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Published on Sep 04, 2025 Updated 0 Hours ago

करोड़ों लोगों को सेवा प्रदान करने और पहले एवं आख़िरी मील की महत्वपूर्ण दूरी को भरने के बावजूद भारत का पैराट्रांज़िट सेक्टर अनौपचारिक, नियमों के पालन में पीछे और मुख्यधारा की शहरी आवागमन की योजना से अलग बना हुआ है.

भारत का पैराट्रांज़िट: अनदेखा क्षेत्र जिसे सुधार की सबसे अधिक ज़रूरत है

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दुनिया के कुल ऑटो-रिक्शाओं में से तीन-चौथाई भारत में हैं. इन्हें आम तौर पर पैराट्रांज़िट या मध्यवर्ती सार्वजनिक परिवहन (IPT) कहा जाता है. इस सेक्टर में यात्री सेवा के हिसाब से तैयार दो-पहिया गाड़ियों से लेकर 30 सीट तक की क्षमता वाली मिनीबस शामिल हैं. 

भारत में पैराट्रांज़िट सेवाएं मुख्यत: अनौपचारिक और स्वतंत्र रूप से काम करती हैं जो न्यूनतम कानूनी दायरे में लचीले परिवहन विकल्प प्रदान करती हैं. ये सेवाएं शहरी गतिशीलता के लिए आवश्यक होती हैं, प्रभावी रूप से पहले और आख़िरी मील के संपर्क को जोड़ती हैं जिसे औपचारिक सार्वजनिक परिवहन के नेटवर्क ने छोड़ रखा है.  

दुनिया के कुल ऑटो-रिक्शाओं में से तीन-चौथाई भारत में हैं. इन्हें आम तौर पर पैराट्रांज़िट या मध्यवर्ती सार्वजनिक परिवहन (IPT) कहा जाता है.

उनके महत्व के बावजूद केंद्र और राज्यों के स्तर पर सरकारी काम-काज में पैराट्रांज़िट को औपचारिक शहरी परिवहन प्रणाली से जोड़ने में नाकामी मिली है. इन सेवाओं की औपचारिक और नियमों से दूर प्रकृति का परिणाम अक्सर यात्रियों के लिए घटिया सेवा के रूप में निकलता है. वैसे राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति (NUTP) पैराट्रांज़िट की भूमिका को स्वीकार तो करती है लेकिन औपचारिक रूप से इसके समावेशन के लिए कार्यान्वयन के योग्य रणनीतियां सीमित हैं. 

भारत के शहरों में पैराट्रांज़िट का दबदबा

भारतीय शहरों में शहरी गतिशीलता की मांग को पूरा करने में पैराट्रांज़िट एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. कुल वाहनों में सीमित हिस्सेदारी होने के बावजूद सवारी ढोने में इसका हिस्सा महत्वपूर्ण है. उदाहरण के लिए, जयपुर और अमृतसर जैसे शहरों में कुल रजिस्टर्ड वाहनों में पैराट्रांज़िट वाहनों का हिस्सा केवल 2 प्रतिशत है लेकिन कुल यात्राओं का लगभग 20-25 प्रतिशत इन्हीं वाहनों के द्वारा पूरा किया जाता है. इसी तरह लखनऊ और गुवाहाटी में यात्राओं में पैराट्रांज़िट का हिस्सा क्रमश: 17 प्रतिशत और 15 प्रतिशत होने का अनुमान है. मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में काम-काज से जुड़ी यात्रा में मध्यवर्ती सार्वजनिक परिवहन (IPT) का हिस्सा 1.5 प्रतिशत और 5 प्रतिशत के बीच है. 

टियर 2 और टियर 3 शहरों, जहां औपचारिक सार्वजनिक परिवहन प्रणाली अपर्याप्त हैं, में पैराट्रांज़िट अक्सर परिवहन के प्राथमिक साधन के रूप में उभरते हैं. 2021 में भारत में सड़कों पर चल रहे 15 लाख ई-रिक्शा में से केवल 1,50,000 पंजीकृत थे जो उनके नियमों के दायरे में रहने और निगरानी में आने के संबंध में गंभीर चिंताओं को उजागर करते हैं. ये स्थिति इन्हें औपचारिक परिवहन में शामिल करने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है ताकि सुरक्षा, सेवा की गुणवत्ता और शहरी गतिशीलता प्रणाली में प्रभावी रूप से एकीकृत करने को सुनिश्चित किया जा सके.  

