Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 30, 2026 Updated 0 Hours ago

ईरान-सऊदी तनाव के बीच पाकिस्तान दोनों पक्षों को साधते हुए फँसा है- न पूरी तरह साथ छोड़ सकता है, न खुलकर युद्ध में उतर सकता है. इसीलिए इस्लामाबाद सैन्य भूमिका से बचते हुए कूटनीति और संतुलन की “दोहरी रणनीति” पर चल रहा है. पढ़े विश्लेषण.

ईरान या सऊदी? पाकिस्तान की सबसे कठिन पसंद

अमेरिका-इज़राइल का ईरान के साथ युद्ध अब तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और इस दौरान कई देशों की विदेश नीतियाँ परीक्षा की स्थिति में आ गई हैं. जिन देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां हैं, उनमें पाकिस्तान प्रमुख है. सऊदी अरब का घनिष्ठ सहयोगी और ईरान का पड़ोसी होने के कारण-जिसके साथ उसकी सैकड़ों किलोमीटर लंबी सीमा लगती है -पाकिस्तान खुद को कठिन परिस्थिति में फँसा हुआ पा रहा है. सऊदी अरब के साथ उसके स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA) को देखते हुए, जो किसी भी पक्ष पर आक्रमण होने की स्थिति में सैन्य प्रतिक्रिया की आवश्यकता पैदा करता है, पाकिस्तान की विदेश नीति की गणनाओं में महत्वपूर्ण पुनर्संतुलन की जरूरत पड़ रही है.

पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ लंबे समय से संबंध बनाए रखे हैं और दशकों से उसने साम्राज्य को सैन्य समर्थन भी प्रदान किया है. इसके अलावा, बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिक सऊदी अरब में काम करते हैं और वहाँ से भेजी जाने वाली रेमिटेंस पाकिस्तान की घरेलू अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण सहारा देती है. पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच व्यापार का आकार लगभग 5 अरब अमेरिकी डॉलर के आसपास है, जो पाकिस्तान के बाहरी व्यापार का एक बड़ा हिस्सा बनाता है.

इसके अतिरिक्त, सऊदी अरब लंबे समय से पाकिस्तान को वित्तीय सहायता प्रदान करता रहा है, जबकि पाकिस्तान लगातार आर्थिक चुनौतियों से जूझता रहा है. हाल के वर्षों में सऊदी अरब ने पाकिस्तान के खनिज क्षेत्र और अन्य प्रमुख अवसंरचना परियोजनाओं—जिनमें बिजली क्षेत्र भी शामिल है—में निवेश किया है, जिससे इस्लामाबाद के लिए उसकी रणनीतिक महत्ता और बढ़ गई है. SMDA की उत्पत्ति क़तर पर इज़राइल के मिसाइल हमले के तुरंत बाद हुई थी, जिसने खाड़ी देशों की सुरक्षा के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता को लेकर सऊदी अरब की बढ़ती अनिश्चितता को दर्शाया. इस व्यवस्था से पाकिस्तान को भी लाभ हुआ, क्योंकि इसके परिणामस्वरूप देश में सऊदी निवेश बढ़ा. अफगानिस्तान मोर्चे पर पहले से संसाधन झोंक रहा है पाकिस्तान, इसलिए किसी नए युद्ध में उतरना उसकी सैन्य क्षमता पर भारी दबाव डाल सकता है.

सऊदी अरब का घनिष्ठ सहयोगी और ईरान का पड़ोसी होने के कारण-जिसके साथ उसकी सैकड़ों किलोमीटर लंबी सीमा लगती है -पाकिस्तान खुद को कठिन परिस्थिति में फँसा हुआ पा रहा है. सऊदी अरब के साथ उसके स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA) को देखते हुए, जो किसी भी पक्ष पर आक्रमण होने की स्थिति में सैन्य प्रतिक्रिया की आवश्यकता पैदा करता है . 

दूसरी ओर, पाकिस्तान और ईरान के बीच भी एक लंबा और जटिल इतिहास रहा है. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 3 अरब अमेरिकी डॉलर के आसपास है, और दोनों इसे बढ़ाकर 10 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखते हैं. युद्ध से पहले दोनों देशों के संबंध धीरे-धीरे बेहतर हो रहे थे, जिसका प्रमाण पिछले दो वर्षों में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच हुई 25 उच्चस्तरीय द्विपक्षीय यात्राएँ हैं. हालांकि, समय-समय पर तनाव भी सामने आया है, और 2024 में दोनों देशों के बीच सीमित स्तर पर मिसाइल हमलों का जवाबी आदान-प्रदान भी हुआ था. फिर भी, भौगोलिक निकटता के कारण दोनों देशों के संबंध महत्वपूर्ण बने रहते हैं.

