जलवायु परिवर्तन और मानवजनित कारकों की कमज़ोरी की वजह से निपाह के प्रकोप का ख़तरा बहुत ज़्यादा है. संक्रमण के समय को कम करने और इसके प्रबंधन के लिए सही मायने में समग्र और समन्वित स्वास्थ्य दृष्टिकोण आवश्यक है.
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मानसून की आमद के साथ ही एक बार फिर निपाह वायरस का प्रकोप दिखने लगा है. इस बार इसका असर केरल की उत्तरी जिलों में दिख रहा है. दो हफ्ते में निपाह वायरस से 2 लोगों की मौत के बाद केरल ने 600 से ज़्यादा लोगों को निगरानी में रखा है. इनके बारे में माना जा रहा है कि ये लोग निपाह वायरस से संक्रमित लोगों के संपर्क में आए होंगे. 2018 के बाद से केरल में निपाह वायरस का ये सातवां प्रकोप है. ये दिखाता है कि पशुजनित बीमारियों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण प्रतिरोधात्मक उपाय विकसित करने कितने ज़रूरी है. इसके अलावा ये एकजुट स्वास्थ्य पहलों और विज्ञान कूटनीति की आवश्यकता को उजागर करता है.
निपाह वायरस (NiV) को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने प्राथमिक रोगजनक के रूप में सूचीबद्ध किया गया है क्योंकि ये व्यापक महामारी का कारण बनने की संभावनाएं रखता है. फल खाने वाले चमगादड़ निपाह वायरस के प्राकृतिक वाहक का काम करते हैं. संक्रमित चमगादड़ का स्राव इस वायरस को मध्य मेजबान जैसे कि सुअरों, फलों या खजूर के रस पर संचारित कर सकते हैं. मनुष्यों में संक्रमण तब होता है, जब मनुष्य (1) संक्रमित फल का सेवन करते हैं; (2) संक्रमित मध्य मेज़बानों के संपर्क में आते हैं; (3) चमगादड़ की गंदगी या चमगादड़ के मल के संपर्क में आते हैं (जिसका उपयोग अक्सर खाद के रूप में किया जाता है); या (4) निपाह वायरस से संक्रमित रोगी के शारीरिक तरल पदार्थ के संपर्क में आते हैं. पहली बार इस वायरस की पहचान 1998-1999 के बीच मलेशिया में सुअर पालने वाले किसानों में की गई थी, जहां संक्रमित सूअरों के सीधे संपर्क में आने के कारण 100 से अधिक मौतें हुईं. इसके बाद 2001 से दक्षिण एशिया, जिसमें बांग्लादेश और भारत शामिल हैं, में कई बार निपाह वायरस का प्रकोप दिखा. इस बीमारी में मृत्यु दर 40-75 प्रतिशत है, जो काफ़ी चिंताजनक है. केरल में वर्तमान में इसका प्रकोप शायद दूषित फलों के सेवन से संबंधित है. हालांकि अभी तक ये निश्चित नहीं है.
केरल में निपाह वायरस का प्रकोप दिखाता है कि पशुजनित वायरस के प्रसार की घटनाएं जारी हैं. इसे लेकर विभिन्न स्वास्थ्य उपायों में समन्वय स्थापित करना ज़रूरी है. निपाह वायरस के संचरण की गतिशीलता का पता लगाना, इसके प्रकोपों का प्रबंधन और पूर्वानुमान करने के लिए महत्वपूर्ण है. आर्थिक प्रथाओं, सामाजिक-संस्कृतिक कारकों, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता का संयोग फल खाने वाले चमगादड़ के पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव लाता है. ये वायरस के संचरण के पैटर्न पर भी प्रभाव डालता है. इसे लेकर किए गए पिछले अध्ययन ने निपाह वायरस के संचरण को काजू और सुपारी के बागों से जोड़ा है. ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि वायरल संचरण को प्रेरित करने वाले कारकों के बारे में सामुदायिक जागरूकता को बढ़ाया जाए. लोगों से उन व्यवहारों को अपनाने के लिए कहा जाए, जो संक्रमण फैलने की घटनाओं को रोक सकते हैं.
