नेपाल में चुनाव होने वाले हैं जहाँ जेन जी बदलाव और ईमानदार राजनीति की मांग कर रही है. जानें कि ये चुनाव देश की राजनीति को नई दिशा देगा या पुरानी व्यवस्था ही जारी रहेगी.
नेपाल में पिछले कुछ समय में युवाओं, खासकर जेन जी के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों ने देश की राजनीति को हिला दिया था. इन प्रदर्शनों का असर इतना बड़ा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा. अब लगभग पांच महीने बाद देश 5 मार्च को नई सरकार चुनने के लिए मतदान करने जा रहा है. पिछले साल सितंबर से अंतरिम सरकार काम कर रही है जिसका नेतृत्व सुशीला कार्की कर रही हैं. इस अंतरिम व्यवस्था का मकसद चुनाव तक प्रशासन को स्थिर रखना और जरूरी फैसले लेना है.
कई विश्लेषकों का मानना है कि इस बार किसी एक पार्टी को साफ बहुमत मिलना मुश्किल हो सकता है इसलिए गठबंधन सरकार बनने की संभावना भी जताई जा रही है. फिर भी असली बात यह है कि राजनीतिक दल युवाओं की मांग- पारदर्शिता, जवाबदेही और नई सोच को कितना महत्व देते हैं. यही तय करेगा कि देश की राजनीति आगे बदलेगी या पुरानी राह पर ही चलेगी.
सितंबर के प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और नुकसान के बाद, राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने 12 सितंबर को सेना और जेन जी प्रतिनिधि समूहों से परामर्श के बाद सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार का प्रमुख नियुक्त किया. मंत्रिमंडल ने बाद में प्रतिनिधि सभा भंग कर दी और नए चुनावों की घोषणा की. इस तकनीकी और गैर-राजनीतिक प्रशासन का मुख्य उद्देश्य चुनावों के सफल आयोजन की परिस्थितियाँ तैयार करना, दैनिक प्रशासन चलाना और अशांति के बाद उत्पन्न शिकायतों का समाधान करना था.
दिसंबर में अंतरिम सरकार ने जेन जी आंदोलन के नेताओं के साथ समझौता किया और उनकी मांगों को संस्थागत रूप दिया. इन मांगों में संविधान संशोधन, चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका और लोक प्रशासन में सुधार तथा भ्रष्टाचार-रोधी उपाय शामिल थे. प्रदर्शनों को औपचारिक रूप से ‘जन आंदोलन’ का दर्जा भी दिया गया.
चुनाव की तैयारी के तहत नए पात्र मतदाताओं का पंजीकरण कराया गया और अधिक युवाओं को जोड़ने के लिए समय सीमा बढ़ाई गई. विदेश में रहने वाले मतदाताओं को मतदान की अनुमति देने का प्रस्ताव भी रखा गया, लेकिन इस वर्ष लागू नहीं हो सका. दिसंबर में अंतरिम सरकार ने जेन जी आंदोलन के नेताओं के साथ समझौता किया और उनकी मांगों को संस्थागत रूप दिया. इन मांगों में संविधान संशोधन, चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका और लोक प्रशासन में सुधार तथा भ्रष्टाचार-रोधी उपाय शामिल थे. प्रदर्शनों को औपचारिक रूप से ‘जन आंदोलन’ का दर्जा भी दिया गया. हालांकि, आंदोलन के भीतर विभाजन के कारण हाल के महीनों में अंतरिम सरकार की आलोचना भी बढ़ी. नवंबर 2025 में राजतंत्र समर्थक झुकाव वाले 20 से अधिक समूहों ने कार्की के इस्तीफे की मांग की.
2008 में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के बाद से नेपाल ने 14 प्रधानमंत्री देखे हैं और राजनीति कमजोर गठबंधनों के बनने-बिगड़ने के बीच झूलती रही है. यही अस्थिरता युवाओं के असंतोष और पिछले वर्ष के जनसक्रिय आंदोलन का एक बड़ा कारण बनी. राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया अलग-अलग रहीं, पर अधिकतर का लक्ष्य सत्ता बचाए रखना था. सभी दलों ने हिंसा की निंदा की और निष्पक्ष जांच की मांग की, लेकिन प्रदर्शनों के कारणों और मांगों की वैधता पर मतभेद रहे.
