मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर खतरा बढ़ गया है. यही रास्ता भारत की बड़ी एलपीजी आपूर्ति का मुख्य मार्ग है. जानें इस संकट का भारत की रसोई गैस की कीमतों पर क्या असर पड़ सकता है और सरकार इसके लिए क्या तैयारी कर रही है.
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व के हाइड्रोकार्बन व्यापार के केंद्र में स्थित है. वर्ष 2024 में प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल तेल इस जलडमरूमध्य से होकर गुज़रा जो वैश्विक पेट्रोलियम तरल खपत का लगभग 20 प्रतिशत है. इसी कारण यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है. यहाँ किसी भी प्रकार की बाधा जहाजों की आवाजाही को रोक सकती है, माल भाड़ा और युद्ध-जोखिम बीमा प्रीमियम बढ़ा सकती है, कार्गो शेड्यूलिंग में देरी कर सकती है और भविष्य की आपूर्ति के प्रति भरोसे को कमजोर कर सकती है.
मध्य-पूर्व संकट के कारण एलपीजी आपूर्ति बाधित होने से भारत जैसे आयात-निर्भर देश में यह वैश्विक झटका तेजी से घरेलू वितरण की समस्या बन गया है.
चित्र 1: होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से तेल व्यापार

Source: EIA
भारत की संवेदनशीलता इसलिए भी अधिक है क्योंकि एलपीजी एक व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला घरेलू ईंधन है और इसका बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है. भारत की कुल एलपीजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत आयात से आता है, और उन आयातों का लगभग 90 प्रतिशत सामान्यतः हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. इसका अर्थ है कि यदि यह मार्ग बंद हो जाता है, तो सामान्य एलपीजी उपलब्धता का लगभग 54 प्रतिशत सीधे प्रभावित हो सकता है.
भारत की प्रणाली बड़ी होने के बावजूद काफी सघन तरीके से संचालित होती है. देश में लगभग 215 बॉटलिंग प्लांट, 25,600 वितरक और औसतन लगभग 18 दिनों का भंडारण उपलब्ध है. यदि लंबी अवधि का अवरोध हो जाए तो यह रणनीतिक सुरक्षा प्रदान नहीं करता. इसलिए समुद्री प्रवेश बिंदु पर देरी सीधे बॉटलिंग, वितरण और क्षेत्रीय उपलब्धता को प्रभावित करती है.
यदि एलपीजी केवल औद्योगिक उपयोग तक सीमित ईंधन होता तो यह समस्या इतनी गंभीर नहीं होती. लेकिन जनवरी 2026 तक भारत में लगभग 332.1 मिलियन सक्रिय घरेलू एलपीजी कनेक्शन और लगभग 104.29 मिलियन Pradhan Mantri Ujjwala Yojana (प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना) कनेक्शन हैं. इतने बड़े स्तर पर घरेलू निर्भरता का अर्थ है कि किसी भी लंबे व्यवधान से तुरंत ही कल्याण, वितरण की निरंतरता और ईंधन राशनिंग की राजनीतिक अर्थव्यवस्था से जुड़ी चिंताएँ उत्पन्न हो जाती हैं.
एलपीजी आपूर्ति श्रृंखला के अनुसार भारत को गैस दो स्रोतों से मिलती है-घरेलू रिफाइनरियाँ और गैस संयंत्र तथा आयातित प्रोपेन-ब्यूटेन. इसके बाद यह टर्मिनल, भंडारण, बॉटलिंग, परिवहन और वितरकों के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुँचती है. भारत की प्रणाली बड़ी होने के बावजूद काफी सघन तरीके से संचालित होती है. देश में लगभग 215 बॉटलिंग प्लांट, 25,600 वितरक और औसतन लगभग 18 दिनों का भंडारण उपलब्ध है. यदि लंबी अवधि का अवरोध हो जाए तो यह रणनीतिक सुरक्षा प्रदान नहीं करता. इसलिए समुद्री प्रवेश बिंदु पर देरी सीधे बॉटलिंग, वितरण और क्षेत्रीय उपलब्धता को प्रभावित करती है.
सरकार ने तुरंत आपातकालीन स्थिरीकरण उपाय अपनाए हैं. रिफाइनरियों और पेट्रोकेमिकल संयंत्रों को निर्देश दिया गया है कि वे प्रोपेन और ब्यूटेन को घरेलू पूल में मोड़कर अधिकतम एलपीजी उत्पादन करें. इससे घरेलू उत्पादन में लगभग 25 प्रतिशत वृद्धि हुई है.
