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Published on May 08, 2026 Updated 3 Days ago

भविष्य की महामारी में सभी देशों को वैक्सीन और दवाएं बराबरी से मिलें, इसके लिए PABS प्रणाली में साफ और समान नियम जरूरी हैं. भारत जैसे देश चाहते हैं कि जानकारी साझा करने के साथ लाभ बाँटने और जवाबदेही की गारंटी भी पहले से तय हो, जानिए पूरा मामला.

PABS पर दुनिया में क्यों बढ़ा विवाद?

WHO महामारी समझौते के तहत रोगजनक पहुँच और लाभ-साझेदारी (प्रणाली पर चल रही वार्ताएँ एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई हैं. लगभग चार वर्षों की बातचीत - जिनमें तीन वर्ष PA को अपनाने से पहले और एक वर्ष उसके बाद शामिल हैं - के बावजूद पहुँच, लाभ-साझेदारी, जवाबदेही, पारदर्शिता, शासन व्यवस्था और कानूनी स्पष्टता जैसे मुख्य मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी है. PABS प्रणाली को एक बहुपक्षीय तंत्र के रूप में देखा गया है, जिसका उद्देश्य अनुसंधान और विकास के लिए महामारी की संभावना वाले रोगजनकों तथा उनसे प्राप्त अनुक्रम जानकारी तक पहुँच आसान बनाना है. साथ ही, इस अनुसंधान से मिलने वाले लाभों - विशेष रूप से वैक्सीन, उपचार और निदान (VTDs) तक समान पहुंच - को न्यायसंगत तरीके से साझा करना भी इसका लक्ष्य है.

PA के अनुच्छेद 12 में बनी सहमति के आधार पर, इस प्रणाली के संचालन संबंधी पहलुओं को एक परिशिष्ट (Annex) में विकसित किया जाना था. इसी उद्देश्य से एक अंतर-सरकारी कार्य समूह (IGWG) को इन व्यवस्थाओं को तैयार करने का दायित्व दिया गया. समझौते के अध्याय-III के अनुसार, Annex को अपनाए जाने के बाद ही PA को हस्ताक्षर और अनुमोदन के लिए खोला जा सकता है. इसके बावजूद, वर्तमान वार्ताएँ अनुच्छेद 12 की भावना से अलग दिशा में जा रही हैं, जिससे समान लाभ-साझेदारी और प्रभावी महामारी रोकथाम, तैयारी तथा प्रतिक्रिया दोनों खतरे में पड़ सकते हैं.

मार्च 2026 में IGWG की छठी बैठक के अंत में कुछ विकसित देशों ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए PABS के लिए दो-पटरी का प्रस्ताव रखा. पिछले सप्ताह यूरोपीय संघ ने इसी प्रस्ताव को ‘ब्लेंडेड मॉडल‘ नाम दिया. इस मॉडल के तहत एक व्यवस्था में रोगजनकों और अनुक्रम जानकारी का बिना किसी शर्त के आदान-प्रदान संभव होगा, जबकि दूसरी व्यवस्था में उपयोगकर्ता पंजीकरण और अनुबंध के माध्यम से लाभ-साझेदारी की शर्तें लागू होंगी.

PABS प्रणाली को एक बहुपक्षीय तंत्र के रूप में देखा गया है, जिसका उद्देश्य अनुसंधान और विकास के लिए महामारी की संभावना वाले रोगजनकों तथा उनसे प्राप्त अनुक्रम जानकारी तक पहुँच आसान बनाना है. साथ ही, इस अनुसंधान से मिलने वाले लाभों - विशेष रूप से वैक्सीन, उपचार और निदान तक समान पहुंच, को न्यायसंगत तरीके से साझा करना भी इसका लक्ष्य है.

