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Published on Aug 29, 2025 Updated 0 Hours ago

सुरक्षित क्वांटम संचार और AI-संचालित ऑटोमेशन परमाणु कमान तंत्रों में बदलाव ला रहे हैं, जिससे मुश्किलों से निपटने का नया सामर्थ्य और नए ख़तरे, दोनों पैदा हो रहे हैं. 

न्यूक्लियर कमांड का नया दौर: क्वांटम कम्युनिकेशन और AI की भूमिका

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मई 2025 में पर्ड्यू यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया, जिसमें एक चालू परमाणु रिएक्टर (PUR-1, यानी पर्ड्यू यूनिवर्सिटी रिएक्टर संख्या एक, जो इस विश्वविद्यालय के अधीन एक अनुसंधान परमाणु रिएक्टर है) में क्वांटम-सुरक्षित संचार तंत्र का प्रदर्शन किया गया. इस उपलब्धि से यह बात साफ़ हो गई कि क्वांटम कुंजी वितरण (QKD) विलंबता-संवेदनशील परमाणु नियंत्रण प्रणालियों (काफ़ी कम समय में अत्यधिक तेज़ी से जवाब देने वाली परमाणु नियंत्रण प्रणालियां) को वास्तविक समय में सक्रिय कर सकता है. यह उभरते ख़तरों को देखते हुए महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए काफ़ी ज़रूरी है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ऑटोमेशन को भी इसमें शामिल कर लेना चाहिए. क्वांटम-सुरक्षित रिएक्टर प्रणालियों में स्वचालित नियंत्रण की व्यवस्था होने से वे कहीं अधिक तेज़ और समय पर प्रतिक्रियाएं दे सकती हैं. यह प्रयोग परमाणु क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो परमाणु कमान, नियंत्रण और संचार (NC3) को नया रूप दे रहा है.

भले ही क्वांटम कंप्यूटर से खुफ़िया संचार और प्रक्षेपण प्रणालियों की सुरक्षा करने वाले क्रिप्टोग्राफिक प्रोटोकॉल के टूटने का ख़तरा बढ़ जाता है, लेकिन यह सुरक्षित संचार की राह भी बनाता है. यही विरोधाभास एक वैकल्पिक सुरक्षा ढांचा और संचार तंत्र उपलब्ध कराता है, जिससे मौजूदा सुरक्षा मॉडलों को अस्थिर करने की क्वांटम प्रौद्योगिकियों की क्षमता का समाधान निकल सकता है. क्वांटम एन्क्रिप्शन और संचार तंत्रों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सुरक्षा के अलावा AI से जोखिमों के बेहतर प्रबंधन और उसके निपटारे की ताक़त मिलने की उम्मीद है.

NC3 तंत्र आज पूर्व-चेतावनी संदेशों और उच्च-स्तरीय डेटा लिंक नियंत्रण के माध्यम से प्रक्षेपण को सुरक्षित करने के लिए इन्हीं पारंपरिक क्रिप्टो प्रोटोकॉल पर निर्भर है. यदि एक या अन्य घटकों की विफलता के बावजूद कोई क्वांटम कंप्यूटर ऑनलाइन हो जाए, तो वह खुफ़िया सैन्य संचार में सेंध लगा सकता है. इतना ही नहीं, वह परमाणु नियंत्रण का विकल्प भी बना सकता है, यहां तक कि नकली कमांड आदेश जारी कर सकता है. इस कारण, इससे रक्षात्मक रणनीतियां चुराई जा सकती हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा पैदा हो सकता है. हालांकि, बड़े पैमाने वाले क्वांटम कंप्यूटर को हक़ीक़त बनने में अभी एक दशक और लग सकता है, लेकिन सुरक्षा संबंधी ख़तरा आज से ही पैदा हो गया है. विरोधी अब एन्क्रिप्टेड, यानी सुरक्षित डेटा को इकट्ठा कर सकते हैं और आने वाले दिनों में क्वांटम क्षमताएं उपलब्ध होने पर उसका तोड़ निकाल सकते हैं. इस तरीके को ‘अभी इकट्ठा करें और बाद में सेंध लगाएं’ कहा जाता है.

