पहले ज़रा-सी कागज़ी गलती भी कारोबारियों को अदालत और जेल के डर तक ले जाती थी, जिससे व्यापार करना मुश्किल हो जाता था. अब जन विश्वास 2.0 उसी कहानी को बदल रहा है- गलती पर सज़ा नहीं, पहले सुधार का मौका, ताकि कारोबार डर से नहीं बल्कि भरोसे के साथ आगे बढ़े. पढ़ें पूरा विश्लेषण.
भारत की जटिल और औपनिवेशिक अनुपालन प्रणाली को सुधारने की यात्रा एक विचार से प्रेरित हुई, जिसे एक पायलट विधायी ढांचे के माध्यम से आगे बढ़ाया गया, और यह व्यवसाय करने की प्रक्रिया को आसान बना रही है. यह एक साफ़-सुथरी और सक्षम नीति ‘डिसैलेशन’ प्रक्रिया का उपयोग करती है, जो नियामक अड़चनों को कम करेगी और उद्यमियों और सरकारों दोनों के लिए विन-विन स्थिति बनाएगी.
यह विचार 10 फरवरी 2022 के ORF मोनोग्राफ ‘व्यापार करने के लिए जेल‘ में प्रस्तुत किया गया था. पायलट विधायी ढांचा 11 अगस्त 2023 के कानून जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम, 2023 (जन विश्वास 1.0) में संलग्न है. इसके बाद पुराने अनुपालन के रूप में विधिक ‘धूल’ की सफाई लोकसभा में 27 मार्च 2026 को जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) विधेयक, 2026 (जन विश्वास 2.0) के माध्यम से प्रस्तुत की गई.
जन विश्वास 2.0 में कुल 79 अधिनियम शामिल हैं, जिनमें से 70 व्यवसाय से संबंधित हैं. यह लगभग जन विश्वास 1.0 के 42 अधिनियमों का दुगना है. इसमें 784 धाराएँ संशोधित की गई हैं, जिनमें से 717 उद्यमियों पर प्रभाव डालती हैं, जो जन विश्वास 1.0 की तुलना में चार गुना अधिक है. जन विश्वास 1.0 और 2.0 के द्वारा किए गए कई संशोधन भारत के औपनिवेशिक काल में बने कानूनों से संबंधित हैं.
जन विश्वास कानूनों का मुख्य फोकस, एक लागू, एक संसद में प्रस्तुत और एक निर्माणाधीन, छोटे अपराधों की अपराधमुक्ति (decriminalisation) को तर्कसंगत बनाना है. इसका मतलब यह है कि ये उन प्रावधानों को संशोधित करते हैं जिनमें कैद की सजा होती थी और उन्हें आर्थिक दंड में बदल देते हैं, जिससे उद्यमियों के लिए अनजाने में हुई गलतियों, जैसे फाइलिंग की समय सीमा चूकना, के लिए जेल का खतरा कम हो जाता है, जबकि जानबूझकर किए गए अपराध, जैसे खाद्य और दवाओं में मिलावट, पर यह लागू नहीं होता.
जन विश्वास 2.0 में कुल 79 अधिनियम शामिल हैं, जिनमें से 70 व्यवसाय से संबंधित हैं. यह लगभग जन विश्वास 1.0 के 42 अधिनियमों का दुगना है. इसमें 784 धाराएँ संशोधित की गई हैं, जिनमें से 717 उद्यमियों पर प्रभाव डालती हैं, जो जन विश्वास 1.0 की तुलना में चार गुना अधिक है. जन विश्वास 1.0 और 2.0 के द्वारा किए गए कई संशोधन भारत के औपनिवेशिक काल में बने कानूनों से संबंधित हैं. संशोधित कानूनों का एक-दसवां हिस्सा, यानी 79 में से 8, इसी अवधि के हैं, जैसे कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स अधिनियम, 1940.