यह व्यवस्था अनुच्छेद 12 के अनुरूप नहीं मानी जा रही, क्योंकि इससे न तो पहुँच की कानूनी निश्चितता मिलती है और न ही लाभ-साझेदारी की गारंटी. अब जबकि वार्ताओं को विश्व स्वास्थ्य सभा के 79वें सत्र के बाद भी जारी रखने पर सहमति बन चुकी है, आगे के निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे. अंतिम परिणाम यह तय करेगा कि PABS वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में समानता को बढ़ावा देगा या फिर बिना जवाबदेही वाली पहुँच और अनिश्चित लाभों वाली व्यवस्था बनाकर मौजूदा असमानताओं को और गहरा करेगा.

कानूनी स्पष्टता से दूरी

जब PA को अपनाया गया था, तब सदस्य देशों ने PABS प्रणाली को एक बहुपक्षीय (अनुच्छेद 12, पैरा 1) और प्रभावी रूप से लागू होने वाली व्यवस्था (अनुच्छेद 12, पैरा 2) के रूप में कल्पित किया था. साथ ही, रोगजनकों और अनुक्रम जानकारी तक पहुँच तथा उससे मिलने वाले लाभों के बंटवारे को लेकर कानूनी स्पष्टता (अनुच्छेद 12, पैरा 5) सुनिश्चित करने की भी बात कही गई थी. लेकिन वर्तमान वार्ताएँ इस मूल समझ से दूर जाती दिखाई दे रही हैं. प्रणाली के संचालन संबंधी पहलुओं को अंतिम रूप देने के बजाय, लाभ-साझेदारी की बाध्यताओं और अनुबंधीय शर्तों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को भविष्य की प्रक्रियाओं पर टालने की कोशिशें बढ़ रही हैं. IGWG ब्यूरो ने 16 मार्च 2026 को सदस्य देशों और हितधारकों के बीच इसी दिशा में एक प्रारूप प्रस्ताव भी प्रसारित किया था.

यह बदलाव साफ और समान नियमों वाली बहुपक्षीय व्यवस्था को कमजोर कर रहा है. विकसित देश चाहते हैं कि लाभ-साझेदारी के फैसले WHO और संसाधनों का उपयोग करने वाले देशों के बीच अलग-अलग समझौतों से तय हों. इससे सभी देशों को बराबर लाभ मिलने की गारंटी खत्म हो सकती है. साथ ही, निर्णय लेने की शक्ति देशों से हटकर WHO सचिवालय के पास चली जाएगी. इससे PABS प्रणाली का मूल उद्देश्य - समानता, पारदर्शिता और भरोसेमंद सहयोग - कमजोर पड़ सकता है.

PABS में नियमों की लड़ाई तेज  

PABS वार्ता में सबसे बड़ा विवाद यह है कि लाभ कब और कैसे साझा किए जाएँ. विकासशील देश चाहते हैं कि जैविक संसाधनों का उपयोग शुरू करने से पहले ही लाभ बांटने के नियम तय हों. वहीं, विकसित देश चाहते हैं कि लाभ-साझेदारी पर फैसला बाद में, यानी उत्पाद बाजार में आने के समय किया जाए.  नॉर्वे ने IGWG की शुरुआती बैठक में इसी प्रकार का संकेत दिया था. इसका अर्थ यह होगा कि जैविक संसाधन और जानकारी तो स्वतंत्र रूप से साझा होंगे, लेकिन लाभ-साझेदारी अनिश्चित बनी रहेगी.

‘ओपन साइंस’ के नाम पर लाभ-साझेदारी को कमजोर करने से तकनीक, ज्ञान और शोध सहयोग जैसे महत्वपूर्ण गैर-आर्थिक फायदे कम हो जाते हैं, जिससे स्थानीय विज्ञान और उद्योग कमजोर पड़ते हैं. लाभ-साझेदारी को केवल वित्तीय योगदान तक सीमित करने की ऐसी प्रवृत्ति WHO, खाद्य एवं कृषि संगठन और जैव विविधता सम्मेलन जैसी संस्थाओं की प्रक्रियाओं में भी दिखाई दी है.

