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टेक्नोलॉजी के वर्चस्व वाली वर्तमान दुनिया में क्वांटम तकनीक़ का इस्तेमाल भी लगातार बढ़ता जा रहा है. ऐसे में देखा जाए तो भारत और ताइवान के बीच कूटनीतिक सहयोग को सशक्त करने के लिए क्वांटम टेक्नोलॉजी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरा है.
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पूरी दुनिया में क्वांटम टेक्नोलॉजी (QT) अभी उभर रही है और कहा जा सकता है कि यह फिलहाल अपने शुरुआती दौर में है. बावज़ूद इसके क्वांटम तकनीक़ में ज़बरदस्त संभावनाएं हैं और यह भविष्य में एक महत्वपूर्ण और बुनियादी तकनीक़ बनने की दिशा में तेज़ी से अग्रसर है. कहने का मतलब है कि जिस प्रकार से आज सेमीकंडक्टर तकनीक़ ने अपनी जड़ें मज़बूती से जमा ली हैं, ठीक उसी तरह क्वांटम टेक्नोलॉजी भी आने वाले दिनों में हर तरफ छा जाने वाली है. जिस प्रकार से ताइवान ने सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी में महारत हासिल की है और इस सेक्टर में वह दुनिया के सामने एक मिसाल बनकर उभरा है, उसी तर्ज़ पर ताइवान क्वांटम तकनीक़ में भी दुनिया का अग्रणी देश बनने की ओर अग्रसर है और सेमीकंडक्टर की तरह ही क़ामयाबी को दोहराने के लिए पूरी तरह से तैयार नज़र आ रहा है. इस लिहाज़ से देखें तो भारत के लिए क्वांटम तकनीक़ के क्षेत्र में ताइवान एक मज़बूत सहयोगी बन सकता है. अगर ऐसा होता है, तो भारत क्वांटम टेक्नोलॉजी की वैश्विक ताक़तों यानी अमेरिका और चीन की ओर से इसके निर्यात में खड़ी की गई रुकावटों से पैदा हुई विपरीत परिस्थितियों से आसानी से निज़ात पा सकता है.
वर्ष 2021 में ताइवान नेशनल साइंस एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल (NSTC) ने क्वांटम तकनीक़ के रणनीतिक महत्व को समझते हुए ताइवान क्वांटम प्रोग्राम ऑफिस (TQPO) की स्थापना की थी. वर्ष 2022 में NSTC ने एकेडेमिया सिनिका और आर्थिक मामलों के मंत्रालय के सहयोग से पांच वर्षों में 259 मिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश की योजना के साथ नेशनल क्वांटम टीम का भी गठन किया. इस नेशनल क्वांटम टीम में तकनीक़ के 72 विशेषज्ञ और 24 कंपनियां शामिल हैं. इस टीम में निजी सेक्टर से लेकर ताइवान के सरकारी अधिकारी, शिक्षाविद् और शोध संस्थानों के प्रतिनिधि तक शामिल हैं. इस नेशनल टीम की रिसर्च का फोकस मुख्य रूप से यूनिवर्सल क्वांटम कंप्यूटर हार्डवेयर टेक्नोलॉजी, क्वांटम ऑप्टिकल टेक्नोलॉजी, क्वांटम सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी और विभिन्न क्षेत्रों में इसके उपयोग को विकसित करने पर है.
इस नेशनल टीम की रिसर्च का फोकस मुख्य रूप से यूनिवर्सल क्वांटम कंप्यूटर हार्डवेयर टेक्नोलॉजी, क्वांटम ऑप्टिकल टेक्नोलॉजी, क्वांटम सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी और विभिन्न क्षेत्रों में इसके उपयोग को विकसित करने पर है.
