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Published on May 28, 2026 Updated 12 Days ago

डेंगू के तेजी से बढ़ते खतरे के बीच क्वाडेंगा वैक्सीन को एक अहम कदम माना जा रहा है लेकिन यह अकेला समाधान नहीं है. इस बीमारी पर काबू पाने के लिए वैज्ञानिक रणनीति, निगरानी और सतर्कता बेहद जरूरी बनी हुई है. पढ़िए पूरा विश्लेषण.

डेंगू बनाम क्वाडेंगा: कौन जीतेगा ये जंग?

डेंगू एक मच्छर जनित वायरल संक्रमण है जो उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय (subtropical) क्षेत्रों में फैला हुआ है. दुनिया की आधी आबादी पर डेंगू का खतरा है और इसके मामले लगातार बढ़ रहे हैं. साल 2000 में इसके मामले 5 लाख थे जो 2024 में बढ़कर 1.46 करोड़ हो गए. भारत में भी 2025 में 1.2 लाख मामले आए. बढ़ता तापमान, तेजी से शहरीकरण और खराब टाउन प्लानिंग इसके मुख्य कारण हैं जिससे यह 100 से अधिक देशों में फैल चुका है. चूंकि इसका कोई खास इलाज नहीं है इसलिए बचाव ही एकमात्र उपाय है. इस वर्ष मार्च में, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की एक विषय विशेषज्ञ समिति (Subject Expert Committee) ने डेंगू के टीके - 'क्वाडेंगा' (Qdenga) - की शुरुआत को मंजूरी दे दी, जो डेंगू के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण मोड़ है. बहरहाल, डेंगू के सार्थक नियंत्रण के लिए एक एकीकृत रणनीति अभी भी आवश्यक बनी हुई है.

डेंगू (DENV) संक्रमण चार आनुवंशिक रूप से समान लेकिन अलग-अलग प्रकारों या सरोटाइप - DENV-1, DENV-2, DENV-3, और DENV-4 में से किसी के भी कारण हो सकता है. संक्रमण लक्षणहीन (asymptomatic) हो सकता है, इसके परिणामस्वरूप ऐसा डेंगू बुखार हो सकता है जो अपने आप ठीक हो जाता है, या फिर यह डेंगू रक्तस्रावी बुखार (DHF) या डेंगू शॉक सिंड्रोम (DSS) जैसे अधिक गंभीर परिणामों का रूप ले सकता है. डेंगू का टीका विकसित करने में यह सबसे बुनियादी चुनौती है - एक सुरक्षित और प्रभावी टीके को सभी चार सरोटाइप के खिलाफ सुरक्षात्मक प्रतिरक्षा प्रदान करनी चाहिए; अन्यथा, आंशिक प्रतिरक्षा (उदाहरण के लिए, टीके के माध्यम से) गंभीर परिणामों का कारण बन सकती है यदि वह व्यक्ति बाद में प्राकृतिक रूप से डेंगू के संपर्क में आता है.

क्वाडेंगा का वादा

जापान की टाकेडा कंपनी ने एक टेट्रावेलेंट वैक्सीन - क्वाडेंगा (TAK-003) - विकसित की है, जिसे अब भारत की सीडीएससीओ विषय विशेषज्ञ समिति से मंजूरी मिल गई है. भारत में क्वाडेंगा वैक्सीन को सुरक्षा जांच की शर्त पर मंजूरी मिली है. इसकी दो खुराकें 3 महीने के अंतराल पर दी जाती हैं. इसे 41 देशों में मंजूरी मिल चुकी है और अब तक 2.5 करोड़ खुराकें बांटी गई हैं. यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा अनुशंसित डेंगू वैक्सीन है, जिसमें संगठन उच्च-बोझ वाले क्षेत्रों में 6 से 16 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए इसे लगाने की सिफारिश करता है. यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी और यूनाइटेड किंगडम इस सिफारिश को 4 से 60 वर्ष की आयु के लोगों तक बढ़ाते हैं. इंडोनेशिया 2022 में क्वाडेंगा को मंजूरी देने वाला पहला देश था, जबकि ब्राजील ने तब से इसे अपने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल कर लिया है. भारत में, हैदराबाद स्थित बायोलॉजिकल ई ने वैक्सीन के स्थानीय विनिर्माण के लिए टाकेडा के साथ साझेदारी की है.

