बजट में न्यायपालिका के लिए होने वाला आवंटन भी अपर्याप्त और अनियमित ही है. उदाहरण के तौर पर, देश में लंबित मामलों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है और न्यायालयीन बुनियादी ढांचा, मामलों की लंबी सूची पर बढ़ रहे दबाव से निपटने में असमर्थ दिख रहा है. इसके बावजूद 2019-20 के केंद्रीय बजट में न्यायलयीन बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए पूर्व के 990 करोड़ के आवंटन पर कैंची चलाकर इसे 762 करोड़ कर दिया गया. [xxxi][xxxi]

ढांचागत सुविधाओं में विस्तार के सामने सबसे पहली और मुख्य चुनौती पैसों की कमी नहीं, बल्कि संघीय बाधाओं को दूर करना और संबंधित राज्य सरकारों को इस मामले में अपनी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार करना है. इस दिशा में काम किया जा सकता है यदि विधि विभाग (डीओजे) इसके लिए जरूरी नेतृत्व दिखाते हुए राज्य स्तरीय अधिकारियों के साथ अपनी बातचीत को बढ़ाकर केंद्रीय योजनाओं पर अमल तय समय के भीतर पूरा करना सुनिश्चित कर सके. 

इसके साथ ही राज्य सरकार भी इस गंभीर आवश्यकता को लेकर अनुत्साहित दिखाई दे रही है और उन्होंने भी अपने बजटीय आवंटन से यह बात साबित की है. उदाहरण के तौर पर राज्यों ने अपने समग्र बजट में न्यायालयीन सुविधाओं में सुधार के लिए 2 प्रतिशत से भी कम राशि आवंटित की है. इसमें केवल महाराष्ट्र को ही अपवाद माना जाएगा, जिसने अपने बजट का दो प्रतिशत इस कार्य के लिए रखा है.[xxxii][xxxii] डीएकेएसएच और सेंटर फॉर बजट एंड गर्वनंस अकाउंटिबिलीटी (सीबीजीए) की रिपोर्ट में हालांकि एक सुनहरी किरण देखी जा सकती है: जहां केंद्र और राज्य सरकारों का न्यायपालिका पर होने वाला संयुक्त खर्च 2016-17 और 2018-19 में बढ़कर 53 प्रतिशत हो गया, वहीं जमीनी स्तर पर राज्य सरकार ने अपनी ओर से इस आवंटन में लगभग 92 प्रतिशत का हिस्सा दिया.[xxxiii][xxxiii]

अनुशंसा एवं निष्कर्ष

वर्षो तक धीमी गति से आगे बढ़ने के बाद अब देश की अदालतों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के मुद्दे को वह महत्व मिलने लगा है, जो उसे मिलना चाहिए था. और इसके लिए वर्तमान सीजेआई के दृढ़ प्रयासों को श्रेय दिया जाना चाहिए. सन् 2021 में न्यायाधीश रामन्ना ने नेशनल ज्युडिशियल इंफ्रास्ट्रक्चर कार्पोरेशन (एनजेआईसी) के गठन का सुझाव दिया था ताकि न्याय व्यवस्था में बुनियादी सुविधाओं की खामियों को दूर किया जा सके.[xxxiv][xxxiv] भूमि आवंटन में होने वाली देरी जैसे जटिल मुद्दे, आवंटित राशि का गैर-न्यायिक कार्य के लिए उपयोग करने, उच्च न्यायालय और ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनी जिम्मेदारी से बचने जैसे अन्य मुद्दों की निगरानी और उन्हें हल एनजेआईसी को करना था. [xxxv][xxxv] एनजेआईसी, जिसमें सीजेआई, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, केंद्र और संबंधित राज्यों के वित्त सचिव शामिल होंगे, का उपयोग कर प्रशासनिक रुकावटों और चुनौतियों को समन्वय साधकर समाप्त किया जा सकेगा.