बड़े पैमाने वाले क्वांटम कंप्यूटर को हक़ीक़त बनने में अभी एक दशक और लग सकता है, लेकिन सुरक्षा संबंधी ख़तरा आज से ही पैदा हो गया है. विरोधी अब एन्क्रिप्टेड, यानी सुरक्षित डेटा को इकट्ठा कर सकते हैं और आने वाले दिनों में क्वांटम क्षमताएं उपलब्ध होने पर उसका तोड़ निकाल सकते हैं.

तकनीकी कमज़ोरियों के अलावा, क्वांटम कंप्यूटिंग से परमाणु स्थिरता को भी सामरिक ख़तरा पैदा हो सकता है. NC3 न सिर्फ क्वांटम तकनीकों द्वारा, बल्कि ऑटोमेशन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा भी तैयार हो रहा है. राजनेताओं, सैन्य कमानों और रणनीतिक मंचों के बीच भरोसेमंद और समय पर संचार परमाणु सुरक्षा की बुनियाद है. अगर इसमें कुछ भी गड़बड़ी हुई, तो नतीजा विनाशकारी निकल सकता है. NC3 संकेतों का यदि तोड़ निकाल लिया जाए, तो दुश्मन परमाणु आदेशों को रोक सकता है या उसे नकली आदेश दे सकता है. इसके साथ ही, क्वांटम की मदद से होने वाले साइबर हमले उपग्रह से मिलने वाले संदेशों और पूर्व-चेतावनी प्रणालियों को ख़तरे में डाल सकते हैं, जिससे झूठी चेतावनी जारी की जा सकती है या जोखिम को देखते हुए तैयारी के कामों में देरी की जा सकती है. इसके अलावा, प्रतिस्पर्धी देशों से पहले ऐसी क्षमताओं का विकास कर उन देशों की जवाबी कार्रवाई की क्षमता को कम किया जा सकता है. यह ताक़त में असंतुलन बढ़ा सकता है और परमाणु शक्ति से संपन्न देशों को उस ‘लॉन्च ऑन वार्निंग’ स्थिति में ला सकता है, जब वे किसी परमाणु मिसाइल हमले की चेतावनी मिलने पर, दुश्मन की मिसाइलों के वास्तव में विस्फोट होने से पहले ही जवाबी परमाणु हमला कर दें. 

हालांकि, जैसे-जैसे ऑटोमेशन और AI तकनीकें आगे बढ़ेगी, यह ‘लॉन्च ऑन वार्निंग’ नीति राष्ट्रीय कमान, नियंत्रण और संचार (NC3) में AI और ऑटोनोमस सिस्टम पर निर्भरता भी बढ़ाएगी, जिससे ख़तरे का पता लगाने और स्वचालन से उसे बेअसर करना संभव होगा. यह बदलाव फ़ैसले लेने की प्रक्रियाओं में तेज़ी ला सकता है और इंसानी दख़ल के कारण होने वाली देरी को कम कर सकता है. वैसे, ऐसी प्रणालियों के खुद-ब-खुद संचालित होने से तनाव में अप्रत्याशित वृद्धि हो सकती है या गलत फ़ैसले लिए जा सकते हैं, और AI एल्गोरिदम में पारदर्शिता की कमी भी हो सकती है, ख़ास तौर से यदि उनके पास इंसानी निगरानी के बिना परमाणु हमले करने की क्षमता हो.

 

