Author : Sohini Bose

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Published on Apr 20, 2026 Updated 1 Days ago

बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान के नई दिल्ली दौरे ने भारत- बांग्लादेश रिश्तों में जमी बर्फ पिघलाने की शुरुआत की है- ऊर्जा, पानी और संवाद के जरिए भरोसा फिर बनाने की कोशिश दिखी. लेकिन क्यों जल-बंटवारा, प्रत्यर्पण और राजनीतिक बदलाव जैसे मुद्दे साफ करते हैं कि रिश्ते आगे बढ़ेंगे मगर बेहद संभलकर...पढ़ें इस लेख में.

ढाका से दिल्ली तक: भरोसे की नई शुरुआत या पुरानी शंकाएँ?

12 फरवरी को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), जिसका नेतृत्व तारीक रहमान कर रहे हैं, के 13वें आम चुनाव जीतने के बाद से ढाका और भारत के बीच संबंधों की भविष्य दिशा को लेकर सवाल बढ़ गए हैं, खासकर इसलिए क्योंकि इस पार्टी के नई दिल्ली के साथ पहले रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं. फिर भी, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान की 7 से 9 अप्रैल तक भारत यात्रा ने कूटनीतिक रिश्तों में नरमी (थॉ) के शुरुआती संकेत दिए हैं. पद संभालने के बाद उनकी यह पहली आधिकारिक विदेश यात्रा थी, जो यह दिखाती है कि ढाका, नई दिल्ली को कितना महत्व देता है.

इस दौरान रहमान ने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर, वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से मुलाकात की. रहमान ने अपने अनुभव को कूटनीतिक समानताबताया, जहां दोनों देश बात करने, जुड़ने और पहल करने के लिए तैयारहैं, और रिश्तों को धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से सामान्यबना रहे हैं.

बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान की 7 से 9 अप्रैल तक भारत यात्रा ने कूटनीतिक रिश्तों में नरमी (थॉ) के शुरुआती संकेत दिए हैं. पद संभालने के बाद उनकी यह पहली आधिकारिक विदेश यात्रा थी, जो यह दिखाती है कि ढाका, नई दिल्ली को कितना महत्व देता है.

वास्तव में, लगभग डेढ़ साल तक भारत और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बाद अब दोनों देश भरोसा बहाल करने के इच्छुक हैं. इसके लिए न केवल रुकी हुई परियोजनाओं और समझौतों को फिर से शुरू करने के प्रयास जरूरी हैं, बल्कि उन मुख्य चिंताओं को दूर करने की भी जरूरत है जो सहयोग में बाधा बनती रही हैं. इस यात्रा के दौरान ऐसे कई मुद्दे सामने आए, जो द्विपक्षीय संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की संभावनाओं और सीमाओं दोनों को दर्शाते हैं.

आपूर्ति की राजनीति

खलीलुर रहमान की हरदीप सिंह पुरी से मुलाकात का एक प्रमुख कारण भारत से डीज़ल और उर्वरकों की अतिरिक्त आपूर्ति का अनुरोध करना था. बांग्लादेश, जो अपने लगभग 63 प्रतिशत  कच्चे तेल के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से ईंधन आपूर्ति में आई बाधाओं से बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जो अमेरिकाईरान तनाव के कारण उत्पन्न हुईं.

इसके अलावा, रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पहले से चल रही ऊर्जा संकट की स्थिति और गंभीर हो गई है, जिससे उद्योगों और आम जीवन पर असर पड़ा है. इस स्थिति से निपटने के लिए बीएनपी सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जैसे विश्वविद्यालयों को बंद करना और रोजाना ईंधन बिक्री पर प्रतिबंध लगाना, ताकि जमाखोरी और घबराहट में खरीदारी को रोका जा सके. हालांकि, लंबे समय तक युद्ध जारी रहने की आशंका के बीच, जिससे आने वाले वर्षों में बांग्लादेश की जीडीपी में लगभग 3 प्रतिशत की गिरावट हो सकती है, सरकार के लिए विदेशी सहायता लेना आवश्यक हो गया है.

इसी कारण, तारीक रहमान ने परिष्कृत तेल के आयात को बढ़ाने का प्रयास किया और असम के नुमालीगढ़ रिफाइनरी से भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन के माध्यम से अधिक आपूर्ति के लिए भारत से संपर्क किया. 2023 में शुरू की गई यह परियोजना भारत से बांग्लादेश को डीज़ल आपूर्ति बढ़ाने के उद्देश्य से बनाई गई थी, जो रेल और समुद्री मार्गों के अतिरिक्त है.

इस स्थिति से निपटने के लिए बीएनपी सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जैसे विश्वविद्यालयों को बंद करना और रोजाना ईंधन बिक्री पर प्रतिबंध लगाना, ताकि जमाखोरी और घबराहट में खरीदारी को रोका जा सके.

