Author : Sushant Sareen

Published on Nov 20, 2021 Updated 0 Hours ago

अतीत में चंद मौकों पर सरकार ने अपना प्रभाव दिखाने और अपनी ताक़त जताने की कोशिश की थी. हालांकि उन मौकों पर भी वो टीएलपी के पर कतरने का साहस नहीं कर पाई थी

पाकिस्तान: कट्टरपंथी संगठन टीएलपी के सामने पाकिस्तानी हुकूमत का सरेंडर

पाकिस्तान में अब ये एक जाना-पहचाना क़िस्सा हो गया है: कट्टरपंथी बरेलवी मज़हबी सियासी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) के बेहद जुनूनी प्यादे चंद जज़्बाती मजहबी मुद्दों पर हायतौबा मचाना शुरू करते हैं, सड़कों पर उतरकर उत्पात करते हैं. पुलिस और क़ानून का पालन कराने वाली दूसरी एजेंसियों के साथ उनकी भिड़ंत होती है. शुरू में तो सरकार उनको अपने तीख़े तेवर और ताक़त दिखाकर डराने की कोशिश करती है, लेकिन आख़िर में बुज़दिली दिखाकर उनके सामने घुटने टेक देती है. इसकी एक वजह तो यही है कि पाकिस्तान की ‘असली हुकूमत’ और ‘इंतजामिया’ ग़ुस्से से तमतमा रहे इन कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ बल-प्रयोग किए जाने का समर्थन नहीं करती. ऐसे में सरकार टीएलपी की मांगें मानकर फ़ौरी तौर पर अमन-चैन क़ायम करने में कामयाब हो जाती है. चूंकि टीएलपी की दूसरी गंभीर मांगों को मानने का सरकार का कोई इरादा नहीं है लिहाज़ा टकराव का अगला दौर भविष्य में कभी भी शुरू हो सकता है. हालांकि सरकार द्वारा घुटने टेकने से जुड़े हर वाक़ये के साथ टीएलपी की ताक़त और उसको मिलने वाला समर्थन बढ़ता जाता है. ऐसी तमाम क़वायदों से यही लगता है कि कट्टरपंथियों के सामने सरकार का रुतबा और रसूख़ ढीला पड़ रहा है. अतीत में चंद मौकों पर सरकार ने अपना प्रभाव दिखाने और अपनी ताक़त जताने की कोशिश की थी. हालांकि उन मौकों पर भी वो टीएलपी के पर कतरने का साहस नहीं कर पाई थी. नतीजतन टीएलपी और ज़्यादा ताक़त, जोश और ज़हरीलेपन के साथ उठ खड़ा हुआ.

पाकिस्तान की ‘असली हुकूमत’ और ‘इंतजामिया’ ग़ुस्से से तमतमा रहे इन कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ बल-प्रयोग किए जाने का समर्थन नहीं करती. ऐसे में सरकार टीएलपी की मांगें मानकर फ़ौरी तौर पर अमन-चैन क़ायम करने में कामयाब हो जाती है. 

ऐसी पृष्ठभूमि में टीएलपी के सामने पाकिस्तानी राजसत्ता द्वारा घुटने टेकने की ताज़ा घटना से कतई हैरानी नहीं होती. दरअसल ताज्जुब तो उन तौर-तरीक़ों पर होता है जिनके सहारे सरकार ने ये बुज़दिली भरा फ़ैसला लिया. माना जा रहा है कि सरकार और टीएलपी के बीच हुए समझौते की शर्तें इतनी एकतरफ़ा हैं (टीएलपी के पक्ष में) कि उन्हें ख़ुफ़िया रखा गया है. दिलचस्प रूप से अतीत में हुए वाक़यों की तरह इस बार भी टीएलपी के सामने अपमानजनक तौर पर घुटने टेकने से जुड़े समझौते के पीछे पाकिस्तानी फ़ौज का ही हाथ रहा है. हालांकि, फ़ौज द्वारा मोर्चा संभालने से पहले ही इस मसले पर सरकार की किरकिरी हो चुकी थी. टीएलपी के जुलूस से जुड़े मसले से कैसे निपटा जाए, इसे लेकर सरकार में असमंजस और अनिर्णय के हालात जगज़ाहिर हो चुके थे. मार्च में शामिल टीएलपी के झंडाबरदारों के प्रति कभी गरम  कभी नरम वाली नीति से सरकार के इरादों को लेकर उहापोह का दौर बन गया था. पुलिस द्वारा जुलूस को रोकने में नाकाम रहने के बाद हालात पर क़ाबू पाने के लिए फ़ौज की अगुवाई वाले रेंजरों को बुलाया गया. इस पूरी क़वायद के मायने यही हुए कि टीएलपी के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की कार्रवाई का पूरा जिम्मा फ़ौज पर आ गया.