2018 के बाद से केरल में निपाह वायरस का ये सातवां प्रकोप है. ये दिखाता है कि पशुजनित बीमारियों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण प्रतिरोधात्मक उपाय विकसित करने कितने ज़रूरी है.
एक स्वास्थ्य पहल को वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंडे में शामिल किया गया है. एक स्वास्थ्य संयुक्त कार्य योजना निगरानी उपायों और प्रतिक्रिया क्षमताओं को मज़बूत करने की रणनीतियों पर ज़ोर देती है. भारत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर अत्याधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन को सुविधाजनक बनाने के लिए एक अंतर-मंत्रालय समूह - राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य मिशन - की शुरुआत की है. हालांकि, निपाह वायरस जैसे प्रकोपों पर तेज़ी से प्रतिक्रिया करने की भारत की क्षमता बहुत हद तक एक संयुक्त कानूनी ढांचे पर बहुत निर्भर करती है, क्योंकि ये समन्वित प्रयास करने की अनुमति देता है. सबसे पहले एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकालीन प्रबंधन अधिनियम बनाए जाने की ज़रूरत है. ये एक्ट बनाए जाने से मानव, पशु और पर्यावरणीय नमूनों की निगरानी करने में मदद मिलेगी. पूर्वानुमान क्षमताओं के साथ प्रारंभिक-चेतावनी प्रणालियों का कार्यान्वयन, डेटा प्रबंधन पोर्टलों का एकीकरण किया जा सकेगा. आपातकालीन चिकित्सा उपायों के विकास के लिए सार्वजनिक-निजी साझेदारियों (पीपीपी) को सुव्यवस्थित करना होगा. इतना ही नहीं ये अधिनियम राष्ट्रीय जैव सुरक्षा और जैव सुरक्षा नेटवर्क का कार्यान्वयन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पहलों की सुविधा को सक्षम करेगा.
निपाह वायरस के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती लाइसेंस प्राप्त वैक्सीन या उपचार की कमी है. निपाह-संबंधित स्वास्थ्य देखभाल के विकास की आवश्यकता को समझते हुए कई हितधारक इसके उपचार का उपाय खोजने में जुटे हैं. इसमें वैश्विक स्वास्थ्य संघ जैसे महामारी से निपटने की तैयारी नवाचार के लिए गठबंधन (सीईपीआई), निजी कंपनियां, शिक्षण और अनुसंधान संगठन और विभिन्न सरकारें शामिल हैं. ये सब मिलकर विज्ञान सहयोग को सुविधाजनक बनाते हैं.
कई निपाह वैक्सीन विकास के विभिन्न चरणों में हैं. ध्यान देने वाली बात ये है कि इसे लेकर पब्लिक हेल्थ वैक्सीन कैंडिडेट (पीएचवी-02) ने लेकर काफ़ी सफलता हासिल की है. ये एक वायरल-वेक्टर आधारित प्लेटफार्म है, जिसने बांग्लादेश में फेज़-वन का क्लीनिकल टेस्ट पास किया था. सीईपीआई अब पीएचवी-02 को दूसरे चरण के क्लीनिकल टेस्ट के लिए 17.3 मिलियन डॉलर का फंड प्रदान करेगा. सीईपीआई का लक्ष्य NiV वैक्सीन का भंडार बनाने का है, जिससे इस बीमारी के व्यापक प्रकोप की स्थिति में तुरंत वैक्सीन की आपूर्ति की जा सके. सीईपीआई द्वारा फंड की गई एक और संस्था ChAdOx1, निपाह-बी के पहले चरण के क्लीनिकल टेस्ट से गुजर रही है. इसे ऑक्सफोर्ड वैक्सीन समूह द्वारा संचालित किया जा रहा है. इस संस्था को हाल ही में यूरोपीय औषधि एजेंसी (ईएमए) द्वारा इसके विकास और नियामक स्वीकृति में तेज़ी देने के लिए प्राथमिकता दी गई है.
