Author : Sushant Sareen

Expert Speak Raisina Debates
Published on Feb 10, 2026 Updated 6 Days ago

पाकिस्तान ग्लोबल मंच पर सक्रिय, आर्थिक और कूटनीतिक अवसर ढूँढ रहा है. जानें, भारत के लिए इससे कौन से सुरक्षा खतरे पैदा हो सकते हैं.

बोर्ड ऑफ पीस में पाकिस्तानः भारत क्यों रहे सावधान?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बहुचर्चित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (BOP) में शामिल होने का फैसला शहबाज़ शरीफ़ के नेतृत्व और असीम मुनीर के नियंत्रण वाले पाकिस्तान के हाइब्रिड शासन के लिए लगभग तयशुदा था. शुरुआती उत्साह तब कुछ कम हुआ जब यही निमंत्रण भारत और लगभग 50 अन्य देशों को भी दिया गया, फिर भी शासन तंत्र इस औपचारिक मंच से जुड़ने को तैयार हो गया. इस निर्णय के पीछे उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ हद तक स्वीकार्यता और सम्मान हासिल करना था, खासकर तब जब सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और तुर्किये जैसे कुछ मुस्लिम देशों ने भी इसमें सदस्यता ली.

देश के भीतर हुई आलोचना को शासन से जुड़े लोगों ने नज़रअंदाज़ कर दिया. सरकार समर्थक समूहों ने इस कदम को सही ठहराने के लिए कई तर्क दिए. कहा गया कि ट्रंप जैसे अप्रत्याशित अमेरिकी प्रशासन को नाराज़ करना पाकिस्तान के लिए संभव नहीं था. पाकिस्तान आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक रूप से कमजोर स्थिति में है. हाल में ट्रंप ने पाकिस्तान का गर्मजोशी से स्वागत किया और नए फील्ड मार्शल तथा प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की प्रशंसा की. पाकिस्तान को उम्मीद है कि खनन और क्रिप्टोकरेंसी के क्षेत्र में अमेरिकी निवेश बढ़ेगा. यदि ट्रंप नाराज़ हो जाते, तो IMF का दबाव बढ़ सकता था, नए टैरिफ लग सकते थे और वित्तीय प्रवाह प्रभावित हो सकता था. घरेलू वैधता की कमी से जूझ रहा शासन अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति दिखाने के लिए उत्सुक है- यह पाकिस्तान के अलोकप्रिय शासनों की सामान्य प्रवृत्ति रही है.

ट्रंप प्रशासन के साथ पाकिस्तान की सुनियोजित नज़दीकी

यह भी तर्क दिया गया कि BOP में शामिल होकर पाकिस्तान को कम से कम कमरे में जगह तो मिलेगी, जहाँ वह गाज़ा जैसे मुद्दों पर अपनी बात रख सकेगा. हालांकि ट्रंप के वैकल्पिक विचारों को न सुनने और BOP में पूर्ण वीटो रखने की बात को कम करके दिखाया गया. शासन के लोगों ने कहा कि BOP में शामिल होने का अर्थ गाज़ा में सैनिक भेजना या हमास को निरस्त्र करना नहीं है. 1 अरब डॉलर की सदस्यता फीस भी तुरंत नहीं देनी होगी; तीन साल बाद निर्णय लिया जा सकता है. पाकिस्तान को उम्मीद है कि गाज़ा पुनर्निर्माण में ठेके या श्रम आपूर्ति के अवसर मिल सकते हैं. सार्वजनिक रूप से गाज़ा पर आक्रोश जताते हुए भी लाभ उठाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. साथ ही, अरब और मुस्लिम देशों के लिए सुरक्षा सेवाएँ देकर क्षेत्र में उपस्थिति मजबूत करने की सोच भी है.

बोर्ड ऑफ पीस से पाकिस्तान की अपेक्षाएँ

BOP का दायरा केवल गाज़ा तक सीमित नहीं है. उसके चार्टर में संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में स्थिरता, वैध शासन और स्थायी शांति को बढ़ावा देने की बात कही गई है. पाकिस्तान को उम्मीद है कि गाज़ा के बाद BOP का ध्यान कश्मीर पर जा सकता है. तुर्किये जैसे भारत-विरोधी रुख वाले देशों की मौजूदगी से पाकिस्तान को लगता है कि वह कश्मीर को एजेंडे में ला सकता है. कुछ भारतीय विश्लेषकों की आशंकाओं ने भी पाकिस्तान के उत्साह को बढ़ाया है.

हाल में ट्रंप ने पाकिस्तान का गर्मजोशी से स्वागत किया और नए फील्ड मार्शल तथा प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की प्रशंसा की. पाकिस्तान को उम्मीद है कि खनन और क्रिप्टोकरेंसी के क्षेत्र में अमेरिकी निवेश बढ़ेगा. यदि ट्रंप नाराज़ हो जाते, तो IMF का दबाव बढ़ सकता था, नए टैरिफ लग सकते थे और वित्तीय प्रवाह प्रभावित हो सकता था.