क्वांटम एन्क्रिप्शन- एक नई सुरक्षा संरचना

बेशक, क्वांटम कम्प्यूटिंग से आज के एन्क्रिप्शन का तोड़ निकाला जा सकता है, लेकिन QKD से एक भरोसेमंद सुरक्षा मिलती है, जो एन्क्रिप्टेड एक्सचेंज प्रोटोकॉल में सेंध लगाने के किसी भी प्रयास का पता लगा सकता है. जब इसे परमाणु सुरक्षा या अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में लागू किया जाएगा, तो यह सुनिश्चित करेगा कि राष्ट्रीय कमांड केंद्रों, पनडुब्बियों और मिसाइल साइलो के बीच सुरक्षित QKD लिंक ऐसी संचार प्रणाली बनाए, जिसे कोई भेद न सके. इससे महत्वपूर्ण डेटा सुरक्षित रहेगा. साथ ही, परमाणु संयंत्रों और रासायनिक या जैविक प्रयोगशालाओं जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों से जुड़ी संवेदनशील जानकारियों को क्वांटम-एन्क्रिप्टेड नेटवर्क पर सुरक्षित रूप से साझा किया जा सकेगा. कुल मिलाकर, QKD हथियारों के नियंत्रण से जुड़ी निगरानी व्यवस्था और सत्यापन डेटा से जुड़े संचार को सुरक्षित रखने में मदद करेगा, साथ ही संचार चैनल पर उभरते ख़तरों का पता लगाते हुए गोपनीय जानकारी सुरक्षित रखेगा.

हालांकि, अभी तक किसी भी देश ने सुरक्षा के लिए सीधे तौर पर QKD संचार चैनलों का इस्तेमाल नहीं किया है, लेकिन यूरोपीय संघ (EU), चीन और अमेरिका ने इस दिशा में कुछ प्रयास किए हैं. यूरोपीय संघ ने रणनीतिक संचार को बढ़ाने के लिए EuroQCI (यूरोपियन क्वांटम कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर) परियोजना शुरू की है, जबकि चीन के मिसियस उपग्रह ने 2017 में ही अंतर-महाद्वीपीय क्वांटम-एन्क्रिप्टेड संचार की थी, जिससे सुरक्षित परमाणु कूटनीति की संभावनाएं खुल गई है. अमेरिका के पास भी अपना क्वांटम संचार नेटवर्क है और उसने क्वांटम संचार, इन्फ्रास्ट्रक्चर व विभिन्न एजेंसियों में आपसी तालमेल को लेकर रणनीति बनाई है. अमेरिका ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी नीतियों में AI को भी शामिल किया है, ताकि त्वरित ख़तरों का विश्लेषण हो सके और सुरक्षित संचार को आगे बढ़ाया जा सके.

 

भारत क्या कर सकता है?

भारत ‘क्वांटम शोध से उसके क्रियान्वयन की ओर’ तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसमें राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (2023-2031) भरपूर मदद कर रहा है. इस मिशन के तहत क्वांटम संचार और एन्क्रिप्शन में स्वदेशी क्षमताओं के विकास के लिए 6,000 करोड़ रुपये से अधिक का आवंटन किया गया है. प्रमुख उपलब्धियों की बात करें, तो रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), दिल्ली द्वारा उलझाव वाला QKD का प्रदर्शन उल्लेखनीय है, जिसमें बिना केबलों के क्वांटम का संचार किया गया.   

भारत के सुरक्षा बलों ने भी ठोस कदम उठाए हैं, जैसे- नौसेना बड़े पैमाने पर QKD तैनात करने वाली पहली भारतीय सेना बन गई है. सितंबर 2024 में भारतीय थल सेना ने भी QKD पर आधारित लंबी दूरी के सैन्य संचार (लगभग 200 किलोमीटर) के लिए अनुबंध किए. ‘वासेनार व्यवस्था’ के अनुसार निर्यात पर नियंत्रण, साथ ही भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-IN), इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा विकसित किए जा रहे राष्ट्रीय मानक कुछ विशेष नीतिगत कदम हैं.

विश्व स्तर पर, ‘Q-Day’ (जब क्वांटम कंप्यूटर आज के एन्क्रिप्शन को भेद सकेंगे) की आशंका ने इसके विकास को गति दी है. राष्ट्रीय मानक एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (NIST) के पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) मानकों को अमेरिका और उसके सहयोगी देश अपनाने लगे हैं. चीन और अमेरिका ने भविष्य के लिए तैयार NC3 सिस्टम के लिए क्वांटम संचार उपग्रह भी प्रक्षेपित किए हैं.

अमेरिका ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी नीतियों में AI को भी शामिल किया है, ताकि त्वरित ख़तरों का विश्लेषण हो सके और सुरक्षित संचार को आगे बढ़ाया जा सके.

