ग्रीनलैंड, कनाडा और आर्कटिक जैसे इलाके अचानक दुनिया की बड़ी ताकतों के लिए बेहद अहम हो गए हैं. वजह है रेयर अर्थ के भंडार, जिन पर भविष्य की टेक्नोलॉजी और ऊर्जा का बड़ा हिस्सा निर्भर करता है. अगर रेयर अर्थ की सप्लाई रुक जाए तो आधुनिक हथियारों का प्रॉडक्शन भी रुक सकता है. F-35 फाइटर जेट से लेकर पनडुब्बियों तक में इन खनिजों की बड़ी भूमिका है.
रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REE) आज बहुत अहम हो गए हैं. ग्रीन एनर्जी हो या नई रिन्यूएबल टेक्नोलॉजी, इसमें इन एलिमेंट्स की बड़ी जरूरत पड़ती है. थोरियम एक रेयर अर्थ एलिमेंट वाले खनिज से निकाला जाता है. यह न्यूक्लियर ईंधन बनाने में यूरेनियम की जगह ले सकता है. एक टन थोरियम से उतनी एनर्जी मिल सकती है जितनी 200 टन यूरेनियम या 35 लाख टन कोयले से मिलती है.
2025 में रेयर अर्थ एलिमेंट्स का बाजार 7.2 अरब डॉलर से ज्यादा था. 2026 में इसके 7.6 अरब डॉलर तक पहुंचने का अंदाजा है. 2035 तक यह हर साल करीब 12.6 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, यानी औसतन 6 फीसदी की रफ्तार. रकम के हिसाब से यह बाजार बहुत बड़ा नहीं लगता, लेकिन नई टेक्नोलॉजी बनाने और देशों की सुरक्षा के लिए रेयर अर्थ एलिमेंट्स तक पहुंच बेहद जरूरी है.
दुनिया में रेयर अर्थ एलिमेंट्स वाले खनिज काफी जगहों पर हैं. इनमें आर्कटिक का इलाका भी है. लेकिन असली दिक्कत इनसे काम की चीजें बनाने वाली टेक्नोलॉजी की है. 1990 के दशक की शुरुआत में ही जरूरी खनिजों पर पैसा लगाने की वजह से चीन आज इस क्षेत्र में दुनिया में सबसे आगे पहुंच गया है.
थोरियम एक रेयर अर्थ एलिमेंट वाले खनिज से निकाला जाता है. यह न्यूक्लियर ईंधन बनाने में यूरेनियम की जगह ले सकता है. एक टन थोरियम से उतनी एनर्जी मिल सकती है जितनी 200 टन यूरेनियम या 35 लाख टन कोयले से मिलती है.
बता दें कि चीन करीब 60 फीसदी कच्चा माल निकालता है और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बाजार के 60 से 80 फीसदी हिस्से पर उसका कब्जा है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सी धातु का इस्तेमाल हो रहा है. इसी वजह से चीन दुनिया को करीब 94 फीसदी चुंबक देता है. इन चुंबक का इस्तेमाल सेमीकंडक्टर, कार, फैक्टरी के मोटर, डेटा सेंटर, जेट विमान और हथियारों के सिस्टम में होता है.
चीन ने अहम खनिजों की सप्लाई पर पाबंदी लगाकर अपनी पकड़ और मजबूत करने की कोशिश की है. इसके लिए उसने 2020 में एक्सपोर्ट कंट्रोल एक्ट जैसे कदम उठाए. चीन प्रॉडक्शन कम या ज्यादा करने के लिए कोटा इस्तेमाल करता है ताकि दुनिया के बाजार पर असर डाला जा सके. साथ ही चीन दूसरे देशों से खनिज खरीदने और वहां निवेश करने की कोशिश भी कर रहा है, जहां ये संसाधन ज्यादा मात्रा में हैं.
