भारत क्वांटम तकनीक में आगे बढ़ रहा है लेकिन बिना सही तैयारी जोखिम भी बढ़ सकते हैं. जानें, कैसे राष्ट्रीय क्वांटम मिशन तकनीक, सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रहा है.
2023 में भारत के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (एनक्यूएम)को मंजूरी दी गई. 2023 से 2031 तक इस योजना के लिए 6 हज़ार करोड़ रुपये का आवंटन किया गया. क्वांटम कंप्यूटिंग, संचार, सेंसिंग और उन्नत सामग्री के क्षेत्र में तकनीकी संप्रभुता की दिशा में ये एक महत्वपूर्ण कदम है. केंद्रीय बजट 2026 ने इस दिशा को और मज़बूत किया है. अब भारत की क्वांटम महत्वाकांक्षाओं को सेमीकंडक्टर के विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस रिसर्च और भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) को आधार प्रदान करने वाली सुरक्षा संरचना से जोड़ा गया है.
वैश्विक स्तर पर, क्वांटम टेक्नोलॉजी को रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के साधन के रूप में देखा जा रहा है. अमेरिका अपनी राष्ट्रीय क्वांटम पहल की संरचना को आगे बढ़ा रहा है. इसके साथ ही, वो राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे जैसे कि एनएसए के कमर्शियल नेशनल सिक्योरिटी एल्गोरिथम (सीएनएसए) 2.0 सूट के तहत क्रिप्टोग्राफिक परिवर्तन की तैयारी कर रहा है. चीन ने क्वांटम कम्युनिकेशन और कंप्यूटिंग के क्षेत्र में लगातार सरकारी निवेश किया है, जिसमें सेटेलाइट आधारित क्वांटम वितरण प्रयोग भी शामिल हैं. यूरोपीय संघ का क्वांटम फ्लैगशिप प्रोग्राम सदस्य देशों के बीच समन्वित शोध को बढ़ावा देता है.
केंद्रीय बजट 2026 ने इस दिशा को और मज़बूत किया है. अब भारत की क्वांटम महत्वाकांक्षाओं को सेमीकंडक्टर के विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस रिसर्च और भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को आधार प्रदान करने वाली सुरक्षा संरचना से जोड़ा गया है.
ऐसे माहौल में, भारत भी जल्द से जल्द इस तकनीकी में शीर्ष पर आना चाहता है और उसकी इस महत्वाकांक्षा में कुछ भी गलत नहीं है. फिर भी, बिना सोचे-समझे की गई जल्दबाजी से रणनीतिक कमज़ोरी का ख़तरा है. सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये नहीं है कि भारत को क्वांटम टेक्नोलॉजी में निवेश करना चाहिए या नहीं? इस बात पर तो दो राय नहीं है कि भारत को इस तकनीकी में निवेश करना चाहिए, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या निवेश का क्रम भू-राजनीतिक स्थिति के बजाए इंजीनियरिंग की वास्तविकताओं को दर्शाता है.
वैश्विक क्रिप्टोग्राफिक चिंता की नींव पीटर शोर के 1994 के एल्गोरिदम में निहित है. इसने ये प्रदर्शित किया कि एक पर्याप्त रूप से बड़ा, और ना के बराबर गलतियां करने वाला क्वांटम कंप्यूटर लार्ज इंटिजर्स (बड़ी पूर्णांक संख्याओं) का सही से फैक्टर (गुणनखंड) कर सकता है, साथ ही डिस्क्रीट लोगारिथ्मस की गणना कर सकता है. ऐसी क्षमता व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले सार्वजनिक कुंजी क्रिप्टोग्राफिक सिस्टम जैसे कि RSA और इलिप्टिक कर्व क्रिप्टोग्राफ़ी को कमज़ोर कर देगी.
