हाल ही में चीन ने ताइवान के चारों ओर ‘जस्टिस मिशन 2025’ नामक सैन्य अभ्यास किया जिससे ताइवान और उसके बाहरी सहयोगियों को चेतावनी दी गई. इस लेख से जानें कि यह अभ्यास क्यों किया गया और इसका क्षेत्रीय असर क्या रहा.
29 दिसंबर 2025 को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के ईस्टर्न थिएटर कमांड ने ‘जस्टिस मिशन 2025’ नाम से संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू किया. इस दो-दिवसीय अभ्यास में थलसेना, नौसेना, वायुसेना और रॉकेट फोर्स की इकाइयों ने ताइवान जलडमरूमध्य और ताइवान के आसपास के पाँच क्षेत्रों में भाग लिया. चीन ने इन अभ्यासों को ताइवान की स्वतंत्रता समर्थक ताकतों और उनके बाहरी सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई के रूप में पेश किया. अभ्यास का मुख्य उद्देश्य समुद्र-हवा संयुक्त गश्त, युद्ध-तैयारी की जांच, अहम बंदरगाहों और रणनीतिक इलाकों की नाकेबंदी तथा बहु-क्षेत्रीय सैन्य दबाव दिखाना था. यह समझना जरूरी है कि यह अभ्यास अभी क्यों किया गया, यह पहले के अभ्यासों से कैसे अलग है और चीन इससे क्या संदेश देना चाहता है.
बीजिंग ने यह अचानक सैन्य अभ्यास उस फैसले के बाद शुरू किया, जब 2025 के अंत में ट्रंप प्रशासन ने ताइवान को 11.1 अरब अमेरिकी डॉलर के हथियार बेचने की मंजूरी दी. यह सौदा ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते के उस फैसले से जुड़ा है जिसके तहत 2026 में रक्षा बजट जीडीपी का तीन प्रतिशत और 2030 तक पाँच प्रतिशत करने की योजना बनाई गई है. इसके अलावा, लाई ने अमेरिका और अन्य साझेदार देशों से हथियार खरीदने के लिए 40 अरब डॉलर का अतिरिक्त बजट भी पेश किया है. इस राशि का इस्तेमाल ‘टी-डोम’ नामक बहु-स्तरीय रक्षा प्रणाली बनाने में किया जाना है ताकि मिसाइलों, लड़ाकू विमानों और ड्रोन से ताइवान की सुरक्षा की जा सके. इसी के तहत ताइवान लंबी दूरी के हथियार, वायु-रक्षा और एंटी-मिसाइल सिस्टम, ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित हथियार हासिल करना चाहता है.
अभ्यास का मुख्य उद्देश्य समुद्र-हवा संयुक्त गश्त, युद्ध-तैयारी की जांच, अहम बंदरगाहों और रणनीतिक इलाकों की नाकेबंदी तथा बहु-क्षेत्रीय सैन्य दबाव दिखाना था. यह समझना जरूरी है कि यह अभ्यास अभी क्यों किया गया, यह पहले के अभ्यासों से कैसे अलग है और चीन इससे क्या संदेश देना चाहता है.
पिछले कुछ वर्षों में ‘जॉइंट स्वॉर्ड’, ‘स्ट्रेट थंडर’ और अब ‘जस्टिस मिशन’ जैसे बड़े सैन्य अभ्यासों के जरिए चीन यह दिखाना चाहता है कि वह ताइवान की स्वतंत्रता समर्थक ताकतों से निपटने में सक्षम और तैयार है. साथ ही, बीजिंग इन अभ्यासों के माध्यम से अमेरिका को भी चेतावनी देना चाहता है जिस पर वह ताइवान को राजनीतिक हथियार देने का आरोप लगाता है.
चीन ने इस हथियार सौदे को ताइवान की सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी और बाहरी ताकतों, खासकर अमेरिका, की मिलीभगत बताया है. बीजिंग का कहना है कि लाई सरकार का हथियारों पर जोर ताइवान को एक बारूद के ढेर में बदल रहा है और तथाकथित ‘पॉर्क्यूपाइन रणनीति’ द्वीप और वहां के लोगों को संघर्ष की ओर धकेल रही है. इसी कारण चीन ने ताइवान की स्वतंत्रता समर्थक ताकतों और उनके समर्थकों को साफ चेतावनी देते हुए अपने सैन्य अभ्यासों के जरिए कड़ा संदेश दिया है.
‘जस्टिस मिशन’ अभ्यास पीएलए की संयुक्त सैन्य क्षमताओं को परखने का मंच था. इस दौरान पीएलए की थलसेना और रॉकेट फोर्स ने अहम ठिकानों पर कई चरणों में नकली हमलों का अभ्यास किया जबकि नौसैनिक जहाज़ और लड़ाकू विमान अलग-अलग दिशाओं से ताइवान के आसपास तैनात किए गए. विभिन्न सेनाओं की इकाइयों ने मिलकर समन्वित हमलों का अभ्यास किया. ताइवान के ऊर्जा संयंत्रों, प्रमुख बंदरगाहों और सैन्य अड्डों को संभावित लक्ष्य मानकर कार्रवाई की गई. अभ्यास में ताइवान को तीन दिशाओं से घेरने की स्थिति दिखाई गई जिसका उद्देश्य हवा और समुद्र दोनों में नियंत्रण स्थापित करना था. पूरी रणनीति का साफ संदेश था बाहरी हस्तक्षेप से पहले ताइवान की अहम शक्ति संरचनाओं को तेज़ी से निष्क्रिय करना.
ताइवान के ऊर्जा संयंत्रों, प्रमुख बंदरगाहों और सैन्य अड्डों को संभावित लक्ष्य मानकर कार्रवाई की गई. अभ्यास में ताइवान को तीन दिशाओं से घेरने की स्थिति दिखाई गई जिसका उद्देश्य हवा और समुद्र दोनों में नियंत्रण स्थापित करना था.
इन अभ्यासों में संदेश और मनोवैज्ञानिक दबाव सबसे अहम तत्व रहे. चीन के सरकारी मीडिया ने तीखे, युद्ध जैसे चित्रों और भाषा का इस्तेमाल किया और इन अभ्यासों को संभावित संघर्ष की झलक के रूप में पेश किया. जारी की गई तस्वीरों का मकसद डर पैदा करना, चीन की दृढ़ता दिखाना और जनता की सोच को प्रभावित करना था.
चित्र 1: न्याय की श्रृंखला