आईएसआई के नए मुखिया की नियुक्ति को लेकर पहले ही सरकार और फ़ौज के बीच तनातनी का माहौल बन गया था. इससे नागरिक सरकार और फ़ौजी इंतजामिया के बीच अविश्वास की गहरी खाई बन गई है. दोनों के बीच भरोसे में काफ़ी कमी आ गई है. ऐसे में फ़ौज को ये लगा कि अगर टीएलपी को लेकर हालात क़ाबू से बाहर हुए तो इमरान ख़ान की अगुवाई वाली सरकार फ़ौज को बलि का बकरा बना देगी. यही वजह थी कि लाहौर से इस्लामाबाद के बीच टीएलपी की नामूस-ए-रिसालत मार्च पर गोली चलाने के लिए फ़ौज कतई तैयार नहीं थी. भले ही सरकार ने टीएलपी के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाने और ज़रूरत पड़ने पर बल प्रयोग का मन बना लिया था लेकिन फ़ौज ने सरकार को हार मानकर पीछे हट जाने का मशविरा दिया. आख़िरकार सरकार ने भी यही रास्ता अपनाना बेहतर समझा.

इस्लामी कट्टरपंथी और पुलिस

टीएलपी ने अपने तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक मार्च शुरू कर दिया था. उसके तमाम झंडाबरदार पुलिस द्वारा रास्ते में लगाई गई रुकावटों और बैरियरों को तोड़कर आगे बढ़ने में कामयाब हो गए. ऐसे में अधिकारियों के पास सिर्फ़ तीन विकल्प बच गए थे. यहां एक बात बिना लाग-लपेट के कही जा सकती है कि ये तीनों ही विकल्प बेहद बुरे थे. पहला विकल्प था- रैली में शामिल लोगों को किसी भी सूरत में इस्लामाबाद की ओर बढ़ने से रोकना, चाहे इसके लिए पूरी ताक़त ही क्यों न लगानी पड़ जाए. दरअसल, पुलिस के सामान्य तौर-तरीक़े- आंसू गैस, लाठीचार्ज आदि पहले ही आज़माए जा चुके थे और इनका नतीजा सिफ़र ही रहा था. ऐसे में गर्मजोशी से भरी इस जुनूनी भीड़ को रोकने का एक ही तरीक़ा था- उनपर गोलियां चलाना. इससे बड़ी तादाद में लोग मारे जाते. पूरा वाक़या तस्वीरों और वीडियो में क़ैद होता. ये वीडियो न सिर्फ़ पाकिस्तान बल्कि दुनिया भर में वायरल हो जाते. अगर सचमुच ऐसी कोई वारदात होती तो उसके नतीजों का अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता था. इन हालातों ने एक और लाल मस्जिद कांड के दोहराए जाने की आशंका को जन्म दे दिया. 

ग़ौरतलब है कि 2007 में पाकिस्तानी फ़ौजी कमांडो दस्ते ने इस्लामाबाद की मस्जिद में छिपकर मोर्चा जमाए इस्लामी कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ बड़ा ऑपरेशन चलाया था. इसी कार्रवाई के बाद मुशर्रफ़ की हुकूमत के बुरे दिन शुरू हो गए थे. इतना ही नहीं लाल मस्जिद कांड के बाद पाकिस्तान के जिहादी कट्टरपंथी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के झंडे तले इकट्ठा होने लगे थे. उस दिन के बाद से पाकिस्तानी राज्यसत्ता लगातार जिहादी कट्टरपंथियों के निशाने पर रही है. अतीत में लाल मस्जिद में हुए वाक़ये की तरह ही टीएलपी के मार्च में शामिल लाखों लोगों के ख़िलाफ़ बल प्रयोग के नतीजों का अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता था. टीएलपी के जुलूस में शामिल लोग ज़ाहिर तौर पर पैगंबर के सम्मान के लिए प्रदर्शन कर रहे थे. इतना ही नहीं उनका ये विरोध-प्रदर्शन पाकिस्तान के दिल पंजाब में चल रहा था. ऐसे में इस संकट को और गहरा करने को लेकर पाकिस्तानी फ़ौज की हिचक पूरी तरह से समझ में आती है.

