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दुनिया एक नए शीत युद्ध की ओर बढ़ती नजर आ रही है लेकिन इस बार खतरनाक हथियारों की दौड़ परमाणु स्तर पर है. अमेरिका, रूस, चीन और पाकिस्तान जैसी ताक़तें अपनी शक्ति बढ़ाने में जुटी हैं और यह खेल हर देश के लिए चिंता का सबब बन गया है.
दुनिया भर में अलग-अलग तरह के संघर्ष और संकट एक साथ घटित हो रहे हैं, फिर चाहे वह यूक्रेन-रूस युद्ध हो, गाज़ा-इज़रायल संघर्ष, ईरान-इज़रायल विवाद, भारत-पाकिस्तान तनाव, थाइलैंड-कंबोडिया संघर्ष, इथियोपिया-इरिट्रिया जंग या फिर सूडान संकट हो. मगर इन सबके बीच शायद सबसे चिंता की बात है, परमाणु हथियारों को लेकर फिर से बढ़ता रुझान. इसने सभी देशों की परेशानी बढ़ा दी है.
यूक्रेन पर हमला बोलने के बाद से रूस ने पश्चिम को चेतावनी देने के लिए बार-बार परमाणु धमकी दी. हाल-फिलहाल ही रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक नई ब्यूरवेस्टनिक मिसाइल के सफल परीक्षण का दावा किया, जो परमाणु ऊर्जा से चलती है और परमाणु हथियारों को ले जाने में सक्षम है. इसके साथ ही उन्होंने पोसाइडन के भी परीक्षण की बात भी कही है जो पानी के अंदर संचालित होने वाला परमाणु हथियार से लैस एक ड्रोन है.
इसके तुरंत बाद, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि उनका देश भी अब परमाणु हथियारों का परीक्षण शुरू करने जा रहा है. यह क़रीब 30 साल से चली आ रही रोक को ख़त्म करना होगा. इसके कुछ ही दिनों के बाद पुतिन ने कहा कि अगर अमेरिका परीक्षण शुरू करता है तो रूस भी पीछे नहीं हटेगा, वह भी ऐसा ही करेगा. अमेरिका ने 1992 से परमाणु परीक्षणों पर खुद रोक लगा रखी है, हालांकि, परीक्षण फिर से शुरू करने के लिए जितनी क्षमता की ज़रूरत है, उसने वह बनाए रखी है.
“साल 2020 से, चीन ने अपने परमाणु हथियारों की संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा बढ़ा ली है और अब उसके पास क़रीब 600 परमाणु हथियार हैं।”
ट्रंप की इस घोषणा का क्या मतलब है, यह तो अभी साफ़ नहीं हो सका है, मगर विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षण के चार पहलुओं पर अमेरिका आगे बढ़ सकता है. पहला, सीधा-सीधा विस्फोटक परीक्षण, जिसके कारण भूकंप के झटके आ सकते हैं और इसका पता भूकंपीय स्टेशनों के वैश्विक नेटवर्क द्वारा आसानी से लगाया जा सकता है. दूसरा, सुपर क्रिटिकल टेस्ट, जिसमें एक रिएक्शन से एक या अधिक रिएक्शन होते रहते हैं, पर इसमें भूकंप नहीं आते. तीसरा, सब क्रिटिकल टेस्ट है, जो नियमित रूप से किया जाता है, जिसमें परमाणु शक्ति संपन्न देश लेजरों और सुपरकंप्यूटरों के माध्यम अपने हथियारों की विश्वसनीयता जांचते हैं, जैसा कि अमेरिका के नेशनल इगनिटेशन फैकल्टी और चीन के मियांयांग केंद्र में है. और चौथा है, उन प्रणालियों का परीक्षण, जिनके माध्यम से किसी परमाणु हथियार को उसके लक्ष्य तक पहुंचाया जाता है, यानी परमाणु वितरण प्रणालियां.
