AI डेटा सेंटर और बढ़ती बिजली मांग के बीच परमाणु ऊर्जा को एक भरोसेमंद विकल्प माना जा रहा है और AI से इसे ज्यादा सुरक्षित, तेज़ और कुशल बनाने की कोशिश हो रही है. जानिए कैसे भारत AI की मदद से परमाणु संयंत्रों की डिजाइन, रखरखाव और संचालन को बेहतर बनाकर 2047 तक अपने बड़े ऊर्जा लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है.
एआई डेटा सेंटर और हाई परफॉर्मेंस कम्प्यूटिंग के विस्तार के साथ बिजली की मांग में वृद्धि हो रही है. इस मांग को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा को विश्वसनीय बिजली आपूर्ति के एक प्रमुख स्रोत के रूप में देखा जा रहा है. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि एआई का इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बदलने और दक्षता को उच्चतम करने के लिए कैसे किया जा सकता है. ये प्रश्न तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए दुनिया भर में छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों का परीक्षण किया जा रहा है.
भारत ने अपने सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI एक्ट 2025)के माध्यम से एआई और सेमीकंडक्टर उत्पादन का समर्थन करने के लिए विस्तारित परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता को मान्यता दी है. सरकार ने विकसित भारत के लिए परमाणु ऊर्जा मिशन का लक्ष्य 2047 तक 100 गीगावॉट की परमाणु क्षमता हासिल करना लक्ष्य रखा है.
बड़ा सवाल ये है कि एआई का इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बदलने और दक्षता को उच्चतम करने के लिए कैसे किया जा सकता है. ये प्रश्न तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए दुनिया भर में छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों का परीक्षण किया जा रहा है.
एआई के उपयोग से परमाणु प्रणालियों के डिज़ाइन, विनियमन और संचालन के तरीके बदल रहे हैं. अमेरिका और चीन जैसे सुपरपावर देश लंबे समय से चली आ रही कमियों को दूर करने, नियामक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और परिचालन की व्यवस्था को बेहतर करने के लिए एआई का लाभ उठा रही हैं.
अमेरिका में, परमाणु ऊर्जा उत्पादन में एआई का एकीकरण तेज़ी से उन प्रणालीगत अक्षमताओं के समाधान के रूप में उभर रहा है जिन्होंने इसके विस्तार को अब तक बाधित रखा है. अमेरिका अब स्पीड, स्केल और स्टैंडर्डाइजेशन पर ध्यान दे रहा है. ऐतिहासिक रूप से, परमाणु संयंत्रों का विकास जटिल और लंबी अनुमति प्रक्रियाओं, विशिष्ट इंजीनियरिंग और खंडित डेटा के कारण धीमा रहा है. इंजीनियर अक्सर हजारों घंटे दस्तावेज़ों का मसौदा तैयार करने, उनका मिलान करने और उनकी समीक्षा करने में बिताते हैं. दस्तावेज़ीकरण के इस बोझ और कई दौर की मैन्युअल नियामक समीक्षा के कारण लाइसेंसिंग और निर्माण दोनों ही समय लेने वाले और महंगे हो गए हैं. यही वजह है कि वोगल यूनिट-3 जैसी परियोजनाओं को पूरा होने में एक दशक से अधिक समय लग गया.
भारत के लिए, परमाणु प्रणालियों में एआई को एकीकृत करना उसके नए परमाणु कानून की भावना के अनुरूप होना आवश्यक है, जिससे ये सुनिश्चित हो सके कि क्षमता विस्तार कुशल और भविष्य के लिए तैयार हो.
इन समस्याओं को कम करने के लिए, एआई एक कारगर समाधान के रूप में उभर रहा है. माइक्रोसॉफ्ट और एनवीडिया के बीच एआई-आधारित सहयोग संयंत्र डिजाइन, अनुमति, निर्माण और संचालन में बिखरे हुए वर्कफ़्लो को मानकीकृत करके इन बाधाओं को दूर कर रहे हैं. ये प्लेटफ़ॉर्म दस्तावेज़ीकरण में होने वाली देरी को कम करते हैं, और बड़े डेटासेट में विसंगतियों का पता लगाते हैं. संस्थागत स्तर पर, अमेरिकी ऊर्जा विभाग (डीओई) द्वारा इडाहो राष्ट्रीय प्रयोगशाला और अन्य के साथ साझेदारी में शुरू की गई पहलें लाइसेंसिंग समय-सीमा को कम करने में एआई की क्षमता को प्रदर्शित करती हैं. एवरस्टार के गार्डियन एआई सॉल्यूशन जैसे एआई उपकरण जटिल सुरक्षा विश्लेषणों को अमेरिकी परमाणु नियामक आयोग (एनआरसी) के अनुरूप दस्तावेज़ों में बहुत कम समय में परिवर्तित कर सकते हैं.
