Expert Speak Raisina Debates
Published on Aug 30, 2025 Updated 0 Hours ago

सीरिया की सांप्रदायिक हिंसा को देखकर तेहरान की सुरक्षा रणनीति नया आकार लेने लगी है- ईरान के लिए ख़तरे कई गुना बढ़ रहे हैं, उसके विकल्प सीमित हो रहे हैं और नए मोर्चे भी खुलते दिख रहे हैं.

ईरान की सामरिक-सुरक्षा रणनीति में सीरिया की अहमियत

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सीरिया के हालिया सांप्रदायिक संघर्ष से ईरान के सामने रणनीतिक-सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियां पैदा हो गई हैं. इससे युद्ध-बाद के दौर में ख़तरों और चुनौतियों को लेकर तेहरान नया आकलन करने लगा है. बेशक, इनमें से कुछ चुनौतियां चिंता की बड़ी वज़ह नहीं हो सकतीं और वे सिर्फ़ ऐसे कारक के रूप में काम कर सकेंगी, जिससे मौजूदा मुश्किलें बढ़ जाएं, लेकिन अन्य चुनौतियां नए ख़तरे का संकेत हो सकती हैं. मार्च 2025 की शुरुआत में, हयात तहरीर अल-शाम (HTS) समर्थित सरकारी सुरक्षा बलों ने लताकिया और टार्टस में बड़े पैमाने पर नरसंहार किया, जिसमें लगभग 1,500 लोग मारे गए थे. इससे दमिश्क की मंशा, क्षमता और नेतृत्व में तालमेल को लेकर संदेह पैदा होने लगा. जुलाई के मध्य में यह भरोसा और कमज़ोर हो गया, जब सुवेदा प्रांत में ड्रूज़-बेडौइन संघर्ष की वज़ह से सेना की तैनाती की गई और बाद में दुर्व्यवहार के आरोप भी लगे. संघर्ष-विराम की घोषणा के बावजूद, वहां हिंसा जारी रही, जिसमें लगभग 1,000 लोग मारे गए और 1,76,000 लोग भागने को मजबूर हुए. इन सब घटनाओं से इज़रायल के अभियान तेज़ हो गए, सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेज (SDF)- दमिश्क एकीकरण विवाद अधिक गंभीर बन गए, और सीरियाई क्षेत्र में शासन संबंधी मतभेद बढ़ गए.

ईरान की भू-राजनीतिक सीमा में हो रहे इन हालिया घटनाक्रमों ने ख़तरे को लेकर तेहरान की सोच बदल दी है, और जोखिमों के प्रति उसे अधिक असहिष्णु बना दिया है. ईरान का सहयोगी छद्म नेटवर्क कमज़ोर पड़ने लगा है. हमास सुस्त हो गया है, हिज़्बुल्लाह को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है

ईरानी नज़रिये को संतुलित करना

ईरान की भू-राजनीतिक सीमा में हो रहे इन हालिया घटनाक्रमों ने ख़तरे को लेकर तेहरान की सोच बदल दी है, और जोखिमों के प्रति उसे अधिक असहिष्णु बना दिया है. ईरान का सहयोगी छद्म नेटवर्क कमज़ोर पड़ने लगा है. हमास सुस्त हो गया है, हिज़्बुल्लाह को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और असद के पतन ने अग्रिम पंक्ति की सुरक्षा-रणनीति को कमज़ोर बना दिया है. 12 दिनों के युद्ध ने ख़तरों के प्रति उसकी संवेदनशीलता बढ़ा दी है और सत्ता-संरक्षण को महत्वपूर्ण बना दिया है. सबसे अस्थिर करने वाला पक्ष मोसाद का ईरान के अंदर तक पहुंच जाना था. उसने वायु रक्षा व रडार नोड्स पर हमले किए और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRCG) के बड़े अधिकारी व वरिष्ठ परमाणु वैज्ञानिक मार गिराए. इज़रायली अधिकारियों द्वारा सत्ता-परिवर्तन की सार्वजनिक बयानबाजी ने भी रेड-लाइन उल्लंघन की आशंकाओं को बढ़ा दिया है. 

