Author : Ruchita Bansal

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Published on Apr 06, 2026 Updated 3 Days ago

अर्बन प्लानर Carlos Moreno का 15 मिनट शहर मॉडल, जो Paris में सफल माना जाता है, भारत के लिए उतना आसान नहीं है क्योंकि यहां असली कमी सुविधाओं की नहीं बल्कि नौकरियों, अवसरों और बराबर पहुंच की है. यही सवाल यह लेख उठाता है कि क्या सिर्फ पास-पड़ोस सुधारने से शहर सच में बेहतर बन सकते हैं?

पेरिस का 15-मिनट मॉडल: भारत में कितना असरदार?

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‘15-मिनट शहर’ की अवधारणा, जिसे कार्लोस मोरेनो ने लोकप्रिय बनाया और पेरिस में व्यापक रूप से अपनाया गया, वैश्विक शहरी नियोजन विमर्श में तेजी से एक प्रमुख विचार बन गई है. जलवायु परिवर्तन, ट्रैफिक जाम और शहरी जीवन की गिरती गुणवत्ता के समाधान के रूप में प्रस्तुत इस विचार को ‘कम्प्लीट कम्युनिटीज़‘ और ‘वॉकेबल नेबरहुड्स‘ जैसे नए नामों के साथ व्यापक रूप से अपनाया गया है. फिर भी, इसकी बढ़ती लोकप्रियता विशेष रूप से उन संदर्भों में गहन समीक्षा की मांग करती है, जो उन शहरों से काफी अलग है जहाँ इसे पहली बार लागू किया गया था.

इसके मूल में, 15-मिनट शहर यह प्रस्तावित करता है कि निवासियों को अपनी रोज़मर्रा की आवश्यकताओं-जैसे आवास, काम, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, व्यापार और मनोरंजन-तक कम दूरी में पैदल या साइकिल से पहुंच मिलनी चाहिए. यह विचार पास में सुविधाएं देकर गाड़ियों की जरूरत कम करता है और लोगों को पैदल चलने वाली स्वस्थ जिंदगी अपनाने के लिए बढ़ावा देता है.

भारतीय शहर दिखने में ठीक लगते हैं और पास में चीजें भी मिल जाती हैं, लेकिन असली दिक्कत नौकरी और मौके की है. कई मोहल्ले वैसे ही बने हैं जैसे 15-मिनट शहर चाहता है, फिर भी यह मॉडल यहाँ पूरी तरह काम नहीं करता. रोज़मर्रा की सेवाएँ अक्सर पास में उपलब्ध होती हैं, जिन्हें व्यापक अनौपचारिक अर्थव्यवस्था सहारा देती है. लेकिन यह समानता भ्रामक है. भले ही भारतीय शहर रूप में 15-मिनट शहरों जैसे दिखें, पर कार्य में वे काफी अलग हैं. असली चुनौती सुविधाओं की नहीं, बल्कि अवसरों-खासकर रोजगार-और गहरी स्थानिक असमानताओं की है.

जलवायु परिवर्तन, ट्रैफिक जाम और शहरी जीवन की गिरती गुणवत्ता के समाधान के रूप में प्रस्तुत इस विचार को ‘कम्प्लीट कम्युनिटीज़‘ और ‘वॉकेबल नेबरहुड्स‘ जैसे नए नामों के साथ व्यापक रूप से अपनाया गया है. फिर भी, इसकी बढ़ती लोकप्रियता विशेष रूप से उन संदर्भों में गहन समीक्षा की मांग करती है, जो उन शहरों से काफी अलग है जहाँ इसे पहली बार लागू किया गया था.

इसलिए, असली सवाल यह नहीं है कि क्या भारतीय शहरों को 15-मिनट शहरों के रूप में पुनः डिज़ाइन किया जा सकता है, बल्कि यह है कि क्या यह अवधारणा वास्तव में श्रम बाज़ार, वहनीयता और असमानता जैसी उन वास्तविकताओं को संबोधित करती है, जो भारतीय शहरीकरण को परिभाषित करती हैं.

वैश्विक संदर्भ में 15-मिनट शहर

15-मिनट शहर ऑटोमोबाइल-आधारित शहरी विकास से हटकर पड़ोस-स्तर की पहुंच और बहु-केंद्रित शहरी संरचना की ओर बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है. कार्लोस मोरेनो के ‘क्रोनो-अर्बनिज़्म‘ सिद्धांत पर आधारित यह अवधारणा भौतिक दूरी के बजाय यात्रा समय को कम करने पर जोर देती है, साथ ही ऐसे मिश्रित उपयोग वाले मोहल्लों को बढ़ावा देती है जहाँ दैनिक आवश्यकताएँ स्थानीय स्तर पर ही पूरी हो सकें. कोविड-19 के बाद इस अवधारणा को विशेष महत्व मिला, जब शहरों ने लंबी यात्राओं को कम करने और स्थानीय लचीलापन बढ़ाने के उपाय तलाशे.

