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भारत की सीरिया नीति भावनाओं से नहीं, हितों और व्यावहारिकता से तय होती है. समझे किस तरह फरवरी 2026 में अरब मंत्रिस्तरीय बैठक इस रणनीति की पुष्टि करेगी.
सीरिया के साथ भारत की भागीदारी यह दिखाती है कि भारत अपनी विदेश नीति में भावनाओं के बजाय हितों, क्षेत्रीय स्थिरता और भू-राजनीतिक व्यावहारिकता को प्राथमिकता देता है. अहमद अल-शरा सरकार के सत्ता में आने की पहली वर्षगांठ के मौके पर भारत ने फरवरी 2026 में एक अरब मंत्रिस्तरीय बैठक आयोजित करने की घोषणा की है जिसमें सीरिया के विदेश मंत्री असद अल-शैबानी के शामिल होने की संभावना है. यह पहल जुलाई 2025 में विदेश मंत्रालय के पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका प्रभाग के संयुक्त सचिव सुरेश कुमार की सीरिया यात्रा के बाद की अगली कड़ी है.
हालांकि, हयात तहरीर अल-शाम के नेता अहमद अल-शरा के साथ भारत का संवाद कुछ लोगों को चौंका सकता है. यह संगठन पहले अमेरिका द्वारा आतंकी घोषित किया गया था. हालांकि नवंबर 2025 में अल-शरा की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले यह टैग हटा लिया गया. ऐसे में सवाल उठता है कि भारत ऐसे शासन से संवाद क्यों कर रहा है जिसकी राजनीतिक इस्लाम की सोच भारत की विचारधारा से मेल नहीं खाती.
भारत और सीरिया के बीच 1950 में औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित हुए थे. तब से अब तक दोनों देशों के मंत्रियों और अधिकारियों के बीच करीब 30 द्विपक्षीय यात्राएँ हो चुकी है. भारत के लिए सीरिया के साथ संबंधों का महत्व व्यापार बढ़ाने और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा है क्योंकि पश्चिम एशिया में अस्थिरता का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. भारत ने लगातार सीरिया के उस अधिकार का समर्थन किया है, जिसके तहत वह 1973 के अरब–इज़राइल युद्ध में इज़राइल द्वारा कब्जाए गए गोलान हाइट्स को वापस लेना चाहता है. बदले में सीरिया ने कश्मीर मुद्दे पर भारत के उस रुख का समर्थन किया है कि इसका समाधान भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय बातचीत से होना चाहिए.
सवाल उठता है कि भारत ऐसे शासन से संवाद क्यों कर रहा है जिसकी राजनीतिक इस्लाम की सोच भारत की विचारधारा से मेल नहीं खाती.
पिछले दो दशकों में भारत ने एक स्थिर सीरिया में खास दिलचस्पी दिखाई है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं. क्षेत्र में अस्थिरता होने पर न सिर्फ उन्हें वापस लौटना पड़ सकता है बल्कि भारत को मिलने वाला भारी भरकम रेमिटेंस भी प्रभावित हो सकता है. इसके अलावा, ईरान, तुर्किये, इज़राइल और खाड़ी देशों के बीच स्थित होने के कारण सीरिया भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के लिहाज़ से भी रणनीतिक रूप से अहम है. प्रस्तावित भारत–मध्य पूर्व आर्थिक गलियारे में भी सीरिया की संभावित भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिसे चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है.
अरब विद्रोह के दौरान जब असद सरकार संकट में थी, तब भारत ने तटस्थ रुख अपनाया. उसने न तो असद सरकार से रिश्ते तोड़े और न ही सीमित संपर्क से आगे बढ़कर किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन किया. यह नीति पश्चिम एशिया के अन्य संघर्षों में भी भारत के संतुलित दृष्टिकोण के अनुरूप थी. इसी कारण भारत ने जबहत अल-नुसरा और हयात तहरीर अल-शाम जैसे संगठनों से दूरी बनाए रखी.
भारत ने लगातार सीरिया के उस अधिकार का समर्थन किया है, जिसके तहत वह 1973 के अरब–इज़राइल युद्ध में इज़राइल द्वारा कब्जाए गए गोलान हाइट्स को वापस लेना चाहता है.
आज अहमद अल-शरा सरकार से संवाद भी इसी व्यावहारिक निरंतरता का हिस्सा है. भारत का मूल हित एक शांत और स्थिर सीरिया में है ताकि पश्चिम एशिया में उसके आर्थिक और रणनीतिक हित सुरक्षित रह सकें. भारत ने इससे पहले भी अफगानिस्तान में तालिबान सरकार से भू-रणनीतिक कारणों से संपर्क बनाए रखा है. अहमद अल-शरा द्वारा अपेक्षाकृत व्यावहारिक राजनीति अपनाने से भारत को द्विपक्षीय संबंध आगे बढ़ाने की और गुंजाइश मिलती है.
भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो अल-शरा सरकार से संवाद कर रहा है. अमेरिका ने न केवल अल-शरा का आतंकी दर्जा हटाया बल्कि राष्ट्रपति ट्रंप ने उन्हें व्हाइट हाउस में भी आमंत्रित किया और सीरिया पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी. वहीं, ईरान और रूस, जो पहले असद सरकार के प्रमुख समर्थक थे, उन्होंने भी सत्ता परिवर्तन के बाद सीरिया से राजनयिक संबंध स्थापित कर लिए. यह दिखाता है कि सीरिया का भू-रणनीतिक महत्व पुराने मतभेदों से कहीं अधिक है. पुनर्निर्माण में भागीदारी अब कई देशों के लिए एक रणनीतिक निवेश बन चुकी है, जिसमें भारत भी रुचि दिखा रहा है.
सीरिया के प्रति भारत की नीति यथार्थवादी और व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित है. इसका उद्देश्य पश्चिम एशिया के अन्य देशों के साथ भारत की नीति के अनुरूप ही है.
आने वाले समय में भारत–सीरिया संबंध किस दिशा में जाएंगे, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. फिर भी, दोनों देशों के बीच बढ़ते आधिकारिक संपर्क आगे सहयोग की संभावनाएं दिखाते हैं. इसमें सांस्कृतिक आदान-प्रदान, छात्रवृत्तियां और पुनर्निर्माण परियोजनाओं में निवेश शामिल हो सकता है. भारत यह भी चाहेगा कि सीरिया इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) जैसे मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर तटस्थ बना रहे. साथ ही, आतंकवाद-रोधी सहयोग के ज़रिये सीरिया को स्थिर करने में भारत की भूमिका बढ़ सकती है.
कुल मिलाकर, सीरिया के प्रति भारत की नीति यथार्थवादी और व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित है. इसका उद्देश्य पश्चिम एशिया के अन्य देशों के साथ भारत की नीति के अनुरूप ही है- व्यापारिक हितों की रक्षा करना, क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना, विदेशों में कार्यरत भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और आर्थिक हितों को सुरक्षित रखना. साथ ही, भारत वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करना चाहता है.
मोहम्मद सिनान सियेच ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक नॉन-रेजिडेंट एसोसिएट फेलो हैं.
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Dr. Mohammed Sinan Siyech is a Non – Resident Associate Fellow working with Professor Harsh Pant in the Strategic Studies Programme. He works on Conflict ...
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