अमेरिका ने चीन और रूस पर ‘सुपर क्रिटिकल’ हाइड्रोन्यूक्लियर परीक्षण करने का आरोप लगाया है, जिसके बारे में उसका कहना है कि यह व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) का उल्लंघन है, क्योंकि ऐसे परीक्षणों में रिएक्शन की शृंखला बनती है और इसीलिए संधि की परिभाषा के अनुसार, यह परमाणु विस्फोट माना जाता है। CTBT पर 187 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं, जबकि 178 देशों ने इसका अनुसमर्थन किया है, यानी औपचारिक रूप से मंजूरी दी है. मगर यह संधि अब तक लागू नहीं हो सकी है, क्योंकि परमाणु क्षमताओं वाले 44 (अनुलग्नक-।। देशों) देशों में से कुछ ने इसका अनुसमर्थन नहीं किया है. इन देशों में भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया भी शामिल हैं.
परमाणु क्षेत्र के अन्य मुद्दे भी इसी तरह चर्चा का विषय बने हुए हैं. जैसे- साल 2020 से, चीन ने अपने परमाणु हथियारों की संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा बढ़ा ली है और अब उसके पास क़रीब 600 परमाणु हथियार हैं. माना जाता है कि वह हर साल लगभग 100 परमाणु हथियार बना रहा है. 2025 की शुरुआत तक, उसने अपने उत्तरी रेगिस्तानी हिस्से में तीन और पूर्व के पहाड़ी इलाकों में तीन, कुल छह नए अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) साइलो को बनाने का काम क़रीब-क़रीब पूरा कर लिया था. इन साइलो में मिसाइलें रखी जा सकती हैं या प्रक्षेपित की जा सकती हैं. चीन के पास लगभग उतने ही साइलो हैं, जितने अमेरिका में हैं. चीन ने अभी तक इसे कबूला नहीं है, लेकिन उसने ‘रणनीतिक संतुलन बनाने’ की बात ज़रूर कही है.
“अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि उनका देश भी अब परमाणु हथियारों का परीक्षण शुरू करने जा रहा है।”
एक और मुद्दा है, ट्रंप प्रशासन की अस्पष्ट गठबंधन नीति से घबराये हुए देशों का परमाणु क्षमता की दहलीज़ को पार करने की मंशा जताना. इनमें दक्षिण कोरिया, जापान, पोलैंड और जर्मनी जैसे देश शामिल हो सकते हैं. ईरान भी अपनी परमाणु सुविधाओं के नुक़सान से उबरने लगा है और निश्चित रूप से अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने पर विचार कर रहा है.
यूक्रेन की दुर्दशा सबका ध्यान खींच रही है. इसने पांच घोषित परमाणु-शक्तियों से सुरक्षा गारंटी मिलने के बदले अपने परमाणु हथियार सौंपे थे. 1994 में जब तत्कालीन सोवियत संघ का पतन हो गया, तब इससे परमाणु हथियार सौंपने को कहा गया था. इसके बदले में गारंटी देने वाले देशों ने यूक्रेन ही नहीं, बेलारूस और कज़ाकिस्तान के ख़िलाफ़ भी सैन्य बल का उपयोग न करने का आश्वासन दिया था.
वैसे, अमेरिका और रूस के पास कुल 5,000 से ज़्यादा परमाणु हथियार हैं और उन्होंने 1700-1700 परमाणु हथियार तैनात कर रखे हैं. परमाणु युद्ध की स्थिति में ही एक-दूसरे के ख़िलाफ़ इसके इस्तेमाल की बात कहकर इन हथियारों की तैनाती की गई थी. अमेरिका अब चीन के परमाणु हथियार भंडार से अपनी तुलना कर रहा है और इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या उसके पास जितने हथियार हैं, वे पर्याप्त हैं। इतना ही नहीं, उसे रूस की नई वितरण प्रणाली की चिंता भी सता रही होगी. कांग्रेस द्वारा बनाए गए एक आयोग ने भी 2024 में यह सिफ़ारिश की थी कि चीन की बढ़ती परमाणु क्षमता के मद्देनजर अमेरिका अपने परमाणु ज़ख़ीरे का विस्तार करे.