ज़ाहिर है कि ताइवान पहले ही क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और काबिलियत का लोहा मनवा चुका है. एकेडेमिया सिनिका ने जनवरी 2024 में ताइवान का पहला स्वदेश में निर्मित क्वांटम कंप्यूटर लॉन्च किया था, जिसमें पांच सुपरकंडक्टिंग क्यूबिट शामिल थे. इतना ही नहीं, नेशनल त्सिंग हुआ यूनिवर्सिटी (NTHU) में पिछले साल अक्टूबर महीने में भौतिकी विभाग की अगुवाई में एक रिसर्च टीम ने दुनिया का सबसे छोटा क्वांटम कंप्यूटर विकसित किया था. इस छोटे क्वांटम कंप्यूटर को बनाने में एक अकेले फोटॉन का इस्तेमाल किया गया था. इसके अतिरिक्त, नेशनल एप्लाइड रिसर्च लेबोरेटरीज (NARLabs) के अंतर्गत ताइवान के सरकारी वित्त पोषित संस्थान ताइवान सेमिकंडक्टर रिसर्च इंस्टीट्यूट (TSRI) ने पिछले साल नवंबर महीने में फिनलैंड की एक क्वांटम कंप्यूटिंग कंपनी यानी IQM क्वांटम कंप्यूटर्स (IQM) से IQM स्पार्क नाम के 5-क्यूबिट सुपरकंडक्टिंग क्वांटम कंप्यूटर का अधिग्रहण किया था. इसके साथ ही ताइवान ने अपने होन हाई रिसर्च इंस्टीट्यूट और जापान की क्यूनासिस के बीच रणनीतिक साझेदारी स्थापित की है. इस साझेदारी के ज़रिए ताइवान क्वांटम कंप्यूटिंग सॉफ्टवेयर और सिमुलेशन के विकास में महारत हासिल करने की कोशिश कर रहा है.
ताइवान की नेशनल त्सिंग हुआ यूनिवर्सिटी ने क्वांटम कम्युनिकेशन के क्षेत्र में वर्ष 2019 में खुद से ही विकसित किए गए सिंगल-फोटॉन सोर्स का इस्तेमाल करके सफलतापूर्वक क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (QKD) तकनीक़ ईज़ाद की थी. विश्वविद्यालय की रिसर्च टीम ने इस दिशा में अपने शोध को जारी रखा और उनकी रिसर्च की बदौलत ही वर्ष 2023 में ताइवान का पहला क्वांटम सिक्योर कम्युनिकेशन नेटवर्क विकसित किया गया. चीन की ओर से लगातार बढ़ते साइबर सुरक्षा ख़तरों के मद्देनज़र ताइवान ने पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) में बदलाव करने की अहमियत को भी बखूबी समझा है. ताइवान की एकेडेमिया सिनिका पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी रिसर्च में पूरी गंभीरता के साथ जुटी हुई है. पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी के क्षेत्र में शोध कार्य कर रही ताइपे की रिसर्च कंपनी चेल्पिस क्वांटम कॉर्प को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्टैंडर्ड एंड टेक्नोलॉजी (NIST) द्वारा मान्यता प्रदान की गई है. NIST ने अपनी PQC मानकीकरण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए अक्टूबर 2024 में ताइवान की इस चेल्पिस क्वांटम कॉर्प शोध फर्म के तीन एल्गोरिदम को चुना था. इतना ही नहीं वर्ष 2006 से ही पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी को विकसित करने के लिए एकेडेमिया सिनिका और चेल्पिस क्वांटम कॉर्प आइंडहोवन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के ज़रिए नीदरलैंड्स के साथ सहयोग कर रहे हैं. इसी सहयोग की वजह से वर्ष 2023 में चेल्पिस क्वांटम सेफ माइग्रेशन सेंटर की स्थापना का रास्ता बन सका. इस सेंटर की स्थापना का मकसद इस क्षेत्र में अनुसंधान को गति प्रदान करने और PQC माइग्रेशन को बढ़ावा देने के लिए वैश्विक स्तर पर सहयोग को प्रोत्साहित करना है.
