Author : Katie Earnshaw

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Published on May 21, 2026 Updated 0 Hours ago

समुद्र के नियम किताबों में तो नाविकों को बराबरी और सुरक्षा का भरोसा देते हैं लेकिन असल में गरीब देश के नाविक सबसे ज्यादा शोषण और भेदभाव झेलते हैं. समस्या सिर्फ कानूनों की नहीं बल्कि उन लोगों की अनदेखी की है जो दिन-रात समुद्र में काम करते हैं लेकिन उनकी आवाज़ फैसलों तक पहुंच ही नहीं पाती. जानिए क्यों आज भी ग्लोबल साउथ के नाविक इंसाफ और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं.

महासागरीय शासन में क्यों गुम हैं नाविक?

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यह लेख 'महासागरों का शासन: पहुंच और समानता पर पुनर्विचार' श्रृंखला का हिस्सा है. 


वैश्विक महासागरीय शासन (ग्लोबल ओशन गवर्नेंस) अंतर्राष्ट्रीय कानूनों, संस्थागत ढांचों और तकनीकी मानकों के एक व्यापक तंत्र पर टिका हुआ है. 'समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन' (UNCLOS), 'मैरीटाइम लेबर कन्वेंशन' (MLC), और 'अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन' (IMO) के नियामक बुनियादी ढांचे जैसे साधनों को अक्सर एक मजबूत शासन प्रणाली के प्रमाण के रूप में पेश किया जाता है. इसके बावजूद, समुद्र में काम करने वाले नाविकों-खासकर विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) के लोगों-को कागज़ी कानूनों का असली फायदा नहीं मिलता. हकीकत में ये नियम उन्हें ज़रूरी सुरक्षा, सम्मान और अधिकार देने में हमेशा नाकाम साबित होते हैं.

नियमों और हकीकत के बीच का यह अंतर काफी हद तक असमान कार्यान्वयन (कमजोर अमल) के साथ-साथ लचर निगरानी और प्रवर्तन का परिणाम है. इसके अलावा, यह इस बात में भी गहरी असमानताओं को दर्शाता है कि महासागरीय शासन को कैसे डिजाइन किया गया है, किसके ज्ञान को प्राथमिकता दी जाती है, और किसे निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में सार्थक रूप से शामिल किया जाता है. इस लिहाज से, समानता (इक्विटी) कोई मामूली या बाहरी चिंता नहीं है, बल्कि यह महासागरीय शासन के मूल ढांचे का मुख्य हिस्सा है.

सबसे बड़ी वजह यह है कि जो लोग बड़े-बड़े AC कमरों में बैठकर नियम और नीतियां तय करते हैं, वे समुद्र में दिन-रात काम करने वाले नाविकों की वास्तविक परेशानियों, उनके सुख-दुख और रोज़मर्रा के अनुभवों को उन नियमों में शामिल ही नहीं करते. 

कागज़ पर लिखे समुद्री कानूनों और समुद्र के भीतर नाविकों की असली ज़िंदगी के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है, जिसे ठीक से समझ पाना अक्सर काफी मुश्किल होता है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जो लोग बड़े-बड़े AC कमरों में बैठकर नियम और नीतियां तय करते हैं, वे समुद्र में दिन-रात काम करने वाले नाविकों की वास्तविक परेशानियों, उनके सुख-दुख और रोज़मर्रा के अनुभवों को उन नियमों में शामिल ही नहीं करते. जब तक नियम बनाने की इस पूरी प्रक्रिया में नाविकों की आवाज़ और उनके अनुभवों को सही जगह नहीं मिलेगी, तब तक कागज़ी नियम और ज़मीनी हकीकत का यह अंतर कभी खत्म नहीं हो सकता. 

महासागरीय शासन में गायब आवाज 

समुद्री नियमों और वास्तविक जीवन में उनके कार्यान्वयन के बीच के अंतर को पूरी तरह से समझ पाना अक्सर कठिन होता है, आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि नाविकों के वास्तविक जीवन के अनुभवों को शासन की प्रक्रियाओं में व्यवस्थित रूप से शामिल या प्रतिबिंबित नहीं किया जाता है. कल्याणकारी संगठनों ,ट्रेड यूनियनों, शैक्षणिक शोधों और दुर्घटना रिपोर्टिंग निकायों से मिलने वाले सबूत समुद्र में श्रम संरक्षण, सुरक्षा मानकों और कल्याणकारी प्रावधानों के अपने सही तरीक़े से काम करने  में लगातार होने वाली विफलताओं को उजागर करते हैं. हालांकि, ये जानकारियां अधूरी और बिखरी हुई हैं, जिसकी वजह से , समुद्र में जीवन की हकीकतें अक्सर केवल संकट के क्षणों में ही दिखाई देती हैं. 