पेरिस इस मॉडल का प्रमुख उदाहरण बनकर उभरा है. मेयर ऐनी हिडाल्गो के नेतृत्व में शहर ने पैदल यात्री क्षेत्रों का विस्तार किया, साइकिल अवसंरचना विकसित की, स्कूल परिसरों को सार्वजनिक स्थानों में बदला, प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर प्रतिबंध लगाए और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा दिया. इसी तरह के सिद्धांतों ने मेलबर्न की ‘20-मिनट नेबरहुड्स‘ नीति और पोर्टलैंड की ‘हेल्दी कनेक्टेड नेबरहुड स्ट्रेटेजी‘ को भी प्रभावित किया है, जिनका उद्देश्य कारों पर निर्भरता कम करना और स्थानीय सामाजिक व आर्थिक जीवन को मजबूत बनाना है. 

कार्लोस मोरेनो के ‘क्रोनो-अर्बनिज़्म‘ सिद्धांत पर आधारित यह अवधारणा भौतिक दूरी के बजाय यात्रा समय को कम करने पर जोर देती है, साथ ही ऐसे मिश्रित उपयोग वाले मोहल्लों को बढ़ावा देती है जहाँ दैनिक आवश्यकताएँ स्थानीय स्तर पर ही पूरी हो सकें.

इन पहलों का उद्देश्य उत्सर्जन कम करना, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारना और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है. फिर भी, इस मॉडल की आलोचना भी हुई है. शहरी अर्थशास्त्री एलेन बर्टाड का तर्क है कि शहरों की संरचना मुख्य रूप से श्रम बाज़ार द्वारा तय होती है, न कि सिर्फ़ स्थानीय सुविधाओं से. कोई भी बड़ा शहर यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि अधिकांश लोग अपने घर से 15 मिनट की दूरी पर काम करें.

भारतीय शहर: सघन लेकिन असमान

ऊपरी तौर पर भारतीय शहर 15-मिनट मॉडल के लिए उपयुक्त दिखते हैं. शहरों में ज्यादा लोग, अलग-अलग काम और छोटी सेवाएँ होने से रोज़ की ज़रूरी चीजें अक्सर पास में ही मिल जाती हैं, लेकिन पास होने पर भी सेवाएँ अच्छी नहीं होतीं. अस्पताल और स्कूल हर जगह एक जैसे नहीं हैं, और गरीब इलाकों में पार्क या घूमने की जगहें भी कम होती हैं. उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में 1 प्रतिशत से भी कम सरकारी स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी हैं, और स्मार्ट क्लासरूम की पहुंच 12 प्रतिशत से कम है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घर के पास सुविधाएं होने से रोजगार तक पहुंच की समस्या हल नहीं होती. आर्थिक गतिविधियां कुछ चुनिंदा व्यावसायिक क्षेत्रों में केंद्रित हैं, जबकि आवास शहरों के बाहरी हिस्सों तक फैल रहा है. सार्वजनिक परिवहन इन क्षेत्रों को जोड़ता तो है, लेकिन यह अक्सर असुरक्षित, अविश्वसनीय या सीमित होता है, जिससे लोगों को लंबी और थकाऊ यात्राएँ करनी पड़ती हैं. जैसा कि एलेन बर्टाड बताते हैं, श्रम बाज़ार को पैमाने और विविधता की आवश्यकता होती है-जो स्वाभाविक रूप से पूरे शहर में यात्रा को आवश्यक बनाती है.

श्रम बाज़ार की समस्या

15-मिनट शहर की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह नौकरी के मुद्दे को सही से नहीं समझता. शहर में काम के मौके हर जगह नहीं होते. सिर्फ पास में सुविधाएँ होना काफी नहीं है. अगर लोग केवल घर के पास काम तक सीमित हो जाएँ, तो उनके बड़े और बेहतर अवसर कम हो सकते हैं.