क्वांटम टेक्नोलॉजी सहयोग के क्षेत्र में भारत और ताइवान के बीच अपार संभावनाएं मौज़ूद हैं. इस तकनीक़ में सहयोग स्थापित होने से दोनों देशों को ज़बरदस्त फायदा मिलने की उम्मीद है. भारत 6,000 करोड़ रुपये (730 मिलियन अमेरिकी डॉलर) के अपने महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (NQM) के माध्यम से क्वांटम तकनीक़ के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को मज़बूती प्रदान करने में जुटा हुआ है. NQM के चार मुख्य स्तंभ यानी क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम कम्युनिकेशन, क्वांटम सेंसर और क्वांटम मैटेरियल एंड डिवाइस हैं. इसी के अनुरूप भारत सरकार ने देश भर के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में चार थीमैटिक हब (T-Hubs) स्थापित किए हैं, जो हाल ही में शुरू भी हो गए हैं.
क्वांटम टेक्नोलॉजी के निर्यात पर अमेरिका, चीन और यूरोपियन यूनियन के ज़्यादातर देशों समेत इस क्षेत्र के अग्रणी राष्ट्रों ने तमाम निर्यात प्रतिबंध लगा रखे हैं. ज़ाहिर है कि भारत के लिए क्वांटम तकनीक़ में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने की राह में ये प्रतिबंध बहुत बड़ा रोड़ा बने हुए हैं. इन हालातों में अगर क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में ताइवान के साथ भारत किसी सहयोग की दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह भारत के साथ-साथ ताइवान के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है. इसके अलावा, जिस प्रकार से हाल-फिलहाल में सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं की स्थापना की दिशा में चीन पर निर्भरता कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर जो कोशिशें की गई हैं, उनसे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि दूसरी अहम और उभरती प्रौद्योगिकियों के मामले में भी इसी प्रकार की आपूर्ति श्रृंखलाओं को स्थापित किए जाने की बेहद ज़रूरत है. मौज़ूदा दौर की बात की जाए तो QT आपूर्ति श्रृंखलाएं फिलहाल ज़्यादा सशक्त नहीं हैं. ऐसे में अलग समान विचारधारा और मकसद वाले देशों के बीच क्वांटम तकनीक़ के क्षेत्र में सहयोग स्थापित होता है, तो इससे काफ़ी फायदा होगा और इस सेक्टर में सप्लाई चेन्स की कमी भी नहीं खलेगी. देखा जाए तो अमेरिका में इस दिशा में काम करना भी शुरू कर दिया है. अमेरिका ने सैन डिएगो स्थित क्वांटम डिजाइन इंटरनेशनल कंपनी के ज़रिए ताइवान के साथ क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग की पहल शुरू कर दी है. अमेरिकी कंपनी क्वांटम डिजाइन इंटरनेशनल ने ताइपे में क्वांटम डिजाइन ताइवान की स्थापना की है. यह कंपनी क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम कम्युनिकेशन के लिए एक महत्वपूर्ण घटक डाइल्यूशन रेफ्रिजरेटर्स का निर्माण करती है. इस सबके मद्देनज़र इसमें कोई शक नहीं है कि QT आपूर्ति श्रृंखलाओं की स्थापना में भारत और ताइवान के बीच अगर सहयोग की संभावनाएं बनती है, तो भविष्य में यह बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है.
जिस प्रकार से हाल-फिलहाल में सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं की स्थापना की दिशा में चीन पर निर्भरता कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर जो कोशिशें की गई हैं, उनसे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि दूसरी अहम और उभरती प्रौद्योगिकियों के मामले में भी इसी प्रकार की आपूर्ति श्रृंखलाओं को स्थापित किए जाने की बेहद ज़रूरत है.
जहां तक ताइवान का सवाल है, तो सेमीकंडक्टर तकनीक़ में उसने जो महारत हासिल की है, उससे ताइवान को बहुत फायदा हुआ है. सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि चीन की तरफ से पैदा की जा रही चुनौतियों का सामना करने के लिए इससे ताइवान को बहुत आर्थिक ताक़त मिली है. सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में विशेषज्ञता से ताइवान को और भी बहुत लाभ हुए हैं. हालांकि, वैश्विक स्तर पर जिस तरह से किसी ख़ास देश पर निर्भरता को समाप्त करने के लिए निर्बाध सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है, उससे साफ है कि अभी नहीं तो बहुत ज़ल्द ही ताइवान को इस क्षेत्र में जो बढ़त मिली हुई है, वो समाप्त हो सकती है. हालांकि, अगर ताइवान क्वांटम तकनीक़ जैसी बेहद अहम और बुनियादी टेक्नोलॉजी में विशेषज्ञता हासिल कर लेता है, तो निश्चित रूप से आने वाले वक़्त में वह अपनी इस रणनीतिक स्थिति को मज़बूती के साथ बरक़रार रख सकता है.