Source: Ministry of National Defense
चित्र 1 यह संकेत देता है कि घेराबंदी या दबाव से जुड़ी कई व्याख्याएँ बीजिंग के असली संदेश को समझने में चूक जाती हैं. चीन इन अभ्यासों के ज़रिये यह बताना चाहता है कि ये केवल दिखावटी कदम नहीं हैं और पुनः एकीकरण उसकी दृष्टि में तयशुदा है. वहीं, चीन के तटरक्षक बल द्वारा जारी चित्र 2 इस धारणा को और मज़बूत करता है कि ताइवान पहले से ही चीन की निगरानी में है, जहां सफ़ेद रंग के जहाज़ चीन की सरकारी सत्ता के प्रतीक के रूप में गश्त करते दिखाए गए हैं.
चित्र 2: ताइवान पर चीन का संरक्षण

Source: Ministry of National Defense
चित्र 3: ताइवान के बंदरगाहों और जहाजरानी मार्गों पर भारी बमबारी

Source: Ministry of National Defense
हालांकि, पिछले वर्षों के सैन्य अभ्यासों से तुलना करने पर यह दो दिन का ताज़ा अभ्यास तीव्र तो दिखा लेकिन इसकी रूपरेखा अपेक्षित ही रही. चित्र 4, 5 और 6 से स्पष्ट है कि अभ्यास का क्षेत्र और इस्तेमाल किए गए सैन्य संसाधनों की संख्या लगभग पहले जैसी ही रही. पीएलए की कार्रवाइयाँ उस रणनीति से मिलती-जुलती दिखती हैं जिसे रणनीतिकार हाल ब्रैंड्स ने ‘एनाकोंडा रणनीति’ कहा है. इसके तहत बीजिंग मानता है कि धीरे-धीरे ताइवान को अलग-थलग करना और उसका मनोबल तोड़ना, सीधे समुद्री हमले की तुलना में अधिक प्रभावी होगा, जिसका परिणाम अब भी अनिश्चित है. इसी सोच के तहत अभ्यास में तीन क्षमताओं को खास तौर पर प्रदर्शित किया गया-ताइवान के आसपास समुद्र में वास्तविक मिसाइल प्रक्षेपण, दो प्रमुख समुद्री मार्गों को बाधित करने और अहम बंदरगाहों की नाकाबंदी का अभ्यास, तथा संयुक्त वायु-नौसैनिक युद्धाभ्यास.
चित्र 4: ताइवान के आसपास पीएलए के सैन्य अभ्यासों का पता लगाना

Source: K Tristen Tang
चित्र 5: पीएलए के लगातार अभ्यासों में उपयोग की गई संपत्तियों की संख्या

Source: Institute for the Study of War
चित्र 6: 29 दिसंबर, 2025 को ताइवान के आसपास पीएलए द्वारा किया गया अभ्यास

