आसियान देशों के साथ रिश्तों का दर्जा बढ़ाने और पूर्ण संवाद की महत्वाकांक्षाएं पूरी करने की पाकिस्तान की कोशिश उन्हीं जानी पहचानी चुनौतियों- यानी आर्थिक सीमाओं, कमज़ोर संपर्कों भू-राजनीतिक अविश्वास का सामना कर रही है.
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पाकिस्तान लंबे समय से दक्षिणी पूर्वी एशिया में ज़्यादा अहम भूमिका निभाने का ख़्वाब देखता आया है. पिछले तीन दशकों से पाकिस्तान, एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज़ यानी आसियान (ASEAN) के साथ सेक्टोरल डायलॉग पार्टनर (SDP) से बढ़कर फुल डायलॉग पार्टनर (FDP) बनना चाहता है. वैसे पाकिस्तान 1993 में ही आसियान का सेक्टोरल डायलॉग पार्टनर बन चुका था. लेकिन, उसकी पहली बैठक 1997 में जाकर हुई थी. आसियान रीजनल फोरम (ARF) में पाकिस्तान, 2004 में जाकर शामिल हुआ था. इस प्रतीकात्मक संबंध से आगे बढ़ने के लिए पाकिस्तान लगातार संघर्ष करता रहा है. आसियान के साथ अपने रिश्तों में नई जान डालने की पाकिस्तान की हालिया कोशिशें, उसके हिंद प्रशांत क्षेत्र में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की आकांक्षा को दिखाती हैं. लेकिन, भागीदारी गहरी करने के पाकिस्तान के प्रयासों में संरचनात्मक मसले, सीमित आर्थिक रिश्ते और सामरिक अविश्वास की खाई बाधा बने हुए हैं.
पिछले कुछ वर्षों के दौरान पाकिस्तान ने आसियान को लेकर अपने कूटनीतिक प्रयास काफ़ी तेज़ कर दिए हैं. उसके अधिकारियों ने दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों का दौरा किया है, व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों की मेज़बानी की है और देश की ‘विज़न ईस्ट एशिया’ नीति को नई ऊर्जा के साथ सामने रखा है. ये क़दम पाकिस्तान द्वारा अपने पारंपरिक सामरिक क्षेत्रों- दक्षिणी एशिया, मध्य पूर्व और चीन से आगे बढ़ते हुए अपनी विदेश नीति में विविधता लाने के प्रयासों को दर्शाते हैं. पाकिस्तान ने आसियान की अगुवाई वाली दूसरी रूप-रेखाओं जैसे कि ईस्ट एशिया समिट और आसियान डिफेंस मिनिस्टर्स मीटिंग प्लस (ADMM-Plus) में शामिल होने की इच्छा भी जताई है. हालांकि, पाकिस्तान के लिए इन मंचों के दरवाज़े अभी बंद हैं क्योंकि ये संस्थाएं सीमित फोकस वाली हैं, जो अपने आपको हल्का बनाने से गुरेज़ करती हैं; इससे इतर, पाकिस्तान के ये प्रयास दिखा रहे हैं कि उसकी भू-राजनीतिक सोच में तब्दीली आ रही है और वो वैश्विक राजनीति में दक्षिणी पूर्वी एशिया की बढ़ती अहमियत को समझ रहा है.
इन क़दमों के बावजूद, पाकिस्तान का दर्जा बढ़ाने को लेकर आसियान की हिचक बरक़रार है. इसकी एक बड़ी वजह, पाकिस्तान के नीतिगत रुख़ में निरंतरता का अभाव है. आसियान दूरगामी और भरोसेमंद साझेदारियों में यक़ीन रखता है, जो आपसी भरोसे और निरंतरता पर आधारित हों. इसके उलट, आसियान के साथ पाकिस्तान का संवाद कभी-कभार वाला रहा है, जिसमें अक्सर घरेलू नेतृत्व में परिवर्तन के मुताबिक़ उतार चढ़ाव होता रहता है. दक्षिणी पूर्वी एशिया के प्रति एक स्थायी संस्थागत नीति न होने की वजह से पाकिस्तान, वैसा स्थायी संवाद कर पाने में नाकाम रहा है, जिसकी अपेक्षा आसियान को होती है.
पिछले कुछ वर्षों के दौरान पाकिस्तान ने आसियान को लेकर अपने कूटनीतिक प्रयास काफ़ी तेज़ कर दिए हैं. उसके अधिकारियों ने दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों का दौरा किया है, व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों की मेज़बानी की है और देश की ‘विज़न ईस्ट एशिया’ नीति को नई ऊर्जा के साथ सामने रखा है.
