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Published on Feb 25, 2026 Updated 0 Hours ago

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बहावलपुर दौरे और 27वें संशोधन के जरिए पाकिस्तान ने परमाणु कमान पर सेना का नियंत्रण और कड़ा कर दिया. जानें कि यह बदलाव भारत की रणनीति, परमाणु संतुलन और भविष्य के संकटों को किस तरह प्रभावित कर सकता है.

आसिम मुनीर का बहावलपुर दौराः क्या है संकेत?

पाकिस्तान के नवनियुक्त चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (सीडीएफ), फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने जनवरी के अंतिम सप्ताह में बहावलपुर का दौरा किया जो पिछले वर्ष मई में भारत द्वारा लक्षित स्थलों में से एक था. इस दौरे की प्रतीकात्मकता और भविष्य के संघर्षों के लिए सैन्य तैयारी पर उनके वक्तव्य भारत के विरुद्ध पाकिस्तान की तत्परता का संकेत देते हैं. नई दिल्ली की पाकिस्तान के प्रति नई कार्यप्रणाली इस्लामाबाद की असममित परमाणु मुद्रा, विशेष रूप से उसके सामरिक (टैक्टिकल) परमाणु हथियारों को कमजोर करती है. यह ‘नया सामान्य’ पूर्ववर्ती संयम से स्पष्ट विचलन को दर्शाता है. परिणामस्वरूप, बदलती सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना और नई दिल्ली के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता को पुनर्स्थापित करना पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में सैन्य वर्चस्व की पुनर्पुष्टि के लिए औचित्य और आवश्यकता दोनों बन गया है. 27वें संवैधानिक संशोधन की घोषणा ने पाकिस्तान में नागरिक सरकार पर सैन्य कमान को सुदृढ़ किया, तीनों सेनाओं के बीच आंतरिक संरचना का पुनर्गठन किया और सेना को परमाणु कमान और नियंत्रण पर एकमात्र अधिकार प्रदान किया. ये विकास परमाणु दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए गंभीर जोखिम प्रस्तुत करते हैं.

ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रतिरोधक क्षमता

भारत और पाकिस्तान के बीच नवीनतम संकट दोनों देशों के परमाणु क्षमताएँ प्राप्त करने के बाद छठा था. ऑपरेशन सिंदूर ने भारत को क्षेत्रीय प्रतिरोधक ढांचे को पुनर्परिभाषित करने और परमाणु सीमा के नीचे कार्रवाई को बढ़ाने के लिए अधिक अवसर प्रदान किया. पाकिस्तानी आकलनों ने देश की प्रतिक्रिया को ‘जिम्मेदार प्रतिरोध’का अभ्यास बताया-अर्थात् संयम बरतना, संतुलित प्रतिकार करना और संकट प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना. इन दृष्टिकोणों के अनुसार, पाकिस्तान का उद्देश्य आगे बढ़ती वृद्धि के बिना शीघ्र ही प्रतिरोधक संतुलन बहाल करना था. हालांकि, ऑपरेशन बुनयान अल-मर्सूस की शुरुआत ने इसके विपरीत संकेत दिए. वर्षों में पाकिस्तान की परमाणु मुद्रा न्यूनतम विश्वसनीय प्रतिरोध से विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध और तत्पश्चात पूर्ण-स्पेक्ट्रम प्रतिरोध तक विकसित हुई है—जिसमें सामरिक परमाणु हथियार शामिल हैं—और यह क्विड-प्रो-क्वो-प्लस (क्यूपी-क्यूपी) दृष्टिकोण द्वारा निर्देशित है. पाकिस्तान के वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री इशाक डार ने देश के “नए सामान्य” को क्यूपी-क्यूपी रणनीति बताया, जो भारत की तुलना में एक कदम आगे रहने की मंशा को दर्शाता है. वरिष्ठ अधिकारियों ने दोहराया है कि इस दृष्टिकोण ने क्षेत्रीय स्थिरता को सुदृढ़ किया है.