कमज़ोर नियम तो बहाना है, भेदभाव असली निशाना है  

नाविकों द्वारा सामना की जाने वाली कई चुनौतियां न केवल मौजूदा नियमों के कमजोर प्रवर्तन (लचर अमल) से पैदा होती हैं, बल्कि समुद्री प्रणालियों और बदलावों के डिजाइन में विचार-विमर्श तथा समावेशन( आसान तरीक़े से शामिल करना) की उचित  कमी के कारण भी होती हैं. 'मानव-केंद्रित डिजाइन' के महत्व को व्यापक रूप से स्वीकार किए जाने के बावजूद, जहाजों के डिजाइन, परिचालन प्रक्रियाओं और तकनीकी बदलावों के निर्णयों पर नाविकों से शायद ही कभी सार्थक रूप से सलाह ली जाती है, भले ही वे सहज रूप से इन प्रणालियों को संचालित करने के लिए जिम्मेदार होते हैं.

इस निष्कासन (बाहर रखने) के सीधे सुरक्षा परिणाम होते हैं. जैसा कि समुद्री सुरक्षा चैरिटी 'कॉन्फिडेंशियल ह्यूमन फैक्टर्स इंसिडेंट रिपोर्टिंग प्रोग्राम' (CHIRP) ने समुद्र में दुर्घटनाओं और बाल-बाल बची घटनाओं के अपने 2025-26 के वार्षिक संग्रह में जोर दिया है कि खराब डिजाइन परिचालन संबंधी खतरों को जन्म दे सकता है; क्योंकि नाविकों के इनपुट के बिना डिजाइन की गई प्रणालियाँ नियामक या तकनीकी मानकों को तो पूरा कर सकती हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से वे कठिन, अवास्तविक या असुरक्षित साबित हो सकती हैं.

मजदूरी से परे, सत्ता में असंतुलन अक्सर ग्लोबल साउथ के नाविकों के लिए अत्यधिक संवेदनशीलता और शोषण के खतरे  में बदल जाता है. जबकि ग्लोबल नॉर्थ के अधिकांश हिस्सों में नाविक बनने के लिए प्रशिक्षण लेने वाले लोगों की संख्या में भारी गिरावट आई है.

यही ढर्रा अब समुद्री डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन-मुक्ति) में भी साफ दिखाई दे रहा है. हालांकि 'मैरीटाइम जस्ट ट्रांजिशन टास्क फोर्स'-जो कि हरित पोत परिवहन (ग्रीन शिपिंग) की दिशा में बदलाव के लिए स्थापित एक वैश्विक क्षेत्रीय पहल है-का उद्देश्य नाविकों को समुद्री डीकार्बोनाइजेशन के केंद्र में रखना है, लेकिन अब तक का ध्यान मुख्य रूप से इस क्षेत्र को अपने शून्य-कार्बन दायित्वों तक पहुंचने के लिए आवश्यक कौशल और प्रशिक्षण पर रहा है, जबकि व्यावहारिक रूप से नाविकों के दृष्टिकोण अक्सर कम दिखाई दिए हैं.

तेजी से हो रहे तकनीकी बदलावों के कल्याणकारी प्रभावों पर 'इंटरनेशनल सीफैरर्स वेलफेयर एंड असिस्टेंस नेटवर्क' (ISWAN) का शोध आवाज (अपनी बात रखने के अधिकार) की इस कमी के परिणामों को दर्शाता है. एक ISWAN सर्वेक्षण का जवाब देने वाले आधे से अधिक (53.8 प्रतिशत) नाविकों ने बताया कि डीकार्बोनाइजेशन तकनीकों और नियमों को लागू करने से उनका काम का बोझ (वर्कलोड) बढ़ गया है, जबकि 44 प्रतिशत ने तनाव बढ़ने की बात कही और लगभग एक तिहाई (32.8 प्रतिशत) ने कहा कि समुद्री डीकार्बोनाइजेशन को आधार देने वाली जटिल नियामक आवश्यकताओं को पूरा करने ने उनके भीतर अपराधी ठहराए जाने (क्रिमिनलाइजेशन) के डर को बढ़ा दिया है.

गरीब देशों की अनदेखी- हक और इंसाफ की लड़ाई  

हालांकि ये व्यवस्थागत मुद्दे पूरे समुद्री उद्योग में नाविकों को प्रभावित करते हैं, लेकिन इनके प्रभाव समान रूप से वितरित होने से बहुत दूर हैं. आईएमओ (IMO) जैसे प्रमुख मंचों में नाविकों की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों की बढ़ती दृश्यता और प्रभाव के बावजूद, शक्ति, निर्णय लेने का अधिकार और मुनाफा काफी हद तक कुछ प्रमुख समुद्री अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रित बना हुआ है जो उन ग्लोबल साउथ (वैश्विक दक्षिण) के देशों से अलग हैं, और बड़े पैमाने पर उनसे अलग  हैं-जो वैश्विक शिपिंग को बनाए रखने वाले अधिकांश श्रम (वर्कफोर्स) की आपूर्ति करते हैं.

