म्यांमार में सेना सरकार कुछ कदम उठाकर दुनिया को यह दिखाना चाहती है कि हालात बदल रहे हैं लेकिन असली ज़मीनी स्थिति अभी भी वही है. इसी वजह से चीन, आसियान और भारत अपनी-अपनी रणनीति फिर से सोचने को मजबूर हैं. भारत खासकर सुरक्षा और संपर्क के बीच संतुलन साध रहा है. जानें कैसे यह पूरा घटनाक्रम पूरे क्षेत्र की राजनीति बदल रहा है.
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30 अप्रैल की रात म्यांमार के सरकारी प्रसारक MRTV ने घोषणा की कि पूर्व नेता आंग सान सू ची को जेल से निकालकर नजरबंदी (हाउस अरेस्ट) में भेज दिया गया है. बौद्ध पर्व पर कैदियों को दी गई राहत के तहत आंग सान सू ची की सजा कम की गई और उन्हें घर में नजरबंद करने की बात कही गई. शुरुआत में यह बड़ी खबर लगी, लेकिन जल्द ही इस पर सवाल उठने लगे. उनका ठिकाना गुप्त है, वकीलों से संपर्क नहीं है और जारी तस्वीर भी पुरानी बताई गई. लंदन में रहने वाले उनके बेटे किम एरिस ने इसे ‘सोची-समझी रणनीतिक चाल‘ कहा. वहीं म्यांमार की समानांतर जुंटा-विरोधी सरकार, नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (NUG) के प्रवक्ता ने फोन लट्ट ने भी इस घोषणा की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि सू ची की स्थिति का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं दिया गया है और यह किसी भी तरह बिना शर्त रिहाई नहीं है. यह घोषणा सू ची की आजादी से ज्यादा जुंटा प्रमुख मिन आंग हलाइंग की महत्वाकांक्षाओं को उजागर करती है, जिसके प्रभाव नई दिल्ली तक महसूस किए जा सकते हैं.
इस कदम का समय किसी आश्चर्य से कम नहीं था. अप्रैल 2026 की शुरुआत में मिन आंग हलाइंग ने खुद को राष्ट्रपति निर्वाचित करवाया. दिसंबर और जनवरी में ऐसे चुनाव कराए गए जिन पर कई सवाल उठे. इन चुनावों का मकसद सेना के शासन को आम नागरिक सरकार जैसा दिखाना था. 10 अप्रैल को मिन आंग हलाइंग ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली और आसियान देशों से रिश्ते सुधारने व शांति लाने की बात कही. म्यांमार की नई सरकार अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि बेहतर बनाना चाहती है. इसी कारण सू ची को घर में नजरबंद करने और कैदियों को राहत देने जैसे कदम उठाए गए. सरकार ने इसे मानवीय कदम बताया, लेकिन कई लोग इसे सिर्फ छवि सुधारने की कोशिश मानते हैं.
बौद्ध पर्व पर कैदियों को दी गई राहत के तहत आंग सान सू ची की सजा कम की गई और उन्हें घर में नजरबंद करने की बात कही गई. शुरुआत में यह बड़ी खबर लगी, लेकिन जल्द ही इस पर सवाल उठने लगे. उनका ठिकाना गुप्त है, वकीलों से संपर्क नहीं है और जारी तस्वीर भी पुरानी बताई गई.
असल में यह कदम सैन्य शासन को वैध ठहराने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. म्यांमार की सेना-निर्मित नागरिक सरकार लगातार अपनी वैश्विक छवि सुधारने में लगी हुई है. इसी क्रम में जुलाई 2025 में म्यांमार के सूचना मंत्रालय ने अमेरिका के साथ संबंध बेहतर करने के लिए वाशिंगटन की लॉबिंग फर्म DCI Group के साथ लगभग 30 लाख डॉलर प्रतिवर्ष का समझौता किया. यह सब उस समय हो रहा है जब देश में जारी गृहयुद्ध में हजारों लोग मारे जा चुके हैं और लाखों विस्थापित हो चुके हैं.
80 वर्ष की उम्र में, और दो बार माफी मिलने के बाद भी 13 साल से अधिक की सजा बाकी होने के कारण, सू ची व्यावहारिक रूप से जीवन भर कैद में ही हैं. इसका मतलब है कि अब वे प्रतिरोध आंदोलन के प्रतीक के अलावा कोई महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं. जुंटा ने उन्हें एक राजनीतिक शक्ति के रूप में निष्क्रिय कर दिया है, लेकिन उन्हें जीवित रखा है ताकि जरूरत पड़ने पर कूटनीतिक सौदेबाजी के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सके.
