बोर्ड ऑफ पीस पर राजनीतिक तर्कों की चर्चा पहले ही हो चुकी है लेकिन असली कहानी इसकी रूपरेखा और सत्ता-संरचना में छिपी है. यह लेख उसी ढांचे को खोलता है ताकि समझा जा सके कि यह शांति का मंच है या शक्ति का नया प्रयोग.
ग़ाज़ा शांति योजना के लिए बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस (बीओपी)को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब महत्वपूर्ण वैश्विक मंच में बदलना चाहते हैं. ट्रंप चाहते हैं कि 'सदस्यता-आधारित' इस संस्थागत इकाई को वैश्विक संघर्षों को सुलझाने वाला संगठन बनाया जाए. अमेरिका ने 22 जनवरी 2026 को दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मौके पर 'चार्टर' के लिए एक हस्ताक्षर समारोह भी आयोजित किया. यहां लगभग 18 देशों ने शुरुआती सदस्य के तौर पर अमेरिका का साथ दिया. ट्रंप की दलील है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में की जाने वाली कोशिशों से शांति स्थापित नहीं हो रही, इसीलिए बोर्ड ऑफ पीस बनाना पड़ा. हालांकि, वैकल्पिक वैश्विक पहलों का आना कोई नई बात नहीं है लेकिन अमेरिका के नेतृत्व में गठित बोर्ड ऑफ पीस कुछ चिंताएं पैदा करता है. इसकी वजह ये है कि इस बोर्ड के नियम-कानूनों और इसकी वैधता को लेकर स्पष्टता नहीं है.
अमेरिका द्वारा तैयार किए गए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के प्रस्ताव 2803 के बाद साल 2025 के आखिर में इस बोर्ड को मंजूरी मिली. बोर्ड ऑफ पीस को 2027 तक ग़ाज़ा में स्थिरता, विसैन्यीकरण और पुनर्निर्माण की कोशिशों में मदद करने का काम सौंपा गया था. बोर्ड का घोषित उद्देश्य संघर्ष से प्रभावित या ख़तरे वाले क्षेत्रों में स्थिरता को बढ़ावा देना, भरोसेमंद, कानूनी शासन को बहाल करना और स्थायी शांति सुनिश्चित करना था. हालांकि, बोर्ड के चार्टर में उसके जनादेश को साफ तौर पर परिभाषित नहीं किया गया है और ना ही ग़ाज़ा का ज़िक्र है. यही कारण है कि इससे बोर्ड के कार्यक्षेत्र को लेकर मनमाफिक व्याख्याओं की काफ़ी गुंजाइश बचती है.
दावोस में मीटिंग से कुछ ही दिन पहले, अमेरिका ने इस पहल में शामिल होने के लिए लगभग 60 देशों को न्योता भेजा. सऊदी अरब, तुर्किए, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कतर जैसे मध्य-पूर्व के बड़े क्षेत्रीय देशों समेत लगभग 35 देशों ने इस बोर्ड के लिए सहमति जताई. इस संगठन के कुछ अन्य प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता देशों में अज़रबैजान, मोरक्को, कोसोवो, पाकिस्तान और इंडोनेशिया शामिल हैं. इज़राइल भी बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए सहमत हो गया, हालांकि ग़ाज़ा-विशिष्ट पैनल और ग़ाज़ा शांति प्रक्रिया में तुर्किये और क़तर की भागीदारी को लेकर उसे कुछ आपत्तियां थीं.
बोर्ड का घोषित उद्देश्य संघर्ष से प्रभावित या ख़तरे वाले क्षेत्रों में स्थिरता को बढ़ावा देना, भरोसेमंद, कानूनी शासन को बहाल करना और स्थायी शांति सुनिश्चित करना था. हालांकि, बोर्ड के चार्टर में उसके जनादेश को साफ तौर पर परिभाषित नहीं किया गया है और ना ही ग़ाज़ा का ज़िक्र है.