केरल में वर्तमान में इसका प्रकोप शायद दूषित फलों के सेवन से संबंधित है. हालांकि अभी तक ये निश्चित नहीं है.
निपाह वायरस पर महत्वपूर्ण शोध एंटीबॉडी विकसित करने के लिए समर्पित है क्योंकि इससे उन व्यक्तियों को प्रतिरोधक क्षमता हासिल करने में मदद मिलती है, जो संक्रमण के उच्च जोखिम में हैं, जैसे कि एक चिकित्सा कर्मी. जब किसी वायरस का प्रकोप होता है को वैक्सीन के माध्यम से मिली प्रतिरोधक क्षमता के प्रभाव प्रकट होने में समय लगेगा. इस संबंध में एक उल्लेखनीय प्रयोगात्मक एंटीबॉडी थेरेपी, m102.4 ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड स्वास्थ्य विभाग से मिली. केरल में 2018 और 2023 में निपाह वायरस के प्रकोपों के दौरान उसने सहानुभूतिपूर्ण के आधार पर ये थेरेपी प्रदान की. हालांकि ये उपचार का ये उपाय अभी क्लीनिकल ट्रायल के चरण में ही है. फेज़-1 के क्लीनिकल ट्रायल का उद्देश्य एक और थेरेपी, MBP1F5 की प्रभावशीलता की जांच करना है. इसे अमेरिका की यूनिफॉर्म्ड सर्विसेज यूनिवर्सिटी द्वारा विकसित किया गया है. भारत और बांग्लादेश में ये क्लीनिकल ट्रायल इसी साल सर्वारेजीएमपी और मैप बायोफार्मास्यूटिकल्स इंक. द्वारा किए जाएंगे. सीईपीआई ने क्लीनिकल ट्रायल और उत्पादन को आगे बढ़ाने के लिए 43.5 मिलियन डॉलर देने का वचन दिया है. वर्तमान में, ये उपचार सुरक्षा परीक्षण से गुजर रहा है. ये सुरक्षा जांच अमेरिकी रक्षा विभाग के रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु रक्षा के संयुक्त कार्यक्रम कार्यकारी कार्यालय के सहयोग से हो रही है. मैप बायोफार्मास्यूटिकल्स इंक. भी इसमें शामिल है.
इसके अलावा एक और ऐसी प्री-क्लीनिकल स्टडी हो रही है, जो इस बीमारी की अनूठी उपचार विधि विकसित करने की संभावनाएं रखती है. इस शोध पर ऑस्ट्रेलिया (क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी और कॉमनवेल्थ वैज्ञानिक औद्योगिक अनुसंधान संगठन) के शोधकर्ता चिली (ऑस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय, चिली) और चीन (चीन विज्ञान और तकनीकी विश्वविद्यालय) के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. इन्होंने एक नई उपचार विधि, डीएस-90 का विकास किया, जो नैनोबॉडी तकनीक का उपयोग करती है. ये तकनीक निपाह और एक अन्य पशुजनित वायरस (हैंड्रा वायरस) को विशिष्ट रूप से कोशिकाओं को संक्रमित करने की क्षमता को रोकने में सक्षम है. नैनोबॉडीज़ की एक विस्तृत श्रृंखला विभिन्न अनुसंधान और विकास के चरणों में है. ये नैनोबॉडी से उत्पन्न उपचारों की स्वीकृति द्वारा प्रेरित है. इसमें दुर्लभ रक्त विकार के लिए कैप्लाज़िज़ुमैब, रूमेटॉइड आर्थराइटिस के लिए ओज़ोरालिज़ुमैब और ठोस ट्यूमर के लिए एनवाफ़ोलिमैब शामिल हैं.