हालांकि, यहां पर "पर्याप्त रूप से बड़ा" शब्द ही सबसे महत्वपूर्ण है. आरएसए-2048 को तोड़ने के लिए हज़ारों लॉजिकल क्यूबिट्स की ज़रूरत होगी. मौजूदा सरफेस-कोड एरर करेक्शन मॉडल के तहत, संभावित रूप से लाखों फिजिकल क्यूबिट्स की आवश्यकता होगी जो बहुत कम त्रुटि दरों के साथ काम कर रहे हों. वर्तमान प्रणालियां जॉन प्रेस्किल द्वारा बताई गई नॉइज़ी इंटरमीडिएट-स्केल क्वांटम (एनआईएसक्यू) श्रेणी में ही हैं. इस समय क्रिप्टोग्राफिक रूप से प्रासंगिक कोई भी क्वांटम कंप्यूटर (सीआरक्यूसी) मौजूद नहीं है.
ये बात सही है कि, इन प्रणालियों के लिए सुनियोजित परिवर्तन योजना आवश्यक है, लेकिन इस बदलाव को ख़तरे के अनुपात में होना चाहिए. हार्डवेयर विकास के संदर्भ में समय-समय पर इसका पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए.
ऐसे में कहा जा सकता है कि ये भेद्यता सशर्त है. समयसीमा भी अनिश्चित बनी हुई है. रणनीतिक नीति को गणितीय अनिवार्यता, इंजीनियरिंग व्यवहार्यता और तात्कालिकता के बीच अंतर करना होगा. इन सबको आपस में मिला देने से राष्ट्रीय संसाधनों के गलत आवंटन का खतरा है.
"अभी डेटा इकट्ठा करो, बाद में डिक्रिप्ट करो" (एचएनडीएल) परिदृश्य ने पोस्ट क्वांटम क्रिप्टोग्राफी के बाद की वैश्विक चर्चाओं को गति दी है. हालांकि, चिंता इस बात की है कि बड़े पैमाने पर क्वांटम सिस्टम शुरू होने पर शत्रु आज एन्क्रिप्टेड डेटा इकट्ठा कर सकते हैं और बाद में उसे डिक्रिप्ट कर सकते हैं.
फिर भी, ज़्यादातर एन्क्रिप्टेड ट्रैफिक का दीर्घकालिक मूल्य सीमित होता है, फिर चाहे वो खुदरा भुगतान, नियमित संचार, परिचालन संबंधी आदान-प्रदान. ज़्यादा गंभीर ख़तरा उन क्षेत्रों में निहित है, जहां गोपनीयता दशकों तक कायम रहनी चाहिए. रणनीतिक रक्षा अभिलेखागार, खुफिया संपत्तियां, राजनयिक संचार, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा डिज़ाइन और दीर्घकालिक पहचान प्रणालियों पर ज़ोखिम ज़्यादा है.
भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर दीर्घकालिक राष्ट्रीय संपत्ति माना जाता है. इसमें आधार से जुड़ी पहचान प्रणाली और डिजिटल पेमेंट सिस्टम शामिल है. ये बात सही है कि, इन प्रणालियों के लिए सुनियोजित परिवर्तन योजना आवश्यक है, लेकिन इस बदलाव को ख़तरे के अनुपात में होना चाहिए. हार्डवेयर विकास के संदर्भ में समय-समय पर इसका पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए. इस संदर्भ में भारत की कमज़ोरी तत्काल क्रिप्टोग्राफिक पतन नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से गलत क्रम है.
के राष्ट्रीय मानक एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईएसटी) के नेतृत्व में की गई मानकीकरण की कोशिशों से पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है. इसके बावजूद, अभी तक किसी भी पोस्ट-क्वांटम एल्गोरिदम का ऑपरेशनल टेस्ट नहीं हो सका है. सुरक्षा संबंधी मान्यताएं वैकल्पिक गणितीय कठोरता ढांचों पर आधारित हैं, और इनकी अभी जांच होनी बाकी हैं.
भारत में मानकीकरण परीक्षण और गुणवत्ता प्रमाणन निदेशालय के तहत मान्यता प्राप्त मूल्यांकन संस्थान हैं. सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस कम्प्यूटिंग के भीतर तकनीकी विशेषज्ञता मौजूद है. इसके बावजूद, समर्पित पीक्यूसी परीक्षण प्रणालियां वैश्विक स्तर पर अभी भी प्रारंभिक अवस्था में हैं.
