काठमांडू में बालेन्द्र शाह की नई सरकार है लेकिन नेपाल की लोकेशन ऐसी है कि उसे भारत और चीन- दोनों के साथ संतुलन बनाकर ही चलना पड़ता है. समझिए कैसे… अब चीन से रिश्ते तो रहेंगे लेकिन हर प्रोजेक्ट, चाहे BRI हो या निवेश, नेपाल पहले उसकी लागत, फायदा और जोखिम को परखेगा, फिर ही आगे बढ़ेगा.
पिछले छह महीनों की घटनाओं का अंत 5 मार्च 2026 को हुए चुनावों में स्थापित पुराने दलों की लगभग पूरी हार के साथ हुआ. चुनावों के बाद, नेपाल में 27 मार्च को राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के बालेन्द्र शाह ने सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. जैसे ही काठमांडू अपने राजनीतिक सफर के इस नए चरण में प्रवेश कर रहा है, यह अटकलें तेज हो गई हैं कि नई सरकार अपनी विदेश नीति को कैसे आकार देगी. चीन के लिए, एक नई राजनीतिक शक्ति का उभरना सावधानीपूर्ण रुख अपनाने का कारण बना है, जिसके चलते बीजिंग स्थिति को समझने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपनी नीति को समायोजित करने के लिए ‘इंतजार करो और देखो’ की रणनीति अपना रहा है.
RSP का सत्ता में आना केवल यथास्थिति को बदलने की उसकी प्रतिबद्धता का परिणाम नहीं है, बल्कि जमे हुए राजनीतिक अभिजात वर्ग के प्रति जनता की निराशा का भी परिणाम है. परिणाम-उन्मुख, जांच-आधारित और जवाबदेही-केंद्रित शासन पर उसका जोर इसी बदलाव की मांग को दर्शाता है. हालांकि, घरेलू स्तर पर बड़े सुधारों की आवश्यकता बनी हुई है, लेकिन पड़ोसी देशों के साथ काठमांडू के संबंधों को लेकर अपेक्षाएँ लंबे समय से चली आ रही नीतियों और सिद्धांतों पर आधारित हैं-एक संतुलित, गुटनिरपेक्ष दृष्टिकोण, जो सुरक्षा या सैन्य उलझनों से बचते हुए भारत और चीन दोनों की आर्थिक वृद्धि का लाभ उठाने पर केंद्रित है.
RSP के चुनावी अभियान में नेपाल को भारत और चीन के बीच ‘पुल’ के रूप में पुनः स्थापित करने पर भी जोर दिया गया, साथ ही यह संकेत दिया गया कि वह देश की विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं करना चाहता. अधिकारियों के अनुसार, मुख्य ध्यान आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने पर रहेगा, जिसमें विकास कूटनीति प्रमुख साधन होगी. पिछले कुछ दशकों में चीन के लिए नेपाल का महत्व बढ़ा है, जो दक्षिण एशिया के प्रति चीन के व्यापक दृष्टिकोण और भारत के साथ उसकी बढ़ती प्रतिस्पर्धा के साथ विकसित हुआ है. तिब्बत से सटी इसकी भौगोलिक स्थिति भी इसे सुरक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है.
जैसे ही काठमांडू अपने राजनीतिक सफर के इस नए चरण में प्रवेश कर रहा है, यह अटकलें तेज हो गई हैं कि नई सरकार अपनी विदेश नीति को कैसे आकार देगी. चीन के लिए, एक नई राजनीतिक शक्ति का उभरना सावधानीपूर्ण रुख अपनाने का कारण बना है, जिसके चलते बीजिंग स्थिति को समझने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपनी नीति को समायोजित करने के लिए ‘इंतजार करो और देखो’ की रणनीति अपना रहा है.
शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन ने उन्हें बधाई दी और सहयोग बढ़ाने की बात कही. ओली सरकार के समय दोनों देशों के संबंध अच्छे थे. 2024 में चीन यात्रा के दौरान BRI पर समझौता हुआ. 2017 से यह योजना चीन के बढ़ते प्रभाव का प्रमुख संकेत बनी हुई है. शुरुआत में 35 परियोजनाएँ चुनी गई थीं, लेकिन केवल 9 ही अंतिम सूची में आईं. कई साल बाद भी समस्याएँ बनी हुई हैं. नेपाल कर्ज नहीं लेना चाहता, जबकि चीन अनुदान देने में पूरी तरह तैयार नहीं है. इसके अलावा, जमीन, पहाड़ी इलाके, स्थानीय विरोध और नीतियों की अस्पष्टता भी काम को धीमा करती हैं.
हाल के समझौते में दस परियोजनाओं को शामिल किया गया, जिसमें दोनों पक्षों ने प्रत्येक परियोजना के लिए अलग-अलग आधार पर वित्तपोषण तय करने पर सहमति जताई. नेपाली अधिकारियों ने इसे अपनी जीत के रूप में देखा, क्योंकि चीन ने आखिरकार काठमांडू की शर्तों को स्वीकार किया. इन दस परियोजनाओं में से केवल टोरखा–छारे सुरंग परियोजना में प्रगति हुई है, जबकि दोनों देश हिल्सा–सिमिकोट सड़क को पूरा करने के प्रयास में हैं. इन परियोजनाओं की पहचान जनवरी 2026 में सीमा व्यापार सहयोग बैठक के दौरान की गई थी. केरुंग–काठमांडू रेलवे की व्यवहार्यता रिपोर्ट जून 2026 तक पूरी होने की उम्मीद है, जबकि सभी परियोजनाओं की स्थिति की आखिरी समीक्षा मई 2025 में की गई थी.