हालांकि, 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने और अंतरिम सरकार के साथ बढ़ते मतभेदों के कारण भारत ने इस परियोजना के विस्तार को रोक दिया था. कुछ रिपोर्टों के अनुसार, अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने डीज़ल आपूर्ति पर रोक लगा दी थी.

अब बीएनपी सरकार के तहत इस परियोजना का फिर से शुरू होना न केवल बांग्लादेश के ऊर्जा संकट को कम करने में मदद करेगा, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों को बहाल करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है. इसी संदर्भ में हरदीप सिंह पुरी ने संकेत दिया कि भारत की घरेलू जरूरतों को पूरा करने के बाद रहमान के अनुरोध पर सकारात्मक और शीघ्रविचार किया जाएगा.

जल-बंटवारा और चुनौतियाँ

खलीलुर रहमान की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब दोनों देशों के बीच गंगा जल संधि 1996 इस वर्ष पुनः वार्ता (पुनर्नवीनीकरण) के लिए निर्धारित है. 1996 में हस्ताक्षरित इस समझौते का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि निचले प्रवाह वाले देश बांग्लादेश को सूखे मौसम (1 जनवरी–31 मई) के दौरान गंगा नदी से पर्याप्त जल मिल सके, ताकि कृषि, आजीविका और पारिस्थितिक संतुलन बना रहे.

हालाँकि, इस संधि की कई आधारों पर आलोचना भी हुई है. पहला, विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे कठिन सूखे समय में बांग्लादेश को अक्सर उसका उचित हिस्सा नहीं मिल पाता. वहीं भारत का कहना है कि वह समझौते का पालन करता है और अन्य समय में निर्धारित मात्रा से अधिक जल छोड़ता है. इस संधि की एक बड़ी सीमा यह है कि इसमें बांग्लादेश के लिए न्यूनतम जल आपूर्ति की कोई गारंटी नहीं है. इसके बजाय यह प्रावधान है कि यदि फरक्का बैराज पर 10 दिनों में जल प्रवाह 50,000 क्यूसेक से कम हो जाता है, तो दोनों देश न्याय, निष्पक्षता और किसी भी पक्ष को नुकसान न पहुँचानेके सिद्धांतों के आधार पर तत्काल परामर्श करेंगे. यद्यपि संयुक्त नदी आयोग को विवाद समाधान का दायित्व दिया गया है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता दोनों सरकारों के सहयोग पर निर्भर करती है, जिससे कूटनीतिक तनाव के समय विवाद सुलझाना कठिन हो जाता है.

रहमान ने अपनी यात्रा के दौरान नदी जल के लिए एक न्यायसंगत और जलवायु-संवेदनशील व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने मानवीय पहलू को रेखांकित करते हुए कहा कि ‘लोग, लोग हैं-चाहे भारत में हों या बांग्लादेश में, हम सभी एक ही प्रकार के जलवायु संकट का सामना कर रहे हैं

दूसरी बड़ी समस्या यह मानी जाती है कि यह संधि केवल फरक्का बैराज पर मिलने वाले पानी पर ध्यान देती है, जबकि असल में गंगा का काफी पानी भारत में ऊपर की ओर ही इस्तेमाल हो जाता है. इससे बांग्लादेश तक पहुँचने वाले पानी की मात्रा कम हो सकती है. अगर गंगा के ऊपरी हिस्से में पानी का प्रवाह और घटता है, तो इसका सीधा असर सुंदरबन डेल्टा जैसे नाजुक पर्यावरण वाले क्षेत्र पर पड़ सकता है, जहाँ पहले से ही पारिस्थितिक संतुलन संवेदनशील है. इसलिए जरूरी है कि गंगा नदी को केवल एक स्थान से नहीं, बल्कि उसके पूरे प्रवाह-स्रोत से लेकर समुद्र तक-समझकर और उसी आधार पर जल प्रबंधन किया जाए, ताकि सभी पक्षों के हित सुरक्षित रह सकें.

तीसरा, जलवायु परिवर्तन के कारण इस संधि का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हो गया है. आज गंगा का प्रवाह 30 साल पहले जैसा नहीं रहा-बाढ़ और सूखा असामान्य समय पर आने लगे हैं. इसलिए न्यायसंगत वितरण और पारिस्थितिक संतुलन के बीच तालमेल बैठाने के लिए लचीली (एडैप्टिव) जल-वितरण व्यवस्था जरूरी है. साथ ही, डेटा-आधारित सक्रिय बाढ़ प्रबंधन को भी नए समझौते में शामिल किया जाना चाहिए.

बांग्लादेश की शर्तों पर गंगा जल संधि का नवीनीकरण बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के लिए घरेलू स्तर पर बड़ा समर्थन ला सकता है, क्योंकि इससे यह साबित होगा कि वह भारत जैसे बड़े पड़ोसी के साथ प्रभावी बातचीत कर सकती है.

