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मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच, ईरान- इज़राइल/अमेरिका का युद्ध बेक़ाबू हो, उससे पहले भारत को अपनी ऊर्जा, सुरक्षा और कूटनीतिक हितों की हिफ़ाज़त को मज़बूत करना चाहिए.
Image Source: Getty
प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप द्वारा नाज़ुक युद्धविराम का पालन करने की अपील के बावजूद, अमेरिका- इज़राइल और ईरान के बीच फिर से युद्ध भड़कने का अंदेशा बना हुआ है. और भारत को इस मामले पर अपने सामरिक रुख़ पर सावधानी से विचार करना चाहिए. जहां तक ट्रंप के सैन्य अभियान का सवाल है, तो अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने अब तक लंबी लड़ाई के बजाय एक दिखावे के हमले (जो पिछले हफ़्ते किया गया) तक सीमित रखा है. लेकिन, उनके अपने देश के दबाव और मध्य पूर्व में बदली हुई परिस्थितियां अभी भी अमेरिका को ईरान के ख़िलाफ़ व्यापक अभियान छेड़ने के लिए मजबूर कर सकते हैं. अमेरिका के किसी और साथी देश की तुलना में भारत को तुलनात्मक रूप से सबसे ज़्यादा नीतिगत स्वतंत्रता हासिल है. ऐसे में उसके पास ये अच्छा मौक़ा है, जब वो अर्थपूर्ण संयम बरतने की अपील कर सकता है. ऐसा करना भारत के सुरक्षा और आर्थिक हितों के साथ साथ मौजूदा सरकार की प्राथमिकताओं से भी मेल खाता है. यही नहीं, मध्य पूर्व में जो कुछ होता है, उसका एक बड़ी ताक़त के तौर पर भारत के उभार पर भी काफ़ी असर पड़ सकता है.
पहली बात, अगर लंबे समय तक युद्ध चला तो ये भारत की ऊर्जा आपूर्ति को बाधित कर सकता है. भारत अपनी ज़रूरत का आधे से कुछ ही कम तेल मध्य पूर्व के देशों से आयात करता है. यूक्रेन युद्ध के पहले तो खाड़ी देशों से भारत अपनी ज़रूरत का 60 प्रतिशत तेल ख़रीदता था, और अगर डोनाल्ड ट्रंप रूस के ऊपर लगे प्रतिबंध हटा लेता है और पश्चिमी देश, रूस की ऊर्जा के लिए भारत के साथ प्रतिस्पर्धा शुरू कर देते हैं, तो ये आयात वापस उसी स्थिति में पहुंच सकते हैं. लंबा और व्यापक युद्ध ऊर्जा के इस महत्वपूर्ण स्रोत पर बुरा असर डाल सकता है. ईरान की संसद ने पहले ही होरमुज़ की जलसंधि को बंद करने का प्रस्ताव पारित कर दिया था. युद्ध में अमेरिका की भागीदारी होने की सूरत में संसद के इस क़दम पर ईरान की सुप्रीम सिक्योरिटी काउंसिल से मुहर लगने और लागू किए जाने की संभावना है. ईरान, पहले ही क़तर में अमेरिकी सैनिक अड्डे पर हमला कर चुका है. इसके बाद वो खाड़ी देशों के तेल के ठिकानों पर बमबारी और आग लगाने का क़दम उठा सकता है. क्योंकि, ईरान की नज़र में ये देश अमेरिकी सैनिकों को अपने यहां रहने का ठिकाना देकर पहले ही उसके ख़िलाफ़ जंग में शामिल हैं.
ईरान, पहले ही क़तर में अमेरिकी सैनिक अड्डे पर हमला कर चुका है. इसके बाद वो खाड़ी देशों के तेल के ठिकानों पर बमबारी और आग लगाने का क़दम उठा सकता है. क्योंकि, ईरान की नज़र में ये देश अमेरिकी सैनिकों को अपने यहां रहने का ठिकाना देकर पहले ही उसके ख़िलाफ़ जंग में शामिल हैं.
ऐसा हुआ तो तेल और गैस की क़ीमतों में भारी उछाल आएगा. चुनावी तौर पर बाहरी कारणों की वजह से आर्थिक गिरावट आने पर सबसे बुरा असर मौजूदा सत्ताधारी दल को भुगतना पड़ता है. ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में ईरान पर जो पाबंदियां लगाई थीं, उससे ईरान से भारत का तेल आयात पहले ही बहुत कम हो गया था. पहले जहां ईरान, भारत को तेल आयात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश था, उसकी हिस्सेदारी अब एक प्रतिशत से भी कम रह गई है, जिसकी भारत की अर्थव्यवस्था को भारी क़ीमत चुकानी पड़ रही है. प्रधानमंत्री मोदी, ट्रंप के साथ संवाद में मज़बूत रुख़ अपनाकर भारत के हितों की रक्षा करते हैं, तो जनता भी इसे सकारात्मक नज़रिए से देखेगी.