निसंदेह तौर पर ताइवान ने हाल के दिनों में क्वांटम तकनीक़ विकसित करने की दिशा में काफ़ी कुछ प्रयास किए हैं. बावज़ूद इसके QT के क्षेत्र में ताइवान कहीं न कहीं एक नया खिलाड़ी है. ऐसे में ताइवान अगर भारत के साथ इस क्षेत्र में सहयोग स्थापित करता है, तो निश्चित रूप से उसे QT में भारत के अनुभव और विशेषज्ञता का फायदा होगा. सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जिस प्रकार से ताइवान ने उपलब्धियां हासिल की हैं, उनके मद्देनज़र सेमीकंडक्टर क्यूबिट्स पर आधारित क्वांटम कंप्यूटर विकसित करने में पारस्परिक सहयोग भारत और ताइवान दोनों के लिए अवसरों से भरा हुआ है. भारत ने सेमीकंडक्टर के सेक्टर में हाल के दिनों में ही तेज़ गति पकड़ी है. भारत ने जिस तरह से ताइवान की फॉक्सकॉन और पॉवरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कारपोरेशन (PSMC) जैसी कंपनियों के साथ गठजोड़ किया है, उससे कहा जा सकता है कि भारत-ताइवान तकनीक़ी सहयोग एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है और तेज़ी के साथ मज़बूत हो रहा है. इतना ही नहीं, भारत ने क्वांटम कम्युनिकेशन और क्वांटम सेंसिंग जैसी क्वांटम तकनीक़ों में अपनी काबिलियत साबित की है. क्वांटम टेक्नोलॉजी के ये वो क्षेत्र हैं, जिनमें ताइवान अभी बहुत आगे नहीं जा पाया है. ज़ाहिर है कि इन उन्नत प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में किया जा सकता है. ऐसे में यह तय है कि ताइवान अगर भारत के साथ QT सहयोग को आगे बढ़ाता है, तो यह उसके लिए फायदेमंद होगा.
क्वांटम टेक्नोलॉजी एक नया क्षेत्र है और अभी विकसित होने की राह पर अग्रसर है. ऐसे में इस तकनीक़ में अनुसंधान और विकास (R&D) फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण है. ज़ाहिर है कि इस कार्य के लिए न केवल व्यापक स्तर पर निवेश की ज़रूरत है, बल्कि इसके लिए विशेषज्ञों की भी आवश्यकता है. इसे देखते हुए QT में भारत और ताइवान की ओर से साझा अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देना वर्तमान में सबसे अहम है. गौरतलब है कि सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक्नोलॉजी और एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान और विकास परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करने के मकसद से वर्ष 2007 में इंडिया-ताइवान प्रोग्राम ऑफ कोऑपरेशन इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी शुरू किया गया था. अगर इसी सहयोगी फ्रेमवर्क के तहत क्वांटम तकनीक़ को भी लाया जाता है, तो यह बहुत ही अच्छा क़दम साबित हो सकता है. इसकी वजह यह है कि भारत और ताइवान के बीच इस सहयोगी कार्यक्रम की नोडल एजेंसियां विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और NSTC हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि यही दोनों एजेंसियां अपने-अपने देशों में क्वांटम तकनीक़ के विकास के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों की नोडल एजेंसियों के तौर पर भी काम करती हैं. भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग NQM यानी नेशनल क्वांटम मिशन को संचालित करता है, जबकि ताइवान में NSTC नेशनल क्वांटम टीम की गतिविधियों को नियंत्रित करती है.
भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग NQM यानी नेशनल क्वांटम मिशन को संचालित करता है, जबकि ताइवान में NSTC नेशनल क्वांटम टीम की गतिविधियों को नियंत्रित करती है.