यह व्यवस्था सही नहीं मानी जाती, क्योंकि अगर शुरुआत में लाभ साझा करने का स्पष्ट वादा नहीं होगा, तो बाद में कोई देश या कंपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार नहीं होगी. संसाधनों तक पहुँच देने के समय ही विकासशील देशों और WHO की बातचीत की ताकत सबसे ज्यादा होती है. ‘ओपन साइंस’ के नाम पर लाभ-साझेदारी को कमजोर करने से तकनीक, ज्ञान और शोध सहयोग जैसे महत्वपूर्ण गैर-आर्थिक फायदे कम हो जाते हैं, जिससे स्थानीय विज्ञान और उद्योग कमजोर पड़ते हैं. लाभ-साझेदारी को केवल वित्तीय योगदान तक सीमित करने की ऐसी प्रवृत्ति WHO, खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और जैव विविधता सम्मेलन जैसी संस्थाओं की प्रक्रियाओं में भी दिखाई दी है. Cali Fund और बीज संधि के अनुभव बताते हैं कि जहाँ अनुबंध कमजोर होते हैं या ठीक से लागू नहीं होते, वहाँ लाभों का प्रवाह बहुत सीमित रह जाता है.

महामारी में बराबरी की लड़ाई क्यों अहम?  

अगर शुरुआत में लाभ बांटने के नियम तय नहीं होंगे, तो बाद में कंपनियां जिम्मेदारी लेने से बच सकती हैं. ‘ओपन साइंस’ के नाम पर तकनीक, ज्ञान और शोध सहयोग कम होने से विकासशील देशों का स्थानीय विज्ञान और उद्योग कमजोर पड़ सकता है. लेकिन PABS परिशिष्ट (Annex) की वार्ताओं में बीमारी फैलने के शुरुआती चरणों, जैसे अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति के दौरान ऐसे लाभ सुनिश्चित करने पर सहमति नहीं बन पाई है, जबकि अनुच्छेद 12 के पैरा 7 और 8 में इन लाभों को शामिल करने की बात कही गई थी. महामारी और PHEICs को रोकने के लिए VTDs तक शुरुआती पहुंच आवश्यक है, न कि देर से वितरण.

जिस सोच ने दुनिया को महामारी समझौते पर बातचीत के लिए एकजुट किया था, वह यह थी कि यदि भविष्य में कोई नई महामारी फैले, तो विकासशील देशों को जीवनरक्षक चिकित्सा उत्पादों तक पहुँच से वंचित न रहना पड़े. अगर बीमारी की शुरुआत में वैक्सीन और दवाएँ समय पर नहीं मिलेंगी, तो महामारी रोकना मुश्किल होगा. साथ ही, तकनीक और ज्ञान साझा न होने से विकासशील देशों की तैयारी कमजोर बनी रहेगी.

हाल ही में जिनेवा में हुई IGWG बैठक में यूरोपीय संघ (EU) ने PHEICs के दौरान उपयोग के लिए VTDs अलग रखने के विचार पर विचार करने की इच्छा जताई, जबकि पहले वह इसका विरोध कर रहा था. हालांकि, स्विट्जरलैंड, यूनाइटेड किंगडम और जापान अब भी किसी निश्चित प्रतिशत तय करने के खिलाफ हैं. अफ्रीका समूह और अन्य विकासशील देशों ने EU के बदले रुख का स्वागत किया, लेकिन यह भी कहा कि इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब EU पहुँच और लाभ-साझेदारी को अलग करने वाले अपने प्रस्ताव को वापस लेगा.