युद्ध से भारत को लगने वाली आर्थिक चोट न केवल बड़ी होगी, बल्कि इसके दूसरे असर भी देखने को मिलेंगे. अमेरिका, रूस, और चीन जैसी दूसरी बड़ी ताक़तों की तुलना में भारत, ऊर्जा आयातों- ख़ास तौर से कच्चे तेल और तरल प्राकृतिक गैस (LNG) की ख़रीद पर कहीं अधिक निर्भर है. वैसे तो अमेरिका और चीन भारत से कहीं ज़्यादा तेल विदेशों से ख़रीदते हैं. लेकिन, आनुपातिक रूप से देखें, तो चीन और अमेरिका की तुलना में भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकता का कहीं अधिक हिस्सा दूसरे देशों से ख़रीदता है. बड़ी ताक़तों के बीच संसाधन की इस प्रतिस्पर्धा की स्थिति में युद्ध की वजह से भारत अपने समकक्ष प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में कमज़ोर स्थिति में पड़ सकता है.
दूसरा, मध्य पूर्व से भारत के दूसरे अहम आर्थिक हित भी जुड़े हुए हैं. वहां पर- किसी अन्य बड़ी ताक़त की तुलना में ख़ास तौर से खाड़ी देशों में भारतीय मूल के लोग सबसे ज़्यादा संख्या में रहते हैं. अगर व्यापक युद्ध छिड़ गया, तो लोगों के जीवन पर ख़तरा मंडराएगा, भारत में वहां से जो विदेशी मुद्रा आती है, उसमें गिरावट आएगी और फिर लोगों को निकालने का अभियान छेड़ना पड़ेगा, जो बहुत महंगा साबित होगा. ये हम पहले भी देख चुके हैं.
तीसरा और जिसकी कम चर्चा होती है कि अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है, तो इससे मध्य पूर्व में सत्ता के समीकरणों में बदलाव होगा. अभी जहां बहुध्रुवीय स्थिति है, वहां अमेरिका की अगुवाई वाली एकध्रुवीय स्थिति बन जाएगी. अगर ईरान में नई सरकार बनती है, जैसा की सीरिया में हुआ, तो भी; और अगर लीबिया की तरह लंबे समय तक अराजकता फैलती है, तो भी और अगर ईरान टुकड़ों में बंटता है, तो भी नतीजा यही निकलेगा. अमेरिका के बजाय दूसरी तरफ़ झुकाव रखने वाले खाड़ी क्षेत्र के आख़िरी बड़े देश की हुकूमत गिराने से इलाक़े में चल रही भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा प्रभावी रूप से ख़त्म हो जाएगी. इससे भारत जैसी उभरती हुई शक्तियां जो पिछले एक दशक के दौरान अपने सामरिक क़दम फैलाने का प्रयास कर रही हैं, उनके लिए अपने प्रभाव के विस्तार के अवसर ख़त्म हो जाएंगे. इस क्षेत्र के साथ भारत का सामरिक संवाद, प्रभावी रूप से अमेरिका के वीटो के अधीन हो जाएगा. ईरान की संतुलन बनाने वाली भूमिका के बग़ैर, खाड़ी देशों और इज़राइल के साथ संबंधों में भारत की हैसियत बहुत कमज़ोर हो जाएगी.
चीन इस मौक़े का फ़ायदा उठाए और युद्ध या फिर शांतिपूर्ण तरीक़ों से ताइवान पर दोबारा क़ब्ज़ा करने की कोशिश करें. इससे चीन के हौसले बुलंद होंगे और तब सीमा विवाद जैसे कई द्विपक्षीय मामलों में भारत की स्थिति कमज़ोर हो जाएगी.
चौथा, अगर युद्ध लंबा खिंचा तो अमेरिका को अपने सैन्य संसाधनों को एशिया से हटाकर मध्य पूर्व की तरफ़ ले जाना पड़ेगा. इससे चीन की स्थिति मज़बूत होगी. हो सकता है कि चीन इस मौक़े का फ़ायदा उठाए और युद्ध या फिर शांतिपूर्ण तरीक़ों से ताइवान पर दोबारा क़ब्ज़ा करने की कोशिश करें. इससे चीन के हौसले बुलंद होंगे और तब सीमा विवाद जैसे कई द्विपक्षीय मामलों में भारत की स्थिति कमज़ोर हो जाएगी. इसीलिए, भारत को चाहिए कि वो मध्य पूर्व में बहुध्रुवीय व्यवस्था को रेखांकित करके अमेरिका को समझाए कि सामरिक रूप से ताक़तवर चीन की तुलना में उसके लिए मध्य पूर्व को संतुलित करने में कम मेहनत करनी पड़ेगी. चीन से, एशिया में अमेरिका के हितों को ज़्यादा चोट पहुंचेगी, जो अमेरिका के लिए कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक मोर्चा है.