साथ ही औद्योगिक और वाणिज्यिक उपयोग के लिए एलपीजी आवंटन में कटौती की गई है ताकि घरेलू आपूर्ति सुरक्षित रखी जा सके. यदि सामान्य आपूर्ति को 100 इकाइयों के रूप में माना जाए और उनमें से 54 इकाइयाँ हॉर्मुज़ व्यवधान से प्रभावित हों, तो घरेलू उत्पादन की 40 इकाइयाँ 25 प्रतिशत वृद्धि के बाद 50 इकाइयों तक पहुँचती हैं. गैर-हॉर्मुज़ आयात की 6 इकाइयाँ यथावत रहती हैं. इस प्रकार आपातकालीन आयात और मांग में कमी से पहले कुल उपलब्धता लगभग 56 इकाइयाँ रह जाती है. ऐसे हालात में नीति का ध्यान बाजार आधारित आवंटन से हटकर प्राथमिकता आधारित आवंटन की ओर चला जाता है.
यदि सामान्य आपूर्ति को 100 इकाइयों के रूप में माना जाए और उनमें से 54 इकाइयाँ हॉर्मुज़ व्यवधान से प्रभावित हों, तो घरेलू उत्पादन की 40 इकाइयाँ 25 प्रतिशत वृद्धि के बाद 50 इकाइयों तक पहुँचती हैं.
यह संरक्षणवादी व्यवस्था अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर असमान प्रभाव डालती है. घरेलू उपभोक्ताओं को सबसे पहले सुरक्षित रखने की संभावना है, क्योंकि खाना पकाने का ईंधन राजनीतिक रूप से संवेदनशील है और कल्याणकारी नीतियों से गहराई से जुड़ा हुआ है. व्यवसाय-विशेषकर रेस्तरां, कैटरिंग सेवाएँ, होटल और वाणिज्यिक गैस सिलेंडरों का उपयोग करने वाले छोटे औद्योगिक उपभोक्ता-इस प्रारंभिक समायोजन का भार उठाएँगे. वाणिज्यिक आवंटन पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है, और सरकार ने घरेलू आपूर्ति बनाए रखने के लिए कुछ क्षेत्रों में अस्थायी रूप से वैकल्पिक ईंधनों के उपयोग की सलाह दी है. इसके साथ ही, भारत अब एलपीजी की आपूर्ति के लिए वैकल्पिक स्रोतों से भी व्यवस्था कर रहा है, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, नॉर्वे और कनाडा शामिल हैं.
इस स्थिति का आर्थिक प्रभाव एक परिचित आपूर्ति-पक्ष झटका (सप्लाई-साइड शॉक) होगा. शोध बताते हैं कि परिवहन में आने वाली बाधाएं उपभोक्ता कीमतों पर कुछ समय के अंतराल के बाद प्रभाव डालती हैं, विशेषकर तब जब आयातित वस्तुएँ या कच्चे माल कुछ विशेष आपूर्ति चैनलों पर अधिक निर्भर हों. यदि नाकाबंदी लंबे समय तक जारी रहती है, तो एलपीजी का यह झटका केवल ईंधन की समस्या न रहकर स्थानीय स्तर पर मुद्रास्फीति और व्यवसायों के अस्तित्व से जुड़ी समस्या बन सकता है.
भारत पहले ही वर्ष 2026 के लिए अमेरिका के साथ 2.2 एमटीपीए (मिलियन टन प्रति वर्ष) एलपीजी समझौता कर चुका है, जो कुल वार्षिक आयात का लगभग 10 प्रतिशत है. यह स्थिति लचीलापन और दक्षता के बीच संतुलन को दर्शाती है-सामान्य समय में सीमित स्रोतों से खरीद सस्ती होती है, लेकिन संकट के समय विविध आपूर्ति नेटवर्क जोखिम को कम करते हैं. इसका अर्थ है कि भारत को वैकल्पिक अनुबंधों को सामान्य खरीद प्रक्रिया से महंगे विचलन के रूप में नहीं, बल्कि बीमा जैसी सुरक्षा व्यवस्था के रूप में देखना चाहिए. अधिक भंडारण क्षमता, टर्मिनलों में लचीलापन, रेल परिवहन और पाइपलाइन कनेक्टिविटी को मजबूत करने से इस ‘बीमा’ का उपयोग करना कम महंगा होगा.
सरकार को यह भी ध्यान रखना होता है कि यह समस्या आगे चलकर महंगाई न बढ़ा दे. अगर ईंधन और परिवहन महंगा हो जाता है, तो व्यवसाय अपनी लागत बढ़ाकर सामान और सेवाओं की कीमतें भी बढ़ा सकते हैं. इसलिए सरकार को ऐसी लक्षित सहायता देनी चाहिए जो ज़रूरतमंद लोगों की मदद करें.
जब ऐसी आपूर्ति की समस्या आती है, तो सरकार को बाज़ार के भरोसे सब कुछ छोड़ने के बजाय ज़रूरत के अनुसार ईंधन का प्राथमिकता के आधार पर वितरण करना पड़ता है. सबसे पहले घरों और ज़रूरी सेवाओं को गैस मिलनी चाहिए. साथ ही सरकार को यह भी ध्यान रखना होता है कि यह समस्या आगे चलकर महंगाई न बढ़ा दे. अगर ईंधन और परिवहन महंगा हो जाता है, तो व्यवसाय अपनी लागत बढ़ाकर सामान और सेवाओं की कीमतें भी बढ़ा सकते हैं. इसलिए सरकार को ऐसी लक्षित सहायता देनी चाहिए जो ज़रूरतमंद लोगों की मदद करे, लेकिन बेवजह सभी को सब्सिडी देकर सरकारी खर्च और महंगाई दोनों न बढ़ाए.