जैसे ही संघर्ष शुरू हुआ, कुर्दिस्तान फ्रीडम पार्टी (PAK) और कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ ईरान (KDPI) जैसे कुर्द गुटों ने तेहरान को दोषी ठहराना शुरू कर दिया, जिससे अराजकता पैदा हुई. इतना ही नहीं, फ्री लाइफ पार्टी ऑफ़ कुर्दिस्तान (PJAK) ने ‘जिन, जियान, आजादी’ क्रांति के अगले दौर का ऐलान किया, जिससे तेहरान की चिंता और गहरा गई. यह युद्ध के बाद के घटनाक्रमों में साफ़ दिखाई दिया, जब अधिकारियों ने जवाबी कार्रवाई के रूप में बड़े पैमाने पर लोगों को गिरफ्तार किया, कइयों को तुरंत फांसी दी, सीमा पर सैनिकों का जमावड़ा बढ़ाया और अफ़गानों को निकाल बाहर किया. यह संकेत था कि वे किसी भी ख़तरे को हल्के में नहीं लेना चाहते. 

हाल की आतंकी घटनाओं ने ‘संरक्षण-प्रथम’ की नीति पर बल दिया है, और कुर्द उग्रवाद को विदेशी समर्थन मिलने के लंबे समय से चले आ रहे दावों ने उनके प्रति शासन का संदेह बढ़ा दिया है. ईरान-इराक युद्ध की तरह एक उच्च-स्तरीय रक्षा परिषद् को सक्रिय करना संकेत है कि वे संकट की गंभीरता समझ रहे हैं और शासन की सुरक्षा को मज़बूत करना चाहते है.

युद्ध-बाद ख़तरे के आकलन के रूप में, सीरिया जैसी अपेक्षाकृत सीमित बाहरी घटनाओं को भी एक बड़े ख़तरे के रूप में देखा जा रहा है, जिस आधार पर सतर्कता और सुरक्षा बढ़ाई जा रही है.

  

सीरियाई चुनौतियां

तेल अवीव ने, जो HTS समर्थित सरकार और अंकारा (तुर्किये की राजधानी) के बढ़ते प्रभाव को लेकर बेहद दुविधा में है, असद के पतन के बाद पूरी तस्वीर बदल दी है. सैकड़ों हवाई हमले, माउंट हरमोन तक चढ़ाई, दक्षिण दमिश्क से सेना को पूरी तरह हटाने की मांग और गोलान-हाइट्स के क्षेत्र में विस्तार जैसे प्रयास बताते हैं कि यहां इज़रायली प्रभाव और पैठ में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है.

सुवेदा में झड़पों के बाद, ड्रूज़ को सुरक्षा देने की बात कहते हुए इज़रायल ने सीरिया के कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए. इनमें उसके सेना मुख्यालय पर किया गया हमला भी शामिल था. दमिश्क ने अपनी संप्रभुता के इस उल्लंघन की निंदा ज़रूर की, लेकिन उसने कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की. इज़रायली और सीरियाई अधिकारियों के बीच बातचीत के बावजूद, सीरियाई इलाकों में हमले, छापे और गश्त जारी हैं, जो बताता है कि सीरिया में तेल अवीव की रणनीति ईरान के लिए एक रणनीतिक फंदा है. ईरान यदि अपना प्रभाव फिर से बनाने को कोशिश करता है, तो इज़रायली कार्रवाई बढ़ने का ख़तरा होगा, जबकि उसका चुपचाप बैठ जाना लैवेंट से स्थायी रूप से हाथ धोने जैसा होगा. इस कारण ईरान के सामने सिर्फ़ यही विकल्प बचता है- तनाव बढ़ाना या रणनीतिक रूप से पीछे हट जाना.

तेहरान वास्तव में इज़रायली प्रभाव के विस्तार को सीरिया में तनाव बढ़ाने और दक्षिण में नियंत्रण बनाने की कोशिश के रूप में देखता है. यह उसे स्वीकार नहीं है और उसके लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं है. यह भू-रणनीति में उलटफेर का प्रतीक है. उसने न केवल अपना ‘मुख्य आधार’ खो दिया है, बल्कि यह क्षेत्र क़रीब-क़रीब इज़रायल के प्रभाव वाला मैदान बनता जा रहा है. इस कारण तेहरान के पास यहां पूर्व में जो रणनीतिक ताक़त थी, वह ख़त्म होती दिख रही है. तेहरान अब अपनी भौगोलिक सीमा के नज़दीक इज़रायली ख़तरे का सामना कर रहा है.

हिज़्बुल्लाह के हथियार-विहीन करने की कोशिशों का विरोध और ‘बदला लेने’ संबंधी ईरानी नेतृत्व के बयानों से इसी बात की आशंका बढ़ रही है कि ईरान लैवेंट में अपने छद्म गुटों को समर्थन जारी रखने के लिए नए नेटवर्क और रास्ते तलाशेगा, जो क्षेत्रीय व घरेलू चुनौतियों को देखते हुए फिलहाल सीमित मात्रा में हो सकती है.