पांचवां, मध्य पूर्व और अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता बदलने वाले अमेरिका के युद्धों ने आम तौर पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का ही काम किया है. पूर्व में अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ के समर्थन वाली सरकार को सत्ता से हटाने के अभियान से ही अल क़ायदा और तालिबान का जन्म हुआ था. इराक़ में सद्दाम हुसैन को अपदस्थ करने के बाद इस्लामिक स्टेट ऑफ सीरिया एंड इराक़ (ISIS) का उभार हुआ. लीबिया में तबाही मची, तो वहां इस्लामिक स्टेट और दूसरे आतंकी संगठनों ने क़ब्ज़ा कर लिया. अब सीरिया में हुकूमत की कमान अल क़ायदा और ISIS के पूर्व उप-नेता के हाथ में है. ईरान के बहुत से क्षेत्रीय प्रतिद्वंदी उग्रवादी वहाबी इस्लामिक विचारधारा के हामी हैं, उनकी स्थिति और मज़बूत हो जाएगी. जैसा कि पहलगाम हमले ने दिखाया है कि अमेरिका या फिर चीन की तुलना में कट्टरपंथी आतंकवाद के सामने भारत की स्थिति कहीं अधिक कमज़ोर है. इसी वजह से भारत की विदेश नीति में लगातार ऐसे हालात के निर्माण का विरोध किया जाता रहा है, जिससे आतंकवाद को बढ़ावा मिले.
ये बात इसलिए और भी अहम है, क्योंकि ईरान के साथ भारत के रिश्ते न केवल इस्लाम की आमद से पुराने हैं, बल्कि, शुरुआती वैदिक दौर तक जाते हैं. यानी दोनों देशों के संबंध दक्षिण एशिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में कहीं अधिक प्राचीन हैं.
छठवां, अमेरिका के साथ अपने अच्छे संबंधों का इस्तेमाल करके उसको संयम के लिए राज़ी करने से भारत के पास मौक़ा होगा कि वो उस वैश्विक बहुमत के सामने अपने नेतृत्व की हैसियत चमकाए, जो ईरान के ख़िलाफ़ इज़राइल और अमेरिका के आक्रामक अभियान का विरोध करते हैं. ये बात लगातार स्पष्ट होती जा रही है. क्योंकि, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अमेरिका के मज़बूत साथियों ने भी अमेरिका के हमले का विरोध किया और नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) शिखर सम्मेलन से दूरी बना ली. अमेरिका को युद्ध का दायरा बढ़ाने से रोकने के लिए राज़ी करना, मोदी सरकार के ‘विश्व गुरु’ वाले उस नैरेटिव से भी मिलता है, जिसमें वो भारत को एक महान और स्वतंत्र सभ्यता के तौर पर पेश करते हैं. ये बात इसलिए और भी अहम है, क्योंकि ईरान के साथ भारत के रिश्ते न केवल इस्लाम की आमद से पुराने हैं, बल्कि, शुरुआती वैदिक दौर तक जाते हैं. यानी दोनों देशों के संबंध दक्षिण एशिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में कहीं अधिक प्राचीन हैं.
अमेरिका का ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध को न बढ़ाना, भारत के सामरिक हित में है. सुरक्षा और आर्थिक कारकों में से अधिकतर आम जनता के बीच नहीं पहुंचते हैं, पर इनको लेकर मोदी सरकार के प्रयासों के चुनावी लाभ भी मिल सकते हैं. युद्ध लंबा खिंचने पर जिस तरह ट्रंप के नियोकॉन के घुटने टेकने और ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) समर्थकों के बीच लोकप्रियता गंवाने का ख़तरा है. उसी तरह मोदी अगर पश्चिमी ज़ुल्म के आगे ख़ामोश रहते हैं, तो कांग्रेस उनकी एक कमज़ोर नेता की छवि बनाने की कोशिश करेगी. हम सोनिया गांधी के हालिया लेख में इसका उदाहरण देख चुके हैं. अमेरिका के दूसरे बहुत से साथी देशों के उलट, भारत के पास वो स्वतंत्रता और ताक़त है कि वो अमेरिका पर अपने हित में दबाव बना सके.
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Kadira Pethiyagoda is a geopolitics expert and former political advisor and diplomat. His expertise on foreign policy stems from being a Fellow at the Brookings ...
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