Author : Veer Puri

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Published on May 06, 2026 Updated 0 Hours ago
चीन बनाम अमेरिका: प्रोजेक्ट वॉल्ट क्या बदल पाएगा खेल?

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प्रोजेक्ट वॉल्ट पिछले एक दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका (US) की सबसे महत्वपूर्ण घरेलू महत्वपूर्ण खनिज नीति है और एक व्यापक ढांचे का घरेलू आधार है, जिसमें मिनरल्स सिक्योरिटी पार्टनरशिप (MSP)-30 साझेदार देशों का एक बहुपक्षीय निवेश मंच-और पैक्स सिलिका, जो अमेरिकी विदेश विभाग की 2025 की पहल है और एआई-युग की आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने के लिए बनाई गई है, शामिल हैं. फरवरी 2026 में घोषित यह 12 अरब अमेरिकी डॉलर का सार्वजनिक-निजी भंडार प्रतिक्रियात्मक कूटनीति से संरचित औद्योगिक बीमा की ओर बदलाव को दर्शाता है. इसका प्रमुख कारण बीजिंग द्वारा खनिजों के माध्यम से किया गया व्यवस्थित दबाव था-2023 में गैलियम, जर्मेनियम और ग्रेफाइट पर लाइसेंसिंग आवश्यकताएं लागू करना, जो दिसंबर 2024 में गैलियम, जर्मेनियम और एंटीमनी के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध तक बढ़ गया. साथ ही ग्रेफाइट पर सख्त उपयोगकर्ता नियंत्रण लगाए गए, जिनका असर अमेरिकी उद्योगों पर भी पड़ा, जैसे कि फोर्ड को 2025 में रेयर अर्थ मैग्नेट की कमी के कारण एक्सप्लोरर का उत्पादन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा.

संयुक्त राज्य अमेरिका 12 महत्वपूर्ण खनिजों के लिए 100 प्रतिशत आयात पर निर्भर है और 28 अन्य खनिजों के लिए 50 प्रतिशत से अधिक आयात पर निर्भर रहता है. चीन अमेरिका के प्रमुख खनिज आपूर्तिकर्ताओं में से एक है और 21 गैर-ईंधन खनिज वस्तुओं में अग्रणी है, जिनमें अमेरिका 50 प्रतिशत से अधिक आयात-निर्भर है.

प्रोजेक्ट वॉल्ट की संरचना

प्रोजेक्ट वॉल्ट अमेरिकी एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक से 10 अरब डॉलर के वित्तपोषण का उपयोग करता है, जो उसके 92 साल के इतिहास की सबसे बड़ी प्रतिबद्धता है, इसके साथ ही भाग लेने वाले निर्माताओं से लगभग 1.67 अरब डॉलर की प्रारंभिक पूंजी भी शामिल है. इस भंडार में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) की 2025 की महत्वपूर्ण खनिज सूची के सभी 60 खनिज शामिल हैं, जिनमें कोबाल्ट, गैलियम, रेयर अर्थ, ग्रेफाइट, लिथियम, टाइटेनियम और जर्मेनियम शामिल हैं. जनरल मोटर्स, स्टेलांटिस, जीई वर्नोवा और गूगल जैसी प्रमुख कंपनियां पहले ही इसमें शामिल हो चुकी हैं, जो चीन के प्रभुत्व को चुनौती देने के इस औद्योगिक प्रयास के पैमाने को दर्शाता है.

प्रोजेक्ट वॉल्ट अमेरिकी एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक से 10 अरब डॉलर के वित्तपोषण का उपयोग करता है, जो उसके 92 साल के इतिहास की सबसे बड़ी प्रतिबद्धता है, इसके साथ ही भाग लेने वाले निर्माताओं से लगभग 1.67 अरब डॉलर की प्रारंभिक पूंजी भी शामिल है.

प्रोजेक्ट वॉल्ट अमेरिकी एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक से 10 अरब डॉलर के वित्तपोषण का उपयोग करता है-जो उसके 92 साल के इतिहास की सबसे बड़ी प्रतिबद्धता है. यह व्यवस्था पारंपरिक सरकारी भंडार के बजाय एक बीमा मॉडल की तरह काम करती है. ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) पहले से निर्धारित मात्रा में खनिज सुरक्षित करने के लिए अग्रिम शुल्क का भुगतान करते हैं. किसी भी आपूर्ति बाधा की स्थिति में, उन्हें तय कीमतों पर पहले से आवंटित आपूर्ति मिलती है, जिससे वे बाजार के अस्थिर दामों से बच जाते हैं. यह एक 60-दिन का आपातकालीन बफर प्रदान करता है, जिससे कंपनियों को उत्पादन समायोजित करने, वैकल्पिक स्रोत खोजने या कूटनीतिक समाधान का इंतजार करने का समय मिल जाता है. सरल शब्दों में, कंपनियां संकट के समय बाजार में भागदौड़ करने के बजाय पहले से ही आपूर्ति की निश्चितता खरीद लेती हैं.