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जन विश्वा 2.0 का विवरण |
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कवर किए गए अधिनियम |
79 |
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औपनिवेशिक युग के दौरान कानून बनाए गए अधिनियम |
08 |
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व्यवसाय करने को प्रभावित करने वाले कार्य |
70 |
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कवर किए गए अनुभागों की संख्या |
784 |
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ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के लिए कवर किए गए अनुभागों की संख्या |
717 |
इन कानूनों को जिस लापरवाही से बनाया गया या दशकों तक जिस विधायी सुस्ती के साथ बनाए रखा गया, वह एक ऐसी नियामक व्यवस्था को दर्शाता है जिसकी जड़ें औपनिवेशिक काल में थी और जिसका उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को दबाना था. इसके बाद धन-विरोधी, उद्यमी-विरोधी और व्यवसाय-विरोधी नीतियों ने भारत को आर्थिक रूप से पीछे बनाए रखा. जन विश्वास 1.0 ने इस यात्रा की शुरुआत की, जन विश्वास 2.0 इसे आगे बढ़ा रहा है, और जन विश्वास 3.0 इस प्रक्रिया को मजबूत करेगा.
संक्षेप में, जन विश्वास 2.0 भारत के नियमों की जांच करके उन्हें बेहतर और आसान बनाने का काम करता है. पहले कई छोटे-छोटे नियम इतने सख्त थे कि मामूली गलती पर भी लोगों पर केस हो सकता था. जैसे अपरेंटिस अधिनियम, 1961 की धारा 30 के तहत अगर कोई संस्था तय संख्या में प्रशिक्षु नहीं रखती थी, तो उस पर मुकदमा चल सकता था. इसी तरह, किसी प्रशिक्षु से थोड़ा-सा प्रशिक्षण शुल्क लेना भी अपराध माना जाता था और जेल तक हो सकती थी.
इसका असर यह था कि छोटे व्यवसाय, जो पहले से ही बाजार की मुश्किलों से जूझ रहे होते हैं, वे छोटी प्रशासनिक या कागजी गलतियों के कारण भी आपराधिक मामलों में फंस जाते थे. यानी असली अपराध नहीं, बल्कि छोटी गलतियों के लिए भी सख्त सजा मिलती थी.
अब जन विश्वास 2.0 ने इस व्यवस्था को बदल दिया है. इसमें जेल की जगह जुर्माना और ‘सुधार नोटिस’ जैसी व्यवस्था लाई गई है, ताकि पहले गलती सुधारने का मौका मिले. इससे नियमों का पालन भी होता है और लोगों पर बेवजह का डर भी कम होता है. उदाहरण के लिए, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत सरकारी रिपोर्ट का विज्ञापन में उपयोग करने पर भी सजा हो सकती थी. अब ऐसे मामलों में आर्थिक दंड लगाया जाता है और बार-बार गलती पर अधिक जुर्माना तय है. इससे नियमों का पालन सुनिश्चित होता है, लेकिन व्यवसायों पर अनावश्यक आपराधिक दबाव कम होता है.
पहले ऐसे मामले सीधे अदालत और जेल तक पहुंचते थे, लेकिन अब उन्हें आसान और संतुलित प्रशासनिक तरीके से सुलझाया जा रहा है. इससे व्यवसायों को अपराधी नहीं, बल्कि नियमों का पालन करने वाले भागीदार के रूप में देखा जा रहा है. एक बड़ा बदलाव भरोसे पर आधारित व्यवस्था है.
महत्वपूर्ण अवसंरचना में भी पहले छोटी-छोटी तकनीकी या कामकाजी गलतियों पर सख्त कार्रवाई होती थी. विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 146 के तहत नियम न मानने पर जेल तक हो सकती थी, भले ही गलती परिस्थितियों के कारण हुई हो. अब नए बदलाव में इन जटिलताओं को समझते हुए केवल जवाबदेही तय की जा रही है, गलती को अपराध नहीं माना जा रहा. पहले ऐसे मामले सीधे अदालत और जेल तक पहुंचते थे, लेकिन अब उन्हें आसान और संतुलित प्रशासनिक तरीके से सुलझाया जा रहा है. इससे व्यवसायों को अपराधी नहीं, बल्कि नियमों का पालन करने वाले भागीदार के रूप में देखा जा रहा है. एक बड़ा बदलाव भरोसे पर आधारित व्यवस्था है. अब पहली गलती पर चेतावनी मिलती है और बार-बार गलती पर ही दंड लगता है, जिससे जानबूझकर और अनजाने में हुई गलती में फर्क किया जाता है.