हालांकि, विश्लेषकों ने इस बात पर संदेह जताया है कि क्या इस तरह की केंद्रीय एजेंसी की इस समय ज़रूरत है.[xxxvi][xxxvi] इन निरीक्षकों ने चेताया है कि यदि किसी नई संस्था के पास अधिकार एकत्रित हो जाएंगे तो यह संघीय ढांचे के आदर्शो के खिलाफ़ होगा. इसी प्रकार एनजेआईसी किसी राज्य को ज्य़ादा खर्च करने पर मजबूर नहीं कर सकता और न ही राज्य उसे अपने अधिकारों में दखल की अनुमति ही देंगे. इसी तरह बुनियादी सुविधाओं के सुधार की योजनाओं, विशेषत: सीएसएस के अनुदान से होने वाले कार्यो की प्रक्रिया काफी ऊबाऊ और थकानेवाली है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों के बीच काफी पत्रचार होता है. इसके अलावा भूमि अधिगृहण, निविदाकरण और निविदा आवंटन के साथ ही योजना पर होने वाले कार्य का प्रत्यक्ष निरीक्षण करने जैसे मसलों पर समन्वय को लेकर भी अनेक मुद्दे होते हैं. इन सब के लिए एनजेआईसी को काफी मेहनत करनी होगी और उसे काफी वक्त की आवश्यकता होगी.

निचली अदालतों में न्यायिक बुनियादी ढांचे का मुद्दा एक जटिल संघीय मामला है, जिसे चतुराई के साथ संभाले जाने की आवश्यकता है. ऐसे में अन्य वैक्लपिक विचारों पर ज्यादा गौर किया जाना चाहिए.

ढांचागत सुविधाओं में विस्तार के सामने सबसे पहली और मुख्य चुनौती पैसों की कमी नहीं, बल्कि संघीय बाधाओं को दूर करना और संबंधित राज्य सरकारों को इस मामले में अपनी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार करना है. इस दिशा में काम किया जा सकता है यदि विधि विभाग (डीओजे) इसके लिए जरूरी नेतृत्व दिखाते हुए राज्य स्तरीय अधिकारियों के साथ अपनी बातचीत को बढ़ाकर केंद्रीय योजनाओं पर अमल तय समय के भीतर पूरा करना सुनिश्चित कर सके. यह न्यायसंगत ही होगा कि विधि विभाग (डीओजे) अपनी एकपक्षीय फैसले लेने की संस्कृति को छोड़कर न्यायपालिका में बुनियादी सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए किए जाने वाली बजटीय मांग पर राज्य सरकारों से बातचीत करने की कोशिश करे.  ऐसा इसलिए होना चाहिए, क्योंकि विधि विभाग की ओर से राज्यों को होने वाला आवंटन मनमाने ढंग से तय किया जाता है. राज्यों को होने वाले असंतुलित वित्तीय आवंटन को संसद की स्थायी समितियों ने भी बार-बार एक अहम मुद्दा माना है.[xxxvii][xxxvii] राज्य सरकारों को यदि बराबरी का हिस्सेदार बनाया गया तो उन्हें केंद्रीय योजनाओं के अमल को लेकर अपनी जिम्मेदारी का अहसास भी करवाया जा सकेगा.

दूसरी बात यह है कि सीएसएस के माध्यम से आवंटित होने वाली राशि साल दर साल बड़ी मात्रा में खर्च ही नहीं की जाती. इसके लिए सीएसएस के दिशा निर्देशों में लचीलेपन का आभाव है, जिसकी वजह से राज्य सरकारों पर अन्य ढांचागत सुविधाओं को बढ़ाने पर जोर दिया जाता है. इस समस्या को 2021 में तैयार किये गए सीएसएस के नए दिशा निर्देशों ने और भी जटिल बना दिया, जिसमें अदालत कक्ष और आवासीय परिसर के निर्माण को अन्य योजनाओं के मुकाबले प्राथमिकता देने को कहा गया. [xxxviii] [xxxviii] नीति आयोग की ओर से ‘फ्लेक्सी फंड्स’ को लेकर जारी दिशा निर्देशों, जिसमें सीएसएस के माध्यम से आवंटित राशि के कुछ प्रतिशत तक लचीले उपयोग की अनुमति राज्य सरकार को दी गई थी, को न्यायालयीन बुनियादी सुविधाओं में वृद्धि के लिए आवंटित राशि के कम खर्च होने की लंबे समय से चली आ रही समस्या के हल के रूप में देखा जा सकता है. [xxxix] [xxxix]