इस सिलसिले में दूसरा विकल्प था- मार्च को बेरोकटोक इस्लामाबाद की ओर बढ़ने देना. बहरहाल इस विकल्प में इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि एक बार इस्लामाबाद पहुंच जाने के बाद भीड़ बेक़ाबू होकर वहां उत्पात मचाना शुरू नहीं कर देगी. अगर इस्लामाबाद पहुंचकर उन्मादी भीड़ कोहराम मचाने पर आमादा हो जाती तो अधिकारियों के पास बल प्रयोग के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता. ऐसे में वही सब कुछ होता जिसे वो पहले से ही टालने की कोशिश करते आ रहे थे. सदोक या वज़ीराबाद जैसे अपेक्षाकृत गुमनाम इलाक़ों में मजहबी भीड़ पर गोलियां चलाने के मुक़ाबले ऐन राजधानी इस्लामाबाद में गोलियां चलाने के नतीजे और भी भयावह होते. दूसरी ओर अगर रेंजर्स और पुलिस इन कट्टरपंथियों को बेरोकटोक उत्पात करने की इजाज़त दे देती तो इन उन्मादियों द्वारा सरेआम सार्वजनिक संपत्ति को तबाह करने या कूटनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने की तस्वीरें सामने आतीं. ऐसी तस्वीरें पाकिस्तान और उसकी फ़ौज के लिए विनाशकारी साबित होतीं. ज़ाहिर है कि ये दूसरा उपाय भी कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं होता.

अगर पाकिस्तानी राज्यसत्ता टीएलपी की बढ़ती ताक़त को कुंद करने के लिए उसका बंटवारा करने या उसकी काट में दूसरे बरेलवी मौलवियों को खड़ा करने में कामयाब हो जाए तो भी वो चरमपंथ के उस जिन्न को बोतल में बंद करने में कामयाब नहीं होगी जिसके हौसले टीएलपी से जुड़े इस पूरे वाक़ये के चलते बुलंदियों को छू रहे हैं. 

ऐसे में तीसरे और आख़िरी विकल्प के तौर पर घुटने टेकने का ही उपाय बच गया था. बुनियादी तौर पर इसका मतलब था- सभी कट्टरपंथियों की रिहाई, उनपर चल रहे मुक़दमों और पाबंदियों की वापसी, प्रतिबंधित धार्मिक संगठन से बैन वापसी और उसकी सियासी गतिविधियों पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगाना, आठ महीनों से नज़रबंदी में चल रहे उसके नेता की रिहाई और फ़्रेंच दूतावास के निष्कासन से जुड़े मसले को संसद के सामने रखना. इन मांगों को पूरा करने से सरकार को अपने लिए थोड़ी मोहलत मिलती और फ़ौरी तौर पर इस संकट से निजात पाने में कामयाबी भी मिल जाती. बेशक़ इस विकल्प से सरकार के रसूख और रुतबे पर बुरा असर पड़ना तय था. इस विकल्प के मायने यही हैं कि सरकार ने टीएलपी से हार मान ली. दुनिया में पाकिस्तान की छवि पहले से ही बदरंग है, इस तीसरे विकल्प को अपनाकर उसकी रही सही इज़्ज़त पर भी बट्टा लग गया है. दूसरी ओर टीएलपी के नज़रिए से देखें तो उसने पाकिस्तानी सरकार को सिर झुकाने पर मजबूर कर दिया. इस पूरे प्रकरण से उसको बड़ा भारी फ़ायदा पहुंचा है. उसकी ताक़त और हौसला ख़तरनाक रूप से बढ़ गए हैं. इस प्रकरण से दूसरे संगठनों और समूहों को भी साफ़ संदेश गया है- अगर वो पक्के इरादों वाली जुनूनी भीड़ इकट्ठा करने में कामयाब हो जाते हैं तो क़त्लेआम जैसे जुर्म से भी साफ़ बच निकलेंगे. ग़ौरतलब है कि टीएलपी के जुलूस में शामिल कट्टरपंथियों पर क़रीब आधा दर्ज़न पाकिस्तानी पुलिसवालों की हत्या का आरोप है. वो इस जुर्म से साफ़ बच निकले हैं और आज़ाद घूम रहे हैं. निश्चित रूप से पाकिस्तान में पुलिस के हौसले पूरी तरह से पस्त पड़ चुके हैं. पुलिसवालों को लग रहा है कि सियासी आकाओं ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया है. इतना ही नहीं उन्हें ये भी लगने लगा है कि ‘धरती के बोझ और निकम्मे’ टीएलपी समर्थक उनपर अपनी दादागीरी चलाने और धौंस जमाने में कामयाब रहे हैं.