भारत में वायरस के प्रारंभिक नियंत्रण की आवश्यकता को पूरा करने के लिए, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने एक किट विकसित की है. लूप-मेडिएटेड आइसोथर्मल एम्प्लीफिकेशन (एलएएमपी) दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए बनाई गई ये एक ऐसी पोर्टेबल किट है, जो कम लागत पर निपाह वायरस के संक्रमण की जांच करने में सक्षम है. ये उपाय सरल है और पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (पीसीआर)-आधारित तकनीकों का एक कम लागत वाला विकल्प है. राष्ट्रीय डायग्नॉस्टिक्स कैटापुल्ट कार्यक्रम के तहत कई डायग्नोस्टिक किट विकसित की गईं, जिसे सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर प्लेटफार्म (C-CAMP) द्वारा स्वदेशी किट को बढ़ावा देने के लिए लॉन्च किया गया. NiV के खिलाफ़ एंटीवायरल प्लेटफॉर्म तकनीकों का विकास भारत के ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (टीएचएसटीआई) और राजीव गांधी सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी (आरजीसीबी) मिलकर कर रहे हैं.
जैव चिकित्सा शोध के क्षेत्र में प्रगति और क्लीनिकल टेस्ट में विकास से ये तो दिख रहा है कि हम इसके उपचारों की तरफ बढ़ रहे हैं. हालांकि, प्रतिकूल उपायों की आवश्यकता को संबोधित करने के लिए वैज्ञानिक सहयोग की विशाल संभावनाएं हैं. सहयोग की ये संभावनाएं भारत की जैव अर्थव्यवस्था के 300 अरब डॉलर के लक्ष्य के विस्तार में योगदान कर सकती हैं. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए राष्ट्रीय नीतियों के माध्यम से वैज्ञानिकों के बीच वैश्विक चुनौतियों और विदेश नीति के उद्देश्यों, जैसे कि स्वास्थ्य कूटनीति, के बारे में अधिक जागरूकता पैदा की जानी चाहिए. ऐसा करके विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों के बीच सद्भाव बढ़ेगा और बौद्धिक विभाजन को पाटा जा सकेगा. इसके लिए विकसित देशों से उच्च कौशल वाले शोधकर्ताओं को विकासशील देशों में लाने की कोशिश करनी चाहिए. रिसर्च फेलोशिप, स्टार्ट-अप अनुदान और युवा करियर शोधकर्ताओं के लिए विज़िटिंग फेलोशिप जैसी नीतियां लागू कर भारत इन कोशिशों में सफलता हासिल कर सकता है. भारत की बायोटेक्नोलॉजी के लिए जैव अर्थव्यवस्था-चालित दृष्टिकोण को अपनाना होगा. भारत अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी (BioE3) का विकास चाहता है. भारत के जैव प्रौद्योगिकी विभाग का स्टार्ट-अप समर्थन कार्यक्रम, बायोटेक्नोलॉजी इग्निशन ग्रांट स्कीम (बीआईजी), सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के बीच पुल का काम कर सकता है. ये अकादमिक और अनुसंधान से जुड़े उद्योग के साथ उपयोगी स्वास्थ्य देखभाल तकनीक के विकास को बढ़ावा दे सकते हैं. भारत ने अनुसंधान विकास नवाचार (आरडीआई) योजना के तहत हाल ही में इसके लिए एक लाख करोड़ का कोष बनाया है. ये महत्वपूर्ण स्वास्थ्य देखभाल प्रौद्योगिकियों की प्राथमिकता देने में सहायता कर सकता है और साथ ही बायोटेक सेक्टर में नवाचार को प्रोत्साहित कर सकता है.
सबसे पहले एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकालीन प्रबंधन अधिनियम बनाए जाने की ज़रूरत है. ये एक्ट बनाए जाने से मानव, पशु और पर्यावरणीय नमूनों की निगरानी करने में मदद मिलेगी. पूर्वानुमान क्षमताओं के साथ प्रारंभिक-चेतावनी प्रणालियों का कार्यान्वयन, डेटा प्रबंधन पोर्टलों का एकीकरण किया जा सकेगा.
अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों के साथ सहयोग से भारत को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों का विकास करने में मदद मिली है. इतना ही नहीं, इन प्रौद्योगिकियों ने अफ्रीका और एशिया में भारत की कूटनीतिक कोशिशों में योगदान दिया है. वैश्विक दृष्टिकोण से देखें तो विज्ञान कूटनीति किसी भी देश के रणनीतिक मूल्यों में इज़ाफा करती है. ये राष्ट्रीय हितों और वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करने के लिए विज्ञान का उपयोग है. हालांकि, वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में विज्ञान दबाव में है. वैज्ञानिक साक्ष्यों का राजनीतिकरण हो रहा है और अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगठनों की वैधता पर भी सवाल उठ रहे हैं. नवाचार और खोज में प्रगति जटिल होती जा रही है, जिसमें नॉन-स्टेट एक्टर्स की एक प्रमुख भूमिका होती है. विज्ञान और प्रौद्योगिकी में महाशक्ति बनने के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है. बायोटेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जैसी तकनीकों की दोहरे इस्तेमाल की क्षमताओं ने इसके दुरुपयोग के प्रति संदेह को बढ़ावा दिया है.
ऐसे में साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और विज्ञान में विश्वास को नीति चर्चा में वापस लाना चाहिए. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए विध्वंसक प्रौद्योगिकियों के खिलाफ़ सुरक्षा उपाय खोजे जाने चाहिए. नॉन-स्टेट एक्टर्स को मिली तकनीकी ताकत में व्यापक पारदर्शिता और जवाबदेही लाने की कोशिश करनी चाहिए. हाल ही में, यूरोपीय संघ (ईयू) ने ये प्रस्तावित किया कि विज्ञान कूटनीति को नेपथ्य में रखने की बजाए विदेश और सुरक्षा नीति के मूल में शामिल किया जाए. बायोटेक्नोलॉजी क्षेत्र में सहयोग, जैसे कि ईयू-भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी समझौता, ब्रिटेन-भारत प्रौद्योगिकी सुरक्षा पहल, अमेरिका-भारत TRUST (ट्रांसफॉर्मिंग द रिलेशनशिप यूटिलाइजिंग स्ट्रैटजिक टेक्नोलॉजी) और क्वाड बायोएक्सप्लोर महत्वपूर्ण चिकित्सीय विकास की अपार संभावनाएं रखते हैं.
निपाह वायरस जैसे प्राथमिक संक्रामक रोगों का सामना करने के लिए एक बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है. जलवायु परिवर्तन और मानवजनित कारकों की कमज़ोरी की वजह से निपाह के प्रकोप का ख़तरा बहुत ज़्यादा है. संक्रमण के समय को कम करने और इसके प्रबंधन के लिए सही मायने में समग्र और समन्वित स्वास्थ्य दृष्टिकोण आवश्यक है. जीवन-रक्षक चिकित्सा के विकास को रणनीतिक निवेश के माध्यम से आसान बनाया जा सकता है. ये बायोइकोनॉमी को भी मज़बूत करेगा. आखिर में ये कहा जा सकता है कि वैश्विक स्वास्थ्य चिंताओं जैसे कि निपाह वायरस से निपटने के लिए विज्ञान कूटनीति एक कड़ी चुनौती है. ये दिखाता है कि निपाह जैसी महामारी के उपचार को एक ऐसे उपकरण के रूप में देखा जाए, जो विभिन्न देशों के मतभेदों को दूर करने में सहायक हो सकती है. सभी देशों को सहयोग के क्षेत्रों की पहचान करके अपने लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए.
लक्ष्मी रामाकृष्णन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के हेल्थ इनीशिएटिव में एसोसिएट फेलो हैं.
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Lakshmy is an Associate Fellow with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. Her work focuses on the intersection of biotechnology, health, and international relations, with a ...
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