डेंगू का टीका विकसित करने में यह सबसे बुनियादी चुनौती है, एक सुरक्षित और प्रभावी टीके को सभी चार सरोटाइप के खिलाफ सुरक्षात्मक प्रतिरक्षा प्रदान करनी चाहिए. अन्यथा  आंशिक प्रतिरक्षा गंभीर परिणामों का कारण बन सकती है यदि वह व्यक्ति बाद में प्राकृतिक रूप से डेंगू के संपर्क में आता है.

क्वाडेंगा की प्रभावकारिता की जांच करने वाले विस्तृत अध्ययन से पता चलता है कि यह आशाजनक है लेकिन इसके कई पहलू हैं. गणितीय मॉडलिंग अध्ययन दर्शाते हैं कि मध्यम से उच्च संचरण वाले परिवेश में, 6 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्तियों के टीकाकरण से 10 वर्षों की अवधि में डेंगू से संबंधित अस्पतालों में भर्ती होने के मामलों में 10 से 22 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है. यह वैक्सीन पहले डेंगू के संपर्क में आने के इतिहास के बिना भी DENV-2 के खिलाफ अत्यधिक सुरक्षात्मक है, क्योंकि इसका मुख्य ढांचा एक लाइव-अटैन्यूएटेड (कमजोर किए गए) DENV-2 स्ट्रेन पर आधारित है. यह उन व्यक्तियों में अन्य सरोटाइप के खिलाफ मध्यम सुरक्षात्मक प्रतिरक्षा प्रदान करता है जो पहले डेंगू के संपर्क में आ चुके हैं. हालांकि, 6 वर्ष से कम उम्र के उन व्यक्तियों के लिए जो पहले कभी डेंगू के संपर्क में नहीं आए हैं, कुछ सबूत DENV-3 और DENV-4 संक्रमण के बाद बीमारी के संभावित बढ़ने का संकेत देते हैं. यह विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि DENV-3 कई एशियाई और दक्षिण अमेरिकी देशों में फिर से उभरने लगा है. इसके अलावा, वैक्सीन की प्रभावकारिता समय के साथ कम होती पाई गई - वैक्सीन का असर एक साल बाद 80 प्रतिशत  से घटकर तीसरे साल 45 प्रतिशत  रह गया, जिससे साफ है कि सिर्फ टीकाकरण ही स्थायी समाधान नहीं है. डेंगू के चारों प्रकारों से लंबे समय तक पूरी सुरक्षा देने वाली आदर्श वैक्सीन बनाना मुश्किल है. 

डेंगवैक्सिया का घटनाक्रम   

सनोफी पाश्चर द्वारा विकसित दुनिया के पहले लाइसेंस प्राप्त डेंगू टीके - डेंगवैक्सिया के अनुभव ने डेंगू के टीकों की बारीकी से जांच करने की जरूरत को उजागर किया. डेंगवैक्सिया वैक्सीन की निगरानी से पता चला कि जिन्हें पहले डेंगू नहीं हुआ था, उनमें इस टीके के कारण बीमारी बढ़ गई. फिलीपींस में इसके बड़े अभियान के बाद कई बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. यह इस बात को रेखांकित करता है कि डेंगू की प्रतिरक्षात्मक जटिलता को देखते हुए बाजार में आने के बाद की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण है. डेंगवैक्सिया वर्तमान में केवल उन्हीं लोगों को दिया जाता है जो पहले डेंगू के संपर्क में आ चुके हैं.

अतीत में डेंगवैक्सिया वैक्सीन के साथ हुआ हादसा हमें यह साफ सबक सिखाता है कि पूरी जांच किए बिना किसी भी टीके को जल्दबाजी में बाजार में उतारने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इसलिए क्वाडेंगा को सोच-समझकर लागू करना ही देश के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद साबित होगा.