दूसरी बात, चीन आज भी ऐसा इकलौता देश है जहां रेयर अर्थ एलिमेंट्स से जुड़े सारे काम एक ही जगह हो सकते हैं. इससे उसे इसकी सप्लाई चेन पर असर डालने की ताकत मिलती है. अप्रैल 2025 में चीन ने अमेरिका को सात रेयर अर्थ एलिमेंट्स स्कैंडियम, यट्रियम, समेरियम, गैडोलिनियम, टरबियम, डिस्प्रोसियम और ल्यूटेशियम और उनसे जुड़े हिस्सों की सप्लाई रोक दी थी. अक्टूबर 2025 में टेक्नोलॉजी और मशीनों के निर्यात पर भी और पाबंदियां लगा दी गईं. हाल यह है कि फाइनल प्रॉडक्ट दुनिया में कहीं भी बने, अगर कोई विदेशी कंपनी चीनी रेयर अर्थ एलिमेंट्स, उनसे बने हिस्से, टेक्नोलॉजी या मशीन इस्तेमाल करती है तो उसे चीन से अनुमति लेनी पड़ती है.
इस मजबूती के चलते चीन दुनिया के बाजार में कीमतों पर असर डाल सकता है. वह अमेरिका के साथ आर्थिक मुकाबले में भी इसका इस्तेमाल कर सकता है. मिसाल के तौर पर, सेमीकंडक्टर सप्लाई पर अमेरिकी दबाव के जवाब में चीन ने दिसंबर 2024 में अमेरिका को गैलियम और सेमीकंडक्टर से जुड़ी दूसरी चीजें भेजनी बंद कर दी थीं. जानकारों के मुताबिक अमेरिका का हाई-टेक प्रॉडक्शन करीब 70 फीसदी तक चीनी रेयर अर्थ एलिमेंट्स पर टिका है. यानी, अगर सप्लाई अचानक कम हो जाए तो एएमडी, एप्पल, ब्रॉडकॉम और एनवीडिया जैसे बड़े चिप बनाने वाले मुश्किल में पड़ सकते हैं.
ट्रंप प्रशासन इस क्षेत्र में चीन की बढ़त से परेशान रहा है. 2024 में अमेरिका ने करीब 80 फीसदी रेयर अर्थ एलिमेंट्स बाहर से मंगाए. इसीलिए वह विदेशों में मौजूद खदानों में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहा है. इसमें कनाडा (8 लाख 30 हजार टन) और ग्रीनलैंड (15 लाख टन) जैसे इलाके शामिल हैं. इसी वजह से ग्रीनलैंड पर खास फोकस है. ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति इस चिंता में है कि अगर पश्चिमी निवेश पूरा न हुआ तो ग्रीनलैंड चीन जैसे दूसरे साझेदारों की तरफ जा सकता है. ग्रीनलैंड को लेकर मुकाबला इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि वहां चीनी कंपनी शेंघे रिसोर्सेज बड़ी अहम जगह पर बैठी है. अगर ग्रीनलैंड पर कंट्रोल मिल जाए तो कच्चे माल की दिक्कत काफी हद तक खत्म हो सकती है और चीन को भी पीछे किया जा सकता है.
अप्रैल 2025 में चीन ने अमेरिका को सात रेयर अर्थ एलिमेंट्स स्कैंडियम, यट्रियम, समेरियम, गैडोलिनियम, टरबियम, डिस्प्रोसियम और ल्यूटेशियम और उनसे जुड़े हिस्सों की सप्लाई रोक दी थी. अक्टूबर 2025 में टेक्नोलॉजी और मशीनों के निर्यात पर भी और पाबंदियां लगा दी गईं.
रूस के साथ सहयोग भी एक रास्ता हो सकता है, बशर्ते दोनों देशों के रिश्ते सामान्य हो पाएं. रूस के पास करीब 38 लाख टन रेयर अर्थ एलिमेंट्स वाले खनिज हैं. उसने अपने यहां रेयर अर्थ एलिमेंट्स से जुड़े सारे काम करने की टेक्नोलॉजी बनाने की बड़ी योजना की घोषणा भी की है. रूस अमेरिका के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि रूसी आर्कटिक में टॉमटोरस्कोए नाम की जगह है. यहां पर दुनिया में सबसे ज्यादा, यानी 14.5 फीसदी तक रेयर अर्थ एलिमेंट्स वाले खनिज मिलते हैं.