एक और प्रमुख बाधा आर्थिक भी है. आसियान बुनियादी तौर पर एक बाज़ार से संचालित संगठन है. वैसे तो पाकिस्तान, आसियान से बहुत कुछ आयात करता है. लेकिन, दक्षिणी पूर्वी एशिया को उसका निर्यात बहुत कम और असंतुलित है. यही नहीं, आसियान देशों से पाकिस्तान में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) भी बहुत कम है. जहां भारत ने पूरे आसियान में आर्थिक हिस्सेदारियों का निर्माण किया है और कई देशों के साथ मुक्त व्यापार के समझौते (FTA) किए हैं. वहीं, पाकिस्तान आसियान के किसी भी देश के साथ कोई अर्थपूर्ण व्यापार समझौता नहीं कर सका है. ठोस आर्थिक एकीकरण की कमी की वजह से आसियान, पाकिस्तान के साथ मज़बूत साझेदारी नहीं विकसित कर पा रहा है.
यही नहीं, दोनों के बीच सांस्कृतिक और आम जनता के आपसी संपर्क भी कमज़ोर बने हुए हैं. जिस तरह भारत, जापान और दक्षिण कोरिया ने पूरे दक्षिणी पूर्वी एशिया के साथ मज़बूत शैक्षणिक, अपने यहां के मूल निवासियों और पर्यटन के माध्यम से ठोस संबंधों को पोषित किया है. उसके उलट, इस क्षेत्र के साथ दूरियां कम करने के लिए पाकिस्तान के पास बहुत कम संस्थागत या फिर आम नागरिकों वाले संपर्क सूत्र हैं. अकादेमिक आदान-प्रदान भी सीमित है. आम लोगों की कूटनीति का कम इस्तेमाल होता है और सांस्कृतिक सहयोग तो दुर्लभ है. सामाजिक स्तर पर कोई संपर्क सूत्र न होने की वजह से पाकिस्तान, आसियान के सदस्य देशों के बीच अपने लिए सद्भावना का निर्माण नहीं कर पा रहा है.
सामरिक रूप से जहां आसियान के कुछ देशों के साथ पाकिस्तान सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग करता है- ख़ास तौर से सैन्य प्रशिक्षण और आतंकवाद निरोध के मामलों में- मगर इलाक़े के सुरक्षा संवाद में पाकिस्तान कहीं नज़र नहीं आता है. समुद्री सुरक्षा, साइबर ख़तरों और दक्षिणी चीन सागर में क्षेत्रीय संतुलन को लेकर आसियान की चिंताएं बहुत गहरी हैं. इन सभी क्षेत्रों में पाकिस्तान का योगदान नगण्य है. यही नहीं, चीन के साथ पाकिस्तान के नज़दीकी रिश्ते भी आसियान के कुछ देशों को सतर्क कर देते हैं, ख़ास तौर से वो देश जो चीन के दबदबे को लेकर आशंकित रहते हैं.
इसके अलावा, पाकिस्तान को लेकर आसियान देशों की सोच भी एक बड़ी चुनौती है. आसियान के कुछ देश पाकिस्तान को सुरक्षा पर केंद्रित नज़रिए से देखते हैं और उनकी चिंता उग्रवाद, आंतरिक स्थिरता और भारत के साथ पाकिस्तान के तनावपूर्ण रिश्तों को लेकर है. आसियान, निरपेक्षता और क्षेत्रीय शांति को तरज़ीह देता है. इसका अर्थ है कि दक्षिणी एशिया की अंदरूनी प्रतिद्वंदिताओं को वो अपने मंच पर नहीं आने देना चाहता. भारत के साथ पाकिस्तान की ऐतिहासिक दुश्मनी और अक्सर उसके द्वारा आसियान के साथ संपर्क बढ़ाने की कोशिशों को भारत विरोधी क़दम के तौर पर पेश किया जाता है. आसियान देश इससे असहज हो जाते हैं, क्योंकि वो दक्षिणी पूर्वी एशिया में किसी का भी पक्ष नहीं लेना चाहते.
दक्षिणी पूर्वी एशिया के प्रति एक स्थायी संस्थागत नीति न होने की वजह से पाकिस्तान, वैसा स्थायी संवाद कर पाने में नाकाम रहा है, जिसकी अपेक्षा आसियान को होती है.
