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भारत में दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित बच्चों का इलाज सिर्फ़ बीमारी तक सीमित नहीं है. फंडिंग की सीमा और लंबी कानूनी प्रक्रिया उन्हें समय पर मदद से वंचित कर रही है जिससे गंभीर स्वास्थ्य जोखिम और मौत का खतरा बन जाता है.
7 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस अपील पर सुनवाई की जिसमें दुर्लभ बीमारी की फंडिंग को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई थी. इस मामले में अंतिम सुनवाई के लिए मार्च 2026 का समय निर्धारित किया गया. कोर्ट ने फंडिंग पर कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया. दुर्लभ बीमारी को लेकर राष्ट्रीय नीति (NPRD) 2021 के तहत सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) में जिन परिवारों के बच्चों ने 50 लाख रुपये की इलाज कराने की सीमा ख़त्म कर ली है, उनके लिए तात्कालिक प्रभाव यथास्थिति का जारी रहना है. हालांकि इलाज को रोका नहीं जा सकता है लेकिन इसका नतीजा अनिवार्य रूप से देखभाल से वंचित रहना होगा.
“इससे ये पता चलता है कि न्यायिक या प्रशासनिक देरी समय के मामले में संवेदनशील इन इलाजों के लिए किस तरह घातक हो सकती है.”
इन प्रक्रिया के दौरान ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर रेयर डिजीज़ इंडिया (ORDI) और लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर सपोर्ट सोसायटी (LSDSS) जैसे संगठनों ने याचिककर्ताओं और दुर्लभ बीमारी के दूसरे मरीज़ों की मौत के बारे में बताया है. इससे ये पता चलता है कि न्यायिक या प्रशासनिक देरी समय के मामले में संवेदनशील इन इलाजों के लिए किस तरह घातक हो सकती है.
सितंबर में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (PMEAC) के सदस्य संजीव सान्याल ने कानूनी पेशेवरों की एक बैठक में कहा कि भारत के पास अपने संरचनात्मक कायापलट को पूरा करने के लिए बहुत कम समय है और कानूनी प्रणाली में देरी एक बड़ी रुकावट बन गई है. उनकी ये टिप्पणी कॉन्ट्रैक्ट और कमर्शियल मध्यस्थता से जुड़ी थी. स्वास्थ्य के क्षेत्र में न्यायिक और प्रशासनिक देरी की कीमत शायद इससे भी ज़्यादा गंभीर है क्योंकि इसका नतीजा अंगों के नुकसान, विकलांगता और अक्सर मृत्यु के रूप में निकलता है. कोई केस दायर करने और उसके सूचीबद्ध होने में जितना ज़्यादा समय लगता है, उतनी ही ये आशंका बढ़ जाती है कि जो राहत मांग रहा है, वो ये देखने के लिए ज़िंदा नहीं रहेगा.
दुर्लभ बीमारी से जुड़ी नीति में मौजूदा गतिशीलता मुख्य रूप से न्यायिक कार्रवाई की वजह से है. देश में दुर्लभ रोगों के इलाज के लिए बढ़ती ज़रूरत का जवाब देते हुए और मौजूदा मुकदमेबाज़ी को देखते हुए भारत सरकार ने दुर्लभ बीमारी के लिए राष्ट्रीय नीति (NPRD) 2021 को अंतिम रूप दिया और इसे लागू किया. अक्टूबर 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने मास्टर अर्नेश शॉ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में केंद्र सरकार को दुर्लभ बीमारियों के लिए एक राष्ट्रीय फंड बनाने और उचित मामलों में 50 लाख रुपये की सीमा के आगे भी फंडिंग के लिए लचीली व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया. इसके कुछ महीनों के बाद हाई कोर्ट को पता चला कि केंद्र की अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर एक अंतरिम रोक लगा दी है. अदालती कार्यवाही की श्रृंखला में सबसे ताज़ा 7 नवंबर की सुनवाई ने किसी भी मरीज़ के लिए ज़मीनी वास्तविकता में कोई बदलाव नहीं किया है.
“मरीज़ों के समूहों ने अधिक सीधे ढंग से मानवीय कीमत के बारे में बताया है… अलग-अलग दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित दर्जनों लोगों की मौत हुई है जो इलाज में रुकावट या इलाज शुरू नहीं होने का नतीजा है.”
मरीज़ों के समूहों ने अधिक सीधे ढंग से मानवीय कीमत के बारे में बताया है. उनके मुताबिक पिछले तीन वर्षों के दौरान अलग-अलग दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित दर्जनों लोगों की मौत हुई है जो इलाज में रुकावट या इलाज शुरू नहीं होने का नतीजा है. इसके अलावा लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSD) के 50 से ज़्यादा इलाज नहीं करवाने वाले मरीज़ों की पहचान हुई है. फंडिंग की सीमा तक पहुंच जाने के बाद अब उन्हें फिर से इलाज शुरू करने की तत्काल ज़रूरत है. जब कार्यवाही लंबी चलने के कारण याचिकाकर्ता मर रहे हैं, ऐसी स्थिति में हाल की एक टिप्पणी में दलील दी गई है कि न्यायपालिका को मौजूदा स्थिति को एक मानवीय आपातकाल के रूप में देखना चाहिए और हाई कोर्ट के आदेश को लागू करने के लिए कहना चाहिए.