दूसरी ओर, अमेरिका के कुछ पारंपरिक सहयोगी देशों ने इस 'अपरिभाषित' बोर्ड में शामिल होने में हिचकिचाहट दिखाई है. दावोस में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के विरोध वाले भाषण के बाद ट्रंप ने कनाडा को दिया न्योता वापस ले लिया. नॉर्वे, स्वीडन और फ्रांस जैसे कई देशों ने संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रियाओं से तालमेल ना होने का हवाला देते हुए इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया. इसके जवाब में फ्रांस को दंडात्मक व्यापार उपायों की धमकी दी गई है, जिसमें फ्रेंच वाइन और शैम्पेन पर 200 प्रतिशत टैरिफ शामिल है. रूस और चीन ने बोर्ड को अधिकृत करने वाले शुरुआती यूएन प्रस्ताव पर वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया था और ये भी उन देशों में शामिल हो गए हैं, जो बोर्ड ऑफ पीस में भागीदारी के बारे में अभी भी दुविधा में हैं.
हालांकि बोर्ड ऑफ पीस के पीछे का मक़सद संयुक्त राष्ट्र के सिस्टम में आई कमियों को दूर करके समाधान खोजना है, लेकिन बोर्ड का मौजूदा ढांचा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए एक ग्लोबल ग्रुप के बजाय एक एग्जीक्यूटिव क्लब जैसा लगता है. यूएन में पारंपरिक कूटनीति वीटो पॉलिटिक्स और संस्थागत ठहराव की वजह से ठप पड़ी है. ऐसे में एक तेज़ी से काम करने वाला एक वैश्विक संगठन सुनने में आकर्षक लगता है. हालांकि, यूएन को वैधता द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुई बातचीत से मिली, जिससे इसका चार्टर अपनाया गया. उस चार्टर पर 1945 में सैन फ्रांसिस्को कॉन्फ्रेंस में लगभग 50 देशों ने साइन किए थे. यह ट्रंप के बोर्ड से बिल्कुल अलग था, क्योंकि बोर्ड ऑफ पीस का चार्टर अमेरिका के नेतृत्व वाली प्रक्रिया से तैयार किया गया था और सिर्फ तीन देशों की सहमति मिलने के बाद ही लागू हो सकता था.
इसके अलावा, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस बोर्ड के चेयरमैन के तौर पर काम करेंगे और उन सदस्य देशों की देखरेख करेंगे जिन्हें वे तीन साल के कार्यकाल के लिए नामांकित करेंगे. सदस्य देश, अपनी आर्थिक स्थिति या क्षमताओं की परवाह किए बिना, 1 अरब डॉलर के निवेश के बदले एक स्थायी सीट खरीद सकेंगे. इसके अलावा, चेयरमैन द्वारा नियुक्त एक एग्जीक्यूटिव बोर्ड को फैसले लागू करने का काम सौंपा जाएगा. ऑपरेशन के लिहाज़ से, राष्ट्रपति ट्रंप ने जनवरी 2026 में ग़ाज़ा के प्रशासन के लिए नेशनल कमेटी (एनसीएजी) बनाकर अपने 20-सूत्रीय शांति योजना के दूसरे चरण की शुरुआत की. वैसे हैरानी की बात ये है कि 2026 की शुरुआत तक, किसी भी बड़े देश ने स्थायी सीट के लिए ज़रूरी एक अरब डॉलर देने के लिए औपचारिक रूप से सहमति नहीं दी है.
यूएन में पारंपरिक कूटनीति वीटो पॉलिटिक्स और संस्थागत ठहराव की वजह से ठप पड़ी है. ऐसे में एक तेज़ी से काम करने वाला एक वैश्विक संगठन सुनने में आकर्षक लगता है. हालांकि, यूएन को वैधता द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुई बातचीत से मिली, जिससे इसका चार्टर अपनाया गया. उस चार्टर पर 1945 में सैन फ्रांसिस्को कॉन्फ्रेंस में लगभग 50 देशों ने साइन किए थे.