इस 60 दिन के आपातकालीन बफर को दो अतिरिक्त उपायों से समर्थन मिलता है. अमेरिका और उसके साझेदार देशों के बीच द्विपक्षीय मूल्य समझौते चीन द्वारा किए जाने वाले मूल्य हेरफेर को सीमित करने का प्रयास करते हैं, जो पहले बाजार को या तो भर देता था या प्रतिबंधित कर देता था. इस व्यवस्था को ‘फोरम ऑन रिसोर्स जियोस्ट्रेटेजिक एंगेजमेंट‘ (FORGE) के माध्यम से लागू किया जाता है, जो एक प्राथमिकता प्राप्त खनिज व्यापार समूह है और सहयोगी देशों को बाजार तक पहुंच की गारंटी देता है, बदले में वे चीन से परे आपूर्ति प्रतिबद्धताएं देते हैं.

रणनीतिक स्थिति  

प्रोजेक्ट वॉल्ट का सबसे बड़ा योगदान संचालनात्मक (ऑपरेशनल) की बजाय संरचनात्मक है. यह भंडार प्रमुख निर्माताओं के साथ दीर्घकालिक खरीद समझौतों को सुनिश्चित करके बाजार में एक स्थिर आधार (फ्लोर) प्रदान करता है, जिससे गैर-चीनी खनन और प्रोसेसिंग निवेशकों को भरोसेमंद संकेत मिलता है. इससे उस समस्या का समाधान होता है जिसमें खदानें तो बनाई जाती हैं, लेकिन उनके लिए बाजार नहीं होता-पिछले डेढ़ दशक में यही कारण रहा है कि पश्चिमी आपूर्ति श्रृंखलाएं ठप पड़ी रहीं, क्योंकि निवेशक बिना ऑफटेक गारंटी के खनन परियोजनाओं में निवेश करने से हिचकिचाते रहे.

अमेरिका और उसके साझेदार देशों के बीच द्विपक्षीय मूल्य समझौते चीन द्वारा किए जाने वाले मूल्य हेरफेर को सीमित करने का प्रयास करते हैं, जो पहले बाजार को या तो भर देता था या प्रतिबंधित कर देता था. इस व्यवस्था को ‘फोरम ऑन रिसोर्स जियोस्ट्रेटेजिक एंगेजमेंट‘ (FORGE) के माध्यम से लागू किया जाता है, जो एक प्राथमिकता प्राप्त खनिज व्यापार समूह है.

द्विपक्षीय मूल्य समझौते चीन के दाम नियंत्रण को सीमित करते हैं, जबकि 60-दिन का बफर कंपनियों को संकट में वैकल्पिक स्रोत, उत्पादन समायोजन और जोखिम से बचाव का समय देता है. OEM-आधारित वित्तपोषण मॉडल भी उल्लेखनीय है. पारंपरिक सरकारी भंडार के विपरीत, जहां पूरा वित्तीय बोझ राज्य पर होता है, यह व्यावसायिक हितों और रणनीतिक उद्देश्यों के बीच एक असामान्य लेकिन प्रभावी संतुलन स्थापित करता है.

सहयोगी देशों के स्तर पर, FORGE-जिसमें अपने पहले सम्मेलन में 55 देशों के मंत्री-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए-प्रोजेक्ट वॉल्ट को खनिज उत्पादक और उपभोक्ता देशों के एक बढ़ते गठबंधन से जोड़ता है. यह, ऑस्ट्रेलिया के साथ 8.5 अरब डॉलर के समझौते और यूक्रेन–अमेरिका खनिज संसाधन समझौते जैसे द्विपक्षीय समझौतों के साथ मिलकर, चीन के समानांतर एक वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला बनाने की दिशा में कदम है. निश्चित मूल्य निर्धारण (फिक्स्ड इन्वेंटरी प्राइसिंग) भी निर्माताओं को बाजार की अस्थिरता से बचाता है, जिसका उपयोग चीन अक्सर भू-राजनीतिक हथियार के रूप में करता रहा है.