अमेरिका को अपने यहां रेयर अर्थ एलिमेंट्स से जुड़े सारे काम करने की क्षमता बढ़ाने के लिए बड़ा निवेश भी चाहिए. वहां ऐसी टेक्नोलॉजी और फैक्टरी 2035 तक बन सकती हैं. हालांकि तब भी वे कुल जरूरत का सिर्फ करीब 25 फीसदी ही पूरा कर पाएंगी. यानी तब भी चीन से छुटकारा पाने में कई साल लगेंगे. इस बीच अगर रेयर अर्थ एलिमेंट्स की सप्लाई में रुकावट आती है तो आधुनिक हथियार बनाने पर असर पड़ेगा. इनमें एफ-35 लड़ाकू विमान, अर्ले बर्क-क्लास युद्धपोत और वर्जीनिया क्लास पनडुब्बियां शामिल हैं. इनमें से 77.7 फीसदी में रेयर अर्थ एलिमेंट्स लगता है. सैटेलाइट सिस्टम और बहुत तेज स्पीड वाले हथियारों का डिवेलपमेंट भी धीमा हो सकता है. अमेरिकी स्टॉक में करीब 2,500 टन जरूरी रेयर अर्थ एलिमेंट्स मौजूद हैं, जो सिर्फ छह महीने ही चलेंगे.
पश्चिमी यूरोप के देश स्कैंडिनेविया से कच्चा माल पा सकते हैं. हालांकि यूरोप अभी सीधे चीन से टकराने या अपने यहां बड़े पैमाने पर रेयर अर्थ एलिमेंट्स निकालने और उन्हें तैयार करने के जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं दिखता.
इसी वजह से अमेरिकी जानकार सलाह दे रहे हैं कि लंबे वक्त के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ बनाया जाए, ताकि रेयर अर्थ एलिमेंट्स से जुड़ा पूरा काम कई देशों में हो सके. अमेरिका के मुख्य साझेदार यूरोपीय यूनियन (SecREEts प्रॉजेक्ट) और ऑस्ट्रेलिया (लिनास कॉर्पोरेशन) हैं. इसके साथ अमेरिका जापान और सऊदी अरब को भी साथ लाने की कोशिश में है ताकि चीनी दबदबे में संतुलन बनाया जा सके. पश्चिमी यूरोप के देश स्कैंडिनेविया से कच्चा माल पा सकते हैं. हालांकि यूरोप अभी सीधे चीन से टकराने या अपने यहां बड़े पैमाने पर रेयर अर्थ एलिमेंट्स निकालने और उन्हें तैयार करने के जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं दिखता.
एकतरफा आर्थिक पाबंदियों की वजह से चीन ऐसा इकलौता देश बनकर सामने आया है जो अमेरिका को इस क्षेत्र में चुनौती दे सकता है. रेयर अर्थ एलिमेंट्स की सप्लाई पर रोक लगाने के बाद ही ट्रंप को चीन के खिलाफ पाबंदियों पर अपना रुख कुछ नरम करना पड़ा था. साफ है कि रेयर अर्थ एलिमेंट्स पर पकड़ आर्कटिक इलाके में अमेरिका और चीन के बीच चल रहे मुकाबले का अहम हिस्सा बन चुकी है. आने वाले समय में इस मुकाबले में चीन के ऊपर रहने की ही संभावना दिखाई देती है.
वैलेरी कोनिशेव रूसी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और लोक प्रशासन अकादमी में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के प्रफेसर हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Valery Konyshev is Professor of International Relations, Russian Academy of National Economy and Public Administration. ...
Read More +