बीजिंग की शांत लेकिन स्पष्ट भूमिका भी ध्यान देने योग्य है. अप्रैल के अंतिम सप्ताह में वांग यी की म्यांमार यात्रा- जो सू ची को नजरबंदी में भेजे जाने की घोषणा से कुछ ही दिन पहले हुई - के साथ चीन ने उन्हें अपना ‘पुराना मित्र‘ बताया. 2021 के तख्तापलट के बाद भी चीन सू ची को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं करना चाहता. वह उनके जरिए संवाद के रास्ते खुले रखना चाहता है. चीन की BRI परियोजनाएं, चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा और क्याउकफ्यू बंदरगाह म्यांमार की स्थिरता पर निर्भर हैं. लेकिन बढ़ते संघर्ष और ऑपरेशन 1027 से चीन के निवेश और रणनीतिक हित प्रभावित हो रहे हैं.
बीजिंग ने म्यांमार नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस आर्मी (MNDAA) जैसे जातीय सशस्त्र संगठनों (EAOs) के साथ संपर्क बढ़ाया है. खबरों के अनुसार चीन उन्हें युद्धविराम की ओर धकेल रहा है और कुछ क्षेत्रों को वापस हासिल करने के लिए ‘फाइव कट्स‘ जैसी रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहा है. हालांकि ये कदम स्थायी समाधान की बजाय अल्पकालिक संकट प्रबंधन जैसे अधिक दिखाई देते हैं. सू ची को नजरबंदी में भेजना चीन की एक सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है. इससे चीन म्यांमार के जुंटा शासन से संबंध बनाए रख सकता है और उस पर अपना प्रभाव भी कायम रखता है. इस तरह सू ची अब केवल नेता नहीं, बल्कि चीन की कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा बन गई हैं.
अप्रैल के अंतिम सप्ताह में वांग यी की म्यांमार यात्रा- जो सू ची को नजरबंदी में भेजे जाने की घोषणा से कुछ ही दिन पहले हुई - के साथ चीन ने उन्हें अपना ‘पुराना मित्र‘ बताया. 2021 के तख्तापलट के बाद भी चीन सू ची को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं करना चाहता. वह उनके जरिए संवाद के रास्ते खुले रखना चाहता है.
आसियान के लिए यह कदम ऐसे समय आया है जब म्यांमार को लेकर संगठन के भीतर थकान और मतभेद बढ़ रहे हैं. 2021 का फाइव-पॉइंट कंसेंसस कोई ठोस परिणाम नहीं दे पाया है, लेकिन आसियान अपने किसी सदस्य देश को अनिश्चितकाल तक अलग-थलग भी नहीं रख सकता, क्योंकि इससे उसके मूल सिद्धांत कमजोर पड़ सकते हैं.
अगर म्यांमार को फिर से अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति मिलती है, जबकि वहां सेना की हिंसा लगातार जारी रहती है, तो यह लोकतंत्र की वापसी नहीं बल्कि सैन्य शासन को सामान्य मानने जैसा होगा. मिन आंग हलाइंग सू ची को नजरबंदी में भेजने और कुछ नेताओं को रिहा करने जैसे छोटे कदमों का इस्तेमाल आसियान देशों का रुख नरम करने के लिए कर रहे हैं. थाईलैंड की पहल, सीमा सुरक्षा और आर्थिक कारणों से आसियान के कुछ देश भी म्यांमार से दोबारा जुड़ने की ओर बढ़ रहे हैं. खतरा यह है कि केवल दिखावटी कदम असली राजनीतिक सुधारों की जगह ले लें.
म्यांमार को लेकर भारत की नीति हमेशा व्यावहारिक रही है. भारत चाहता है कि उसके रणनीतिक और सुरक्षा हित बने रहें, इसलिए वह म्यांमार की सेना-समर्थित सरकार से भी बातचीत जारी रखता है. साथ ही भारत लोकतंत्र की बात भी सावधानी से करता है. अगस्त 2025 में SCO शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिन आंग हलाइंग से मुलाकात ने दिखाया कि भारत म्यांमार से संवाद बनाए रखना जरूरी मानता है. भारत का मानना है कि अगर म्यांमार पूरी तरह अस्थिर हो जाता है, तो इससे भारत की सुरक्षा और पूर्वोत्तर क्षेत्र पर बड़ा असर पड़ेगा. इसलिए भारत संतुलित नीति अपनाता है.