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए में, "क्वांटम-प्रूफ" या "फ्यूचर-प्रूफ" सुरक्षा की भाषा को सावधानीपूर्वक अपनाना चाहिए. खरीद संबंधी निर्णयों में जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए. ये फैसले मानकों पर आधारित और स्वतंत्र रूप से मान्य होने चाहिए.
क्वांटम पर चल रहे काम को लेकर जिस एक पहलू पर कम चर्चा होती है, वो इसकी प्रमाणीकरण की क्षमता है. क्रिप्टोग्राफिक माइग्रेशन के लिए कार्यान्वयन परीक्षण, साइड-चैनल रेजिस्टेंस मूल्यांकन, लाइफसाइकिल आश्वासन और आईएसओ/आईईसी 15408 (सामान्य मानदंड) जैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त ढांचों के तहत सत्यापन ज़रूरी होता है.
हालांकि भारत में मानकीकरण परीक्षण और गुणवत्ता प्रमाणन (एसटीक्यूसी) निदेशालय के तहत मान्यता प्राप्त मूल्यांकन संस्थान हैं. सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस कम्प्यूटिंग (सी-डीएसी) के भीतर तकनीकी विशेषज्ञता मौजूद है. इसके बावजूद, समर्पित पीक्यूसी परीक्षण प्रणालियां वैश्विक स्तर पर अभी भी प्रारंभिक अवस्था में हैं.
अगर बिना मूल्यांकन अवसंरचना और समानांतर विकास के बिना माइग्रेशन में तेज़ी आती है, तो भारत को बाहरी सत्यापन प्रणालियों पर निर्भर रहना पड़ सकता है. मौजूदा संस्थागत ढांचों के साथ एकीकृत राष्ट्रीय क्वांटम परीक्षण और मूल्यांकन केंद्र की स्थापना से राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के तहत तैयारियों को मज़बूती मिलेगी.
क्वांटम संप्रभुता का अनुसंधान निधि और हार्डवेयर महत्वाकांक्षा से आगे विस्तार कर प्रमाणीकरण को भी इसमें शामिल करना चाहिए.
भारत की क्वांटम तकनीक से संबंधित तैयारियां सिर्फ नागरिक नीतिगत चर्चा तक ही सीमित नहीं हैं. मध्यप्रदेश के महू में स्थित मिलिट्री कॉलेज ऑफ टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग (एमसीटीई) में देश की पहली समर्पित क्वांटम प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला स्थापित की गई है. ये दिखाता है कि सशस्त्र बलों के भीतर भी इस बात को स्वीकार कर लिया गया है कि भविष्य में क्वांटम प्रौद्योगिकियां सैन्य क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी.
ये विकास रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है. सैन्य संस्थान नई तकनीकी अपनाने के लिए नैरेटिव की बजाए ये देखते हैं कि ऑपरेशनल तौर पर टेक्नोलॉजी कितनी व्यावहारिक है. रक्षा प्रणालियों में, क्रिप्टोग्राफिक इंटिग्रेटी, सिग्नल की स्पष्टता और हार्डवेयर आश्वासन मिशन, सबसे ज़रूरी होती हैं. अगर सैन्य संस्थान किसी नई तकनीकी पर मुहर लगाते हैं तो इसका मतलब ये होता है कि टेक्नोलॉजी को लेकर प्रयोगशाला में किए गए वादों और ऑपरेशनल फील्ड में उनकी तैनाती के बीच सही सामंजस्य है.
सैन्य संस्थान नई तकनीकी अपनाने के लिए नैरेटिव की बजाए ये देखते हैं कि ऑपरेशनल तौर पर टेक्नोलॉजी कितनी व्यावहारिक है. रक्षा प्रणालियों में, क्रिप्टोग्राफिक इंटिग्रेटी, सिग्नल की स्पष्टता और हार्डवेयर आश्वासन मिशन, सबसे ज़रूरी होती हैं.
रक्षा संचार नेटवर्क भी दीर्घकालिक सुरक्षा संरचनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. एन्क्रिप्शन सिस्टम दशकों तक संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा करते हैं, जिससे सशस्त्र बल सीधे डेटा इकट्ठा करने और बाद में डिक्रीप्ट वाले ज़ोखिम के दायरे में आ जाते हैं. ऐसे में सैन्य संस्थाओं का ट्रांजिशन प्लान, नेशनल क्रिप्टोग्राफिक सीक्वेंसिंग के लिए एक यथार्थवादी मानदंड प्रदान करता है.
