Author : Aditya Bhan

Published on Apr 16, 2022 Updated 1 Days ago

भारत की छवि ख़राब करने की चीनी क़वायद से मुक़ाबले के लिए भारत को अपने दक्षिणी पड़ोसी की मदद करते हुए उसका प्रचार-प्रसार करना चाहिए.

श्रीलंका संकट के मुद्दे पर, “नेकी कर, डंका बजा” का मंत्र भारत के लिए होगा फ़ायदेमंद!

सेंट्रल बैंक ऑफ़ श्रीलंका ने रेपो और रिवर्स रेपो दरों में 7 फ़ीसदी की बढ़ोतरी कर दी है. आमतौर पर इन दरों में 25 से 50 बेसिस अंकों की बढ़ोतरी ही देखी गई है. लिहाज़ा हाल का इज़ाफ़ा चमत्कारी लग सकता है. हालांकि, इस द्वीप देश में सातवें आसमान पर पहुंच रही महंगाई को देखते हुए ये बढ़त काफ़ी देर से उठाया गया और बेहद मामूली क़दम ही साबित हो सकता है  (चित्र-1 देखें). ईंधन की घोर किल्लत इन चिंताओं को और बढ़ा देती है, जिसकी मार ज़्यादातर मछुआरा समुदाय पर पड़ने वाली है.

चित्र 1: श्रीलंका में महंगाई दर- मार्च 2022 के आंकड़े- 1986-2021 के ऐतिहासिक आंकड़े- अप्रैल के पूर्वानुमान (tradingeconomics.com).

ख़ालिस क़िताबी नज़रिए से मौजूदा आर्थिक दुर्गति के पीछे की वजह भुगतान के संतुलन में संकट की वजह से विदेशी मुद्रा भंडार (चित्र 2 देखें) में आई भारी गिरावट है. बहरहाल नज़दीक से उन वजहों और हालातों की तस्दीक ज़रूरी है जिनके चलते श्रीलंका की अर्थव्यवस्था बर्बादी की कगार पर पहुंच गई है. व्यापक तौर पर एक के बाद एक तमाम सरकारों द्वारा अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन से जुड़ी आलोचनाएं अक्सर सुनाई देती रही हैं. बहरहाल मुल्क की तक़दीर में आई ज़बरदस्त गिरावट के पीछे की ख़ास वजहों में बाहरी कर्ज़ों के बूते अपनाई गई लोकलुभावन नीतियां, मौजूदा कोविड-19 महामारी और राजपक्षे घराने का सियासी निकम्मापन शामिल हैं.

चित्र 2: श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार. 1956-2022| CEIC Data.

देश के वित्त मंत्री अली साबरी के मुताबिक खाने-पीने के सामानों और दवाइयों जैसी आवश्यक सप्लाई दोबारा बहाल करने के लिए श्रीलंका को अगले 6 महीनों के भीतर 3 अरब अमेरिकी डॉलर की विदेशी मदद की दरकार है. ग़ौरतलब है कि जे. पी. मॉर्गन के विश्लेषकों का आकलन है कि इस साल श्रीलंका को ऋण के भुगतान के तौर पर 7 अरब अमेरिकी डॉलर की रकम चुकानी है. देश के चालू खाते का घाटा 3 अरब अमेरिकी डॉलर के स्तर पर है. एक ओर भारत अपने पड़ोसी देश को आर्थिक दलदल से बाहर निकालने की कोशिशों में लगा है तो वहीं दूसरी ओर श्रीलंका की सरकार ने चीन से 1 अरब अमेरिकी डॉलर की अतिरिक्त सहायता मांगी है. निश्चित रूप से ये घोर विडंबना का विषय है, क्योंकि चीन ही वो मुल्क है जिसकी कर्ज़ के जाल में फंसाने की कूटनीति का श्रीलंका शिकार हुआ है.

चीन की सरकारी मीडिया ने श्रीलंका की खिंचाई करते हुए इन दुश्वारियों के लिए डॉलर पर श्रीलंका की निर्भरता और उसकी भारत-समर्थक नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया है.