टीएलपी के जुलूस में शामिल लोग ज़ाहिर तौर पर पैगंबर के सम्मान के लिए प्रदर्शन कर रहे थे. इतना ही नहीं उनका ये विरोध-प्रदर्शन पाकिस्तान के दिल पंजाब में चल रहा था. ऐसे में इस संकट को और गहरा करने को लेकर पाकिस्तानी फ़ौज की हिचक पूरी तरह से समझ में आती है.   

टीएलपी को तोड़ने की कोशिश

सरकार के साथ टकराव के इस ताज़ा दौर में टीएलपी साफ़ तौर से विजयी बनकर उभरी है. हालांकि आगे का रास्ता सीधा-साधा नहीं रहने वाला, ख़ासतौर से अगर सेना ने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई तो. टीएलपी के आंदोलन ने अब बहुत ख़तरनाक रूप अख़्तियार कर लिया है. निश्चित तौर पर इसको लेकर पाकिस्तानी फ़ौज की पेशानी पर बल पड़ रहे होंगे. फ़ौरी तौर पर पाकिस्तानी फ़ौज अपनी सर्वोच्चता बरकरार रखने में कामयाब रही है. हालिया घटनाओं से साफ़ है कि टीएलपी ने वास्तविक रूप से पाकिस्तान की सेना को कोई चुनौती नहीं दी है. दरअसल उसने तो सरकार के साथ हुए सौदे की कामयाबी के लिए पाकिस्तानी फ़ौज की गारंटी चाही है. इसके बावजूद फ़ौज के लिए टीएलपी का मसला दुविधा और भ्रम से भरा है. ये मजहबी संगठन फ़ौज के लिए दोधारी तलवार जैसा है. एक ओर देखें तो न केवल सरकारों पर दबाव बनाने बल्कि चुनावों के नतीजों और सरकार गठन को प्रभावित करने में टीएलपी पाकिस्तानी फ़ौज के लिए एक असरदार औज़ार साबित हो सकता है. वैसे यहां एक अहम बात पर ग़ौर करना ज़रूरी है. पाकिस्तान में राज्यसत्ता का सबसे बड़ा मध्यस्थ और हामीदार वहां की फ़ौज ही है. लिहाज़ा पाकिस्तानी सेना टीएलपी जैसे गुट, आंदोलन या पार्टी को कतई एक हद से ज़्यादा बड़ा नहीं बनने दे सकती. वो ऐसे हालात नहीं चाहेगी जिसमें ऐसे संगठन को संभालना नामुमकिन हो जाए और वो सरकार और पाकिस्तानी राज्यसत्ता को अस्थिर करने के काबिल बन जाए.

ऐसे में पाकिस्तान की फ़ौजी इंतजामिया के पास टीएलपी के पर काटने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है. ग़ौरतलब है कि पाकिस्तानी सेना को ऐसे कामों का बड़ा तजुर्बा हासिल है. उसने कभी भी किसी इस्लामिक संगठन को इतना बड़ा नहीं बनने दिया कि वो राज्यसत्ता के लिए ख़तरा पैदा करने लगे. किसी संगठन से राज्यसत्ता को ख़तरा महसूस होने के पहले ही वहां की फ़ौज उसमें दरार डालने और उसे गुटों में बांटने की जुगत में जुट जाती थी. इतना ही नहीं कई बार तो सेना ने उन संगठनों की काट में उनके बराबर के दूसरे संगठन तक खड़े करवा दिए. फिर भी अगर अतीत में कोई संगठन बड़ा होने और राज्यसत्ता और फ़ौज के सामने ख़तरा पेश करने में कामयाब हो गया तो उसे बेरहमी से कुचल दिया गया. टीएलपी के साथ भी कुछ ऐसा ही हो सकता है.