इन सभी उदाहरणों को मिलाकर देखें तो जन विश्वास 2.0 के तहत एक व्यापक बदलाव दिखाई देता है. जो मामले पहले जेल की धमकी के साथ अदालतों तक पहुंचते थे, अब उन्हें क्रमिक, अनुपातिक और प्रशासनिक तरीकों से संभाला जा रहा है. यह व्यवसायों को अपराधी के रूप में देखने से हटकर उन्हें नियम-आधारित प्रणाली के सहभागी के रूप में देखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है, जहां अनुपालन लागू होता है, लेकिन डिफॉल्ट रूप से अपराध नहीं माना जाता.
जन विश्वास 1.0 को भारत में व्यवसाय करने की सुगमता को तुरंत बदल देने वाले ‘जादुई समाधान’ के रूप में नहीं बनाया गया था. यह राज्य नीति का एक शक्तिशाली घोषणात्मक साधन था. इस अधिनियम ने सरकार के नियामक दृष्टिकोण को बदलते हुए छोटी प्रक्रियात्मक त्रुटियों को आपराधिक दायित्व से अलग कर दिया. दार्शनिक रूप से, इसने नियंत्रण के मुख्य साधन के रूप में आपराधिक दंड के उपयोग को बदलकर, दंड की गंभीरता को अपराध की गंभीरता के अनुरूप करने पर जोर दिया.
दंडात्मक निगरानी से अनुपातिक प्रशासन की ओर यह बदलाव जेल की धमकी को हटाकर एक नागरिक-आर्थिक ढांचे से बदलता है, जिससे नियामक निगरानी को बनाए रखते हुए भरोसे का माहौल बनता है. यह अधिनियम एक प्रकार का कानूनी रीसेट है. भले ही अनुपालन लागत पर इसका संख्यात्मक प्रभाव मापा जा सकता है, लेकिन इसका वास्तविक महत्व विधायी मंशा को स्पष्ट रूप से स्थापित करने में है. यह ‘नियामकीय अतिरेक (regulatory overreach)’ को समाप्त करने और यह सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता है कि आपराधिक कानून केवल गंभीर उल्लंघनों के लिए ही इस्तेमाल हो, न कि प्रशासनिक गलतियों के लिए. जब जन विश्वास 2.0 लागू होगा, तो यह एक फोर्स मल्टीप्लायर की तरह काम करेगा.
इस बदलाव के महत्वपूर्ण परिणाम हैं. दशकों तक, छोटी-छोटी तकनीकी गलतियों को भी आपराधिक अपराध माना जाता था, जिनमें जेल की सजा का खतरा रहता था. ये प्रावधान औपनिवेशिक सोच से प्रेरित थे, विधायी रूप से कमजोर थे और इनमें गहराई से विचार का अभाव था. जन विश्वास 1.0 ने इस दृष्टिकोण से स्पष्ट रूप से दूरी बनाई.
अब कानून में बदलाव करके छोटी गलतियों पर जेल की सजा हटा दी गई है और उन्हें ‘नागरिक चूक’ माना गया है. इसका मतलब है कि हर गलती को अपराध नहीं माना जाएगा. पहले जहां डर के जरिए नियम लागू होते थे, अब वहां गलती के हिसाब से संतुलित कार्रवाई की जा रही है. इससे व्यवसायों को राहत मिलती है और वे बिना अनावश्यक डर के काम कर सकते हैं. एक और बड़ा बदलाव यह है कि फैसले लेने की जिम्मेदारी धीरे-धीरे अदालतों से हटाकर प्रशासनिक अधिकारियों को दी जा रही है. इससे मामलों का निपटारा जल्दी और आसान तरीके से हो सकेगा, क्योंकि अदालतें इतने छोटे-छोटे मामलों के लिए नहीं बनी थीं. नए नियमों के साथ अधिकारी स्थिति को समझकर सही फैसला ले सकते हैं.
यह भी देखा जाता है कि गलती जानबूझकर की गई है या नहीं, जैसे धोखाधड़ी का इरादा. इसके अलावा, उस नियम के तहत कितने मामले दर्ज या लंबित हैं, यह भी ध्यान में रखा जाता है. इसमें मंत्रालय या विभाग यह भी देखते हैं कि मौजूदा सजा सही है या नहीं, और क्या वही गलती किसी दूसरे कानून में पहले से दंडनीय है, ताकि एक ही बात बार-बार न हो.