सबसे सही रूप से, समुद्री क्षेत्र में आर्थिक असमानता वेतन विसंगतियों (पे डिस्पैरिटीज) के माध्यम से मजबूत है. मजदूरी से परे, सत्ता में असंतुलन अक्सर ग्लोबल साउथ के नाविकों के लिए अत्यधिक संवेदनशीलता और शोषण के खतरे  में बदल जाता है. जबकि ग्लोबल नॉर्थ के अधिकांश हिस्सों में नाविक बनने के लिए प्रशिक्षण लेने वाले लोगों की संख्या में भारी गिरावट आई है. ग्लोबल साउथ में कई लोगों के लिए यह अभी भी अधिक वित्तीय सुरक्षा का एकमात्र संभव  रास्ता बना हुआ है.

एक ऐसा पक्का और सीधा सिस्टम बनाना बेहद ज़रूरी है जहाँ नाविक खुलकर अपनी बात रख सकें, उनके मानसिक स्वास्थ्य और भलाई का ध्यान रखा जाए, और कोई भी देश अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे न हट सके.

गुजरात मैरीटाइम यूनिवर्सिटी के साथ ISWAN का शोध इस बात को साफ़ किया है कि कैसे कई नए योग्य कैडेटों की अपना पहला अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) सुरक्षित करने की हताशा व्यापक भर्ती धोखाधड़ी को बढ़ावा दे रही है, जिसकी वजह से , ये नाविक श्रम शोषण के सबसे गंभीर रूपों के शिकार होते हैं, जिसमें जहाजों पर लावारिस छोड़ दिया जाना (अबांडन्मेंट) भी शामिल है, जो हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है और 2025 में वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है.

आर्थिक पहलुओं से अलग , उच्च आय वाले देशों (जो अक्सर ग्लोबल नॉर्थ में हैं) में निर्णय लेने की शक्ति का होना अधिक सूक्ष्म तरीकों से असमानता को स्थापित करता है. प्रणालियों, नीतियों और सहायता तंत्रों को अक्सर मुख्य रूप से काम, कल्याण और व्यक्तित्व के पश्चिमी ढांचों (वेस्टर्न फ्रेमवर्क्स) के आसपास डिजाइन किया जाता है. यह विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य के प्रति देखने में साफ़ नहीं है, जहां प्रशिक्षण और सहायता ढांचे शायद इस बात से मेल न खाएं कि ग्लोबल साउथ के कई नाविक संकट को कैसे समझते या बता पाते हैं; जिससे वे नाविक जो अक्सर खुद को सबसे कमजोर स्थितियों में पाते हैं, सांस्कृतिक रूप से शामिल होना और प्रभावी सहायता तक पहुंच से वंचित रह जाते हैं. यह औपचारिक रूप से सहायता मौजूद होने पर भी निष्कासन (अपवर्जन) को मजबूत करने का जोखिम पैदा करता है.

महासागरीय शासन पर पुनर्विचार  

अगर हम समुद्र से जुड़े नियमों और व्यवस्था को वाकई असरदार और सबके लिए बराबर बनाना चाहते हैं, तो हमें सिर्फ कागज़ी कानूनों से आगे बढ़कर इसमें समुद्र में काम करने वाले नाविकों (seafarers) को शामिल करना होगा. आज दुनिया के ज़्यादातर नाविक 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) से आते हैं, लेकिन नियम बनाते समय उनके व्यावहारिक अनुभवों और आवाज़ को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. 

वर्तमान व्यवस्था इतनी कमज़ोर है कि नाविकों की सुध सिर्फ किसी हादसे के वक्त ही ली जाती है. इसलिए, एक ऐसा पक्का और सीधा सिस्टम बनाना बेहद ज़रूरी है जहाँ नाविक खुलकर अपनी बात रख सकें, उनके मानसिक स्वास्थ्य और भलाई का ध्यान रखा जाए, और कोई भी देश अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे न हट सके. आखिरकार, जब तक नियमों को बनाने में नाविकों को मुख्य हिस्सेदार नहीं माना जाएगा, तब तक कागज़ पर लिखे कानूनों और समुद्र की असली एवं कठिन ज़िंदगी के बीच का यह बड़ा अंतर कभी खत्म नहीं होगा.


केटी अर्नशॉ इंटरनेशनल सीफेरर्स वेलफेयर एंड असिस्टेंस नेटवर्क (आईएसडब्ल्यूएएन) में नीति और अनुसंधान सलाहकार हैं.
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