दुनिया में पाकिस्तान की छवि पहले से ही बदरंग है, इस तीसरे विकल्प को अपनाकर उसकी रही सही इज़्ज़त पर भी बट्टा लग गया है. दूसरी ओर टीएलपी के नज़रिए से देखें तो उसने पाकिस्तानी सरकार को सिर झुकाने पर मजबूर कर दिया.

वैसे तो अतीत में टीएलपी के भी तीन टुकड़े हो चुके हैं. हालांकि यहां दिक़्क़त ये है कि अशरफ़ जलाली और पीर अफ़ज़ल क़ादरी की अगुवाई वाले गुटों को कभी भी कार्यकर्ताओं की ओर से ख़ास समर्थन नसीब नहीं हो सका है. हालांकि इसका ये मतलब नहीं है कि भविष्य में इस तरह का बंटवारा लाने से जुड़ी कोशिशों को पूरी शिद्दत से आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. फ़िलवक़्त टीएलपी में साद रिज़वी का बोलबाला है. हालांकि, उसके लिए आगे की राह आसान नहीं है. अपने कुनबे को एकजुट रखते हुए संगठन को आगे बढ़ाने में उसके नेतृत्व का इम्तिहान होगा. टीएलपी के भीतर से और पूरे बरेलवी कुनबे से उसके सामने ढेरों चुनौतियां पेश आने वाली हैं. इमरान ख़ान और बरेलवी कुनबे के तक़रीबन 20 मौलवियों (इनमें से ज़्यादातर वो लोग हैं जिनका रुतबा टीएलपी के मरहूम संस्थापक ख़ादिम रिज़वी ने छीन लिया था) के बीच हुई मीटिंग शायद इसी दिशा में उठाया गया एक क़दम है. इसके अलावा भी टीएलपी को विभाजित करने को लेकर ख़ुफ़िया तौर पर कई तरह की ज़ोर आज़माइशें होंगी. हो सकता है कि इसके लिए टीएलपी के भीतर के कुछ आला नेताओं को रिझाने की भी कोशिश की जाए.

किसी संगठन से राज्यसत्ता को ख़तरा महसूस होने के पहले ही वहां की फ़ौज उसमें दरार डालने और उसे गुटों में बांटने की जुगत में जुट जाती थी. इतना ही नहीं कई बार तो सेना ने उन संगठनों की काट में उनके बराबर के दूसरे संगठन तक खड़े करवा दिए. 

हालांकि, यहां परेशानी वाली एक और बात है. अगर पाकिस्तानी राज्यसत्ता टीएलपी की बढ़ती ताक़त को कुंद करने के लिए उसका बंटवारा करने या उसकी काट में दूसरे बरेलवी मौलवियों को खड़ा करने में कामयाब हो जाए तो भी वो चरमपंथ के उस जिन्न को बोतल में बंद करने में कामयाब नहीं होगी जिसके हौसले टीएलपी से जुड़े इस पूरे वाक़ये के चलते बुलंदियों को छू रहे हैं. पुराने तजुर्बों से देखें तो ऐसे में हालात और भी बदतर होते जाएंगे. दरअसल छोटे-छोटे गुटों में बंटे ऐसे समूह अपने मूल संगठन के साथ कट्टरतावाद की होड़ शुरू कर देते हैं. वैचारिक तौर पर भी ऐसे छोटे गुट कहीं ज़्यादा अड़ियल होते हैं. लिहाज़ा टूट-फूट से टीएलपी की ताक़त भले ही कम हो जाएगी लेकिन चरमपंथी विचारधारा और मज़बूत ही होगी. दूसरे इस्लामिक संगठनों में अतीत में हुए विभाजनों से भी इसी तरह का नतीजा देखने को मिला है. इतना ही नहीं मुख्यधारा के सियासी दल चुनावी नफ़े के लिए इन चरमपंथियों के साथ सियासी सौदेबाज़ी करने लगते हैं. इससे हालात और भी बिगड़ सकते हैं. ऐसे में सौ बात की एक बात यही है कि टीएलपी जिन उसूलों की मेज़बानी करता है वो न सिर्फ़ बरकरार रहेंगे बल्कि फूलते-फलते रहेंगे.

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