Author : Atul Kumar

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jan 29, 2026 Updated 1 Days ago

चीन की सेना के दो बड़े नेता झांग और लियू भ्रष्टाचार जांच में फंसे हैं. पढ़िए, कैसे शी जिनपिंग की सख्त नीतियां सेना की ताकत और कमांडरों के मनोबल को प्रभावित कर रही हैं.

पीएलए, झांग और लियू: भ्रष्टाचार या वफादारी?

20 जनवरी 2026 को, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की एक महत्वपूर्ण बैठक में चीन के दो शीर्ष सैन्य अधिकारी शामिल नहीं हुए. जनरल झांग यूक्सिया और लियू जेनली की अनुपस्थिति ने चीन की सुनियोजित राजनीतिक व्यवस्था में अटकलें पैदा कर दीं. यह अनुमान लगाया गया कि दोनों अधिकारी जांच के दायरे में हैं. बाद में, चीन के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय ने 24 जनवरी को अटकलों की पुष्टि करते हुए कहा कि दोनों अधिकारी वास्तव में पार्टी अनुशासन और कानून के गंभीर उल्लंघन के संदेह में जांच के दायरे में थे.

इस घटनाक्रम ने चीन में नागरिक-सैन्य संबंधों की स्थिति को लेकर अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है. पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के भीतर शी जिनपिंग का भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान अब सैन्य कमान संरचना के शीर्ष स्तर तक पहुंच चुका है. इसलिए, यह लेख तीन परस्पर जुड़े सवालों का विश्लेषण करता है. क्या मौजूदा दौर की शुद्धिकरण कार्रवाई भ्रष्टाचार के प्रति एक आकस्मिक प्रतिक्रिया है, या यह शी जिनपिंग के शासनकाल में पार्टी-सेना संबंधों की संरचनात्मक विशेषता है? क्या शीर्ष कमांडरों को हटाने से शासन की सुरक्षा को खतरा पैदा होता है, चाहे वह अभिजात वर्ग के विखंडन, संस्थागत संदेह या तख्तापलट की वजह से हो? और तीसरा सवाल, नेतृत्व में बार-बार होने वाले बदलाव समय के साथ पीएलए की युद्ध क्षमता, कमान की एकजुटता और सैनिकों के मनोबल को कैसे प्रभावित करते हैं?

जांच के दायरे में कौन-कौन से नेता?

झांग यूक्सिया चीन के केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) में उपाध्यक्ष और पोलित ब्यूरो में इकलौते सैन्य प्रतिनिधि थे. शायद वो अपने करियर के शिखर पर थे. लियू जेनली सीएमसी के सदस्य और संयुक्त स्टाफ विभाग के प्रमुख थे. वो युद्ध अभियानों, संयुक्त युद्ध, यूनिट गतिविधियों और खुफिया जानकारी के लिए जिम्मेदार थे. झांग और लियू दोनों ही चीन-वियतनाम संघर्ष के दौर के पीएलए के कुछ गिने-चुने युद्ध-अनुभवी अधिकारियों में से हैं. शी जिनपिंग द्वारा पीएलए में बार-बार चलाए गए भ्रष्टाचार-विरोधी अभियानों के दौरान इन दोनों ने एक-दूसरे के साथ सहयोग किया है.

क्या मौजूदा दौर की शुद्धिकरण कार्रवाई भ्रष्टाचार के प्रति एक आकस्मिक प्रतिक्रिया है, या यह शी जिनपिंग के शासनकाल में पार्टी-सेना संबंधों की संरचनात्मक विशेषता है? क्या शीर्ष कमांडरों को हटाने से शासन की सुरक्षा को खतरा पैदा होता है, चाहे वह अभिजात वर्ग के विखंडन, संस्थागत संदेह या तख्तापलट की वजह से हो?

इसके अलावा, झांग यूक्सिया कुलीन वर्ग हिस्सा होने के साथ-साथ शी जिनपिंग के बचपन के दोस्त हैं. दोनों के पिता एक ही सैन्य टुकड़ी में काम करते थे, जिससे उनके बीच घनिष्ठ पारिवारिक संबंध हैं. यही वजह है कि 76 वर्ष की आयु में पीएलए की सेवानिवृत्ति सीमा पार करने के बाद भी शी जिनपिंग ने झांग को सीएमसी में एक विश्वसनीय शक्ति केंद्र के रूप में बनाए रखा.