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) को Q-Day की दौड़ में बने रहने के लिए निम्नलिखित काम करने चाहिए-

  • MeitY को रक्षा सेवाओं के साथ मिलकर काम करना चाहिए और 2030 तक सभी रणनीतिक संचार लाइनों के लिए क्वांटम-प्रतिरोधी एल्गोरिदम बनाना चाहिए. इतना ही नहीं, उभरते ख़तरे का अनुमान लगाने और सुरक्षित व स्वचालित जवाबी कार्रवाइयों के लिए क्वांटम बुनियादी ढांचे में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को शामिल करने का प्रयास भी होना चाहिए. इससे साइबर ख़तरों के बावजूद QKD सेवाओं का निर्बाध संचालन हो सकेगा.

  • उन्नत क्वांटम व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए, रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) को शिक्षण संस्थानों के प्रयोगशालाओं और स्टार्टअप के साथ मिलकर काम करना चाहिए. इसमें सार्वजनिक-निजी भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. रक्षा उत्कृष्टता परियोजना के लिए नवाचार (IDeX) एक उल्लेखनीय कदम है, जिसे और आगे बढ़ाया जाना चाहिए. प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाए रखने के लिए क्वांटम एन्क्रिप्शन और कंप्यूटिंग में निवेश ज़रूरी है.

  • संकट प्रबंधन के प्रावधान भी इसमें शामिल किए जाने चाहिए. रेड-टीमिंग अभ्यास, यानी किसी समर्पित टीम (रेड टीम) द्वारा सुरक्षा जांचने के लिए विरोधियों के रूप में काम करने संबंधी अभ्यास और परमाणु संकट संबंधी ख़तरों के निपटारे के लिए जो उपाय अपनाए जा रहे हैं, उसमें क्वांटम में छेड़छाड़ और AI से खिलवाड़ जैसी चुनौतियों का आकलन भी किया जाना चाहिए. MeitY के साझेदारों और इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को ऐसे अभ्यासों में ज़रूर शामिल करना चाहिए, ताकि स्वचालन से छेड़छाड़, उसकी विफलता और संचार व्यवस्था में गड़बड़ियों जैसी समस्याओं का समय पर समाधान हो सके. इसके साथ ही, भौतिक रूप से अलग व्यवस्था बनाना और क्वांटम-प्रतिरोधी बैकअप कमांड का गठन भी महत्वपूर्ण है, जैसे- एयर-गैप्ड नियंत्रण और स्वचालित प्रणाली नाकाम करने वाली मैनुअल ओवरराइड. इसमें उन्नत उपग्रह संचार और क्वांटम-सुरक्षित ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) की भी अपनी अहमियत है, जिस पर MeitY या DST जैसे संस्थानों को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के साथ मिलकर काम करना चाहिए.

  • साइबर नियमों के साथ-साथ क्वांटम सुरक्षा पर भी पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए. ख़ास तौर से जासूसी के कामों या रणनीतिक बाधाओं के ख़िलाफ़ क्वांटम उपकरणों को अंतरराष्ट्रीय समझौतों या मानकों के अनुसार इस्तेमाल करना चाहिए. MeitY को घरेलू क्वांटम उद्योग और शिक्षा जगत के लिए वैश्विक सहयोग को आगे बढ़ाना चाहिए और एक प्रेरक की भूमिका निभानी चाहिए.

 

निष्कर्ष

क्वांटम कंप्यूटिंग की क्षमताएं, साथ ही ऑटोमेशन के ख़तरे, मौजूदा एन्क्रिप्शन को कमज़ोर करते हैं और दशकों से बरकरार रणनीतिक स्थिरता को मुश्किलों में डालते हैं. फिर भी, आंतरिक रूप से सुरक्षित और उन्नत जवाबी कार्रवाई तंत्रों के विकास में इन तकनीकों के महत्व को देखते हुए NC3 सिस्टम में फिर से भरोसा करने का एक ऐतिहासिक मौका हमारे पास है. अब परमाणु नीति और बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए रक्षात्मक उपाय अपनाने चाहिए, अन्यथा रणनीतिक अनिश्चितता के नए युग के लिए तैयार न रहने का ख़तरा हमारे सामने होगा.


(श्रविष्ठा अजयकुमार ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फ़ेलो हैं)

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