एनवीडिया ओमनीवर्स और माइक्रोसॉफ्ट के जनरेटिव एआई परमिटिंग टूल्स जैसे एडवांस सिमुलेशन, 3डी, 4डी और 5डी मॉडलिंग को और भी सक्षम बनाते हैं. शुरुआती एप्लिकेशंस से दक्षता में ठोस लाभ देखने को मिलते हैं. आलो एटॉमिक्स जैसी कंपनियां अनुमति हासिल करने की समय सीमा में 92 प्रतिशत तक की कमी की रिपोर्ट करती हैं.
ये घटनाक्रम परमाणु ऊर्जा में एआई के एकीकरण का समर्थन करने वाली अमेरिकी नीति के बाद सामने आए हैं. 'जेनेसिस मिशन' जैसी पहलें संपूर्ण परमाणु जीवनचक्र में, डिज़ाइन और लाइसेंसिंग से लेकर निर्माण और संचालन तक, एजेंटिक वर्कफ़्लो के उपयोग को बढ़ावा देती हैं. इसका उद्देश्य तैनाती की गति को दोगुना करना और परिचालन लागत को 50 प्रतिशत तक कम करना है. 293 मिलियन डॉलर की धनराशि से समर्थित ये नीति, राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, उद्योग और शिक्षा जगत के बीच सहयोग को बढ़ावा देती है.
चीन में, परमाणु संयंत्रों में एआई का एकीकरण महत्वपूर्ण तकनीकी समस्याओं के समाधान के साथ-साथ दक्षता, सुरक्षा और मानकीकरण को बढ़ाने के समन्वित प्रयास को दिखाता है. सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है फ्यूज़न रिएक्टरों में प्लाज़्मा को बनाए रखना और नियंत्रित करना. प्लाज़्मा की स्थिरता बनाए रखना कठिन है, और ये फ्यूज़न एनर्जी को एक विश्वसनीय और व्यापक ऊर्जा स्रोत बनाने में एक बाधा बनी हुई है.
इस समस्या से निपटने और प्लाज़्मा अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए, चीन ने एआई से संचालित प्रणालियां तैनात की हैं, जो मशीन लर्निंग मॉडल पर आधारित हैं. ये प्रणालियां 94 प्रतिशत तक सटीकता के साथ प्लाज़्मा व्यवधानों की भविष्यवाणी करती हैं. ये प्रणालियां कई विशेष निगरानी उपकरणों पर निर्भरता कम करती हैं और रिएक्टर प्रबंधन को व्यवस्थित करती हैं.
2023 के 'परमाणु ऊर्जा के डिजिटल परिवर्तन और विकास को बढ़ावा देने संबंधी मार्गदर्शक मत' परमाणु क्षेत्र में एआई, आईओटी और क्लाउड कंप्यूटिंग के गहन एकीकरण का आह्वान करके इस लक्ष्य को और भी मजबूत करते हैं. ये सब दिखाता है कि चीन किस प्रकार व्यवस्थित रूप से प्रायोगिक और वाणिज्यिक परमाणु क्षेत्रों में एआई को शामिल कर रहा है.
प्रायोगिक रिएक्टरों के अलावा, एआई को परिचालन परमाणु संयंत्रों में भी तैनात किया जा रहा है, जैसे कि हुआवेई के 'एआई + इलेक्ट्रिसिटी' समाधान के माध्यम से. ये बड़े पैमाने पर ऑपरेशनल डेटा का विश्लेषण करके परमाणु संयंत्रों की वास्तविक समय की निगरानी, पूर्वानुमानित रखरखाव और इंटेलिजेंट शेड्यूलिंग को सक्षम बनाता है. इसी तरह, iFLYTEK रखरखाव लॉग्स और ऑपरेशनल रिकॉर्ड्स का विश्लेषण करने के लिए प्रोसेसिंग और डेटा माइनिंग का उपयोग करता है.