फिलहाल, रूस और अमेरिका, दोनों ही न्यू START संधि का पालन कर रहे हैं, जिसकी समय-सीमा फरवरी, 2026 में ख़त्म हो रही है. हथियार नियंत्रण समझौतों के हालिया निराशाजनक रिकॉर्ड को देखते हुए, इस समझौते के आगे बढ़ने की शायद ही उम्मीद है. चीन ने अपनी ओर से साफ़ कर दिया है कि उसे हथियार नियंत्रण के लिए होने वाली वार्ताओं में कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि वह रूस और अमेरिका की परमाणु क्षमताओं के बराबर ताक़त हासिल करना चाहता है.
एक और बदलाव है, जो भारत के लिए चिंता का विषय है. असल में, पाकिस्तान ने 27वां संविधान संशोधन करके पाकिस्तानी परमाणु शस्त्रागार का विशेष नियंत्रण फील्ड मार्शल असीम मुनीर को सौंप दिया है. वहां पहले यह व्यवस्था परमाणु कमान प्राधिकरण (NCA) के हाथों में थी, जिसका गठन 2000 में किया गया था. इसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करते थे और इसमें तीनों सेनाओं के प्रमुखों व ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (CJCSC) के अध्यक्ष शामिल थे. अब CJCSC का पद ख़त्म कर दिया गया है. चूंकि असीम मुनीर अब न सिर्फ़ सेना प्रमुख हैं, बल्कि रक्षा बलों के प्रमुख (CDF) की नई भूमिका में भी हैं. इस तरह वह सभी सेना प्रमुखों से ऊपर हैं और वही नवगठित राष्ट्रीय सामरिक कमान (NSC) के कमांडर को नियुक्त करेंगे. यह कमान NCA की जगह पर बनाया गया है. संक्षेप में कहें, तो इस व्यवस्था के तहत अब पाकिस्तान में परमाणु उपयोग करना है या नहीं, इसका फैसला जनता द्वारा चुने गए नेता से छिटककर एक गैर-निर्वाचित नेतृत्व के हाथों में आ गया है.
“संक्षेप में कहें, तो इस व्यवस्था के तहत अब पाकिस्तान में परमाणु उपयोग करना है या नहीं, इसका फैसला जनता द्वारा चुने गए नेता से छिटककर एक गैर-निर्वाचित नेतृत्व के हाथों में आ गया है।”
जैसा कि सभी जानते हैं, पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियार ‘भारत के संदर्भ’ में विकसित किए हैं. इस्लामाबाद ने ‘प्रथम प्रयोग’ नीति को अपनाया है, जिसके अनुसार वह ‘फुल स्पेक्ट्रम डिटरन्स’ (सामरिक से लेकर रणनीतिक तक, सभी स्तरों पर आक्रमण को रोकने के लिए पारंपरिक व परमाणु शक्ति का इस्तेमाल करना) के लिए रणनीतिक और सामरिक तौर पर परमाणु हथियारों का उपयोग तब कर सकता है, जब भारत के साथ युद्ध में उसका महत्वपूर्ण हिस्सा उसके हाथों से निकल रहा हो, उसकी थल या वायु सेना को बड़ा नुकसान हो जाए, अर्थव्यवस्था यदि ख़त्म हो रही हो या पाकिस्तान राजनीतिक व्यवस्था को अस्थिर करने की कोई साज़िश हो.