इन बाधाओं के बावजूद पाकिस्तान आसियान को लेकर अपनी रणनीति बदलने के अवसर तलाशता रहा है. इस्लामाबाद पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने 2022 में इस बारे में एक अध्ययन किया था, जो पाकिस्तान की आलोचना वाला था. इस स्टडी में सुझाव दिया गया था कि पाकिस्तान को अपने संबंधों में एक संस्थागत निरंतरता स्थापित करनी चाहिए. इसके लिए उसको भारत की तरह (ASEAN-ML डिवीज़न) अपने विदेश मंत्रालय में एक समर्पित आसियान विभाग बनाना चाहिए, जो राजनीतिक चक्र के मुताबिक़ न बदले. दूसरा, पाकिस्तान को चाहिए कि वो व्यापार समझौतों को बढ़ावा देकर अपनी आर्थिक कूटनीति को मज़बूत बनाए. आसियान देशों को पाकिस्तान के विशेष आर्थिक क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रोत्साहित करे और अपनी अर्थव्यवस्था को आसिया की आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ जोड़े.
तीसरा, पाकिस्तान को चाहिए कि वो स्कॉलरशिप, सांस्कृतिक केंद्रों और अकादेमिक संपर्कों के ज़रिए आम लोगों के बीच संवाद बढ़ाए और स्थायी भरोसे का निर्माण करे. सुरक्षा क्षेत्र में सहयोग को ग़ैर पारंपरिक ख़तरों और संयुक्त रूप से मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) के अभ्यास, आसियान की प्राथमिकताओं से तालमेल को दर्शाते हैं और इस मामले में आसियान के साथ भारत के कामयाब रिश्तों की नक़ल करते दिखते हैं.
पाकिस्तान के पास, क्षेत्रीय प्रतिद्वंदिता के बजाय आपसी लाभ पर आधारित कूटनीतिक नैरेटिव का अभाव है. टिकाऊ विकास, जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशक्ति और डिजिटल परिवर्तन जैसे साझा हितों को रेखांकित करने के बजाय पाकिस्तान अक्सर आसियान को भारत के प्रति संतुलन बनाने या फिर अपनी चीन केंद्रित रणनीति के हिस्से के तौर पर देखता है, जो उसकी अपनी संरचनात्मक सीमाओं को दर्शाते हैं.
भारत के साथ पाकिस्तान की ऐतिहासिक दुश्मनी और अक्सर उसके द्वारा आसियान के साथ संपर्क बढ़ाने की कोशिशों को भारत विरोधी क़दम के तौर पर पेश किया जाता है. आसियान देश इससे असहज हो जाते हैं, क्योंकि वो दक्षिणी पूर्वी एशिया में किसी का भी पक्ष नहीं लेना चाहते.
आसियान के सतर्क और आम सहमति पर आधारित मिज़ाज का मतलब है कि उसके साथ नियमित, बहुआयामी और सकारात्मक संवाद ही पाकिस्तान को वो दर्जा दिला सकता है, जिसका वो आकांक्षी है. फुल डायलॉग पार्टनर बनने की राह बहुत लंबी है. हालांकि, ये अध्ययन कहता है कि अगर पाकिस्तान स्थायी और भरोसेमंद क़दम उठाकर आसियान के मूल्यों और विज़न के साथ तालमेल बनाता है, तो आख़िरकार पाकिस्तान वैसा दर्जा पाने में सफल होगा, जिसका वो आकांक्षी है.
आज जब पाकिस्तान, फुल डायलॉग पार्टनर बनने की कोशिशें तेज़ कर रहा। है तो आसियान के साथ उसके दूरगामी संबंधों को तवज्जो मिलती दिख रही है. मलेशिया में पाकिस्तान के उच्चायुक्त सैयद अहसन रज़ा शाह ने हाल ही में एक प्रेस ब्रीफिंग में दक्षिणी पूर्वी एशिया को लेकर पाकिस्तान की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए आसियान के साथ गहरे संबंधों पर बल दिया था. पाकिस्तान 1993 में स्थापित संबंधों की बुनियाद पर आगे बढ़ने के इन प्रयासों में तेज़ी ला रहा है. तब पाकिस्तान, आसियान का पहला सेक्टोरल डायलॉग पार्टनर बना था. हालांकि, ध्यान देने वाली बात ये है कि ये बात जकार्ता में आसियान के लिए भारत के राजदूत ने नहीं, बल्कि मलेशिया में उसके उच्चायुक्त ने कही है.
पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने आसियान को ‘क्षेत्रीय शांति और स्थिरता का एक अहम मंच’ बताया था और तमाम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की पाकिस्तान की इच्छा को रेखांकित किया था. इनमें आर्थिक विकास, सुरक्षा में सहयोग, सांस्कृतिक आदान प्रदान और पर्यावरण को स्थायी बनाने के प्रयास शामिल हैं. पाकिस्तानी उच्चायुक्त ने कहा था कि पाकिस्तान का दर्जा बढ़ाने को लेकर परिचर्चाएं पहले ही उच्चतम राजनीतिक स्तर पर चल रही हैं. इसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और मलेशिया के प्रधानमंत्री दातुक सेरी अनवर इब्राहिम के बीच बातचीत शामिल है.
जब तक आसियान को पाकिस्तान से नज़दीकी में फ़ायदे नहीं दिखते, तब तक वो प्रैक्टिकल को-ऑपरेशन एरिया (PCA) के अलावा किसी और माध्यम से उससे संस्थागत संबंध नहीं बढ़ाएगा.
आसियान के भीतर मलेशिया, पाकिस्तान का एक प्रमुख समर्थक है. वो आसियान में अपनी अध्यक्षता का लाभ उठाकर पाकिस्तान की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा दे रहा है. अनवर इब्राहिम ने अक्टूबर 2024 में ही पाकिस्तान को अपना समर्थन दिया था और 7 जून 2025 को इसे दोहराते हुए कहा था कि आसियान के अगले शिखर सम्मेलन के दौरान इस मुद्दे को भी चर्चा के लिए उठाया जाएगा. अनवर ने पुत्राजाया में ऐदिलाधा की पूजा के बाद कहा था कि, ‘ये मुद्दा आसियान के नेताओं के सम्मेलन के दौरान उठाया जाएगा.’ पाकिस्तान को मलेशिया का समर्थन ख़ास तौर से अहम है. क्योंकि आसियान के नेतृत्व के चक्र के मुताबिक़ इस साल अध्यक्षता मलेशिया के पास है और पाकिस्तान इसका भरपूर लाभ उठाना चाहता है.
पिछले तीन दशकों के दौरान आसियान और पाकिस्तान के रिश्ते व्यापार, निवेश, पर्यटन और तकनीक के क्षेत्र में संस्थागत और व्यवहारिक सहयोग के ज़रिए बढ़े हैं. फिर भी आसियान के प्रमुख साझीदारों जैसे कि चीन और भारत की तुलना में पाकिस्तान के साथ उसका व्यापार नगण्य ही है. इसके बावजूद, 2022 में दोनों पक्षों के बीच व्यापार शीर्ष स्तर पर पहुंच गया था. इसकी बड़ी वजह पाकिस्तान और मलेशिया के बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) और इंडोनेशिया के साथ पाकिस्तान का प्राथमिकता देने वाला व्यापार समझौता था.
पाकिस्तान क्षेत्रीय सुरक्षा के आदर्शों के प्रति अपनी वचनबद्धता को रेखांकित करते हुए आसियान रीजनल फोरम (ARF) में भी अपनी भागीदारी को बढ़ाना चाहता है. ARF आसियान केंद्रित ऐसी इकलौती संस्था है, जिसका पाकिस्तान सदस्य है और ARF की अपनी उपयोगिता पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं. अभी हाल ही में आसियान और पाकिस्तान की ज्वाइंट सेक्टोरल को-ऑपरेशन कमेटी (AP-JSCC) सहयोग की प्रगति का मूल्यांकन करने और इसके लिए नए अवसर तलाशने का अहम माध्यम बन गई है. AP-JSCC की सातवीं और आठवीं बैठकें 2023 और 2025 में हुई थीं. इन दोनों बैठकों में दोनों ही पक्षों के प्रतिनिधि सहयोग की व्यवहारिक गतिविधियों के ज़रिए अपनी साझेदारी में नई जान डालने को तैयार हुए थे, ताकि ठोस परिणाम हासिल किए जा सकें.
इस रूप-रेखा के तहत आयोजित किए गए 2023 के कारोबारी सम्मेलन ने कारोबारियों के बीच (B2B) 400 से ज़्यादा बैठकें आयोजित की थीं, जिसका वास्तविक आर्थिक प्रभाव देखने को मिला था. इसमें आसियान देशों और पाकिस्तान के सूक्ष्म, छोटे और मध्यम औद्योगिक संगठनों (MSMEs) के बीच सौदे हुए थे. इसका फ़ायदा उठाते हुए दोनों ही पक्ष 2019-21 के प्रैक्टिकल को-ऑपरेशन एरियाज़ (PCA) फ्रेमवर्क का दायरा बढ़ाकर 2024-2028 के अधिक व्यापक PCA तक ले जाने पर रज़ामंद हुए थे.