पाकिस्तान के दृष्टिकोण से ट्रंप ने अमेरिका–भारत रणनीतिक संबंधों को कमजोर कर दिया है. उसे लगता है कि अमेरिका अब भारत को रणनीतिक साझेदार नहीं मानता. हालिया अमेरिकी रक्षा रणनीति में चीन को पहले जैसा शत्रु न बताने से भारत की उपयोगिता कम हुई दिखती है. पाकिस्तान ने ट्रंप के साथ सक्रिय रूप से संबंध सुधारने, खनन और क्रिप्टो सौदों की पेशकश करने और अमेरिकी अभियानों में सहयोग का संकेत दिया है. अमेरिका भारतीय बाज़ार में रुचि रखता है, पर अब टैरिफ जैसे औज़ारों से काम चलाना चाहता है.

पाकिस्तान को उम्मीद है कि अमेरिका–भारत दूरी बढ़ने से ट्रंप को कश्मीर में दखल देने के लिए राजी करना आसान होगा. वह कश्मीर को फिर “परमाणु फ्लैशपॉइंट” के रूप में पेश कर रहा है. ट्रंप द्वारा पिछले मई के ऑपरेशन सिंदूर संकट को परमाणु टकराव की कगार बताने वाले बयान से पाकिस्तान उत्साहित है. उसे लगता है कि ट्रंप BOP के ज़रिये भारत पर संवाद का दबाव डाल सकते हैं. कुछ पाकिस्तानी विश्लेषकों का मानना है कि टैरिफ जैसे आर्थिक उपायों से भी भारत पर दबाव बनाया जा सकता है. नोबेल शांति पुरस्कार पाने की ट्रंप की इच्छा और स्वयं को शांति दूत बताने की उनकी छवि से पाकिस्तान की अपेक्षाएँ बढ़ी हैं.

भारत की सुरक्षा और राजनयिक स्थिति पर इसके प्रभाव

पाकिस्तान अक्सर अपनी रणनीतिक क्षमता का अधिक आकलन करता है. ट्रंप जिन संघर्षों को रोकने का दावा करते हैं, उनमें उन्होंने सामान्यतः यथास्थिति या मजबूत पक्ष का समर्थन किया है - जैसे रूस-यूक्रेन, आर्मेनिया-अज़रबैजान आदि. अधिकतर मामलों में केवल संवाद तंत्र बना, मूल विवाद हल नहीं हुए. जब तक पाकिस्तान मजबूत पक्ष नहीं है, और भारत के साथ हालिया टकरावों में वह नहीं था. ट्रंप संभवतः यथास्थिति या मजबूत पक्ष यानी भारत का समर्थन करेंगे. लेन-देन आधारित सोच रखने वाले ट्रंप के लिए उभरती अर्थव्यवस्था भारत, कमजोर पाकिस्तान से अधिक महत्वपूर्ण है.

भारत के लिए आवश्यक है कि वह केवल कूटनीतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि सैन्य और खुफिया स्तर पर भी उच्च सतर्कता बनाए रखें. त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता, तकनीकी निगरानी और संयुक्त बल समन्वय ही प्रभावी प्रतिरोध सुनिश्चित करेंगे.

भारत को ट्रंप द्वारा कश्मीर में दखल की कोशिश से बहुत चिंतित होने की जरूरत नहीं. 2019 में भी प्रयास विफल रहा था. असली खतरा ट्रंप से अधिक पाकिस्तान की सैन्य-प्रेरित सोच से है. पाकिस्तान मान बैठा है कि कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान लाने का अवसर है, इसलिए वह कोई बड़ा आतंकी हमला कर उकसावे की रणनीति अपना सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि ऑपरेशन सिंदूर फिलहाल विराम पर है-यानी बड़े हमले पर जवाब होगा. ऐसी स्थिति में भारत आतंकी ढांचे और उनके समर्थन नेटवर्क, यहाँ तक कि पाक सैन्य तत्वों से जुड़े ठिकानों को भी निशाना बना सकता है. इससे तनाव बढ़ेगा और अमेरिका युद्धविराम कराने के लिए हस्तक्षेप करेगा-और वहीं से मध्यस्थता की भूमिका बढ़ाने की कोशिश हो सकती है. पाकिस्तान का आकलन कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है.

पाकिस्तान के साथ ट्रंप प्रशासन की बढ़ती नजदीकियां दक्षिण एशिया में सामरिक अस्थिरता और संभावित टकराव का जोखिम बढ़ा सकती हैं. इससे पाकिस्तान को कूटनीतिक समर्थन का भ्रम मिल सकता है और वह अधिक आक्रामक या उकसावे वाली कार्रवाइयों की ओर बढ़ सकता है. ऐसे माहौल में सीमा पार आतंकवाद, सीमित सैन्य उकसावे या मनोवैज्ञानिक दबाव की रणनीतियाँ तेज हो सकती हैं. भारत के लिए आवश्यक है कि वह केवल कूटनीतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि सैन्य और खुफिया स्तर पर भी उच्च सतर्कता बनाए रखें. त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता, तकनीकी निगरानी और संयुक्त बल समन्वय ही प्रभावी प्रतिरोध सुनिश्चित करेंगे.


सुशांत सरीन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.

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