अगर म्यांमार धीरे-धीरे फिर से क्षेत्रीय कूटनीतिक व्यवस्था में लौटता है, तो भारत की कनेक्टिविटी परियोजनाओं को स्थिर माहौल मिलेगा. सू ची को नजरबंदी में भेजने से भारत की नीति तुरंत नहीं बदलेगी, लेकिन अगर म्यांमार आसियान देशों के साथ फिर से रिश्ते मजबूत करता है, तो भारत इसे अच्छा मानेगा.
भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो भारत के चार पूर्वोत्तर राज्यों - अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम- को म्यांमार के सागाइंग क्षेत्र और चिन राज्य से जोड़ती है. इसलिए सीमा की स्थिरता भारत के लिए सिर्फ विदेश नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि घरेलू सुरक्षा की अनिवार्यता है. म्यांमार के गृहयुद्ध ने मणिपुर में जातीय विभाजन को गहरा किया है, शरणार्थियों के प्रवाह को तेज किया है और गोल्डन ट्रायंगल से जुड़े अवैध तस्करी तथा ड्रग नेटवर्क को विस्तार दिया है. इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को नेपीडॉ में सत्ता रखने वाले किसी भी पक्ष के साथ कार्यकारी संबंध बनाए रखने पड़ते हैं, चाहे वह सत्ता कैसे भी हासिल की गई हो.
भारत की प्रमुख संपर्क परियोजनाएं- कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग- दोनों ही संघर्ष के कारण प्रभावित हुए हैं. ये केवल दिखावटी परियोजनाएं नहीं हैं, बल्कि भारत की एक्ट ईस्ट नीति की आधारशिला हैं और पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशियाई बाजारों से जोड़ने का मुख्य माध्यम भी हैं. यदि म्यांमार धीरे-धीरे फिर से क्षेत्रीय कूटनीतिक ढांचे में शामिल होता है, तो इससे भारत को इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक स्थिर वातावरण मिल सकता है. इसी सीमित लेकिन महत्वपूर्ण अर्थ में, सू ची को नजरबंदी में भेजने जैसा प्रतीकात्मक कदम भी भारत के लिए परिस्थितियों को थोड़ा बेहतर बनाता है.
भारत के सामने एक और जटिल चुनौती भौगोलिक वास्तविकता से जुड़ी है. भारत-म्यांमार सीमा का बड़ा हिस्सा अब नेपीडॉ के बजाय जातीय सशस्त्र संगठनों- जैसे चिन नेशनल फ्रंट, चिनलैंड काउंसिल और अराकान आर्मी- के प्रभाव में है. ऐसे में इन संगठनों के साथ कार्यकारी संबंध बनाए रखना और साथ ही जुंटा-नेतृत्व वाली सरकार के साथ औपचारिक संबंध जारी रखना कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि भौगोलिक परिस्थितियों की आवश्यकता है.
इसी वजह से भारत ने म्यांमार सीमा पर सुरक्षा बढ़ाई है, बाड़बंदी तेज की है और फ्री मूवमेंट रिजीम रोक दी है. इसका मतलब सीमा के लोगों से दुश्मनी नहीं, बल्कि सुरक्षा चिंताओं को संभालना है. भारत इन समुदायों से अपने पुराने सांस्कृतिक और जातीय संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है. अगर म्यांमार धीरे-धीरे फिर से क्षेत्रीय कूटनीतिक व्यवस्था में लौटता है, तो भारत की कनेक्टिविटी परियोजनाओं को स्थिर माहौल मिलेगा. सू ची को नजरबंदी में भेजने से भारत की नीति तुरंत नहीं बदलेगी, लेकिन अगर म्यांमार आसियान देशों के साथ फिर से रिश्ते मजबूत करता है, तो भारत इसे अच्छा मानेगा. यह स्थिति दिखाती है कि म्यांमार का संकट अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां दिखावटी कदम असली बदलाव से ज्यादा महत्वपूर्ण बन सकते हैं. भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह म्यांमार से संबंध भी बनाए रखे और ऐसा न लगे कि वह सेना सरकार का खुला समर्थन कर रहा है. वहीं दूसरी तरफ, भौगोलिक और सुरक्षा कारणों से भारत पूरी तरह म्यांमार से दूरी भी नहीं बना सकता.
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Sreeparna Banerjee is an Associate Fellow in the Strategic Studies Programme. Her work focuses on the geopolitical and strategic affairs concerning two Southeast Asian countries, namely ...
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