चीन ने अब तक श्रीलंका को इस जंजाल से बाहर निकालने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है. चीन ने कर्ज़ चुकता करने या नए सिरे से कर्ज़ भुगतान की व्यवस्था करने को लेकर किसी भी तरह के समझौते से इनकार कर दिया है. इतना ही नहीं, चीन की सरकारी मीडिया ने श्रीलंका की खिंचाई करते हुए इन दुश्वारियों के लिए डॉलर पर श्रीलंका की निर्भरता और उसकी भारत-समर्थक नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया है. चीन की कम्युनिकेशन यूनिवर्सिटी के रिसर्च फ़ेलो झांग शिओयू के मुताबिक श्रीलंका की सरकार “देश की अर्थव्यवस्था को नए सिरे से खड़ा करने और बड़े पैमाने पर सुधार लागू करने” से जुड़े अवसरों का लाभ उठाने में नाकाम रही है. वहां की आर्थिक वृद्धि निर्माण कार्यों और घरेलू ख़ुदरा कारोबार की बदौलत दिखाई दी है, जिनमें से एक का भी वैश्विक बाज़ार में व्यापार मुमकिन नहीं है.”  इसके ठीक विपरीत, समुद्र से घिरे दक्षिण के अपने पड़ोसी के प्रति भारत का रुख़ उदार और दोस्ताना रहा है. श्रीलंका को चीन के शिकंजे से बाहर निकालने के लिए भारत उसको दिए जाने वाले ऋण, अनुदान या सहायता के प्रावधानों में “ग़ैर-दोस्ताना तीसरे पक्षों” से जुड़ी शर्तें जोड़ सकता है. भारत के पास ऐसा करने की तमाम वजहें भी मौजूद हैं. इसके बावजूद भारत ने ज़रूरत की इस घड़ी में श्रीलंकाई लोगों को खुले दिल से और बिना किसी शर्त के मदद पहुंचाने की प्रतिबद्धता दिखाई है.

निश्चित रूप से श्रीलंका के संकट में भारत का कोई हाथ नहीं है. हालांकि वो भारत का पड़ोसी है, लिहाज़ा उसे मौजूदा दुश्वारियों से बाहर निकालने और हर मुमकिन मदद पहुंचाने में भारत को किसी तरह का संकोच नहीं करना चाहिए.

मिसाल के तौर पर भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बिना किसी अनुचित फ़ायदे के खाद्यान्न के निर्यात का वचन दिया है. श्रीलंका में भारत के उच्चायुक्त गोपाल बागले के मुताबिक भारत सरकार श्रीलंका को 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर सहायता दे चुकी है. श्रीलंका में क्रियान्वयन को लेकर अफ़सरशाही से जुड़ी दिक़्क़तों के बावजूद ये मदद पहुंचाई गई है. इसके तहत मुद्रा- मुद्रा की अदला-बदली और खाद्यान्न, ईंधन और ऊर्जा से जुड़े ऋण को तवज्जो दी गई है. भले ही श्रीलंका को सहायता पहुंचाने में भारत ने पूरी तत्परता दिखाई है, लेकिन उसे मौजदा संकट से बाहर निकालने में ये मानवीय मदद काफ़ी नहीं होगी. लिहाज़ा श्रीलंका द्वारा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से सहायता की गुहार बिल्कुल सही क़दम है. हौसला बढ़ाने वाली बात ये है कि IMF श्रीलंका के सियासी और आर्थिक घटनाक्रमों पर नज़दीकी से नज़र बनाए हुए है.

निश्चित रूप से श्रीलंका के संकट में भारत का कोई हाथ नहीं है. हालांकि वो भारत का पड़ोसी है, लिहाज़ा उसे मौजूदा दुश्वारियों से बाहर निकालने और हर मुमकिन मदद पहुंचाने में भारत को किसी तरह का संकोच नहीं करना चाहिए. बहरहाल, वैश्विक स्तर पर और श्रीलंका की जनता के सामने भारत की छवि ख़राब करने की चीनी क़वायदों और दुष्प्रचार का सक्रिय रूप से मुक़ाबला करना ज़रूरी है. इसी कड़ी में भारत द्वारा श्रीलंका को पहुंचाई जा रही मानवीय मददों के बारे में श्रीलंका के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए. लिहाज़ा “नेकी कर, दरिया में डाल” की युगों पुरानी परंपरा की बजाए भारत को “नेकी कर, डंका बजा” का मंत्र अपनाना चाहिए.

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