Author : Manish Vaid

Expert Speak Raisina Debates
Published on Apr 10, 2026 Updated 4 Days ago

मान लीजिए दुनिया में अचानक खनिजों की सप्लाई कम हो गई- जैसा कि चीन ने निर्यात नियंत्रण सख्त करके दिखाया- तो भारत को बाहर से सामान लाना मुश्किल और महंगा हो जाता है. ऐसे समय में समझ आता है कि हमारे अपने घरों का ई-वेस्ट और पुरानी बैटरियाँ ही असली खजाना हैं- अगर इन्हें सही तरीके से रीसायकल करें तो हम उसी से जरूरी खनिज निकालकर देश को मजबूत और आत्मनिर्भर बना सकते हैं.

समझिए, चीन हर हाल में कैसे बनाए रखता है सप्लाई?

यह 'चाइना क्रॉनिकल' श्रृंखला का 191वां भाग है.


चीन की ताकत सिर्फ खनन और निर्यात में नहीं, बल्कि एक मजबूत छिपी हुई व्यवस्था में भी है-एक सावधानीपूर्वक विकसित घरेलू खनिज चक्र (मिनरल लूप). इस व्यवस्था में खनन से लेकर पुनर्चक्रण तक सब एक ही चक्र का हिस्सा हैं. इसलिए जब निर्यात या कीमतों में समस्या आती है, तब भी चीन के कारखाने चलते रहते हैं, क्योंकि पुनर्चक्रण और संसाधनों का सही उपयोग उन्हें मजबूत बनाए रखता है. 

भारत के लिए, जिसने हाल ही में राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन के तहत महत्वपूर्ण खनिजों के पुनर्चक्रण को प्रोत्साहित करना शुरू किया है, चुनौती यह नहीं है कि वह चीन के राज्य-नेतृत्व वाले मॉडल या उसके पर्यावरणीय समझौतों की नकल करे, बल्कि इस मूल तर्क को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाए. इसका मतलब है कि पुराने सामान से दोबारा चीजें बनाकर काम चलाया जाए और नए खनन को धीरे-धीरे बढ़ाया जाए, साथ ही स्क्रैप को भी कीमती मानकर उसे सही तरीके से इकट्ठा कर इस्तेमाल किया जाए, बिना पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए.

चीन का खनिज चक्र: सबक और सीमाएँ

2024–25 में चीन द्वारा रेयर अर्थ, मैग्नेट और द्वि-उपयोग सामग्रियों पर निर्यात नियंत्रण सख्त करने से वैश्विक निर्भरता उजागर हुई. ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उद्योगों को आपूर्ति संकट और कीमतों में अस्थिरता का सामना करना पड़ा. लेकिन घरेलू स्तर पर, बीजिंग ने पुनर्चक्रण और चक्रीय प्रवाह के सहारे अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित रखा.

चुनौती यह नहीं है कि वह चीन के राज्य-नेतृत्व वाले मॉडल या उसके पर्यावरणीय समझौतों की नकल करे, बल्कि इस मूल तर्क को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाए. इसका मतलब है कि पुराने सामान से दोबारा चीजें बनाकर काम चलाया जाए और नए खनन को धीरे-धीरे बढ़ाया जाए.

पिछले एक दशक में, सर्कुलर इकॉनमी के तहत कई योजनाओं-जैसे 14वीं पंचवर्षीय योजना-ने रेयर अर्थ, बैटरी धातुओं और रणनीतिक मिश्रधातुओं की रिकवरी को राष्ट्रीय रणनीति में शामिल किया. पुनर्चक्रण आपूर्ति व्यवधानों और संसाधन राष्ट्रवाद के खिलाफ एक सुरक्षा कवच बन गया.