उधर, राष्ट्रपति ट्रंप के कहने पर अमेरिका गोल्डन डोम मिसाइल रक्षा परियोजना को आगे बढ़ा रहा है, जिसका मक़सद अंतरिक्ष आधारित सेंसर और उपग्रहों का इस्तेमाल करके मिसाइल हमलों से बचाव करना है. हालांकि, विशेषज्ञों का तर्क है कि यह वास्तव में हथियारों की नई दौड़ शुरू कर सकता है. परमाणु युग की शुरुआत से ही इस सोच के कारण शांति बनी हुई है कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से एक-दूसरे का विनाश ही होगा. मगर अब ढाल बनने वाली यह सोच ख़त्म हो सकती है, क्योंकि सभी विरोधी एक-दूसरे की नई क्षमताओं को रोकने या उसे हराने की कोशिश करेंगे. इसका नतीजा नई और अधिक से अधिक मिसाइलें, डिकॉय और पोसाइडन की तरह पानी के नीचे स्वचालित होने वाली टॉरपीडो जैसी वितरण प्रणालियों के रूप में सामने आ सकता है.
इस महीने की शुरुआत में, राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि उनके नेतृत्व में चीन, रूस और अमेरिका ‘परमाणु निरस्त्रीकरण की योजना पर काम कर रहे हैं’. यह किसी दूसरी बातों के संदर्भ में कहा गया था और इसके बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी सामने नहीं आ सकी है. हालांकि, समस्या यही है कि इस स्तर पर हथियार नियंत्रण के प्रयास न केवल रुक गए हैं, बल्कि अमेरिका और रूस के बीच समझौतों की समय-सीमा भी धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है.
“साफ़ है, मौजूदा राजनीतिक माहौल में, हथियारों पर वार्ताओं की संभावनाएं कम हैं, और हालात उन ताक़तों के पक्ष में दिख रहे हैं, जो हथियारों की नई दौड़ को बढ़ावा दे रही हैं।”
ट्रंप काफ़ी समय से परमाणु वार्ता की बात कह रहे हैं. वर्ष 2020 में, उन्होंने चीन, रूस और अमेरिका को लेकर एक त्रिपक्षीय वार्ता शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सके. राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद, उन्होंने विश्व आर्थिक मंच को बताया था कि परमाणु हथियारों की विनाशकारी क्षमताओं पर भारी मात्रा में ख़र्च किए जा रहे हैं, और कोई भी इस पर बात करने को तैयार नहीं है. ‘इसीलिए, हम देखना चाहते हैं कि क्या हम परमाणु निरस्त्रीकरण कर सकते हैं, और मुझे लगता है कि यह बहुत हद तक संभव है’
इस पर रूस ने तत्काल यह कहकर प्रतिक्रिया दी थी कि वह जल्द से जल्द हथियार नियंत्रण वार्ता को फिर से शुरू करना चाहता है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि ऐसी वार्ताएं दुनिया और देश, दोनों के हित में हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि गेंद अब अमेरिका के पाले में है.
शस्त्र नियंत्रण समझौतों की स्थिति
स्रोत- लेखक द्वारा संकलित
हालांकि, चीन ने साफ़-साफ़ कह दिया है कि वह किसी भी परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रयास में हिस्सा नहीं लेगा. चीन की प्रवक्ता माओ निंग ने ट्रंप के परमाणु निरस्त्रीकरण के दावे को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि ‘चीन के पास जितनी परमाणु ताक़त है, वह अमेरिका और रूस के मुकाबले काफ़ी कम हैं, इसलिए इस समय परमाणु हथियार नियंत्रण वार्ता में शामिल होने के लिए मजबूर करना अनुचित, अविवेकपूर्ण और अव्यावहारिक होगा’
साफ़ है, मौजूदा राजनीतिक माहौल में, हथियारों पर वार्ताओं की संभावनाएं कम हैं, और हालात उन ताक़तों के पक्ष में दिख रहे हैं, जो हथियारों की नई दौड़ को बढ़ावा दे रही हैं.
(मनोज जोशी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विशिष्ट फेलो हैं)
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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...
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