भारत में IPT को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: i) अनुबंधित परिवहन (कॉन्ट्रैक्ट कैरेज) जो यात्रियों की मांग के अनुसार लचीले पिक-अप और ड्रॉप-ऑफ की सुविधा प्रदान करता है और ii) अनौपचारिक सार्वजनिक परिवहन जो क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) के द्वारा निर्धारित निश्चित रूट पर संचालित होता है. इन सेवाओं के लिए जारी किए जाने वाले परमिट को खुले परमिट और बंद परमिट में बांटा गया है. खुले परमिट के तहत बिना किसी प्रतिबंध के पूरे शहर में गाड़ियां चलती हैं और बंद परमिट में शहर के भीतर विशेष क्षेत्रों में गाड़ियां चलती हैं. ध्यान देने की बात है कि ई-रिक्शा के लिए परमिट जारी करने की कोई सीमा नहीं है और इनका हर पांच साल में नवीनीकरण किया जाता है. 

खंडित रेगुलेशन और चूके हुए अवसर

भारत में राज्यों के स्तर पर पैराट्रांज़िट नीतियां काफी अलग-अलग हैं. हर RTO स्थानीय ट्रैफिक, सुरक्षा और शहरी परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग नियमों को लागू करता है. लेकिन RTO की व्यापक ज़िम्मेदारियों के भीतर पैराट्रांज़िट को अक्सर कम प्राथमिकता दी जाती है जिसकी वजह से सेवा की गुणवत्ता, गाड़ियों की फिटनेस और यात्रियों की सुरक्षा मानकों में गंभीर कमियां उत्पन्न होती हैं. नियमों को लागू करने के मामले में इस उपेक्षा ने लोगों और नीति निर्माताओं- दोनों के बीच पैराट्रांज़िट को लेकर नकारात्मक सोच में योगदान दिया है. 

 जयपुर और अमृतसर जैसे शहरों में कुल रजिस्टर्ड वाहनों में पैराट्रांज़िट वाहनों का हिस्सा केवल 2 प्रतिशत है लेकिन कुल यात्राओं का लगभग 20-25 प्रतिशत इन्हीं वाहनों के द्वारा पूरा किया जाता है.

लगभग 22,000 IPT चालकों के देशव्यापी सर्वे से पता चला कि कई चालक यात्रियों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा करते हैं और अपनी घटती आय और यात्रियों की संख्या के लिए वे अक्सर औपचारिक सार्वजनिक परिवहन साधनों को दोषी ठहराते हैं. इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न वित्तीय तनाव उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करता है और आवश्यक सेवाओं तक उनकी पहुंच को सीमित करता है क्योंकि औपचारिक वित्तीय सुरक्षा या सामाजिक सुरक्षा के तौर-तरीकों तक उनकी पहुंच नहीं है. 

अहमदाबाद और चेन्नई जैसे शहरों में पैराट्रांज़िट के साधन सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की सहायता करने के बदले उनके साथ सीधे मुकाबला करते हैं. ये समानांतर परिचालन शहरी भीड़-भाड़ और प्रदूषण को बढ़ाता है, एकीकृत, टिकाऊ गतिशीलता का इकोसिस्टम बनाने के प्रयासों को कमज़ोर करता है. वैसे तो भारत सक्रिय रूप से पैराट्रांज़िट के बेड़े को इलेक्ट्रिक बनाने को बढ़ावा दे रहा है लेकिन इसके बावजूद सूरत, पुणे और राजकोट जैसे शहर अभी भी पारंपरिक CNG से चलने वाले ऑटो-रिक्शा पर काफी हद तक निर्भर हैं. पैराट्रांज़िट को सुगम मल्टीमॉडल नेटवर्क में जोड़े बिना केवल इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर ज़ोर देने से ही भीड़भाड़ या उपलब्धता संबंधी चुनौतियों का समाधान नहीं होगा. 