इसके परिणाम औद्योगिक स्तर पर स्पष्ट हैं. जेएल मैग रेयर-अर्थ, जो दुनिया की सबसे बड़ी मैग्नेट निर्माता कंपनी है, ने ग्रेन-बाउंड्री डिफ्यूजन तकनीक का उपयोग करके भारी रेयर अर्थ की खपत कम की और 2024 में अपने लगभग 30 प्रतिशत इनपुट (2,575 टन) पुनर्चक्रित स्क्रैप से प्राप्त किए. बैटरी निर्माता जैसे CATL और GEM कंपनी लिमिटेड ने इस्तेमाल की गई बैटरियों से निकल, कोबाल्ट के लिए 99.6 प्रतिशत से अधिक और लिथियम के लिए 96.5 प्रतिशत तक रिकवरी दर हासिल की है. इस तरह उत्पादन और पुनर्प्राप्ति के बीच चक्र को बंद करके, चीन महत्वपूर्ण खनिजों को एक बार उपयोग होने वाले संसाधन से अर्ध-नवीकरणीय रणनीतिक संसाधन में बदल देता है. भारत के लिए सीख है कि सरकार के सहारे जल्दी पुनर्चक्रण बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है. लेकिन चीन जैसी सख्ती और पर्यावरण नुकसान से बचते हुए, बेहतर योजना और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ानी चाहिए, मॉडल नहीं उसका तरीका अपनाना चाहिए.

रीसाइक्लिंग से आत्मनिर्भरता

भारत लिथियम, कोबाल्ट, निकल और रेयर अर्थ के लिए अभी भी आयात पर काफी निर्भर है. खनन में बहुत समय और दिक्कतें आती हैं, इसलिए हर देरी से बाहर से सामान मंगाना बढ़ता है. इसी वजह से, पुनर्चक्रण ही सबसे जल्दी काम आने वाला और जरूरी तरीका है. 2025 में, नई दिल्ली ने राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन के तहत 1,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना लागू की, इसका मकसद बैटरी, ई-कचरे और औद्योगिक कचरे से खनिज निकालकर घरेलू सप्लाई बढ़ाना, बाहरी झटकों से बचाव करना और पर्यावरण पर खनन का दबाव कम करना है, जिसमें निजी निवेश भी बढ़ रहा है.

चीन महत्वपूर्ण खनिजों को एक बार उपयोग होने वाले संसाधन से अर्ध-नवीकरणीय रणनीतिक संसाधन में बदल देता है. भारत के लिए सीख है कि सरकार के सहारे जल्दी पुनर्चक्रण बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है. लेकिन चीन जैसी सख्ती और पर्यावरण नुकसान से बचते हुए, बेहतर योजना और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ानी चाहिए, मॉडल नहीं उसका तरीका अपनाना चाहिए.

पुनर्चक्रण अब केवल औद्योगिक नीति तक सीमित नहीं है. नवंबर 2025 में जी20 शिखर सम्मेलन में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक क्रिटिकल मिनरल्स पहल का प्रस्ताव रखा, जिसमें खनिज सुरक्षा, पुनर्चक्रण और भरोसेमंद साझेदारों के बीच सहयोग को वैश्विक प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत किया गया.

यह अमेरिका-नेतृत्व वाली मिनरल्स सिक्योरिटी पार्टनरशिप (MSP) जैसे मंचों के साथ जुड़ाव को पूरक करता है, जो अपने फाइनेंस नेटवर्क के जरिए खनन, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण निवेश का समन्वय करता है. हाल ही में क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल में फोरम ऑन रिसोर्स जियोस्ट्रैटेजिक एंगेजमेंट (FORGE) की शुरुआत ने इस दिशा को और मजबूत किया है, जो भरोसेमंद साझेदारों के बीच अधिक संगठित और क्रियाशील सहयोग की ओर संकेत देता है.

जब चीन चीजें बाहर भेजना कम करता है, तब भारत का ई-कचरा और पुरानी बैटरियाँ काम की बन जाती हैं. अगर सही से पुनर्चक्रण हो, तो भारत खनिजों का बड़ा केंद्र बन सकता है और खनन भी कम करना पड़ेगा. पुनर्चक्रण अब केवल कचरा प्रबंधन नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का एक स्तंभ बन चुका है. जैसे-जैसे चीन निर्यात नियंत्रण सख्त करता है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, भारत का ई-वेस्ट और बैटरी कचरा एक रणनीतिक अवसर में बदल सकता है. एक विश्वसनीय पुनर्चक्रण पारिस्थितिकी तंत्र भारत को पुनःप्राप्त खनिजों का क्षेत्रीय केंद्र बना सकता है और खनन से जुड़े पर्यावरणीय दबाव को कम कर सकता है.