2025 की AP-JSCC बैठक की अध्यक्षता आसियान के लिए पाकिस्तान के राजदूत और सामाजिक आर्थिक समुदाय के लिए आसियान के उप महासचिव ने मिलकर की थी और दोनों ने इसको लेकर अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया था. इस बैठक में व्यापार एवं निवेश, विज्ञान और तकनीक, मीडिया में सहयोग और मानव संसाधन के विकास के क्षेत्र में प्रगति की समीक्षा की गई थी. बैठक में आसियान के प्रमुख सामरिक दस्तावेज़ों के तहत, दोनों पक्षों के बीच सहयोग के अवसरों की भी पहचान की गई थी. इसमें हिंद प्रशांत के लिए आसियान के आउटलुक (AOIP), आसियान कनेक्टिविटी के 2025 के मास्टर प्लान (MPAC) और इनिशिएटिव फॉर आसियान इंटीग्रेशन (IAI) वर्क प्लान शामिल हैं. आसियान अपने डायलॉग पार्टनर्स से ये अपेक्षा करता है कि वो उसकी योजनाओं और विकास के लक्ष्यों को पाने में अर्थपूर्ण योगदान दें. ये ऐसा क्षेत्र है, जिसमें पाकिस्तान के पास अभी पर्याप्त क्षमता नहीं है.
2025 में मलेशिया की आसियान अध्यक्षता के कार्यकाल में पाकिस्तान के फुल डायलॉग पार्टनर का दर्जा हासिल करने की आकांक्षा में नई जान तो आई है. लेकिन, इसमें सफलता मिलने की संभावना कम है. नए डायलॉग पार्टनर स्वीकार करने पर लगी रोक अभी एक तकनीकी बाधा बनी हुई है और इसी वजह से पाकिस्तान की अर्ज़ी की सुनवाई नहीं हो पार रही है. 1996 से 2021 के बीच आसियान ने कोई नया डायलॉग पार्टनर नहीं जोड़ा है. हां, 2021 में यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद ब्रिटेन ने आसियान को EU की तरह ही डायलॉग पार्टनर का दर्जा देने के लिए राज़ी कर लिया था. जहां ब्रिटेन को सफलता मिल गई, वहीं पाकिस्तान आसियान को ये बात समझा पाने में असफल रहा है कि जिस तरह भारत एक डायलॉग पार्टनर है उसी तरह का दर्जा हासिल करने का हक़ वो भी रखता है.
अपने आपसी संबंधों की गर्मजोशी का फ़ायदा उठाते हुए, पाकिस्तान और मलेशिया ने डायलॉग पार्टनर के दर्जे की बात आगे बढ़ाई है. इससे पाकिस्तान के राजनयिकों को कम से कम बताने के लिए तो एक उपलब्धि मिल ही गई है. पर, मलेशिया चाहे जितना भाईचारा दिखा ले, उसको ये बख़ूबी पता है कि आसियान में नए डायलॉग पार्टनर के लिए आम सहमति नहीं है. इस पर रोक क़ायम है और मलेशिया की अध्यक्षता 2025 में समाप्त हो जाएगी और वो 2035 से पहले दोबारा अध्यक्ष नहीं बनेगा. आसियान के अन्य देश अध्यक्षता संभालेंगे. 2026 में फिलीपींस, 2027 में सिंगापुर, 2028 में थाईलैंड और 2029 में कमान वियतनाम के हाथों में होगी. इनमें से किसी भी देश की दिलचस्पी न तो विस्तार में है और न ही पाकिस्तान में. इनमें से कई देश तो पाकिस्तान की कोशिशों को लगातार वीटो करते रहे हैं.आसियान नए डायलॉग पार्टनर बनाने पर लगी रोक हाल फिलहाल में हटाए या फिर नहीं. लेकिन, आसियान समुदाय के सभी तीन स्तंभों के इर्द गिर्द व्यवहारिक संबंधों के विकास अलग-अलग मंचों के ज़रिए जारी हैं. इनमें खाड़ी सहयोग परिषद और यूरोप के दूसरे डेवलपमेंट पार्टनर शामिल हैं, जो आसियान में योगदान दे सकते हैं. जब तक आसियान को पाकिस्तान से नज़दीकी में फ़ायदे नहीं दिखते, तब तक वो प्रैक्टिकल को-ऑपरेशन एरिया (PCA) के अलावा किसी और माध्यम से उससे संस्थागत संबंध नहीं बढ़ाएगा.
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Gurjit Singh has served as Indias ambassador to Germany Indonesia Ethiopia ASEAN and the African Union. He is the Chair of CII Task Force on ...
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