परिणामस्वरूप, बदलती सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना और नई दिल्ली के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता को पुनर्स्थापित करना पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में सैन्य वर्चस्व की पुनर्पुष्टि के लिए औचित्य और आवश्यकता दोनों बन गया है. 27वें संवैधानिक संशोधन की घोषणा ने पाकिस्तान में नागरिक सरकार पर सैन्य कमान को सुदृढ़ किया, तीनों सेनाओं के बीच आंतरिक संरचना का पुनर्गठन किया और सेना को परमाणु कमान और नियंत्रण पर एकमात्र अधिकार प्रदान किया.

मई संकट के बाद गैलप सर्वेक्षण में 93 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने सेना के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया, जबकि 500 से अधिक उत्तरदाताओं में से 96 प्रतिशत का मानना था कि पाकिस्तान ने संघर्ष ऑपरेशन के बाद राजनीतिक और सैन्य परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले. सेना प्रमुख को फील्ड मार्शल की उपाधि प्रदान की गई, जिससे उनकी स्थिति और प्रभाव पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो गया. इसके तुरंत बाद 27वां संवैधानिक संशोधन पारित किया गया, जिसने तीनों सेनाओं—थलसेना, नौसेना और वायुसेना—के आपसी संबंधों तथा नागरिक सरकार के साथ उनके शक्ति-संतुलन को नए सिरे से परिभाषित किया.

इस संशोधन के तहत सैन्य कमान संरचना को पहले की तुलना में अधिक केंद्रीकृत रूप दिया गया है. निर्णय लेने की प्रमुख शक्तियाँ शीर्ष स्तर पर समाहित कर दी गई हैं, जिससे अलग-अलग सेनाओं की स्वतंत्र परिचालनिक भूमिका सीमित हो गई है. विशेष रूप से नौसेना और वायुसेना की अपने-अपने अभियानों, संसाधनों के उपयोग और रणनीतिक प्राथमिकताओं पर स्वायत्तता में कटौती की गई है. अब महत्वपूर्ण रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी निर्णय एक संयुक्त और उच्च केंद्रीकृत ढांचे के माध्यम से लिए जाने की व्यवस्था की गई है.

सरकार का तर्क है कि यह कदम ‘एकीकृत कमान’ की दिशा में आवश्यक सुधार है. उसके अनुसार, बदलते सुरक्षा परिवेश और संभावित संकटों से निपटने के लिए त्वरित, समन्वित और स्पष्ट आदेश-श्रृंखला होना अत्यंत महत्वपूर्ण है. केंद्रीकरण से निर्णय प्रक्रिया में देरी कम होगी, विभिन्न सेनाओं के बीच तालमेल बेहतर होगा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में एकरूपता आएगी.

हालांकि, आलोचकों का मानना है कि अत्यधिक केंद्रीकरण से शक्ति-संतुलन प्रभावित हो सकता है. जब किसी एक स्तर पर अधिकार अधिक केंद्रित हो जाते हैं, तो अन्य सेवाओं की पेशेवर विशेषज्ञता और स्वतंत्र राय को पर्याप्त महत्व न मिलने का खतरा रहता है. इससे आंतरिक असंतोष, प्रतिस्पर्धा या विश्वास की कमी जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं. दीर्घकाल में यह सैन्य संस्थागत सामंजस्य और समन्वय के लिए चुनौती बन सकता है. इसलिए, जहाँ यह संशोधन तेज निर्णय-प्रक्रिया का दावा करता है, वहीं यह सैन्य ढांचे के भीतर नए प्रकार के तनाव और असंतुलन की संभावनाएं भी साथ लेकर आता है.  उदाहरणस्वरूप, पिछले वर्ष आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य संकट की स्थिति में निर्णय-प्रक्रिया को केंद्रीकृत करना था. यह बल पारंपरिक मिसाइल और रॉकेट प्रणालियों के संचालन के लिए उत्तरदायी है, किंतु निर्णय का अंतिम अधिकार सेना के पास ही है. ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष के पद का उन्मूलन सेना प्रमुख की शक्तियों पर संस्थागत नियंत्रण को समाप्त करता है. संशोधन से पूर्व भी, यद्यपि यह पद किसी भी सेवा से हो सकता था, 18 में से 15 अध्यक्ष सेना से रहे हैं.