दुनिया में सबसे ज्यादा डेंगू के मामलों वाले देशों में से एक, ब्राजील ने हाल ही में नवंबर 2025 में एक और डेंगू वैक्सीन को मंजूरी दी है: बुटानटन-डीवी, जिसे ब्राजील के एक बायोलॉजिकल रिसर्च सेंटर, बुटानटन इंस्टीट्यूट द्वारा विकसित किया गया है. बुटानटन-डीवी 12 से 59 साल के लोगों के लिए दुनिया की पहली सिंगल-डोज डेंगू वैक्सीन है. इसकी एक खुराक ही काफी है, जिससे दूसरी खुराक लेने का झंझट खत्म होता है. इसके अतिरिक्त, भारत की पैनेसिया बायोटेक ने देश का पहला स्वदेशी डेंगू वैक्सीन उम्मीदवार - डेंगीऑल - विकसित किया है और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के साथ साझेदारी में इसके तीसरे चरण का क्लिनिकल ट्रायल शुरू कर दिया है.

संयुक्त रणनीतियाँ  

हालांकि भारत में क्वाडेंगा को मिली एसईसी (SEC) की मंजूरी सीडीएससीओ की अनुमोदन प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है. उदाहरण के लिए, जैविक वाहक नियंत्रण के तरीके जैसे कि वोलबाचिया-संक्रमित मच्छरों को छोड़ना, जो डेंगू के संचरण को दबाते हैं, प्रभावी पाए गए हैं. वोलबाचिया-संक्रमित मच्छरों से इंसानों या पर्यावरण को बहुत कम जोखिम होता है और सिंगापुर में इन्हें डेंगू के बोझ को कम करते हुए देखा गया है. इसके अलावा, कॉम्बैट पहल के तहत भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच सहयोगी साझेदारियां आउटब्रेक (प्रकोप) की भविष्यवाणी, नैदानिक ​​परिणामों को निर्धारित करने के लिए बायोमार्कर की पहचान और डेंगू संक्रमण की समझ को मजबूत करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और उन्नत मॉडलिंग जैसे उपकरणों का उपयोग करेंगी. अंत में, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) मोनोक्लोनल एंटीबॉडी उपचार से जुड़े चरण III (Phase III) के क्लिनिकल ट्रायल कर रहा है और इन परीक्षणों को डेंगू-स्थानिक देशों में विस्तारित करने के लिए 'ड्रग्स फॉर नेग्लेक्टेड डिजीज इनिशिएटिव' (DNDi) के साथ साझेदारी करेगा. इस बीच, एंटीवायरल दवा मॉस्नोडेनवीर - फेज 2a ट्रायल में उम्मीद जगाने के बावजूद - जॉनसन एंड जॉनसन द्वारा कंपनी के संक्रामक रोग पोर्टफोलियो के पुनर्गठन के हिस्से के रूप में बंद कर दी गई थी. इन प्रयासों को जारी रखने के लिए किसी वैकल्पिक डेवलपर की पहचान करने के लिए बातचीत चल रही है.

डेंगवैक्सिया से मिला बड़ा सबक

डेंगू बीमारी से लड़ने के लिए 'क्वाडेंगा' वैक्सीन को मिली मंजूरी एक बहुत बड़ी कामयाबी मानी जा रही है, लेकिन इस बीमारी का ढांचा आज भी बेहद उलझा हुआ और जटिल है. इस स्थिति को देखते हुए भारत सरकार को देश में इस वैक्सीन को लागू करने के लिए बेहद सावधानी भरा और समझदारी का रास्ता चुनना होगा. यह जरूरी है कि वैक्सीन को पूरे देश में एक साथ न देकर अलग-अलग चरणों में धीरे-धीरे पेश किया जाए. इसके साथ ही, डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को टीके के असर तथा इसके मरीजों पर होने वाले साइड-इफेक्ट्स की लगातार और बहुत बारीकी से निगरानी करनी होगी. अतीत में डेंगवैक्सिया वैक्सीन के साथ हुआ हादसा हमें यह साफ सबक सिखाता है कि पूरी जांच किए बिना किसी भी टीके को जल्दबाजी में बाजार में उतारने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इसलिए क्वाडेंगा को सोच-समझकर लागू करना ही देश के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद साबित होगा.


लक्ष्मी रामकृष्णन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में एसोसिएट फेलो हैं.

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