इसके अलावा, एकीकृत नियामक रूप-रेखा का अभाव पैराट्रांज़िट को समर्पित पार्किंग, ई-रिक्शा के लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और चालकों के लिए लक्षित सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं जैसे ज़रूरी बुनियादी ढांचे के प्रावधानों से अलग करता है. वैसे तो ऑनलाइन टैक्सी कंपनियों के लिए औपचारिक नियम मौजूद हैं लेकिन ऑफलाइन पैराट्रांज़िट परिचालकों  के सामने उस तरह की स्पष्टता और एकरूपता का अभाव है जो अलग-अलग राज्यों में एक विखंडित और असमान नियामक माहौल तैयार करता है.  

टिकाऊ शहरी आवागमन के लिए एकीकृत पैराट्रांज़िट

एक समावेशी, कुशल और टिकाऊ शहरी गतिशीलता का इकोसिस्टम तैयार करने के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं:

स्थानीय सहकारी समितियों का गठन करें: पैराट्रांज़िट यूनियन को एक संस्थागत रूप-रेखा के तहत परिचालकों को एकजुट करने के लिए स्थानीय स्तर पर सहकारी समितियों की स्थापना करनी चाहिए. ऐसे संगठन उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मज़बूत करेंगे, चालकों एवं परिचालकों को सशक्त बनाएंगे और व्यापक परिवहन के नेटवर्क के भीतर बेहतर काम-काजी हालात एवं एकीकरण के लिए सामूहिक बातचीत को सक्षम बनाएंगे. 

सार्वजनिक परिवहन से जोड़ें: पैराट्रांज़िट परिचालकों को रूट की योजना, भीड़भाड़ के प्रबंधन और सेवा की गुणवत्ता में सुधार से जोड़कर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में औपचारिक रूप से एकीकृत किया जाना चाहिए. उनकी सक्रिय भागीदारी पहले और अंतिम मील के संपर्क को बेहतर बनाएगी, सेवा की कार्यकुशलता में सुधार करेगी और प्रभावी रूप से यात्रियों की आवश्यकताओं का समाधान करेगी. 

सार्वजनिक परिवहन प्राधिकरण (PTA) स्थापित करें: PTA की स्थापना शहरी गतिशीलता की एकीकृत शासन व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है. PTA नीति निर्माण की देखरेख कर सकते हैं, सेवा का मानक तय कर सकते हैं, एकीकृत परिवहन योजना बना सकते हैं और संचालकों के साथ अनुबंध का प्रबंधन कर सकते हैं जिससे कार्यकुशलता, जवाबदेही और निर्बाध मल्टीमॉडल एकीकरण सुनिश्चित हो.  

भारत में पैराट्रांज़िट शहरी गतिशीलता की अदृश्य रीढ़ की हड्डी है. फिर भी इसकी अनौपचारिक स्थिति, खंडित नियमन और व्यवस्थागत उपेक्षा ने इसे शहरी परिवहन से जुड़ी बातचीत में हाशिए पर धकेला दिया है. 

चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय समर्थन में निवेश करें: शहरों को इलेक्ट्रिक पैराट्रांज़िट गाड़ियों के लिए चार्जिंग की सुविधाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि स्वच्छ गतिशीलता की तरफ बदलाव का समर्थन किया जा सके. उन्हें वित्तीय सहायता के तौर-तरीकों को भी संस्थागत रूप देना चाहिए ताकि चालकों के कल्याण में सुधार किया जा सके और ई-गाड़ियों को अपनाने को प्रोत्साहित किया जा सके. 

स्थानीय रूप से संवेदनशील नीतियां अपनाएं: नीतियों और नियमों को स्थानीय संदर्भों की अच्छी समझ के साथ बनाना चाहिए. इनमें ज़मीन के उपयोग का पैटर्न, यात्रा की कार्यकुशलता, यात्रियों की संख्या और पार्किंग शामिल हैं. शहर के प्रशासन को संदर्भ विशेष समाधान लागू करने के लिए सशक्त बनाने से नीति की प्रभावशीलता और लोगों की स्वीकार्यता सुनिश्चित होगी. 

सही ढंग से रूट बनाएं: रूट तैयार करने के काम में पैराट्रांज़िट परिचालकों को शामिल किया जाना चाहिए ताकि परिचालन की कार्यकुशलता में सुधार किया जा सके, ज़रूरत से ज़्यादा गाड़ियों को कम किया जा सके, गाड़ियों का उपयोग ठीक किया जा सके और यात्रियों के लिए सेवा की गुणवत्ता बढ़ाई जा सके. उनका व्यावहारिक ज्ञान अधिक यथार्थवादी और उपयोग करने वाले के हिसाब से बेहतर रूट तैयार करने में सहायता करेगा. 