हालांकि, एग्जीक्यूटिव स्टाइल में फैसले लेने में काम तेज़ी से हो सकता है, लेकिन बहुपक्षीय संस्थाओं के दौर में यह सामूहिक मालिकाना हक और वैधता को कमज़ोर करता है. बोर्ड ऑफ पीस की सबसे विशिष्ट खासियत इसके संस्थागत डिज़ाइन में अधिकारों का बंटवारा है. बोर्ड का चार्टर इसके चेयरमैन को असाधारण शक्तियां देता है, जिसमें सभी फैसलों पर वीटो का अधिकार भी शामिल है. चार्टर की अंतिम व्याख्या करने, सदस्यों को बुलाने या हटाने के एकतरफ़ा अधिकार चेयरमैन को दिए गए हैं. फिलहाल इसके चेयरमैन ट्रंप हैं और उनके मूड स्विंग के बारे में हर कोई जानता है. यहां तक कि बोर्ड का जारी रहना भी चेयरपर्सन की सहमति पर निर्भर है. संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों के विपरीत, यह बोर्ड ग़ाज़ा में अपने मौजूदा जनादेश से परे सुरक्षा परिषद की निगरानी के अधीन नहीं है.
हालांकि, अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि वह संयुक्त राष्ट्र को ख़त्म नहीं करना चाहता, लेकिन एक वैकल्पिक बोर्ड का औपचारिक गठन मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय ढांचे को बदलने, या शायद उसकी जगह लेने के एक बड़े मक़सद की ओर इशारा करता है. यूएन को लगातार कई बाधाओं का सामना करना पड़ा है. यूएन पर पश्चिमी देशों का प्रभाव साफ दिखता है. ज़्यादातर सदस्य, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के देश मानते हैं कि यूएन में संरचनात्मक सुधारों की ज़रूरत है. हालांकि बोर्ड ऑफ पीस शांति स्थापित करने की कोशिशों के लिए फंडिंग का समन्वित मंच बन सकता है. बिखरे हुए माहौल में पर्दे के पीछे से कूटनीति कर सकता है, लेकिन वैश्विक शांति के लिए यह एक टिकाऊ मॉडल नहीं है. इसे ज़्यादातर देशों का जनादेश हासिल नहीं है.
ट्रंप के शांति दूत और ग्रुप के एग्जीक्यूटिव बोर्ड के सदस्य स्टीव विटकॉफ ने रूस, यूक्रेन, ईरान, सूडान और सीरिया को ऐसे संभावित मामलों के तौर पर लिस्ट किया, जहां भविष्य में बोर्ड के दख़ल की ज़रूरत पड़ सकती है. संघर्ष सुलझाने के मक़सद से किए गए ऐसे किसी भी हस्तक्षेप का विरोध कर सकते हैं, क्योंकि ज़्यादातर देश उसी आदेश को मानते हैं, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मान्यता मिली हो. हो सकता है कि आखिर में कुछ और देश भी इस बोर्ड में शामिल हो जाएं. हालांकि, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ये सदस्य बोर्ड चार्टर को मंज़ूरी देंगे. बोर्ड ऑफ पीस में संस्थागत वैधता और जवाबदेही की कमी है. संघर्ष सुलझाने का ये मॉडल आज ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिका की सच्चाई हो सकता है, लेकिन दीर्घकाली नीति की कमी इसकी एक बहुत बड़ी कमज़ोरी है.
हिना मखीजा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
सैंड्रा प्रताप ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Dr. Makhija is an Associate Fellow at ORF and specializes in the study of Multilateralism, International Organizations, Global Norms, India at UN, Multilateral Negotiations, and ...
Read More +
Sandra Thachirickal Prathap is a Research Assistant with the Observer Research Foundation’s (ORF) Strategic Studies Programme (SSP). Her research examines the geopolitical dynamics of the Global ...
Read More +