इसीलिए रहमान ने अपनी यात्रा के दौरान नदी जल के लिए एक न्यायसंगत और जलवायु-संवेदनशील व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने मानवीय पहलू को रेखांकित करते हुए कहा कि लोग, लोग हैं-चाहे भारत में हों या बांग्लादेश में, हम सभी एक ही प्रकार के जलवायु संकट का सामना कर रहे हैं.हालांकि, इसके पीछे एक स्पष्ट कूटनीतिक उद्देश्य भी है. पूर्व आवामी लीग सरकार की एक बड़ी आलोचना यह रही कि वह भारत के साथ अच्छे संबंध होने के बावजूद तीस्ता नदी जल-बंटवारा समझौता नहीं कर सकी.

कानूनी सीमाएँ  

प्रत्यर्पण का मुद्दा भी बातचीत में शामिल रहा, जिसमें ढाका ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की वापसी की मांग दोहराई, जो अगस्त 2024 से भारत में रह रही हैं. मुहम्मद यूनुस की सरकार ने पहले ही उनके साथ-साथ पूर्व गृहमंत्री असदुज्जमान खान कमाल के प्रत्यर्पण की औपचारिक मांग की थी, जिन्हें बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने दोषी ठहराया है.

भारत ने पहले कहा था कि इस मामले की कानूनी और आंतरिक प्रक्रियाओं के तहत समीक्षा की जा रही है, लेकिन अब वह सार्वजनिक रूप से सतर्क रुख अपना रहा है. वहीं, उस्मान हादी के कथित हत्यारों को लौटाने की भारत की इच्छा यह दिखाती है कि वह ढाका की कुछ चिंताओं के प्रति संवेदनशील है.

अगर दोनों देश सहयोग करते रहें, तो समस्याओं का समाधान आसान हो जाता है. इसके अलावा, जब दुनिया में बड़ी परेशानियाँ आती हैं, जैसे कोविड-19 महामारी या युद्ध, तब पास-पड़ोस के देशों का सहयोग एक सहारे की तरह काम करता है और मुश्किल समय में स्थिति को संभालने में मदद करता है.

यह स्थिति एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अंतर को दर्शाती है-कुछ संवेदनशील मुद्दों पर सहयोग संभव है, लेकिन हसीना का मामला अधिक जटिल है, खासकर क्योंकि इसमें मृत्युदंड का पहलू जुड़ा है. नई दिल्ली के लिए प्रत्यर्पण का कोई भी कदम कानूनी, राजनीतिक और प्रतिष्ठात्मक परिणाम ला सकता है. इसलिए दोनों पक्ष इस मुद्दे को सावधानी से संभालते हुए अन्य क्षेत्रों में सहयोग को प्रभावित नहीं होने देना चाहते.

इन प्रमुख मुद्दों के अलावा, रहमान ने लोगों के बीच संपर्क (people-to-people connectivity) बढ़ाने, खासकर वीज़ा प्रक्रियाओं को सुगम बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया. शासन परिवर्तन के बाद भारत ने वीज़ा सेवाओं में कटौती की थी, जिसे बाद में चरणबद्ध तरीके से बहाल किया गया, विशेषकर चिकित्सा यात्रा के लिए.

भारत बांग्लादेशी मरीजों के लिए प्रमुख गंतव्य बना हुआ है, क्योंकि यहाँ सस्ती और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध हैं, साथ ही भाषा, संस्कृति और खान-पान में समानता भी है. हालाँकि कुनमिंग (चीन) को एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन वह उतना सुलभ और आरामदायक नहीं है.

चिकित्सा पर्यटन, कच्चे तेल और पानी के बंटवारे जैसे मामलों में भारत पर निर्भरता यह दिखाती है कि भारत और बांग्लादेश के बीच अच्छे रिश्ते बहुत जरूरी हैं. पड़ोसी देशों के पास कई संसाधन और समस्याएँ साझा होती हैं, इसलिए उन्हें मिलकर काम करना पड़ता है. अगर दोनों देश सहयोग करते रहें, तो समस्याओं का समाधान आसान हो जाता है. इसके अलावा, जब दुनिया में बड़ी परेशानियाँ आती हैं, जैसे कोविड-19 महामारी या युद्ध, तब पास-पड़ोस के देशों का सहयोग एक सहारे की तरह काम करता है और मुश्किल समय में स्थिति को संभालने में मदद करता है.

अंततः, खलीलुर रहमान की यह यात्रा भारत और बांग्लादेश के बीच आवश्यक सामंजस्य की शुरुआत का संकेत देती है. भले ही बीएनपी और भारत के बीच शुरुआती मतभेदों को लेकर आशंकाएँ बनी हुई हैं, लेकिन रहमान का यह कहना कि बांग्लादेश की विदेश नीति शून्य-योग खेलनहीं है, आश्वस्त करने वाला है. उनका यह कथन कि भारत बांग्लादेश के लिए केवल एक बाहरी साझेदार नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक उपस्थितिहै, दोनों देशों के स्थायी और गहरे संबंधों को दर्शाता है.

सोहिनी बोस ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.

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Sohini Bose is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), Kolkata with the Strategic Studies Programme. Her area of research is India’s eastern maritime ...

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