चक्र को पूरा करना  

रेयर अर्थ और बैटरी खनिजों का पुनर्चक्रण उन्नत धातुकर्म (मेटलर्जी), रासायनिक पृथक्करण और सख्त पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों की मांग करता है. यहाँ तक कि विकसित अर्थव्यवस्थाएँ भी इसमें संघर्ष करती रही हैं. यूरोपीय आयोग स्वीकार करता है कि यूरोपीय संघ ने ऐतिहासिक रूप से इस्तेमाल की गई बैटरियों से 1 प्रतिशत से भी कम लिथियम और 40 प्रतिशत से कम कोबाल्ट का पुनर्चक्रण किया है, जिसके चलते नए EU बैटरी विनियमन के तहत कानूनी रूप से बाध्यकारी रिकवरी लक्ष्य तय किए गए हैं. भारत की शुरुआत इससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति से होती है. यहाँ कचरा संग्रहण प्रणाली बिखरी हुई है और अनौपचारिक पुनर्चक्रण क्षेत्र बहुत बड़ा है. औपचारिक संग्रहण और प्रभावी प्रवर्तन के बिना, मूल्यवान सामग्री असुरक्षित अनौपचारिक चैनलों में चली जाती है, जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है और उनका रणनीतिक मूल्य भी खो जाता है. इस संदर्भ में, चीन का अनुभव बताता है कि यह चक्र तभी प्रभावी होता है जब संग्रहण, प्रसंस्करण और अंतिम मांग एक सुसंगत नियामक ढांचे के भीतर जुड़े हों. औपचारिकता और ट्रेसबिलिटी के बिना, पुनर्चक्रण सीमित ही रहता है.

अगर सही से पुनर्चक्रण हो, तो भारत खनिजों का बड़ा केंद्र बन सकता है और खनन भी कम करना पड़ेगा. पुनर्चक्रण अब केवल कचरा प्रबंधन नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का एक स्तंभ बन चुका है. जैसे-जैसे चीन निर्यात नियंत्रण सख्त करता है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, भारत का ई-वेस्ट और बैटरी कचरा एक रणनीतिक अवसर में बदल सकता है.

फिर भी, भारत के पास कुछ महत्वपूर्ण फायदे हैं. उसका तेजी से बढ़ता ईवी, नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स बाज़ार पुनः प्राप्त संसाधनों के लिए दीर्घकालिक मांग सुनिश्चित करता है. अनुमान बताते हैं कि आने वाले वर्षों में पुनर्चक्रण बैटरी सामग्री की मांग का लगभग 30 प्रतिशत तक पूरा कर सकता है. जैसे-जैसे वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं और आपूर्ति जोखिम गहराते हैं, 2026 तक पुनर्चक्रित सामग्री लागत के लिहाज से प्रतिस्पर्धी हो सकती है. पुनर्चक्रण खनन का विकल्प नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक पुल है, जो तब तक समय देता है जब तक घरेलू और विदेशी खनन क्षमता विकसित होती है. यह पुल भारत-जापान जैसे सहयोगों के माध्यम से और मजबूत होता है, जहाँ उन्नत संग्रहण और पुनर्चक्रण प्रणालियों के जरिए शहरी कचरे को महत्वपूर्ण धातुओं में बदला जा रहा है.

चीन से सीख मिलती है कि कचरा इकट्ठा करना, उसे प्रोसेस करना और इस्तेमाल करना अगर ठीक से जुड़ा हो, तभी सिस्टम चलता है. बिना सही नियम और ट्रैकिंग के काम नहीं बनता. पुनर्चक्रण मुश्किल समय में मदद करता है. भारत को चीन जैसा नहीं बनना, बस इस तरीके को अपनाकर खुद को मजबूत करना है.

भारत का नया रास्ता

चीन के निर्यात नियंत्रणों ने दिखा दिया कि दुनिया की आपूर्ति व्यवस्था कितनी कमजोर है. साथ ही यह भी साबित हुआ कि बंद-चक्र पुनर्चक्रण मुश्किल समय में सहारा देता है और देश को मजबूत बनाता है. भारत की नई नीतियाँ भी इसी सोच को अपनाने की ओर इशारा करती हैं, भले ही उसका तरीका अलग हो. अगर भारत कचरा इकट्ठा करने, उसे प्रोसेस करने और इस्तेमाल को सही तरीके से जोड़ ले, तो वह बिना चीन की तरह बने भी मजबूत बन सकता है. आज के समय में, पुनर्चक्रण ही भारत की सबसे बड़ी ताकत और सुरक्षा बन सकता है.


मनीष वैद्य ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में जूनियर फेलो हैं.
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