पाकिस्तान की सीमाएं

वर्तमान परिदृश्य में, जब सऊदी अरब ईरान की ओर से कई हमलों का सामना कर रहा है, यह संभावना है कि रियाद सैन्य समर्थन के लिए पाकिस्तान की ओर रुख कर सकता है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ पहले ही सऊदी अरब के प्रति अपने देश की ‘पूर्ण एकजुटता और समर्थन’ व्यक्त कर चुके हैं. साथ ही, शरिफ़ ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन को फोन भी किया, जब मोजतबा खामेनेई को ईरान का नया सर्वोच्च नेता घोषित किया गया. इसलिए मुख्य प्रश्न यह है कि यदि पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा में आगे आता है, तो उसे किन बातों पर विचार करना होगा.

इस्लामाबाद के लिए सीधे तौर पर इस संघर्ष में शामिल होने का निर्णय कई बाधाओं से घिरा हुआ है. पहली बात, भले ही पाकिस्तान पर एसएमडीए के तहत सऊदी अरब का समर्थन करने की बाध्यता हो, लेकिन वह पहले से ही अफगानिस्तान के साथ चल रहे तनाव और संघर्ष में उलझा हुआ है-ईरान संघर्ष की खबरों के बीच कम चर्चा में रहा अफगानिस्तान मोर्चा पाकिस्तान पर भारी सैन्य और परिचालन दबाव डाल रहा है. इस कारण इस्लामाबाद अपने संसाधन वहीं केंद्रित कर रहा है. ऐसे में ईरान से लंबा तनाव या नया संघर्ष पाकिस्तान के लिए जोखिम भरा होगा, खासकर जब उसे भारत से भी सुरक्षा चुनौतियां झेलनी पड़ रही हैं.

पाकिस्तान के पक्ष में एक और कारक चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) के तहत चीन के बड़े निवेश की मौजूदगी है. ईरान, जो अपने अधिकांश तेल का निर्यात चीन को करता है और जिसे संघर्ष के दौरान बीजिंग से खुफिया सहयोग मिलने की भी खबरें हैं, पाकिस्तान में चीनी निवेश को निशाना बनाना ईरान के लिए एक अहम साझेदार को नाराज़ करने जैसा होगा, खासकर तब जब क्षेत्र में उसके संबंध पहले से तनावपूर्ण हैं.

दूसरी बात, पाकिस्तान भौगोलिक वास्तविकताओं के कारण ईरान से लंबा युद्ध मोर्चा नहीं खोल सकता. ईरान की सैन्य क्षमता और आक्रामक प्रतिक्रिया को देखते हुए, अफगानिस्तान और भारत से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए ईरान के साथ बढ़ता तनाव गंभीर चिंता का विषय बन सकता है.

तीसरी बात, पाकिस्तान को अपनी घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखना होगा, क्योंकि देश की लगभग 20% शिया आबादी के ईरान से गहरे धार्मिक और सामाजिक संबंध हैं और कई लोग नियमित रूप से वहाँ यात्रा करते हैं और कुछ पहले सीरिया में ईरान समर्थित बलों के साथ भी लड़ चुके हैं. यदि पाकिस्तान ईरान के खिलाफ किसी संघर्ष में भाग लेता है, तो इस समुदाय को अलग-थलग करना देश के लिए अस्थिरता पैदा कर सकता है, क्योंकि पाकिस्तान में ऐतिहासिक रूप से सुन्नी और शिया समुदायों के बीच सांप्रदायिक हिंसा के कई उदाहरण रहे हैं.

कठिन निर्णय

इस युद्ध में पाकिस्तान के सामने आसान विकल्प नहीं हैं. आर्थिक सहायता और ऊर्जा आपूर्ति के लिए सऊदी अरब पर निर्भरता उसे सतर्क बनाए हुए है. इसलिए इस्लामाबाद ईरान और सऊदी अरब के बीच संतुलित रुख अपनाते हुए तनाव बढ़ने से बचना चाहता है और सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रहा है.

यह तथ्य कि पाकिस्तान ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते ईंधन आपूर्ति के सुरक्षित मार्ग को सुनिश्चित करने के लिए ईरान के साथ बातचीत की है, यह दिखाता है कि सऊदी अरब को राजनीतिक समर्थन देने के बावजूद वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा के लिए ईरान के साथ व्यावहारिक रूप से जुड़ा हुआ है. पाकिस्तान के पक्ष में एक और कारक चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) के तहत चीन के बड़े निवेश की मौजूदगी है. ईरान, जो अपने अधिकांश तेल का निर्यात चीन को करता है और जिसे संघर्ष के दौरान बीजिंग से खुफिया सहयोग मिलने की भी खबरें हैं, पाकिस्तान में चीनी निवेश को निशाना बनाना ईरान के लिए एक अहम साझेदार को नाराज़ करने जैसा होगा, खासकर तब जब क्षेत्र में उसके संबंध पहले से तनावपूर्ण हैं. ऐसे हालात में पाकिस्तान ईरान और सऊदी अरब के बीच संतुलित और सतर्क नीति अपनाता दिख रहा है. इस्लामाबाद सीधे सैन्य भूमिका से बचते हुए कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता दे रहा है, जबकि सऊदी अरब भी रक्षा समझौता लागू करने जैसी बड़ी सैन्य बढ़ोतरी से फिलहाल बचना चाहता है.


मोहम्मद सिनान सियेच ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक नॉन-रेजिडेंट एसोसिएट फेलो हैं. 

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