शुरुआत में अधिकांश मुख्यधारा दलों ने अंतरिम सरकार को असंवैधानिक बताया और प्रतिनिधि सभा भंग करने का विरोध किया. केवल राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) और राष्ट्रीय प्रजापति पार्टी (आरपीपी) ने खुला विरोध नहीं किया. ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल ने प्रदर्शनों को सरकार के राष्ट्रवादी एजेंडे पर हमला बताया और बाहरी शक्तियों को जिम्मेदार ठहराया. पार्टी ने कई शक्ति प्रदर्शन रैलियां कीं. ओली ने पार्टी नेतृत्व छोड़ने से इनकार किया और झापा-5 सीट से चुनाव लड़ेंगे. एक ओर वे अंतरिम सरकार को अवैध बताते रहे, दूसरी ओर उनकी पार्टी चुनाव की तैयारी भी करती रही.
दूसरी तरफ, नेपाली कांग्रेस ने अलग रास्ता अपनाया. पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउवा सहित शीर्ष नेतृत्व जनता के गुस्से का सामना कर रहा था. गगन थापा ने पार्टी में आत्म-सुधार की मांग उठाई. आंतरिक मतभेद बढ़े और अंततः पार्टी विभाजित हो गई. थापा और विश्व प्रकाश शर्मा ने अलग सम्मेलन कर सुधार कार्यक्रम घोषित किया और नई केंद्रीय समिति बनाई. थापा को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया.
पिछले कुछ वर्षों में युवाओं की भागीदारी राजनीति और सड़कों दोनों जगह बढ़ी है. उन्होंने खुलकर पारदर्शिता, ईमानदार छवि वाले नेतृत्व, भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई और अवसरों में बराबरी की मांग उठाई है.
सुधार प्रक्रिया के तहत पार्टी ने 18 प्रस्ताव रखे- इन प्रस्तावों में प्रधानमंत्री के लिए अधिकतम दो कार्यकाल की सीमा तय करना, बजट का पैसा अधिक न्यायपूर्ण तरीके से बांटना, गैर-आवासीय नेपालियों के अधिकारों की सुरक्षा करना, नियुक्तियों में योग्यता के आधार पर चयन करना, सत्ता वाले समझौतों को न मानना, भाई-भतीजावाद खत्म करना और उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाना शामिल था.
थापा ने यह भी कहा कि राजनीति और प्रशासन में ज्यादा समावेशिता होनी चाहिए. अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को सीधे अवसर (लेटरल एंट्री) दिया जाना चाहिए, और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए. आगामी चुनावों के लिए टिकट वितरण प्रक्रिया में कुछ ‘विरासत से जुड़े’ नेताओं को भी दरकिनार किया गया. फिलहाल, चुनाव आयोग ने अधिवेशन की वैधता को बरकरार रखा है, हालांकि स्थापित एनसी के कुछ सदस्यों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है.
माओवादी धड़े और अन्य छोटे वाम दलों ने मिलकर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी गठित की, जिसमें पुष्पा कमल दहल अध्यक्ष और माधव कुमार सह-समन्वयक बने. वैकल्पिक राजनीति का एजेंडा आगे बढ़ाने वाली आरएसपी के प्रमुख रबी लामिछाने ने नए नेताओं के साथ गठबंधन की कोशिश की. काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह और पूर्व विद्युत प्राधिकरण प्रमुख कुल मान घिसिंग ने साथ आने की कोशिश की, पर गठबंधन जल्दी टूट गया. अन्य नए दल भी उभरे और हरका संपाग ने श्रम संस्कृति पार्टी की कमान संभाली.
नेपाल के ये चुनाव केवल यह तय करने के लिए नहीं हैं कि कौन सी पार्टी या कौन सा नेता सत्ता में आएगा, बल्कि यह भी जांचेंगे कि क्या राजनीतिक दल वास्तव में युवाओं की मांगों को गंभीरता से लेते हैं या नहीं. पिछले कुछ वर्षों में युवाओं की भागीदारी राजनीति और सड़कों दोनों जगह बढ़ी है. उन्होंने खुलकर पारदर्शिता, ईमानदार छवि वाले नेतृत्व, भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई और अवसरों में बराबरी की मांग उठाई है.
एक आशावादी सोच यह है कि जो भी नई सरकार बनेगी, उस पर सुधार करने का दबाव जरूर रहेगा. जनता, खासकर युवा वर्ग, अब ज्यादा जागरूक है और जवाबदेही की मांग कर रहा है. सरकार के लिए इन अपेक्षाओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.