अन्य विद्वानों का मानना है कि पैदल चलने पर अत्यधिक जोर देने से सार्वजनिक परिवहन की भूमिका कमजोर हो सकती है. सामाजिक दृष्टि से भी यह मॉडल ऐसे मोहल्लों को जन्म दे सकता है जो अपने भीतर ही सीमित रह जाएँ और व्यापक शहरी संपर्क कम हो जाए. यहाँ तक कि Paris, जिसे इस मॉडल का सबसे सफल उदाहरण माना जाता है, वहाँ भी अधिकांश लोग अपने घर से 15 मिनट के भीतर कार्यस्थल तक नहीं पहुँच पाते. वहाँ की अर्थव्यवस्था अभी भी क्षेत्रीय स्तर पर जुड़ी हुई है और लोगों को मोहल्ले से बाहर जाकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है.

खासकर कम आय वाले क्षेत्रों में सुरक्षित और लगातार बने रहने वाले फुटपाथों में निवेश करना जरूरी है, ताकि पैदल चलना मजबूरी नहीं बल्कि सम्मानजनक विकल्प बन सके. 15-मिनट शहर यह याद दिलाता है कि मोहल्ले के स्तर पर पहुंच महत्वपूर्ण है, लेकिन यह उन गहरे ढांचागत सुधारों का विकल्प नहीं हो सकता जिनकी भारतीय शहरों को जरूरत है.

यह योजना मानती है कि लोग घर के पास ही काम करें, जिससे उनके अवसर सीमित हो सकते हैं. असल जरूरत पूरे शहर में नौकरी तक आसान पहुंच की है. भारत में गुरुग्राम, व्हाइटफील्ड और मुंबई जैसे क्षेत्रों में काम दूर होने से लोगों को रोज़ लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. भारतीय शहरों में औसत एक तरफा यात्रा समय लगभग 59 मिनट है, और देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों के कारण महिलाओं का समय इससे भी अधिक होता है. वहीं, लगभग 43 प्रतिशत शहरों में सभी के लिए उपयुक्त फुटपाथ नहीं हैं, जिससे सुरक्षित पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है.

15-मिनट शहर का फायदा ज़्यादातर अमीर, केंद्र में रहने वालों को मिलता है. आम लोगों के लिए यह समाधान कम, बल्कि असमानता बढ़ाने वाला विचार बन सकता है.

भारत के लिए नीतिगत दिशा

भारतीय शहरों के लिए अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण यह होगा कि ध्यान आत्मनिर्भर मोहल्लों से हटाकर पूरे महानगर में बेहतर पहुंच (मेट्रोपॉलिटन एक्सेसिबिलिटी) पर दिया जाए. इसके लिए कई रोजगार केंद्र विकसित करना जरूरी है, साथ ही पूरे शहर में मजबूत, सस्ता और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन सुनिश्चित करना होगा.

सिर्फ निकटता नहीं, बल्कि आवश्यक सेवाओं की गुणवत्ता सुधारना भी उतना ही जरूरी है. अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, जो पहले से ही मोहल्लों की पहुंच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, उसे नजरअंदाज करने के बजाय योजनाओं में शामिल करना चाहिए. खासकर कम आय वाले क्षेत्रों में सुरक्षित और लगातार बने रहने वाले फुटपाथों में निवेश करना जरूरी है, ताकि पैदल चलना मजबूरी नहीं बल्कि सम्मानजनक विकल्प बन सके. 15-मिनट शहर यह याद दिलाता है कि मोहल्ले के स्तर पर पहुंच महत्वपूर्ण है, लेकिन यह उन गहरे ढांचागत सुधारों का विकल्प नहीं हो सकता जिनकी भारतीय शहरों को जरूरत है.

समय-आधारित पहुंच के मापदंड उपयोगी हो सकते हैं, यदि उन्हें व्यावहारिक रूप से अपनाया जाए. यह मानने के बजाय कि लोग काम के पास रह सकते हैं, शहरी नीति को यह स्वीकार करना चाहिए कि लंबी यात्राएँ एक वास्तविकता हैं और उनके सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक प्रभावों को कम करने पर ध्यान देना चाहिए.

15-मिनट शहर यह महत्वपूर्ण संदेश देता है कि स्थानीय स्तर पर सुविधाओं तक पहुंच जरूरी है, लेकिन यह भारतीय शहरों की गहरी समस्याओं का समाधान नहीं है. शहर में पास में चीजें होने से ही सब ठीक नहीं होता. लोगों को अच्छी नौकरी, सेवाएँ और आसान सफर चाहिए. असली लक्ष्य यह होना चाहिए कि हर किसी को पूरे शहर के मौके मिलें, नहीं तो 15-मिनट शहर सिर्फ एक अच्छा विचार बनकर रह जाएगा.


रुचिता बंसल एक शहरी योजनाकार और शीसिटी इंडिया की संस्थापक हैं, जो समावेशी, लिंग-संवेदनशील शहरीकरण और भारतीय शहरों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करती हैं।

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