पाकिस्तान की परमाणु नीति में बदलाव

पाकिस्तान ने द्वितीय प्रहार क्षमता सुनिश्चित करने और सामरिक परमाणु हथियारों के उपयोग के बाद की प्रतिक्रिया को सुदृढ़ करने हेतु एक मजबूत परमाणु त्रयी विकसित करने पर बल दिया है. अमेरिकी रक्षा खुफिया एजेंसी (डीआईए) के आकलन के अनुसार, पाकिस्तान भारत की पारंपरिक सैन्य बढ़त की भरपाई के लिए अधिक सामरिक परमाणु हथियारों का विकास जारी रखेगा. इन हथियारों की संख्या पाकिस्तान को संयम बरतने का आत्मविश्वास देती है. हालांकि, प्रथम-उपयोग सिद्धांत के ‘कब, कहाँ और कैसे’ के स्पष्ट मानदंडों का अभाव बना हुआ है. इस अस्पष्टता ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत को पारंपरिक सैन्य प्रतिक्रिया की नई कार्यप्रणाली स्थापित करने का अवसर दिया.

दीर्घकाल में यह सैन्य संस्थागत सामंजस्य और समन्वय के लिए चुनौती बन सकता है. इसलिए, जहाँ यह संशोधन तेज निर्णय-प्रक्रिया का दावा करता है, वहीं यह सैन्य ढांचे के भीतर नए प्रकार के तनाव और असंतुलन की संभावनाएं भी साथ लेकर आता है.

27वें संशोधन से पूर्व, राष्ट्रीय कमान प्राधिकरण (एनसीए) के अंतर्गत एम्प्लॉयमेंट कंट्रोल कमेटी (ईसीसी) प्रमुख निर्णयकारी निकाय थी, जिसमें नागरिक पर्यवेक्षण के तहत रणनीतिक बल कमानों को आदेश और प्राधिकरण कोड प्रेषित किए जाते थे. तीन-स्तरीय संरचना के बावजूद, यह प्रश्न बना रहा कि क्या “कड़ा और विशिष्ट नागरिक नियंत्रण” सदैव सुनिश्चित था.

चित्र 1: 27वें संशोधन से पहले पाकिस्तान का राष्ट्रीय कमान प्राधिकरण (एनसीए)

Pakistan Nuclear Command And Control Post Operation Sindoor

Source: Tahir Mahmood Azad & Karl Dewey

27वें संशोधन के बाद एनसीए-आधारित ढांचे को राष्ट्रीय रणनीतिक कमान (एनएससी) में परिवर्तित कर दिया गया, जिससे परमाणु उपयोग पर नागरिक निगरानी कम हो गई. जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष का पद समाप्त कर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज को अधिकार दिए गए, जिससे सैन्य और नागरिक प्राधिकरणों के बीच संतुलनकारी कड़ी समाप्त हो गई. नई संरचना में सेना का प्रभुत्व अधिक स्पष्ट है. सीडीएफ, जो सेना प्रमुख भी हैं, निर्णय-प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. एनएससी के कमांडर की नियुक्ति भी प्रधानमंत्री द्वारा सेना प्रमुख की अनुशंसा पर होती है. इस प्रकार, सेना को परिचालनिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर परमाणु हथियारों पर अधिकार प्राप्त है.

पाकिस्तान से जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए अपनी परमाणु नीति की दोबारा समीक्षा करनी चाहिए और जरूरत हो तो नया ढांचा तैयार करना चाहिए. तीसरा, देश की वायु रक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाना चाहिए ताकि किसी भी हमले को रोका जा सके.