युवा मतदाताओं का कहना है कि केवल बड़े वादे काफी नहीं हैं, बल्कि पार्टियों को अपने काम और फैसलों में बदलाव दिखाना होगा. खासकर उम्मीदवारों के चयन में साफ-सुथरी छवि, काम करने की क्षमता और नई सोच को महत्व दिया जाना चाहिए. टिकट वितरण में परिवारवाद और गुटबाजी कम हो, यह भी एक बड़ी अपेक्षा है.
नेपाल में अब सबसे बड़ी नजर इस बात पर है कि क्या राजनीतिक पार्टियां युवाओं की मांगों को अपने घोषणापत्र, चुनाव प्रचार और संगठनात्मक फैसलों में सच में शामिल करती हैं, या उन्हें केवल चुनावी नारे तक सीमित रखती हैं. युवा पारदर्शिता, ईमानदार नेतृत्व, भ्रष्टाचार पर सख्ती और बराबरी के अवसर चाहते हैं. अगर पार्टियां इन मुद्दों पर ठोस कदम दिखाती हैं, तो जनता का राजनीति पर भरोसा मजबूत हो सकता है.
इन चुनावों के नतीजे यह भी साफ करेंगे कि मतदाता पुराने और स्थापित चेहरों को फिर से चुनते हैं या नए नेताओं और नए एजेंडे को मौका देते हैं. यही फैसला आगे की राजनीति की दिशा तय करेगा. इससे पता चलेगा कि बदलाव की रफ्तार तेज होगी या फिर सुधार की प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ेगी. मतदाताओं के सामने भी एक अहम फैसला है—क्या वे पुराने और स्थापित चेहरों पर ही भरोसा रखेंगे या नए और उभरते नेतृत्व को मौका देंगे. यह चुनाव राजनीतिक अभिजात वर्ग की क्षमता और इच्छा की भी परीक्षा है कि क्या वे खुद में सुधार ला सकते हैं. सितंबर में हुई राजनीतिक घटनाएँ और विरोध प्रदर्शन आने वाले समय में भी बहस का विषय बने रहेंगे, क्योंकि उन्होंने व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया था. मुख्य और नई उभरती पार्टियों ने कुछ मुद्दों पर सख्त रुख दिखाया है, जबकि कुछ मामलों में सीमित लचीलापन भी दिखा है. फिर भी जमीनी स्तर पर बड़े बदलाव की संभावना अभी कमजोर नजर आती है. असली तस्वीर चुनाव परिणाम और नई सरकार की प्राथमिकताओं से साफ होगी.
लगभग 52% मतदाता 18-40 आयु वर्ग के हैं लेकिन प्रमुख दलों के उम्मीदवारों में युवाओं की हिस्सेदारी सीमित है-3,400 से अधिक उम्मीदवारों में केवल लगभग 30% ही 40 वर्ष से कम आयु के हैं. नेपाल की राजनीति में अधिकतर वरिष्ठ नेता अब भी नई पीढ़ी को नेतृत्व सौंपने से हिचकते दिखाई देते हैं. यह केवल व्यक्तिगत झिझक नहीं, बल्कि व्यवस्था की गहरी संरचनात्मक समस्या को दिखाता है, जहाँ पुराने चेहरे और पुराने तरीके लंबे समय से जमे हुए हैं. इससे युवाओं और नए नेताओं के लिए आगे बढ़ने के अवसर सीमित हो जाते हैं. फिर भी एक आशावादी सोच यह है कि जो भी नई सरकार बनेगी, उस पर सुधार करने का दबाव जरूर रहेगा. जनता, खासकर युवा वर्ग, अब ज्यादा जागरूक है और जवाबदेही की मांग कर रहा है. सरकार के लिए इन अपेक्षाओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा. लेकिन वास्तविक बदलाव तुरंत नहीं आएगा. नीतियों, संस्थाओं और राजनीतिक संस्कृति में सुधार लाने में समय लगता है. इसलिए माना जा रहा है कि बदलाव की राह लंबी और कठिन होगी, पर लगातार दबाव बना रहा तो धीरे-धीरे सकारात्मक परिवर्तन संभव है.
शिवम शेखावत ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में जूनियर फेलो हैं.
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Shivam Shekhawat is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. Her research focuses primarily on India’s neighbourhood- particularly tracking the security, political and economic ...
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