कुर्द का सवाल

हिंसा-बाद की घटनाओं ने अल्पसंख्यकों की स्वायत्तता संबंधी कोशिशों को आगे बढ़ाया है, ख़ास तौर से SDF की. सुवेदा संघर्षों ने SDF के प्रसार और हथियारबंद बने रहने के तर्कों को पुष्ट करते हुए सरकार के साथ उसके जुड़ाव संबंधी वार्ता को जटिल बना दिया है. हाल के SDF-दमिश्क संघर्ष बताते हैं कि दोनों में अविश्वास गहरा गया है और आपसी तालमेल नहीं बन पा रहा, जो राजनीतिक परिदृश्य के नाजुक हो जाने का संकेत है.

खुले टकराव या दुश्मनी का चूंकि कोई इतिहास नहीं है, इसलिए SDF की राजनीतिक कोशिशें अपने आप में ईरान के लिए सीधा ख़तरा नहीं हो सकतीं. मगर तेहरान कुछ ज्यादा ही संवेदनशीलता दिखा रहा है, इसलिए वहां एक प्रतिशत ख़तरे को भी 100 प्रतिशत माना जा रहा है. ऐसी स्थिति में मामूली बदलाव भी चिंता की बड़ी वज़ह बन सकती है. उत्तर और पूर्वी सीरिया का लोकतांत्रिक स्वायत्त प्रशासन (DAANES) मॉडल को पूरे कुर्द आंदोलन में सराहा जाता है, और PJAK ने जुलाई के मध्य में सार्वजनिक रूप से रोजावा क्रांति की 13वीं वर्षगांठ मनाई थी. SDF की पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स (YPG) और PJAK के विचार क़रीब-क़रीब एकसमान हैं, और कभी-कभी वे एक-दूसरे पर काडर को प्रभावित करने का आरोप लगाते हैं, तो सीमा के आर-पार रिश्तेदारी भी निभाते हैं. यह सामाजिक संरचना ईरान के भारी सैन्य जमावड़े वाले कुर्द प्रांतों में उत्सुक नज़रों से देखी जाती है. 2017 के इराकी कुर्दिस्तान जनमत संग्रह का विरोध इसी की एक मिसाल है, जिससे इस क्षेत्र की संवेदनशीलता का पता चलता है.

SDF की पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स (YPG) और PJAK के विचार क़रीब-क़रीब एकसमान हैं, और कभी-कभी वे एक-दूसरे पर काडर को प्रभावित करने का आरोप लगाते हैं, तो सीमा के आर-पार रिश्तेदारी भी निभाते हैं. यह सामाजिक संरचना ईरान के भारी सैन्य जमावड़े वाले कुर्द प्रांतों में उत्सुक नज़रों से देखी जाती है.

कुल मिलाकर, स्थानीय तनाव, शासकीय संवेदनशीलता और कुर्दों से जुड़े कथित हालिया उग्रवाद को देखते हुए यह संभव है कि SDF द्वारा प्राप्त किसी भी लाभ को ईरान अपनी कुर्द आबादी पर हद से अधिक असरकारी मान रहा हो, फिर चाहे वह असर बहुत छोटी आबादी पर ही क्यों न पड़े. हालांकि, SDF से उसकी कोई सीधी दुश्मनी नहीं है, फिर भी तेहरान घरेलू स्थिति पर ध्यान दे सकता है. यदि SDF को कोई राजनीतिक लाभ मिलता है, तो ईरान कुर्द के किसी भी पहल को उभरने से रोकने के लिए घरेलू कार्रवाई कर सकता है और अपने सुरक्षा उपाय बढ़ा सकता है.

अवसर की झलक

इन सबसे ऐसी छिपी हुई चुनौतियां भी पैदा होती हैं, जो अराजकता और शासन-शून्यता से उपलब्ध अवसरों को और गहरा बना सकती हैं. SDF-शासन बलों, ड्रूज़-बेडौइन जनजातियों और शासन बलों के बीच संघर्ष शासन-व्यवस्था के प्रति विश्वास और राष्ट्रीय एकता को कमज़ोर करते हैं. ऐसे में, इज़रायली दुस्साहस बढ़ने पर सीरियाई समाज में दरारें बढ़ सकती हैं और बाहरी ताक़तों के लिए आदर्श परिस्थितियां बन सकती हैं.

ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से कथित रूप से जुड़े इस्लामिक रेजिस्टेंस फ्रंट जैसे गुटों ने कहा है कि वे सांप्रदायिक संघर्षों का सामना हथियारों और विचारों से करेंगे. इज़रायली दख़ल की ईरान द्वारा आलोचना और उसके मीडिया द्वारा अल-शरा का मज़ाक उड़ाना, और उसे नाक़ाबिल बताते हुए सीरिया के अल्पसंख्यकों व लोगों के प्रति अपना समर्थन जताना बताता है कि तेहरान किस तरह पहले से ही अपनी जीत का दावा करने की कोशिश कर रहा है. कूटनीतिक रूप से, उसने इज़रायल पर हमला करने और खुद को सीरियाई अल्पसंख्यकों का रक्षक बताने के लिए हिंसा का इस्तेमाल एक बुनियादी-आधार के रूप में किया है.

विडंबना यह है कि इज़रायली दख़ल ने शायद ईरान को फिर से यहां आने का मौका दे दिया है. मगर आर्थिक समस्याएं, स्थानीय अविश्वास और सैन्य-संबंधी सीमाएं किसी भी बड़े आंदोलन को प्रभावित करती हैं. वैसे, कुछ ख़ास कारकों के लिए लक्षित समर्थन देकर तेहरान असद के पतन से पहले जैसी अपनी पकड़ कुछ हद तक पा सकता है.

तेहरान शायद सीरिया में बढ़ती सांप्रदायिक दरारों में नए अवसर तलाश रहा है. स्थानीय मिलिशिया को कथित तौर पर गुपचुप आर्थिक मदद देना और लेबनान, इराक व यमन के ऐतिहासिक उदाहरण उसकी जानी-पहचानी रणनीति की ओर इशारा करते हैं, जो है- प्रभाव बनाने के लिए अर्थव्यवस्था का लाभ उठाना. विडंबना यह है कि इज़रायली दख़ल ने शायद ईरान को फिर से यहां आने का मौका दे दिया है. मगर आर्थिक समस्याएं, स्थानीय अविश्वास और सैन्य-संबंधी सीमाएं किसी भी बड़े आंदोलन को प्रभावित करती हैं. वैसे, कुछ ख़ास कारकों के लिए लक्षित समर्थन देकर तेहरान असद के पतन से पहले जैसी अपनी पकड़ कुछ हद तक पा सकता है.

निष्कर्ष

तेहरान पहले घरेलू स्तर पर संरक्षण को मज़बूत करेगा. सीरिया में वह छोटे, कम लागत वाले उपायों पर भरोसा कर रहा है. उसकी सक्रियता जिन कारकों पर निर्भर करेगी, वे हैं- इज़रायल के अभियान, ईरान के दमन को आदर्श रूप में स्थापित करना और अल-शरा की रणनीति. ऐसे में, इज़रायली कार्रवाइयों में बढ़ोतरी से अस्थिरता बढ़ सकती है, जिससे उसे अधिक अवसर मिलेंगे, साथ ही ख़तरे और लागत में भी वृद्धि होगी. रक्षा परिषद के कार्यक्षेत्र का विस्तार या नए ‘विदेश-संबंधी’ कानून का बनना घरेलू कार्रवाई का संकेत होगा, जो चरम स्थिति पर जाकर सिद्धांत का रूप ले सकता है, जिससे ख़तरा कुछ कम हो सकेगा. यदि अल-शरा किसी समझौते पर पहुंचने, संघर्षों का हल निकालने और देश को एकजुट करने के लिए अधिक अनुकूल नज़रिया अपनाता है, तो सामान्य अराजकता व संदेह कम हो जाएंगे. इस प्रकार ईरान की पैठ बनाने की मंशा भी कम हो जाएगी. हालांकि, इसका उल्टा भी हो सकता है. साफ़ है, सीरिया के सांप्रदायिक संघर्ष ने तेहरान के क्षेत्रीय रणनीति में कोई ख़ास बदलाव नहीं किया है, बल्कि ख़तरे की आशंका और घरेलू सुरक्षा पर उसका ध्यान अधिक बढ़ा दिया है. बेशक, बहुत कुछ अब भी साफ़ नहीं है, पर यह ज़रूर स्पष्ट है कि सीरिया ईरान के सामरिक-सुरक्षा समीकरण में मज़बूती से शामिल है, जहां की हर हलचल पर तेहरान की कड़ी नज़र है.


(कबीर तनेजा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम के उप-निदेशक और फ़ेलो हैं)

(सृजन श्रीवास्तव ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में शोध प्रशिक्षु हैं) 

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