ओपन एक्सेस का भ्रम- ‘पंजीकृत पहुँच’ बनाम ‘गुमनाम पहुँच’

सबसे विवादित मुद्दों में से एक ‘ओपन एक्सेस’ का अर्थ है. विकसित देशों और कुछ वैज्ञानिक नेटवर्क के लिए ओपन एक्सेस का मतलब है बाहरी डेटाबेस के माध्यम से अनुक्रम जानकारी तक ‘मुफ्त और बिना प्रतिबंध (गुमनाम) पहुँच’, चाहे शोधकर्ताओं को समान पहुँच मिले या नहीं. लेकिन विकासशील देशों के लिए ओपन एक्सेस का अर्थ है वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को ‘बिना भेदभाव’ के सुनिश्चित पहुँच देना, ताकि उससे ‘सामूहिक लाभ’ पैदा हो सके. यह विचार 2021 की यूनेस्को ओपन साइंस की सिफारिश में भी व्यक्त किया गया है.

एक रास्ता ऐसी व्यवस्था की ओर जाता है जो VTDs तक समान पहुँच सुनिश्चित करे, वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल की तैयारी को मजबूत बनाए और महामारी व PHEICs के जोखिम को कम करें. दूसरा रास्ता लाभ-साझेदारी को टालता है, इस व्यवस्था में विकासशील देशों के संसाधनों का उपयोग तो होगा, लेकिन महामारी से निपटने की ताकत विकसित देशों तक सीमित रह सकती है.

विकासशील देश चाहते हैं कि PABS डेटाबेस जवाबदेह रहें, ताकि जानकारी का सही उपयोग हो और लाभ-साझेदारी सुनिश्चित की जा सके. इसके लिए पंजीकरण, पहचान जाँच और डेटा उपयोग नियम जरूरी माने जा रहे हैं.  GISAID (सभी इन्फ्लुएंजा डेटा साझा करने पर वैश्विक पहल) के बढ़ते उपयोग से यह स्पष्ट हुआ है कि उपयोगकर्ता पंजीकरण और निगरानी उपाय शोध को धीमा नहीं करते, बल्कि डेटा साझा करने की गति और भरोसे दोनों को बढ़ा सकते हैं, भले ही उसकी शासन व्यवस्था को लेकर आलोचनाएँ जारी हो.

इन आलोचनाओं और अन्य अनुक्रम डेटाबेस से जुड़ी चिंताओं से यह भी स्पष्ट होता है कि बहुपक्षीय जवाबदेही तंत्र की आवश्यकता है. गुमनाम और पंजीकृत दोनों प्रकार की पहुँच को स्वीकार करने वाली व्यवस्था जैव विविधता सम्मेलन (CBD) के उद्देश्यों को भी कमजोर करती है, क्योंकि CBD यह सुनिश्चित करने की बात करता है कि आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच में सभी अधिकारों को ध्यान में रखा जाए.

विकल्प: तैयारी या टालमटोल  

PABS वार्ताएँ दुनिया के सामने एक स्पष्ट विकल्प रखती हैं. एक रास्ता ऐसी व्यवस्था की ओर जाता है जो VTDs तक समान पहुँच सुनिश्चित करे, वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल की तैयारी को मजबूत बनाए और महामारी व PHEICs के जोखिम को कम करें. दूसरा रास्ता लाभ-साझेदारी को टालता है, इस व्यवस्था में विकासशील देशों के संसाधनों का उपयोग तो होगा, लेकिन महामारी से निपटने की ताकत विकसित देशों तक सीमित रह सकती है. भारत जैसे देशों के लिए जरूरी है कि दवाओं, तकनीक और शोध तक बराबर पहुँच मिले. इसके लिए PABS प्रणाली में साफ नियम, निगरानी और जवाबदेही होना आवश्यक है.


नितिन रामकृष्ण थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क में एक वरिष्ठ शोधकर्ता हैं.
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Nithin Ramakrishan

Nithin Ramakrishan

Nithin Ramakrishan is a postgraduate in international law, currently working with Third World Network as a Senior Researcher. He observes negotiations on access to genetic ...

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