जिस समय एक बेहद संक्रामक वायरस तबाही मचा रहा हो, तब भारत अपने सबसे अधिक जोखिम वाले लोगों को भीड़ भरे टीकाकरण केंद्रों के कई चक्कर लगाने देने का ख़तरा मोल नहीं ले सकता.
ताज़ा आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि देश में टीकाकरण की संख्या में चिंताजनक रूप से कमी आ रही है. ये हाल तब है, जब टीका लगवाने के उपयुक्त लोगों का दायरा बढ़ाकर अब इसमें 18 साल से अधिक उम्र के हर नागरिक को शामिल कर लिया गया है. देश भर में प्रतिदिन लगाए जा रहे टीकों की संख्या में स्पष्ट रूप से कमी आने के बावजूद, आज राज्यों के कई ज़िले वैक्सीन की कमी झेल रहे हैं (Graph 1) भारत ने अब तक लगभग 16 करोड़ लोगों को कोरोना का टीका लगा लिया है. अब राज्यों के पास कोरोना के टीकों की केवल 58 लाख ख़ुराक बची हुई है. अब जबकि वैक्सीन को ख़रीदने की संख्या से ऐसा लग रहा है कि अगले तीन महीने तक देश में टीकों की कमी बनी रहेगी, तो भारत को चाहिए कि वो टीका लगाने की ऐसी रणनीति अपनाए जिससे बड़े पैमाने पर टीका लगाने की अपेक्षाओं को थोड़ा कम किया जा सके.
सरकार द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार ने कुल मिलाकर कोरोना वैक्सीन की 16.54 करोड़ ख़ुराक राज्यों के साथ साझा की थी. इनमें से केवल 58 लाख डोज़ ही इस वक़्त कोल्ड चेन में है. बाक़ी टीके लोगों को लगाए जा चुके हैं. वैक्सीन की कमी से निपटने के लिए अब केंद्र सरकार द्वारा अगले कुछ दिनों में राज्यों को 56 लाख टीके और उपलब्ध कराए जा रहे हैं. केंद्र सरकार ने सफ़ाई दी है कि उसने पिछले ही हफ़्ते कोविशील्ड वैक्सीन की 11 करोड़ ख़ुराक का ऑर्डर दिया था. इसके साथ साथ कोवैक्सिन की पांच करोड़ डोज़ का ऑर्डर भी दिया गया है. जुलाई के अंत तक कोविशील्ड की 12 करोड़ और कोवैक्सिन की छह करोड़ डोज़ सरकार को मिलने वाली है. इसमें पहले से दिए गए ऑर्डर के बचे हुए टीके भी शामिल हैं. हम अगर ये मानकर चलें कि अगले तीन महीनों में वादे के मुताबिक़ वैक्सीन की ये सारी ख़ुराक निर्माताओं द्वारा उपलब्ध करा दी जाती है, तो केंद्र सरकार को अगले तीन महीनों के दौरान कोरोना के टीकों की 19.44 करोड़ ख़ुराक उपलब्ध कराई जा चुकी होगी (इसमें से 18 करोड़ डोज़ दो कंपनियों सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक मुहैया कराएंगी और बाक़ी के टीके पहले ही उपलब्ध कराने की या तो कोशिश हो रही है या वो राज्यों के पास मौजूद हैं). इनसे 45 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों को वैक्सीन दी जाएगी, क्योंकि केंद्र सरकार इसी आयु वर्ग के लोगों को पहले कोरोना का टीका लगाने पर ज़ोर दे रही है. वहीं राज्य सरकारें और निजी क्षेत्र 18 साल से अधिक और 45 साल के कम आयु वर्ग के लोगों के टीकाकरण की ज़िम्मेदारी उठा रहे हैं. (Table 1)
Table 1:भारत में वैक्सीन की आपूर्ति की स्थिति (मई-जुलाई 2021: ख़ुराक दस लाख में.