इसके अलावा, रक्षा खरीद प्रक्रियाओं में पहले से ही कई स्तरीय सत्यापन होता है. हार्डवेयर सत्यापन, फर्मवेयर आश्वासन, साइड-चैनल मूल्यांकन और जीवनचक्र ज़ोखिम प्रबंधन जैसे स्तर पर जांच होती है. आश्वासन की इस संस्कृति को व्यापक राष्ट्रीय क्वांटम संक्रमण ढांचों में एकीकृत करने से नागरिक-सैन्य तालमेल मज़बूत होगा.
इसलिए, क्वांटम तैयारियों को एक राष्ट्रव्यापी क्षमता के रूप में समझा जाना चाहिए, जो रोज़ाना प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करने वाले संस्थानों में निहित है.
भारत के आम बजट 2026 में क्वांटम विकास को एक व्यापक डीप टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम के तहत रखा गया है. सेमीकंडक्टर के निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सुरक्षित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी इसमें शामिल किया गया है. ये तकनीक अलग-अलग मैच्योरिटी कर्व्स पर विकसित होती है.
भारत की ताकत अनुशासित शासन में निहित है. गणितीय संभावना, इंजीनियरिंग समय सीमा और रणनीतिक आवश्यकता के बीच अंतर करना भारत को आता है. एक सुनियोजित रोडमैप को राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के तहत मूलभूत अनुसंधान को बढ़ावा देना चाहिए. स्पेसिफिक क्रिप्टोग्राफिक ट्रांजिशन को प्राथमिकता देनी चाहिए.
भारत को बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ वित्तपोषण समानता हासिल करने की ज़रूरत नहीं है. हर देश की आवश्यकताएं अलग होती है. रणनीतिक भिन्नता क्वांटम संचार सुरक्षा, रक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सेंसिंग एप्लीकेशन, शासन ढांचे और ग्लोबल साउथ में साझेदारी के क्षेत्र में अधिक स्थायी लाभ प्रदान कर सकती है. उभरती हुई तकनीक में नेतृत्व सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि किसी ने उस पर कितना खर्च किया. इसकी सफलता सामंजस्य, समन्वय और संस्थागत गहराई से भी परिभाषित होती है.
क्वांटम कंप्यूटिंग एक दीर्घकालिक संरचनात्मक सीमा का प्रतिनिधित्व करती है. अपर्याप्त तैयारी के साथ इसमें उतरना वास्तव में ज़ोखिम भरा है. हालांकि, इसके साथ ही ये ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि क्वांटम के नैरेटिव में फंसने की बजाए इंजीनियरिंग वास्तविकताओं का भी ख्याल रखा जाए.
भारत की ताकत अनुशासित शासन में निहित है. गणितीय संभावना, इंजीनियरिंग समय सीमा और रणनीतिक आवश्यकता के बीच अंतर करना भारत को आता है. एक सुनियोजित रोडमैप को राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के तहत मूलभूत अनुसंधान को बढ़ावा देना चाहिए. स्पेसिफिक क्रिप्टोग्राफिक ट्रांजिशन को प्राथमिकता देनी चाहिए. संप्रभु प्रमाणीकरण क्षमता का विस्तार करना चाहिए. जहां उचित हो, वहां सैन्य-स्तरीय आश्वासन प्रथाओं को एकीकृत करना चाहिए और समय-समय पर हार्डवेयर की तत्परता का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए.
भारत की दिशा क्वांटम संकट से निपटने की तैयारी से होना चाहिए, न कि क्वांटम संकट के डर से.
लेफ्टिनेंट जनरल एमयू नायर (रिटायर्ड)पूर्व राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा संयोजक (एनसीएससी) हैं.
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Lt Gen M Unnikrishnan Nair PVSM, AVSM, SM (retd) is a former Signal Officer-in-Chief of the Indian Army with nearly four decades of service in ...
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