तीसरी बात यह है कि एनजेआईसी का गठन करने की बजाय, विधि विभाग वरिष्ठता अथवा पदानुक्रम की रेखाओं को वहां विकेंद्रीकृत और स्पष्ट कर सकता है, जहां उच्च न्यायालयों के स्तर पर न्यायिक बुनियादी ढांचे के लिए केंद्रीय योजना का कार्यान्वयन हो रहा है. जवाबदेही बनाए रखने का एक तरीका उच्च और अधीनस्थ न्यायालयों की वेबसाइटों को अपडेट करना अनिवार्य करना है. इससे यह सुनिश्चित हो सकता है कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की प्रगति को पारदर्शी बनाकर इसके बारे में जानकारी की जांच करने को जनता के लिए आसान बनाया जा सके. इसके अलावा, सिविल सोसायटी अर्थात समाज को इन योजनाओं की जानकारी देकर भी जवाबदेही को बढ़ाया जा सकता है.

चौथी बात यह कि केंद्रीय योजनाओं को और भी प्रभावी बनाने एक तरीका यह भी है कि इसके क्रियान्वयन का अंकेक्षण समय समय पर किया जाए ताकि यह देखा जा सके कि बुनियादी सुविधाओं में सुधार के लिए आवंटित राशि समय पर खर्च हो रही है अथवा नहीं. इसके साथ ही एक यह भी सुझाव है कि योजना को विस्तार देने से पहले ही इसके वित्तीय और भौतिक प्रदर्शन का भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) से अंकेक्षण करवाया जाए. सालाना अंकेक्षण की रपट को भी नियमित अंतराल से सार्वजनिक किया जाए, ताकि यह पता चल सके कि आखिर पैसों का आवंटन कहां किया गया है.

अंत में, निचली न्यायपालिका के बुनियादी ढांचे में सुधार मात्रात्मक पहलुओं से आगे बढ़ना चाहिए. गुणवत्ता और अन्य प्रमुख मानकों की कीमत पर अधिक अदालत कक्ष और आवासीय परिसरों का निर्माण नहीं होना चाहिए. न्यायालय परिसरों का निर्माण करते वक्त राष्ट्रीय न्यायालय प्रबंधन प्रणाली समिति द्वारा निर्धारित बुनियादी मापदंड, जैसे कि नेविगेशन, अदालत तक पहुंचने में आसानी, प्रतीक्षा क्षेत्र, बाधा मुक्त पहुंच, केस की जानकारी देने वाली सूची का प्रदर्शन, सुरक्षा, सुविधाएं और शौचालय आदि सुविधाओं की उपलब्धता के मुद्दे का भी कड़ाई से पालन होना चाहिए. इसके साथ ही मौजूदा अदालत कक्षों को आधुनिक बनाने और उन्हें बेहतर तकनीक से लैस करने के प्रयास भी साथ-साथ होने चाहिए.

निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार, न्याय तक समान पहुंच और संपूर्ण न्याय प्रणाली पर नागरिकों के बीच विश्वास की भावना नागरिकों और राज्य के बीच, सामाजिक अनुबंध के महत्वपूर्ण घटक हैं. सामाजिक न्याय के अपने व्यापक दृष्टिकोण को देखते हुए, न्यायपालिका और न्यायिक सेवाएं एक ऐसा सार्वभौम कार्य है, जिसके साथ कोई छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जा सकती और यह प्रदान करने की ज़िम्मेदारी केवल राज्य के पास होती है.

निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार, न्याय तक समान पहुंच और संपूर्ण न्याय प्रणाली पर नागरिकों के बीच विश्वास की भावना नागरिकों और राज्य के बीच, सामाजिक अनुबंध के महत्वपूर्ण घटक हैं. सामाजिक न्याय के अपने व्यापक दृष्टिकोण को देखते हुए, न्यायपालिका और न्यायिक सेवाएं एक ऐसा सार्वभौम कार्य है, जिसके साथ कोई छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जा सकती और यह प्रदान करने की ज़िम्मेदारी केवल राज्य के पास होती है. संविधान निर्माताओं ने प्रक्रिया को संस्थागत बनाने के लिए कई प्रावधान, विशेष रूप से अनुच्छेद 38 और 39, लाए थे. ऐसा इसलिए किया गया था, क्योंकि उन्होंने एक असमान समाज में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों को आगे बढ़ाने में एक कार्यशील न्याय प्रणाली की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया था.

अनुच्छेद 38(1) की आवश्यकता है कि राज्य “एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को सुरिक्षत और संरिक्षत करने का प्रयास करेगा, जिसमें न्याय को, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को सूचित किया जाएगा.”[xl][xl] सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में, निष्पक्ष, वहन करने योग्य और त्वरित न्याय के इन संवैधानिक लक्ष्यों पर प्रकाश डाला है. ऐसे में एक सार्वभौम कार्य, जिसके साथ कोई छेड़छाड़ बर्दाश्त के बाहर होती है, को लेकर केंद्र और राज्यों दोनों को न्यायिक दक्षता के मूलभूत पहलुओं को संबोधित करना होगा.

अत: मौजूदा केंद्रीय योजना में आमूलचूल परिवर्तन लाने के लिए यह अनिवार्य है कि विधि विभाग एक एंकर की भूमिका अदा करते हुए राज्यों और संबंधित संस्थानों को एक दिशा में सोचने के लिए तैयार करें. कुछ प्रमुख केंद्रीय योजनाओं को सफल बनाने के लिए केंद्र की नियोजित रणनीति और संसाधनों को इस क्षेत्र में गंभीरता से लागू किया जा सकता है और इसे लागू किया जाना चाहिए.


निरंजन साहू, ओआरएफ़ में सीनियर फेलो हैं.

जिब्रान. खान, डॉ. राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिविर्सटी, लखनऊ से स्नातक हैं और पीएलआर चेम्बर्स, दिल्ली के एसोसिएट हैं.


एंडनोट्स:

  • In the judicial hierarchy, district and subordinate courts are at the lowest levels after the Supreme Court and High Courts. District courts run by the state governments are headed by a district judge who is aided by additional district judges. The subordinate courts, which cover civil cases, are considered as Junior Civil Judge Court, Principal Junior and Senior Civil Judge Court, which are also known as Sub Courts, Subordinate Courts. These courts are treated in ascending order. The subordinate courts dealing with criminal cases are Second Class Judicial Magistrate Court, First Class Judicial Magistrate Court, and Chief Judicial Magistrate Court, along with family courts. See: https://blog.ipleaders.in/courts-justice-system-india/Subordinate
  • This would include a computer at the judge’s dais, with video-conferencing facility.

[i] Judicial Infrastructure Key to Improving access to justice says CJI”, The Hindu, October 23, 2021.

[ii] Satya Prakash, “Burden on Judiciary, what forced CJI Thakur to break down before PM”, The Hindustan Times, April 25, 2016.

[iii] Bhadra Sinha, Soibam Rocky Singh and Satya Prakash,  “Few Judges, Fewer Courtrooms Indian Judiciary tripped by poor infrastructure”, The Hindustan Times , November 16, 2016.