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है आर्थिक दंड का तर्कसंगत निर्धारण. ऐतिहासिक रूप से, दंड या तो पुराने हो चुके थे या असंगत रूप से लागू किए जाते थे. नया ढांचा स्पष्ट सीमाएँ, अद्यतन राशि और अधिक संरचित विवेक प्रदान करता है. इससे दंड वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप बने रहते हैं और मनमानेपन में कमी आती है. व्यवसायों के लिए इससे पूर्वानुमान (predictability) बढ़ता है, जो पहले अनुपालन प्रणाली में नहीं था. जन विश्वास 2.0 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कार्यपालिका के विवेक में कमी. पहले, किसी कार्य को ‘आपराधिक’ घोषित करना अक्सर मनमाना होता था या औपनिवेशिक सोच से प्रभावित होता था.
साथ ही, इस ढांचे में पर्याप्त प्रवर्तन शक्ति भी बनी रहती है. भले ही मूल अपराधों को अपराधमुक्त किया गया है, लेकिन नागरिक दंड का पालन न करने, खासकर भुगतान न करने पर, दंडात्मक कार्रवाई-जिसमें जेल भी शामिल हो सकती है-की संभावना बनी रहती है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि प्रणाली ढीली न पड़े, बल्कि एक परिपक्व अनुपालन दर्शन विकसित हो, जो इरादे और गलती के बीच अंतर करता है, लेकिन नियमों की अनदेखी होने पर सख्त रहता है. जन विश्वास 2.0 के तहत केंद्र सरकार ने मंत्रालयों को निर्देश दिया कि वे ‘हानि की तीव्रता’ परीक्षण लागू करें, जिसने नियामक कानून निर्माण की प्रक्रिया को बदल दिया. इसका उद्देश्य यह तय करना है कि किसी प्रावधान के लिए आपराधिक दंड वास्तव में आवश्यक है या नहीं.
इस प्रक्रिया में सबसे पहले देखा जाता है कि गलती सिर्फ नियमों की छोटी चूक है या कोई बड़ा उल्लंघन. यह भी समझा जाता है कि उस गलती का असर कितना गंभीर है, क्या उससे किसी को शारीरिक नुकसान हुआ है या ऐसा बड़ा नुकसान हुआ है जिसकी भरपाई मुश्किल हो. साथ ही, यह भी देखा जाता है कि गलती जानबूझकर की गई है या नहीं, जैसे धोखाधड़ी का इरादा. इसके अलावा, उस नियम के तहत कितने मामले दर्ज या लंबित हैं, यह भी ध्यान में रखा जाता है. इसमें मंत्रालय या विभाग यह भी देखते हैं कि मौजूदा सजा सही है या नहीं, और क्या वही गलती किसी दूसरे कानून में पहले से दंडनीय है, ताकि एक ही बात बार-बार न हो. आखिर में, यह तरीका इस ओर बढ़ता है कि मामलों को प्रशासनिक स्तर पर संभाला जाए और खासकर पहली बार की गलती पर जेल की जगह जुर्माना लगाकर सही संतुलन बनाया जाए.
अनुपालन ढांचे के अपराधमुक्तिकरण में सबसे बड़ा बदलाव श्रम सुधारों के रूप में आया है. चार नए श्रम संहिता- वेतन संहिता, 2019; औद्योगिक संबंध संहिता, 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020; और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ संहिता, 2020-ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को पुनर्गठित करते हुए जेल की धाराओं और अनुपालन बोझ को काफी कम किया है.
इन संहिताओं के तहत, 29 श्रम कानूनों के 1,436 नियमों को 75% घटाकर 351 नियम कर दिया गया है. रिपोर्टिंग के मामले में 181 फॉर्म्स को 60% घटाकर 73 कर दिया गया है. वहीं, 84 रजिस्टरों को घटाकर केवल 8 कर दिया गया है, यानी 90% की कमी. ये सभी बदलाव मिलकर व्यवसाय करना आसान बनाते हैं. पहली बार की त्रुटियों के लिए जेल की सजा हटा दी गई है और इसे केवल बार-बार या गंभीर सुरक्षा उल्लंघनों तक सीमित रखा गया है. अब दंडात्मक, निरीक्षक-आधारित प्रणाली से हटकर निरीक्षक-सह-सुविधाकार मॉडल के माध्यम से एक सुविधा-आधारित दृष्टिकोण अपनाया गया है.