पीएलए में नेतृत्व का तेज़ी से पतन 

शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ 2014-18 के दौरान अपना पहला दमन अभियान चलाया. इस अभियान के दौरान उन्होंने जियांग ज़ेमिन युग के उन भ्रष्ट और सत्ताधारी अधिकारियों को निशाना बनाया, जिन्होंने हू जिंताओ की सत्ता और प्रमुख पहलों को खोखला कर दिया था. 2023 से जारी दूसरे अभियान में, शी जिनपिंग ने अपने ही संरक्षण नेटवर्क के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को पद से हटा दिया है. शी जिनपिंग के शासनकाल में पीएलए के कुल 110 से ज़्यादा वरिष्ठतम अधिकारियों को पद से हटाया गया है. कुछ प्रमुख नामों को सारणी 1, 2 और 3 में दिखाया गया है.

Paper Tigers Of Pla Xi Dismantles China S Central Military Commission

 Paper Tigers Of Pla Xi Dismantles China S Central Military Commission

झांग पर कार्रवाई कोई साधारण मामला नहीं

झांग को निशाना बनाकर शी जिनपिंग ने यह दिखा दिया है कि भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से चीन में कोई भी व्यक्ति अछूत नहीं है, फिर चाहे वह जीवन भर का सहयोगी ही क्यों न हो. इसके अलावा, यह कार्रवाई सीसीपी कार्यालय द्वारा की जा रही है, जो झांग पर 'अध्यक्ष उत्तरदायित्व प्रणाली' का उल्लंघन करने का आरोप लगाता है. यह झांग द्वारा जिनपिंग की सर्वोच्च सत्ता को चुनौती देने का संकेत है. यही वजह है कि इस घटनाक्रम में राजनीतिक सत्ता संघर्ष के स्पष्ट संकेत मिलते हैं. इसके अलावा, पीएलए एक गुप्त संगठन है और ऐतिहासिक रूप से पार्टी की पहलों का विरोध करने में अक्सर अग्रणी रहा है, यहां तक कि माओत्से तुंग के युग में भी. पीएलए में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को भी अवज्ञा के रूप में देखा जा सकता है, विशेष रूप से शी जिनपिंग द्वारा, जो अगले साल होने वाले नेतृत्व परिवर्तन से पहले बेहद चिंतित हैं. 

शी जिनपिंग ने धीरे-धीरे अपने भ्रष्टाचार-विरोधी ईकाई के प्रमुख झांग शेंगमिन को छोड़कर, पूरी सीएमसी को भंग कर दिया है. यदि झांग और लियू को बख्शा नहीं गया, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि झांग शेंगमिन का पतन भी नहीं होगा.

इस जांच की एक और विशेषता यह है कि इसमें परमाणु कार्यक्रम से जुड़े रहस्यों की जानकारी लीक करना और पदोन्नति में भ्रष्टाचार जैसे कई आरोपों को मीडिया के माध्यम से धीरे-धीरे उजागर किया गया है. झांग और लियू पर असाधारण रूप से गंभीर, देशद्रोही आचरण का आरोप लगाया जा रहा है. इसका उद्देश्य अभिजात वर्ग के असंतोष, आम सैनिकों और व्यापक सैन्य समुदाय को अनुशासित करना है. 

आत्म-क्रांति: गुफा में रहने का प्रश्न क्या है?

1945 में, माओत्से तुंग ने 'गुफा में रहने का प्रश्न' उठाया, जिसका सार यह था कि "सत्ता में आने के बाद, जब कोई क्रांतिकारी दल गुफा से बाहर निकलकर देश पर शासन करता है, तो वह पतन से कैसे बच सकता है?" माओ ने तीन तरीके सुझाए: स्थायी क्रांति, वैचारिक सुधार और संघर्ष के माध्यम से आत्म-परिवर्तन. इससे सीसीपी में प्रभावी रूप से घेराबंदी वाली मानसिकता उत्पन्न हुई, जो नेतृत्व में पीढ़ीगत परिवर्तनों के बावजूद बनी रही.

इस मूलभूत प्रश्न पर शी जिनपिंग की प्रतिक्रिया उनके 'स्व-क्रांति' के विचार में समाहित है. भ्रष्टाचार और विश्वासघात को शासन की विफलता नहीं, बल्कि अस्तित्वगत राजनीतिक ख़तरे के रूप में देखना. इसलिए, शी जिनपिंग निगरानी, अनुशासन, भय और नौकरशाही घुसपैठ के ज़रिए काम करते हैं. आर्थिक और प्रशासनिक क्षेत्रों पर तकनीकी नियंत्रण बनाए रखते हुए राजनीतिक और सैन्य क्षेत्रों में वैचारिक शुद्धता को बढ़ाते हैं. कई मामलों में उनकी इस रणनीति का उदाहरण देखा जा सकता है. जैक मा जैसे कॉर्पोरेट दिग्गजों पर लगाम लगाने, विदेशों में असंतुष्टों का पीछा करने और पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ जैसे वरिष्ठ राजनेताओं को दरकिनार करना इसके उदाहरण हैं.