[iv] Reshma Sekhar, Sumathi Chandrashekharan and Diksha Sanyal, “Building Better CourtsVIDHI, 2019.

[v] ]  Pradeep Thakur, “COVID hits justice delivery Backlog of cases rises 19% in a year, crosses 4.4 crore”. The Times of India, April 16, 2021.

[vi] Thakur, “COVID hits justice delivery Backlog of cases rises 19% in a year, crosses 4.4 crore”.

[vii] Reshma Sekhar et al 2019.

[viii] Prashant Reddy and Chitrakshi Jain, “India needs judicial reforms – but granting more powers to the chief justice won’t solve anything”, Scroll,  February 24, 2022.

[ix] Reddy and Jain, “India needs judicial reforms – but granting more powers to the chief justice won’t solve anything”.

[x] See Bhadra Sinha,  “What is NJIC? Agency to Monitor Infrastructure development in Trial Courts, proposed by CJI”, The Print,  September 23, 2021.

[xi] Reshma Sekhar et al., 2019

[xii] Cited from S.Muralidhar, “Access to Justice”, Seminar, May, 2005.

[xiii] 127 Law Commission Report, 1988.

[xiv] Imtiyaz Ahmad v. State of Uttar Pradesh, (2012) 2 SCC 688.

[xv] Nyaya Vikas, The Department of Justice.

[xvi] Chitrakshi Jain, Shreya Tripathy and Tarika Jain, “Budgeting Better for Courts- An Evaluation of 7460 crores released under the Centrally Sponsored Scheme for Judicial Infrastructure,” Vidhi Centre for Legal Policy, 03 September,  2019.

[xvii]Cabinet Extends by 5 years, Centrally Sponsored Scheme for developing Infrastructure for Judiciary”, The Economic Times, July 14, 2021.

[xviii] Chitrakshi Jain et al., 2019.

[xix] Report of Working Group for the Twelfth Five Year Plan 2012-2017.

[xx] Soibam Rocky Singh, “Judicial Infrastructure a Neglected Case”, The Hindu, December 6, 2021.

[xxi] See Bhadra Sinha  , The Print, 2021,

[xxii] Chitrakshi Jain et al., 2019.

[xxiii] PTI, November 16, 2021,

[xxiv] Chitrakshi Jain et al., 2019.

[xxv] Bhadra Sinha, 2021

[xxvi] Chitrakshi Jain et al., 2019.

[xxvii] Chitrakshi Jain et al., 2019.

[xxviii] ]  Utkarsh Anand,  “Judicial Infrastructure Neglected after Independence says CJI”, The Hindustan Times, 12 September, 2021.

[xxix] India Justice Report, 2020, Tata Trusts.

[xxx] Niyati Singh, “India spends only 0.08% of GDP on Judiciary, crippling reforms”, India Spend, November 30, 2019.

[xxxi] Soni Mishra,  Budget 2020: Allocation for Judiciary Expenditure has been reduced. The Week, February 1, 2020.

[xxxii] Chitrakshi Jain et al 2019.

[xxxiii] Yash Agarwal, “India Spends 0.1% on the judiciary as against 2% of the GDP on Defence”, National Herald, October 10, 2020

[xxxiv] Badra Sinha 2021

[xxxv] Niranjan Sahoo and Jibran Khan, “Judicial Infrastructure: Will National Judicial Infrastructure Corporation help?” December 22, 2021.

[xxxvi] Prashant Reddy et al 2022. Also Niranjan Sahoo et al 2021.

[xxxvii] Chitrakshi Jain et al 2019.

[xxxviii] Department of Justice, Government of India, August 2021.

[xxxix] Ministry of Finance, Government of India, 06 September, 2016.

[xl] For an excellent discussion, see Aparna Chandra, “Indian Judiciary and Access to Justice: An Appraisal of Approaches”,  2016.

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