भारत के अनुभव में, बड़े संकट ही बदलाव लाते हैं-जैसे 1991 का भुगतान संतुलन संकट, 2019 का कोविड-19 संकट, और आज के समय में युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, और वैश्विक व्यापार व टैरिफ के हथियारकरण जैसी चुनौतियाँ. ऐसे समय में, अनुपालन को आसान बनाना ताकि छोटे और मध्यम भारतीय उद्यमी अवसरों का लाभ उठा सकें और चुनौतियों का सामना कर सकें, केवल आर्थिक आवश्यकता ही नहीं बल्कि एक रणनीतिक अनिवार्यता भी है.
यदि व्यापक रूप से देखें, तो तीन प्रमुख दिशाएं सामने आती हैं. पहला, जन विश्वास 1.0 एक इरादे की घोषणा और अनुपालन प्रणाली का परीक्षण था. जन विश्वास 2.0 उस विश्वास को विधायी रूप से स्थापित करता है. दूसरा, सरकार अब उस संदेह-आधारित ढांचे को खत्म कर रही है जिसने दशकों तक उद्यमियों के लिए अनुपालन के जाल बिछाए. अब उद्यमियों को कर राजस्व, विकास, रोजगार और संपत्ति सृजन के प्रमुख चालक के रूप में देखा जा रहा है. तीसरा, राज्य और व्यवसायों के बीच के टकराव पूर्ण और किराया-उत्पन्न (rent-seeking) संबंधों पर सवाल उठने लगे हैं.
इन सुधारों से व्यवसाय करना और आसान हुआ है. पहली बार की गलतियों के लिए जेल की सजा हटाई गई है और इसे केवल गंभीर व दोहराए गए उल्लंघनों तक सीमित रखा गया है. प्रणाली अब दंडात्मक मॉडल से हटकर एक सुविधा-प्रधान मॉडल की ओर बढ़ रही है.
जब जन विश्वास 1.0, श्रम संहिताएं और जन विश्वास 2.0 को साथ पढ़ा जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि उद्यमियों के प्रति सरकार की कठोरता कम हुई है, हालांकि पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. पहले जेल की धमकी के जरिए भ्रष्टाचार के 26,134 स्रोत (tributaries) पैदा हो गए थे, जो विकास में बाधा बनते थे. आज सरकार बदलती दुनिया के हिसाब से खुद को ढाल रही है और कानूनों के गलत इस्तेमाल को कम करने की कोशिश कर रही है. फिर भी भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है, जो पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. ऐसे में छोटे मामलों को अपराध न मानने का तरीका मदद कर सकता है. इससे सरकार और व्यवसाय के बीच भरोसा बढ़ेगा और फैसले सोच-समझकर, सही जानकारी के आधार पर लिए जाएंगे.
सुधार करने का सबसे अच्छा समय कल था, और दूसरा सबसे अच्छा समय आज है. भारत के अनुभव में, बड़े संकट ही बदलाव लाते हैं-जैसे 1991 का भुगतान संतुलन संकट, 2019 का कोविड-19 संकट, और आज के समय में युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, और वैश्विक व्यापार व टैरिफ के हथियारकरण जैसी चुनौतियाँ. ऐसे समय में, अनुपालन को आसान बनाना ताकि छोटे और मध्यम भारतीय उद्यमी अवसरों का लाभ उठा सकें और चुनौतियों का सामना कर सकें, केवल आर्थिक आवश्यकता ही नहीं बल्कि एक रणनीतिक अनिवार्यता भी है.
पहले से ही एक सक्रिय सुधारक के रूप में, नरेंद्र मोदी सरकार ने जीएसटी, दिवालियापन कानून, श्रम सुधार और बैंकों के एनपीए की सफाई जैसे कठिन आर्थिक सुधारों को लगातार लागू किया है. जन विश्वास 2.0 सुधारों को आगे बढ़ाते हुए अब नियम आसान बनाता है और आगे की जिम्मेदारी राज्यों को देता है.गौतम चिकरमाने ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं.
ऋषि अग्रवाल टीमलीज़ रेगटेक के सह-संस्थापक और सीईओ हैं.
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Gautam Chikermane is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. His areas of research are grand strategy, economics, and foreign policy. He speaks to ...
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