चीन के राष्ट्रीय ऊर्जा प्रशासन और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी नीतिगत ढाचों द्वारा इस तकनीकी प्रगति को समर्थन दिया गया है. 2023 के 'परमाणु ऊर्जा के डिजिटल परिवर्तन और विकास को बढ़ावा देने संबंधी मार्गदर्शक मत' परमाणु क्षेत्र में एआई, आईओटी और क्लाउड कंप्यूटिंग के गहन एकीकरण का आह्वान करके इस लक्ष्य को और भी मजबूत करते हैं. ये सब दिखाता है कि चीन किस प्रकार व्यवस्थित रूप से प्रायोगिक और वाणिज्यिक परमाणु क्षेत्रों में एआई को शामिल कर रहा है.
भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र ने लगातार तरक्की की है. उन्नत रिएक्टर प्रौद्योगिकियों और क्षमता विस्तार के लिए स्पष्ट दीर्घकालिक दृष्टिकोण में ये प्रगति दिखती भी है. हालांकि, वर्तमान में इसका कुल बिजली उत्पादन में योगदान लगभग 3.1 प्रतिशत ही है. प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर जैसी चल रही परियोजनाएं इन प्रयासों पर प्रकाश डालती हैं, और साथ ही योजना और कार्यान्वयन को मज़बूत करने के अवसरों को भी सामने लाती है. इसके अलावा, परिचालन पक्ष पर, लंबे समय तक चलने वाले शटडाउन को कम करने और रखरखाव चक्रों में सुधार करने से संयंत्र के प्रदर्शन और समग्र उत्पादकता में वृद्धि हो सकती है.
एआई में वर्तमान परिदृश्य को तेजी से बदलने और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के डिज़ाइन, विनियमन और संचालन के तरीके को बदलने की क्षमता है. अगर भारत इस तकनीकी को अपनाता है तो लगातार बनी हुई अक्षमताओं को दूर करने, क्षमता बढ़ाने और एआई-संचालित अर्थव्यवस्था की बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने का रास्ता साफ होगा.
इस संदर्भ में, एआई अपनी डेटा-आधारित, स्वचालित और पूर्वानुमानित क्षमताओं के माध्यम से भारत की वर्तमान क्षमताओं को बढ़ाने और अनुकूलित करने का एक सशक्त अवसर प्रदान करता है. रिएक्टर निर्माण और संचालन का अनुकरण करने के लिए 'डिजिटल ट्विन' का उपयोग किया जा सकता है. एआई परमाणु ईंधन असेंबली में स्वचालित दोष पहचान को सक्षम करके परिचालन सुरक्षा को और बढ़ा सकती है. इससे निरीक्षण समय एवं लागत में कमी आती है. इसके अलावा, AI-संचालित प्रणालियां ईंधन और घटकों की विफलताओं का पहले ही पता लगा सकती हैं, जिससे विश्वसनीयता बढ़ती है.
इसके अलावा, एआई उपकरण नियामक दस्तावेज़ीकरण को सुव्यवस्थित कर सकते हैं, क्रॉस-रेफरेंसिंग को स्वचालित कर सकते हैं और अनुमोदन समय को कम करने में मदद कर सकते हैं. एआई द्वारा संचालित पूर्वानुमानित रखरखाव प्रणालियां उपकरण विफलताओं का पूर्वानुमान लगा सकती हैं, डाउनटाइम को कम कर सकती हैं. इसके साथ ही, डेटा-आधारित एआई वित्तीय उपकरण बजट की सटीकता बढ़ा सकते हैं.
भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में एआई का समावेश एक रणनीतिक ज़रूरत है. ना सिर्फ भविष्य की सतत ऊर्जा आवश्यकताओं को सुनिश्चित करने के लिए, बल्कि इसकी तकनीकी नवाचार संबंधी महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए भी. अमेरिका और चीन इस क्षेत्र में काफ़ी सफलता हासिल कर चुके हैं. एआई में वर्तमान परिदृश्य को तेजी से बदलने और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के डिज़ाइन, विनियमन और संचालन के तरीके को बदलने की क्षमता है. अगर भारत इस तकनीकी को अपनाता है तो लगातार बनी हुई अक्षमताओं को दूर करने, क्षमता बढ़ाने और एआई-संचालित अर्थव्यवस्था की बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने का रास्ता साफ होगा.
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Debajyoti Chakravarty is a Research Assistant at ORF’s Center for New Economic Diplomacy (CNED) and is based at ORF Kolkata. His work focuses on the use ...
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