इलाज की बहुत ज़्यादा लागत के कारण दुर्लभ बीमारी से पीड़ित कई मरीज़ मदद के लिए प्राइवेट क्राउडफंडिंग की तरफ रुख कर रहे हैं. साथ ही सरकार ने भी अपना प्लैटफॉर्म शुरू किया है. पहले के एक विश्लेषण से पता चला कि सरकार के दुर्लभ बीमारी से जुड़े क्राउडफंडिंग पोर्टल में महत्वपूर्ण कमियां हैं. CoE के द्वारा सूचीबद्ध सत्यापित मामले लगभग 9,100 करोड़ रुपये के कुल वार्षिक इलाज की आवश्यकता के बारे में बताते हैं, वहीं अगस्त 2021 में शुरू होने के बाद से पोर्टल के ज़रिए केवल 3.9 लाख रुपये का दान मिला है. दूसरी तरफ प्राइवेट प्लैटफॉर्म नियमित रूप से एक मरीज़ के लिए भी करोड़ों रुपया इकट्ठा करते हैं. ये दलील दी गई है कि वैध और ऑडिट के योग्य होने के बावजूद सरकारी क्राउडफंडिंग पोर्टल से जुड़ा ख़राब अनुभव, सीमित ढंग से मरीज़ के बारे में जानकारी देना, बार-बार एवं CSR/FCRA योगदान के लिए व्यवस्थित रास्ते की कमी और ठीक ढंग से लोगों तक नहीं पहुंचने की वजह से ये अधिक लोकप्रिय नहीं हो पाया है.
“CoE के द्वारा सूचीबद्ध सत्यापित मामले लगभग 9,100 करोड़ रुपये के कुल वार्षिक इलाज की आवश्यकता के बारे में बताते हैं, वहीं अगस्त 2021 में शुरू होने के बाद से पोर्टल के ज़रिए केवल 3.9 लाख रुपये का दान मिला है.
इस चुनौती का समाधान करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने एक संस्थागत कदम उठाया. पिछले हफ्ते अदालत ने राजीव बहल (सचिव, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग और महानिदेशक, ICMR) की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति का गठन किया. इसमें वी. के. पॉल (सदस्य, नीति आयोग), कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव और लोक उद्यम विभाग के एक संयुक्त सचिव भी शामिल हैं. इसका काम सरकार के दुर्लभ बीमारी से जुड़े क्राउडफंडिंग पोर्टल की देखरेख करना, दान देने वालों में जागरूकता बढ़ाना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत योगदान इकट्ठा करना और NPRD-2021 को लागू करने के लिए अलग-अलग मंत्रालयों से बातचीत करना है. समिति को हर महीने बैठक करने और एक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है. ये इस बात का संकेत है कि कोर्ट पोर्टल को निष्क्रिय से सक्रिय बनाना चाहता है.
भले ही अदालतें दुर्लभ बीमारी से जुड़ी नीति को आगे बढ़ा रही हैं, लेकिन कानूनी प्रक्रिया की गति अक्सर उसके उद्देश्यों को विफल करती हुई दिखती है. दिल्ली हाई कोर्ट में दुर्लभ बीमारी से जुड़े फंडिंग केस की शुरुआत 2020 में मास्टर अर्नेश शॉ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में कई याचिकाओं के रूप में हुई. इसमें बिना किसी रुकावट के इलाज और उम्मीद के मुताबिक सार्वजनिक फंडिंग के तरीकों की मांग की गई थी. 7 नवंबर के आदेश में मार्च 2026 में अंतिम सुनवाई के लिए समय-सीमा दी गई है लेकिन ये इस तथ्य को नहीं बदलता है कि जिन बच्चों का इलाज चल रहा है वो फंडिंग की सीमा तक पहुंचने पर उपचार में पीछे छूट रहे हैं.
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में दुर्लभ बीमारियों के मामले में एक व्यावहारिक फंडिंग का तरीका विकसित किया है. इसमें राष्ट्रीय नीति एवं रजिस्ट्री कार्यालय, CoE, शुल्क एवं कर राहत, किफायत का समर्थन करने वाले शुरुआती सरकारी मॉडल और न्यायपालिका के द्वारा बताई गई फंड इकट्ठा करने की संरचना शामिल है. कानूनी प्रक्रिया को जल्द तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचना होगा और NPRD की संरचना को मज़बूत एवं व्यवस्थित करना होगा ताकि मरीज़ों की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सके. ऐसा नहीं होने पर न्यायिक और प्रशासनिक देरी मानवीय हानि को उस स्तर तक ले जाएगी जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.
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Oommen C. Kurian is Senior Fellow and Head of the Health Initiative at the Inclusive Growth and SDGs Programme, Observer Research Foundation. Trained in economics and ...
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