एक बफर, न कि पूर्ण समाधान

प्रोजेक्ट वॉल्ट खनिज निर्भरता के मूल कारणों की बजाय उसके लक्षणों को अधिक प्रभावी ढंग से संबोधित करता है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि कच्चे खनिजों का भंडारण आपूर्ति श्रृंखला की स्वतंत्रता के बराबर नहीं है. चीन की असली ताकत खनन में नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग में है-वह रिफाइनिंग, पृथक्करण (सेपरेशन) और मैग्नेट निर्माण सुविधाओं पर नियंत्रण रखता है. केवल कच्चे खनिजों का भंडारण आपूर्ति श्रृंखला के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को अछूता छोड़ देता है.

प्रोजेक्ट वॉल्ट का महत्व यह है कि यह अल्पकालिक राहत प्रदान करता है, औद्योगिक मांग को बनाए रखना, तात्कालिक जोखिम को कम करना और सहयोगी देशों की प्रतिबद्धता को दर्शाना-जबकि स्वतंत्र आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की जटिल प्रक्रिया अगले 10–15 वर्षों में आगे बढ़ती है.

कुछ खनिज चीन से ही लेने पड़ सकते हैं, जिससे निर्भरता कम करने की योजना विरोधाभासी बनती है. वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाएं धीमी हैं, इसलिए अचानक प्रतिबंध की स्थिति में 60-दिन का बफर भी पर्याप्त नहीं हो सकता. शासन (गवर्नेंस) से जुड़े प्रश्न भी अभी स्पष्ट नहीं हैं. खरीद मानदंड, सहयोगी देशों की पहुंच और रणनीतिक रिलीज के नियम सार्वजनिक रूप से तय नहीं किए गए हैं, जिससे इस भंडार की कार्यप्रणाली पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. अंततः, प्रोजेक्ट वॉल्ट स्मेल्टिंग, पृथक्करण और मूल्य-वर्धित विनिर्माण जैसे डाउनस्ट्रीम निवेश को वित्तपोषित नहीं करता-जो वास्तविक आपूर्ति श्रृंखला स्वतंत्रता के लिए आवश्यक हैं. इसलिए यह एक बफर है, पूर्ण समाधान नहीं.

आगे के लिए सुरक्षा की तैयारी  

प्रोजेक्ट वॉल्ट कोई अकेली पहल नहीं है-यह अमेरिका की व्यापक खनिज नीति का हिस्सा है, जिसमें घरेलू सुधार, FORGE, द्विपक्षीय समझौते, पैक्स सिलिका और गहरे समुद्र में खनन की प्रारंभिक खोज शामिल हैं. इस संदर्भ में प्रोजेक्ट वॉल्ट का महत्व यह है कि यह अल्पकालिक राहत प्रदान करता है, औद्योगिक मांग को बनाए रखना, तात्कालिक जोखिम को कम करना और सहयोगी देशों की प्रतिबद्धता को दर्शाना-जबकि स्वतंत्र आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की जटिल प्रक्रिया अगले 10–15 वर्षों में आगे बढ़ती है.

जापान का अनुभव यहां महत्वपूर्ण है. 2010 में चीन द्वारा रेयर अर्थ निर्यात प्रतिबंध के बाद, जापान ने 15 वर्षों में अपनी निर्भरता लगभग 90 प्रतिशत से घटाकर 60 प्रतिशत कर दी. यह केवल भंडारण से संभव नहीं हुआ, बल्कि उसने समानांतर उपाय अपनाए, जैसे उत्पादन में रेयर अर्थ का कम उपयोग, वैकल्पिक सामग्री विकसित करना, रीसाइक्लिंग में निवेश और विदेशी खनन में हिस्सेदारी लेना. परिणामस्वरूप, जापान की रेयर अर्थ खपत 2010 के स्तर की आधी रह गई. इससे स्पष्ट है कि भंडार समय तो खरीद सकता है, लेकिन वास्तविक समाधान संरचनात्मक विविधीकरण से आता है. प्रोजेक्ट वॉल्ट की वास्तविक महत्ता तभी है जब इसे एक दीर्घकालिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जाए, न कि अंतिम समाधान के रूप में.


वीर पुरी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में रिसर्च असिस्टेंट हैं.


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Veer Puri is a Research Assistant with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy.  At ORF, his research focuses on the Blue Economy and connectivity, with particular ...

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