Source: Focus Taiwan
इन सैन्य अभ्यासों का ताइवान और उसके सहयोगी देशों पर गहरा असर पड़ा. जापान ने आधिकारिक तौर पर चीन के सामने गंभीर चिंता जताई और कहा कि इन अभ्यासों से ताइवान जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ा है. टोक्यो ने बातचीत के ज़रिये शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद जताई और स्थिति पर नज़र बनाए रखने की बात कही. यूरोपीय संघ ने भी इन अभ्यासों को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बताया, यथास्थिति बदलने वाली एकतरफ़ा कार्रवाइयों का विरोध किया और संयम बरतने की अपील की. ऑस्ट्रेलिया ने भी चीन के समक्ष आपत्ति दर्ज कराते हुए इन अभ्यासों को अस्थिरता बढ़ाने वाला बताया. जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, न्यूज़ीलैंड और फिलीपींस ने भी इसी तरह के बयान दिए.
हालाँकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन अभ्यासों के असर को कम करके आँका. उनका कहना था कि चीन पिछले दो दशकों से ताइवान के आसपास ऐसे या इससे भी बड़े अभ्यास करता रहा है. ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनके व्यक्तिगत संबंधों को देखते हुए यह केवल शक्ति प्रदर्शन है, न कि तत्काल कार्रवाई की तैयारी. ताइवान सरकार ने अपने सभी साझेदारों का समर्थन के लिए धन्यवाद दिया, जबकि चीन ने इन देशों और संस्थाओं के बयानों को “गलत” बताते हुए औपचारिक विरोध दर्ज कराया.
यूरोपीय संघ ने भी इन अभ्यासों को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बताया, यथास्थिति बदलने वाली एकतरफ़ा कार्रवाइयों का विरोध किया और संयम बरतने की अपील की.
हर बड़े घटनाक्रम के जवाब में-चाहे वह अमेरिका के पूर्व हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा हो, ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री हो, या जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची जैसे नेताओं के बयान-चीन लगातार सीमित लेकिन सटीक सैन्य अभ्यास करता रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य ताइवान के समर्थन में खड़े देशों को स्पष्ट चेतावनी देना है कि चीन इस मुद्दे पर किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेगा.
यह रणनीति अचानक या भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय सुनियोजित और मापी-तौली हुई दिखाई देती है. चीन न तो सीधे युद्ध की ओर बढ़ता है और न ही पूरी तरह चुप रहता है. इसके बजाय, वह सैन्य अभ्यासों के माध्यम से अपनी क्षमता, तैयारी और इरादों का प्रदर्शन करता है. इससे एक संदेश जाता है कि ताइवान से जुड़े हर घटनाक्रम पर चीन की नज़र है और वह आवश्यक होने पर दबाव बढ़ा सकता है. इस तरह के अभ्यास केवल ताइवान के लिए नहीं, बल्कि अमेरिका, जापान और अन्य साझेदार देशों के लिए भी संकेत हैं. यही कारण है कि चीन इन अभ्यासों को अपनी दीर्घकालिक रणनीति का अहम हिस्सा बना रहा है.
राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए ताइवान का मुद्दा सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है और वे इसे अपने राजनीतिक विरासत से जोड़कर देखते हैं. 2027 में उत्तराधिकार पर चर्चा तेज़ होने के साथ ताइपे पर दबाव और बढ़ सकता है. चीन का संदेश साफ़ है-ताइवान को मिलने वाला कोई भी बाहरी समर्थन तुरंत चीनी प्रतिक्रिया को जन्म देगा, जिसका असर राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक रिश्तों पर भी पड़ सकता है.
ऐसे समय में भारत को सीमा ढांचे और सैन्य क्षमताओं को तेज़ी से मज़बूत करना चाहिए, क्योंकि इरादे और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात कभी भी बदल सकते हैं.
हालांकि, 2027 में चीन द्वारा ताइवान पर सीधे हमले की आशंका फिलहाल कम दिखती है. ग्रे-ज़ोन कार्रवाइयों और सैन्य अभ्यासों के ज़रिये चीन पहले ही धीरे-धीरे अपनी स्थिति मज़बूत कर चुका है. हाल के वर्षों की तुलना में सैन्य संसाधनों का सीमित इस्तेमाल यह संकेत देता है कि चीन बिना युद्ध की सीमा पार किए दबाव बनाने की रणनीति के करीब पहुँच चुका है. पूर्ण पैमाने पर हमला इन उपलब्धियों को जोखिम में डाल सकता है.
फिर भी, इन अभ्यासों से क्षेत्र में बेचैनी बढ़ रही है, जैसा कि जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची के बयानों से झलकता है. बाइडन प्रशासन के दौरान अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक में सैन्य मौजूदगी और साझेदारियों को मज़बूत किया था. भले ही ट्रंप का ध्यान अब पश्चिमी गोलार्ध पर अधिक हो, लेकिन ताइवान को लेकर अमेरिका की भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं है.
आगे चलकर जस्टिस मिशन 2025 के बाद ताइवान के आसपास और भी सैन्य अभ्यास हो सकते हैं. वहीं, चीन का पूर्वी मोर्चे पर बढ़ता ध्यान उसे भारत के साथ दक्षिण-पश्चिमी सीमा पर फिलहाल स्थिरता बनाए रखने के लिए भी प्रेरित कर सकता है. ऐसे समय में भारत को सीमा ढांचे और सैन्य क्षमताओं को तेज़ी से मज़बूत करना चाहिए, क्योंकि इरादे और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात कभी भी बदल सकते हैं.
अतुल कुमार ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में राष्ट्रीय सुरक्षा और चीन अध्ययन के फेलो हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Atul Kumar is a Fellow in Strategic Studies Programme at ORF. His research focuses on national security issues in Asia, China's expeditionary military capabilities, military ...
Read More +