जिनपिंग के भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान सतत संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिनमें हजारों भ्रष्टाचारियों को फंसाया गया है, खासकर पीएलए में. शी जिनपिंग ने धीरे-धीरे अपने भ्रष्टाचार-विरोधी ईकाई के प्रमुख झांग शेंगमिन को छोड़कर, पूरी सीएमसी को भंग कर दिया है. यदि झांग और लियू को बख्शा नहीं गया, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि झांग शेंगमिन का पतन भी नहीं होगा. चीन का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिनमें सम्राटों ने अपने शीर्ष सहायकों और लेफ्टिनेंटों के साथ-साथ उनके परिवार और संरक्षण नेटवर्क को भी तब हटा दिया, जब उनकी वफादारी या उपयोगिता पर संदेह हुआ.

अपने शासन की सुरक्षा में लगे हैं जिनपिंग

हालिया फेरबदल से पीएलए में चिंता बढ़ना तय है. इससे पदोन्नति, कमान संरचनाओं और संस्थानों पर भरोसा कम होगा. सबसे ज्यादा प्रभावित सीएमसी है. शी जिनपिंग सीएमसी में युवा पीढ़ी के ऐसे सैन्य अधिकारियों को नियुक्त करने की कोशिश करेंगे, जो पुराने नेताओं की राजनीति से अछूते हों. यह चयन प्रक्रिया काफ़ी कठिन साबित हो सकती है, क्योंकि भविष्य में भर्ती होने वाले लोग भी अपने पूर्ववर्तियों की दुर्दशा को देखते हुए सतर्क रहेंगे.

यदि मौजूदा छंटनी का सिलसिला जारी रहता है तो चीनी सेना दिखने में तो मज़बूत लगेगी लेकिन धीरे-धीरे कागजी शेरों की सेना जैसी हो जाएगी. इतना ही पदोन्नति के वक्त भी ये देखा जाएगा कि वो अधिकारी शी जिनपिंग के लिए कितना वफादार होगा, इससे पेशेवर दक्षता कमज़ोर पड़ सकती है.

हालांकि, तख्तापलट की आशंका या शी जिनपिंग के लिए सेना से तत्काल नेतृत्व के ख़तरे की संभावना फिलहाल कम है, क्योंकि पीएलए संस्थागत रूप से थिएटर कमांड और पार्टी-नियंत्रित निकायों में विभाजित है. फिर भी, अभिजात वर्ग में विभाजन होगा, क्योंकि बर्खास्त जनरलों के सहयोगी या उनके द्वारा पदोन्नत अधिकारी असुरक्षित या हाशिए पर महसूस कर सकते हैं, जिससे गुटबाजी के लिए जगह बन सकती है, पीएलए में भारी अविश्वास भी पैदा हो सकता है.

निष्कर्ष: पीएलए की दुर्दशा

पीएलए एक ऐसे दौर में प्रवेश करता दिख रहा है जहां संस्थागत एकजुटता, व्यावसायिकता और उच्च कमान की प्रभावशीलता कमजोर पड़ सकती है. राजनीतिक कार्य और वैचारिक शुद्धता पर बहुत ज़्यादा ज़ोर देने से पीएलए में कमांडरों के बजाय राजनीतिक कमिश्नरों का दबदबा होने का खतरा है.

पीएलए को अपने सैन्य साजो-सामान और मानव संसाधन के बीच भारी असंतुलन का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि, इसके सैन्य भंडार और सैन्य संरचना का तेज़ी से आधुनिकीकरण हुआ है, लेकिन कमान की गुणवत्ता और व्यावसायिकता अभी भी निम्न स्तर की है. यदि मौजूदा छंटनी का सिलसिला जारी रहता है तो चीनी सेना दिखने में तो मज़बूत लगेगी लेकिन धीरे-धीरे कागजी शेरों की सेना जैसी हो जाएगी.

इतना ही पदोन्नति के वक्त भी ये देखा जाएगा कि वो अधिकारी शी जिनपिंग के लिए कितना वफादार होगा, इससे पेशेवर दक्षता कमज़ोर पड़ सकती है. सैन्य कमांडर प्रतिकूल परिणामों की रिपोर्ट करने में संकोच कर सकते हैं. निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है. पीएलए एक राजनीतिक साधन के रूप में तो विश्वसनीय हो सकती है, लेकिन युद्ध में उसकी क्षमता कमज़ोर पड़ सकती है.


अतुल कुमार ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में नेशनल सिक्योरिटी और चाइना स्टडीज़ में फेलो हैं.

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