ऐसी स्थिति में पाकिस्तान की असममित परमाणु मुद्रा की पहली पंक्ति—सामरिक परमाणु हथियार—प्रमुख हो जाएंगे. पाकिस्तान सेना पहले से ही अधिकांश परमाणु वितरण प्रणालियों और स्ट्रैटेजिक प्लान्स डिवीजन पर नियंत्रण रखती है. वायु और नौसेना घटकों की तर्कसंगत गणनाओं को किस हद तक शामिल किया जाता है, यह अस्पष्ट है. इससे संकट-प्रवण वातावरण उत्पन्न होता है और परमाणु संयम कमजोर पड़ सकता है. संरचनात्मक परिवर्तन 2010 के एनसीए अधिनियम के साथ कानूनी असंगति भी उत्पन्न करते हैं, जिससे भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों में अस्पष्टता बढ़ती है.

भारत के लिए निहितार्थ

पाकिस्तान के नागरिक.सैन्य संबंधों के ऐतिहासिक अनुभव को देखते हुए यह आशंका पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती कि मौजूदा बदलाव भविष्य में अस्थिरता को जन्म दें. परमाणु हथियारों पर सैन्य नियंत्रण का बढ़ता एकीकरण संयम, जवाबदेही और संतुलित निर्णय-प्रक्रिया जैसे सिद्धांतों के लिए प्रतिगामी माना जा सकता है. जब निर्णय लेने की शक्ति अधिक केंद्रीकृत या सैन्य-प्रधान हो जाती है, तो प्रारंभिक परमाणु दबाव बनाने या संकट के समय जल्दबाज़ी में प्रतिक्रिया देने का जोखिम बढ़ सकता है. इससे अनपेक्षित वृद्धि (एस्केलेशन) की संभावना भी अधिक हो जाती है.

परिचालनिक स्तर पर यह व्यवस्था तथाकथित ‘नकारात्मक नियंत्रण’ को सक्षम बना सकती है, जिसमें युद्धक्षेत्र कमांडरों को सीमित परिस्थितियों में अधिक स्वायत्तता मिलती है. विशेष रूप से छोटे युद्धक्षेत्र परमाणु आयुध, जैसे परमाणु तोपखाना या सामरिक मिसाइलें, तेज़ी से तैनात किए जा सकते हैं और वास्तविक समय की निगरानी से बचने की कोशिश कर सकते हैं. ऐसी स्थिति क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है.

इस स्थिति में भारत को कुछ जरूरी कदमों पर ध्यान देना चाहिए. पहला, अलग-अलग संभावित संकटों को ध्यान में रखकर पहले से तैयारी और आकलन करना चाहिए. दूसरा, पाकिस्तान से जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए अपनी परमाणु नीति की दोबारा समीक्षा करनी चाहिए और जरूरत हो तो नया ढांचा तैयार करना चाहिए. तीसरा, देश की वायु रक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाना चाहिए ताकि किसी भी हमले को रोका जा सके. चौथा, खुफिया, निगरानी और जानकारी जुटाने की क्षमता बढ़ानी चाहिए. पाँचवाँ, जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूत लेकिन गैर-परमाणु हथियार विकल्प तैयार रखने चाहिए, ताकि संकट में कई विकल्प मौजूद रहें.


राहुल रावत, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के तहत रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा विभाग में अनुसंधान सहायक हैं.

शिवम शेखावत, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सामरिक अध्ययन कार्यक्रम में कनिष्ठ फेलो हैं.

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Authors

Rahul Rawat

Rahul Rawat

Rahul Rawat is a Research Assistant with ORF’s Strategic Studies Programme (SSP). He also coordinates the SSP activities. His work focuses on strategic issues in the ...

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Shivam Shekhawat

Shivam Shekhawat

Shivam Shekhawat is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. Her research focuses primarily on India’s neighbourhood- particularly tracking the security, political and economic ...

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