सर्वश्रेष्ठ पद्धतियों से सीखें: चेन्नई की एकीकृत महानगर परिवहन प्राधिकरण (CUMTA) एकमात्र शहरी एजेंसी है जिसने अपनी गतिशीलता की योजना में औपचारिक रूप से पैराट्रांज़िट को जोड़ा है. भुवनेश्वर के राजधानी क्षेत्रीय शहरी परिवहन (CRUT) ने 2018 में अंतिम मील के संपर्क के लिए ई-रिक्शा की शुरुआत की. हैदराबाद, दिल्ली और कोच्चि में मेट्रो रेल सिस्टम मल्टीमॉडल एकीकरण की सुविधा के लिए ई-रिक्शा को परमिट प्रदान करते हैं. कोच्चि की एर्नाकुलम ज़िला ऑटो-रिक्शा ड्राइवर सहकारी समिति (EJADCS) लीज़ पर चालकों को ई-ऑटो देती है जिसे जर्मन एजेंसी फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (GIZ) और UN-हैबिटेट का समर्थन प्राप्त है. इससे आय के अवसर उत्पन्न होते हैं और टिकाऊ परिवहन को बढ़ावा मिलता है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जकार्ता ने सफलतापूर्वक अपनी 60 प्रतिशत पैराट्रांज़िट मिनीबसों को औपचारिक रूप दिया है. इसका नाम माइक्रोट्रांस रखा गया है जो आराम, सुरक्षा और एकीकृत किराया प्रणाली की सुविधा प्रदान करती है. ये एकीकरण, जिसे रणनीतिक रूप से सार्वजनिक भागीदारों को जोड़कर और परिदृश्य की योजना बनाकर प्राप्त किया गया है, यात्रियों के लिए निर्बाध, सस्ती और मल्टीमॉडल यात्रा की सुविधा प्रदान करता है.  

पैराट्रांज़िट को औपचारिक रूप देकर और इसे परिवहन योजना की मुख्यधारा में जोड़कर भारत इस क्षेत्र की वास्तविक क्षमता को उजागर कर सकता है, 

भारत में पैराट्रांज़िट शहरी गतिशीलता की अदृश्य रीढ़ की हड्डी है. फिर भी इसकी अनौपचारिक स्थिति, खंडित नियमन और व्यवस्थागत उपेक्षा ने इसे शहरी परिवहन से जुड़ी बातचीत में हाशिए पर धकेला दिया है. चूंकि भारतीय शहरों का तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है और वो मल्टीमॉडल, जलवायु समर्थ गतिशीलता प्रणाली बनने की ओर बढ़ रहे हैं, ऐसे में पैराट्रांज़िट को एक प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए. 

इस तरह का एकीकरण तभी संभव होगा जब सरकारें संस्थागत ढांचे को अपनाएँगी, सहकारी संरचना के माध्यम से परिचालकों को सशक्त बनाती हैं और ऐसे बुनियादी ढांचे में निवेश करती हैं जो स्वच्छ, सुरक्षित और अधिक कार्यकुशल सेवाओं का समर्थन करती हैं. चेन्नई और कोच्चि से प्राप्त सबक के साथ-साथ जकार्ता जैसे वैश्विक उदाहरण बताते हैं कि समावेशी गतिशीलता को तब हासिल किया जा सकता है जब सरकारें उद्देश्य और दूरदर्शिता के साथ औपचारिक-अनौपचारिक बंटवारे को भरने के लिए प्रतिबद्ध होती हैं. 

पैराट्रांज़िट को औपचारिक रूप देकर और इसे परिवहन योजना की मुख्यधारा में जोड़कर भारत इस क्षेत्र की वास्तविक क्षमता को उजागर कर सकता है, समान उपलब्धता सुनिश्चित कर सकता है, भीड़भाड़ घटा सकता है, आजीविका का समर्थन कर सकता है और शहरी स्थिरता एवं सामाजिक न्याय के व्यापक लक्ष्यों को आगे बढ़ा सकता है. 


नंदन एच दावड़ा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के अर्बन स्टडीज़ प्रोग्राम में फेलो हैं. 

प्रणव दुबे ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में इंटर्न हैं.

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