इसके अलावा, दोनों देशों में क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में जुटे शिक्षण संस्थानों के बीच अगर विषय विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का अकादमिक आदान-प्रदान किया जाता है, तो यह भी बहुत लाभदायक सिद्ध होगा. उदाहरण के तौर पर एकेडेमिया सिनिका एवं NTHU जैसे ताइवान के संस्थानों और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs) एवं भारतीय विज्ञान संस्थान (IISC), बेंगलुरु जैसे भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों के बीच अकादमिक आदान-प्रदान प्रोग्राम चलाया जाता है, तो निस्संदेह रूप से इसका बहुत फायदा मिलेगा. जिस प्रकार से भारत और अमेरिका के बीच क्वांटम एंटेंगलमेंट एक्सचेंज प्रोग्राम चलाया जा रहा है, भारत और ताइवान के बीच भी ऐसा प्रतिभाओं की अदला-बदली का कार्यक्रम चलाया जा सकता है. ज़ाहिर है कि इससे न केवल भारत और ताइवान के बीच क्वांटम टेक्नोलॉजी से संबंधित संयुक्त शोध पत्र प्रकाशित करने का अवसर मिलेगा, बल्कि इससे क्वांटम प्रौद्योगिकी के विकास में भी तेज़ी आएगी.
ताइवान की नेशनल साइंस एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल (NSTC) ने वर्ष 2023 में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में ताइवान साइंस एंड टेक्नोलॉजी हब की स्थापना की थी. इसका मकसद शोध, स्टार्टअप्स और प्रतिभाओं को बढ़ावा देना है. NSTC भारत के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के अंतर्गत बनाए गए टेक्नोलॉजी-हब में से किसी एक में, जिनका जिक्र पहले किया गया है, इसी तरह के हब की स्थापना के बारे में सोच सकता है. यह थीमैटिक-हब ऐसा होगा, जो क्वांटम तकनीक़ के क्षेत्र में शोध और विकास के प्रति समर्पित होगा.
भारत में पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) के क्षेत्र में QNu लैब्स जैसे स्टार्टअप भी मौज़ूद हैं. जिस तरह से ताइवान की सेल्पिस क्वांटम कॉर्प कंपनी ने PQC के क्षेत्र में ज़बरदस्त कार्य किया है, उसी तरह से भारत के इन स्टार्टअप ने भी इस क्षेत्र में काफ़ी कुछ किया है. अगर दोनों देशों की इन कंपनियों के बीच बिजनेस-टू-बिजनेस सहयोग विकसित किया जाता है, तो यह भी QT सहयोग के लिए एक बेहतरीन मौक़ा उपलब्ध करा सकता है.
भारत और ताइवान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध वर्ष1995 में स्थापित हुए थे. देखा जाए तो दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते बहुत पुराने नहीं हैं और प्रारंभिक चरण में ही हैं. ऐसे में यदि भारत और ताइवान के बीच क्वांटम तकनीक़ के क्षेत्र में सहयोग आगे बढ़ता है, तो यह कहीं न कहीं द्विपक्षीय कूटनीतिक रिश्तों को सशक्त करने में उत्प्रेरक का काम करेगा. एक और अहम बात यह है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ताइवान की पूर्व राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन समेत दोनों राष्ट्रों के राजनेताओं ने अपने-अपने यहां QT के महत्व को माना है और इसे प्राथमिकता में रखा है. इस लिहाज़ से देखें, तो भारत और ताइवान दोनों ही देश के बीच क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग बनाने का यह सबसे सटीक समय है. सबसे बड़ी बात यह है कि अगर दोनों देशों के बीच इस क्षेत्र में सहयोग परवान चढ़ता है, तो इससे निश्चित तौर पर आने वाले दिनों में उनके बीच सशक्त राजनीतिक रिश्ते क़ायम करने का रास्ता भी खुलेगा.
प्रतीक त्रिपाठी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी एंड टेक्नोलॉजी में जूनियर फेलो हैं.
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Prateek Tripathi is an Associate Fellow at the Centre for Security, Strategy and Technology. His work focuses on an emerging technologies and deep tech including quantum ...
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