| कोविशील्ड | कोवैक्सीन | कुल | |
| राज्यों का स्टॉक | NA | NA | 5.8 |
| पाइपलाइन में | NA | NA | 5.6 |
| पिछले ऑर्डर का बचा | 12 | 11 | 23 |
| जुलाई तक मिलेगा | 110 | 50 | 160 |
| कुल (केंद्र की योजना) | 122 | 61 | 194.4 |
| राज्यों और निजी अस्पतालों के पास | 110 | 29 | 139 |
| कुल संख्या | 232 | 90 | 333.4 |
ये आकलन किन अनुमानों पर आधारित है:
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स्रोत: सरकार और कंपनी की प्रेस ब्रीफ़िंग
केंद्र सरकार की योजना के समानांतर, सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया का लक्ष्य राज्यों और निजी अस्पतालों को वैक्सीन की 11 करोड़ अतिरिक्त ख़ुराक उपलब्ध कराना है. इनका इस्तेमाल अधिकतर 18-45 उम्र वाले लोगों को टीका लगाने के लिए किया जाएगा (क्योंकि अन्य आयु वर्ग के लोगों के लिए केंद्र सरकार से टीकों की आपूर्ति होती रहेगी). फिलहाल कोवैक्सिन के बारे में ऐसा कोई आकलन उपलब्ध नहीं है. इसीलिए, जुलाई के अंत तक भारत के पास कोरोना के टीकों की 33.44 करोड़ ख़ुराक उपलब्ध होंगी. इसके अलावा हमें स्पुतनिक V वैक्सीन की भी कुछ लाख डोज़ मिलेंगी. ये संख्या कितनी होगी ये सरकार के ख़रीद के फ़ैसलों और आयात की तादाद पर निर्भर करेगी. रूस की इस वैक्सीन का आयात शुरू हो चुका है. लेकिन, स्पुतनिक की कब, कितनी ख़ुराक आयात की जाएगी, ये जानकारी अभी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है. एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन की दो करोड़ डोज़ अगले कुछ महीनों के दौरान अमेरिका से भी आयात की जाएगी. लेकिन, हमने इस हिसाब-किताब में अमेरिका से आने वाली वैक्सीन को नहीं जोड़ा है, क्योंकि अभी उपलब्ध होने वाले टीकों में कुछ तो बर्बाद भी होंगी.
सीरम इंस्टीट्यूट ने हाल ही में घोषणा की है कि कंपनी ब्रिटेन में अपने टीकों के कारोबार के विस्तार के लिए 24 करोड़ पाउंड का निवेश करेगी, जिसमें टीकों का संभावित निर्माण भी शामिल है. कंपनी के इस फ़ैसले का उसके भारत में विस्तार की योजनाओं पर असर पड़ सकता है. भारत में स्थित सीरम की इकाइयों में कोविशील्ड की मासिक उत्पादन क्षमता जुलाई महीने के अंत तक 6-7 करोड़ डोज़ ही रहने वाली है.
भारत बायोटेक ने मार्च में अपने कोवैक्सिन टीके की 1.5 करोड़ ख़ुराक का उत्पादन किया था. अप्रैल में उसने ये उत्पादन क्षमता बढ़ाकर दो करोड़ डोज़ कर ली थी. कंपनी का लक्ष्य ये है कि वो मई तक अपने टीकों की उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर तीन करोड़ ख़ुराक तक पहुंचा ले. अपनी निर्माण क्षमता का विस्तार करते हुए, कंपनी का दावा है कि वो अगस्त 2021 तक हर महीने 7 करोड़ टीके बनाने लगेगी.
रूस से स्पुतनिक वैक्सीन की पंद्रह लाख डोज़ भारत पहले ही पहुंच चुकी है. इसके आपातकालीन इस्तेमाल को मंज़ूरी भी दी जा चुकी है. हालांकि, इस वैक्सीन के लिए और अधिक कोल्ड चेन की ज़रूरत होगी.
इसके साथ साथ स्पुतनिक V वैक्सीन की 25 करोड़ ख़ुराक का आयात भी इस साल होना है. इसकी शुरुआत इसी महीने से हो रही है. स्पुतनिक वैक्सीन की 85 करोड़ ख़ुराक का उत्पादन आगे चलकर भारत में ही होना है. लेकिन, ख़बर ये है कि इसमें से अधिकतर ख़ुराक भारत के बजाय अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के लिए होगी. रूस से स्पुतनिक वैक्सीन की पंद्रह लाख डोज़ भारत पहले ही पहुंच चुकी है. इसके आपातकालीन इस्तेमाल को मंज़ूरी भी दी जा चुकी है. हालांकि, इस वैक्सीन के लिए और अधिक कोल्ड चेन की ज़रूरत होगी. ऐसे में स्पुतनिक वैक्सीन का वितरण और इस्तेमाल शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रहने की संभावना है. अभी इस वैक्सीन का बाज़ार मूल्य नहीं घोषित किया गया है. सीरम इंस्टीट्यूट के कोवोवैक्स टीके का उत्पादन, इस साल के अंत में जाकर ही शुरू हो सकेगा. क्योंकि, बिना मंज़ूरी के जोखिम के आधार पर टीकों का निर्माण कच्चे माल की कमी से रुका हुआ है. जहां तक जॉनसन ऐंड जॉनसन के टीके की बात है, तो सिर्फ़ एक ख़ुराक पर्याप्त रहने वाली ये वैक्सीन बहुत जल्द भी भारत पहुंची तो भी जुलाई 2021 में ही उपलब्ध हो सकेगी. इन्हीं कारणों से आने वाले तीन महीनों में भारत अपने कोविड-19 टीकाकरण अभियान के लिए कोविशील्ड और कोवैक्सिन टीकों पर ही निर्भर बना रहेगा.
सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध आंकड़े इशारा करते हैं कि आने वाले तीन महीनों में भारत के पास लगाने के लिए लगभग 37 लाख टीके प्रतिदिन उपलब्ध होंगे. इनमें राज्यों और निजी अस्पतालों द्वारा वितरित ख़ुराकें भी शामिल हैं. केंद्र की योजना के तहत प्राथमिकता वाले समूह के लोगों को हर दिन क़रीब 22 लाख टीके लगाए जा सकेंगे. यहां हमें इस बात का ध्यान रखने की ज़रूरत है कि ये सभी आंकड़े बेहद सख़्त आकलन पर आधारित हैं. जैसे कि सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक द्वारा अन्य देशों को टीकों का निर्यात बिल्कुल नहीं होगा. हालांकि, इसकी संभावना बेहद कम है. इसका मतलब ये होगा कि ज़मीनी स्तर पर टीके लगाए जाने की संख्या इससे भी कम ही होने की आशंका है.
भारत इस समय 1947 में देश के बंटवारे के बाद से सबसे भयंकर संकट से जूझ रहा है. ऐसे में टीकाकरण केंद्रों के सुपर स्प्रेडर केंद्र बन जाने का ख़तरा ऐसा है, जो भारत क़तई मोल नहीं लेना चाहेगा.
अब जबकि 7 दिन में लगने वाले टीकों का औसत एक महीने पहले की 36 लाख ख़ुराक से घटकर अब 17 लाख डोज़ प्रतिदिन तक आ गया है, तो भारत को अब संक्रमण के अधिक जोखिम वाले लोगों को टीका लगाने को तरज़ीह देने को बाध्य होना पड़ेगा. इससे 18 साल से अधिक उम्र के लोगों तक टीका पहुंचा पाना मुश्किल होगा. ऐसी स्थिति में हमें इटली के तजुर्बे से सबक़ सीखना चाहिए. इटली में कोविड-19 टीकाकरण अभियान पर ‘बहुत अधिक संख्या में ग़लत लोगों’ को शामिल किए जाने के आरोप लगे थे. इटली की सरकार ने बुज़ुर्गों से ज़्यादा युवा वर्ग को टीके लगाने को तरज़ीह दी. जिसके चलते कोरोना से ऐसे बुज़ुर्गों की मौतें भी हुईं, जिन्हें बचाया जा सकता था.
इसके अतिरिक्त, शहरों के ज़मीनी सबूत ये संकेत देते हैं कि बुज़ुर्गों को कोरोना का टीका लगाने के लिए टीकाकरण केंद्रों के कई चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. ऐसे में इस समस्या का त्वरित समाधान करना नैतिक रूप से भी ज़रूरी बन जाता है. जिस समय एक बेहद संक्रामक वायरस तबाही मचा रहा हो, तब भारत अपने सबसे अधिक जोखिम वाले लोगों को भीड़ भरे टीकाकरण केंद्रों के कई चक्कर लगाने देने का ख़तरा मोल नहीं ले सकता. ऐसे लोग अगर टीके लगवाने के लिए घंटों लाइन में लगे रहेंगे और अंत में उन्हें ये बताया जाएगा कि टीके तो उपलब्ध ही नहीं हैं. भारत इस समय 1947 में देश के बंटवारे के बाद से सबसे भयंकर संकट से जूझ रहा है. ऐसे में टीकाकरण केंद्रों के सुपर स्प्रेडर केंद्र बन जाने का ख़तरा ऐसा है, जो भारत क़तई मोल नहीं लेना चाहेगा.
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Oommen C. Kurian is Senior Fellow and Head of the Health Initiative at the Inclusive Growth and SDGs Programme, Observer Research Foundation. Trained in economics and ...
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