अल्प और मध्यम अवधि में स्थिति को संभालने के लिए तीन प्रमुख रणनीतियाँ अपनाई जा सकती हैं. पहली, प्राथमिकता निर्धारण, जिसमें घरेलू उपभोक्ताओं को गैस की आपूर्ति में प्राथमिकता दी जाए और गैर-जरूरी मांग को सीमित किया जाए. दूसरी, स्रोतों का विविधीकरण, जिसके तहत भारत अमेरिका, रूस, नॉर्वे और कनाडा जैसे देशों से एलपीजी आयात बढ़ा रहा है; साथ ही भारत ने 2026 के लिए अमेरिका के साथ 2.2 मिलियन टन प्रतिवर्ष एलपीजी आपूर्ति का समझौता भी किया है. तीसरी, लॉजिस्टिक सुदृढ़ीकरण, जिसमें अधिक भंडारण क्षमता विकसित करना, टर्मिनलों की क्षमता बढ़ाना तथा रेल और पाइपलाइन नेटवर्क को मजबूत बनाना शामिल है, ताकि आपूर्ति व्यवस्था अधिक सुरक्षित और लचीली बन सके.संभावित समाधान
फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती गैस की आपूर्ति को संतुलित तरीके से बाँटना है, जबकि आगे चलकर आपूर्ति व्यवस्था को अधिक मजबूत और लचीला बनाना होगा. दीर्घकाल में सस्ती और विविध ऊर्जा स्रोतों को बढ़ाना जरूरी है.
सरकार संकट के प्रभाव को कम करने के लिए कई वित्तीय उपाय अपना सकती है. इसके तहत सीमित अवधि के लिए एलपीजी सब्सिडी बढ़ाई जा सकती है और गैस सिलेंडर के रिफिल की सीमा में भी वृद्धि की जा सकती है. इसके अलावा कम आय वाले उन उपभोक्ताओं को, जो प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना से जुड़े नहीं हैं, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से आर्थिक सहायता दी जा सकती है. साथ ही सरकार तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को संकट के कारण बढ़े अतिरिक्त खर्च या ‘क्राइसिस प्रीमियम’ की भरपाई भी कर सकती है, ताकि गैस की कीमतों पर अचानक अधिक दबाव न पड़े.
दीर्घकाल में भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अधिक विविध और लचीली व्यवस्था बनानी होगी. घरेलू खाना पकाने के लिए एलपीजी महत्वपूर्ण रहेगा, लेकिन इसके साथ-साथ अन्य विकल्पों को भी बढ़ावा देना आवश्यक है. शहरी क्षेत्रों में पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) एक विकल्प हो सकता है, जबकि घरेलू स्तर पर इलेक्ट्रिक कुकिंग और बायो-एनर्जी भी उपयोगी विकल्प हैं. एलपीजी की संभावित कमी की आशंका के बीच इंडक्शन चूल्हों की बिक्री में तेजी देखी गई है, जो यह दिखाती है कि विश्वसनीयता खतरे में पड़ने पर उपभोक्ता कितनी जल्दी विकल्प तलाशते हैं. भारत में वर्तमान में 143.60 गीगावॉट सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित है और 195 संपीड़ित बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं. समय के साथ एक विविधीकृत खाना पकाने की ऊर्जा प्रणाली किसी एक बाहरी आपूर्ति मार्ग पर निर्भरता को कम कर सकती है.
हॉर्मुज़ संकट भारत के लिए एक बड़ा बाहरी झटका साबित हो रहा है, क्योंकि इससे देश की महत्वपूर्ण ईंधन आपूर्ति प्रभावित हो रही है. फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती गैस की आपूर्ति को संतुलित तरीके से बाँटना है, जबकि आगे चलकर आपूर्ति व्यवस्था को अधिक मजबूत और लचीला बनाना होगा. दीर्घकाल में सस्ती और विविध ऊर्जा स्रोतों को बढ़ाना जरूरी है. इस संकट से सबसे बड़ा सबक यही मिलता है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल संकट के समय नहीं, बल्कि पहले से ही विविध स्रोतों, मजबूत भंडारण, बेहतर परिवहन व्यवस्था और नई तकनीकों के सहारे तैयार की जानी चाहिए.
आर्य रॉय बर्धन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में जूनियर फेलो हैं.
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Arya Roy Bardhan is a Junior Fellow at the Centre for New Economic Diplomacy, Observer Research Foundation. His research interests lie in the fields of ...
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