2024 में, के.पी. शर्मा ओली के बीजिंग दौरे से पहले, RSP के वरिष्ठ नेताओं ने समझौते की शर्तों और ढांचे को लेकर अधिक स्पष्टता की मांग की थी. हाल के समय में उनका जोर प्रत्येक परियोजना का अलग-अलग मूल्यांकन करने और उसकी आर्थिक व्यवहार्यता व संभावित लाभ के आधार पर यह तय करने पर रहा है कि उसे अनुदान या ऋण के रूप में लिया जाए. यह दृष्टिकोण हालिया समझौते के साथ एक प्रकार की निरंतरता को दर्शाता है.
प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह द्वारा झापा के दमक में विकसित होने वाले चीन–नेपाल औद्योगिक पार्क को अपने चुनावी वादों में शामिल न करना एक संकेत के रूप में देखा गया-यानी राजनीतिक कार्यकाल की शुरुआत में सावधानी बरतने का प्रयास. इस पार्क की नेपाल–भारत दक्षिणी सीमा के पास स्थिति नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय रही है, भले ही 2019 में इस पर समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे और 2021 में ओली द्वारा इसकी आधारशिला रखी गई थी. भारत की सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखने की पार्टी की मंशा ऐसे परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में जटिलताएँ पैदा करती है.
शुरुआत में 35 परियोजनाएँ चुनी गई थीं, लेकिन केवल 9 ही अंतिम सूची में आईं. कई साल बाद भी समस्याएँ बनी हुई हैं. नेपाल कर्ज नहीं लेना चाहता, जबकि चीन अनुदान देने में पूरी तरह तैयार नहीं है. इसके अलावा, जमीन, पहाड़ी इलाके, स्थानीय विरोध और नीतियों की अस्पष्टता भी काम को धीमा करती हैं.
जब 2024 में दूसरा समझौता हुआ, तो चर्चा में शामिल अधिकारियों ने कहा कि अब नेपाल में होने वाला हर निवेश BRI ढांचे के तहत ही आएगा. यह RSP के दृष्टिकोण के साथ कितना मेल खाता है, यह स्पष्ट नहीं है. बालेन्द्र शाह के पहले के कुछ रुख भी चीन के प्रति आलोचनात्मक माने जाते हैं. इसमें 2023 में चीन की यात्रा रद्द करना शामिल है, जब बीजिंग द्वारा नेपाल के क्षेत्र को भारत का हिस्सा दिखाने पर उन्होंने नैतिक आपत्ति जताई थी.
चीनी ऋण से बने पोखरा हवाई अड्डे के निर्माण में भ्रष्टाचार के आरोप भी भविष्य की परियोजनाओं पर असर डाल सकते हैं. कुछ दिन पहले, भ्रष्टाचार निवारण आयोग (CIAA) ने तीसरा मामला दर्ज किया, जिसमें परियोजना के ठेकेदार-चीनी सरकारी कंपनी CAMC इंजीनियरिंग लिमिटेड-और उसके अधिकारियों पर धन के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया. यह भी कहा गया कि ठेकेदार ने ‘दुर्भावनापूर्ण इरादे’ से परियोजना हासिल की. इससे चीनी निवेशों पर भरोसे की कमी पैदा हो सकती है, खासकर तब जब चीन ने जनवरी 2023 में इस हवाई अड्डे को BRI से जोड़ने की कोशिश की थी, जिसे नेपाल ने खारिज कर दिया था.
दिसंबर 2025 में, जब पहला मामला दर्ज हुआ था, तब चीन के राजदूत ने नेपाल से ठेकेदार को दोषी न ठहराने की अपील की थी और इसे बाहरी साजिश बताया था. नेपाल के बुनियादी ढांचा विकास में चीन की बड़ी भूमिका रही है, जहाँ अधिकांश परियोजनाएँ चीनी कंपनियों को मिली हैं. भ्रष्टाचार खत्म करने के वादे पर चुनी गई सरकार पर कार्रवाई करने का दबाव रहेगा. इससे अन्य चीनी निवेश भी जांच के दायरे में आ सकते हैं या चल रही परियोजनाओं में देरी हो सकती है.
हाल के वर्षों में, चीन की सुरक्षा और रणनीतिक चिंताओं के प्रति नेपाल का रुख भी धीरे-धीरे सख्त हुआ है. यह ‘वन चाइना पॉलिसी’ से ‘वन चाइना प्रिंसिपल’ की ओर बदलाव, GSI और GCI को सहयोग का हिस्सा बनाने (जबकि नेपाल ने केवल GDI स्वीकार किया), तिब्बत पर सख्त रुख, और BRI से पहले की परियोजनाओं को भी उसमें शामिल करने जैसे कदमों में दिखता है. बीजिंग ने जो रणनीतिक स्थान बनाया था, वह अब RSP के फैसलों के आधार पर चुनौती में आ सकता है. नेपाल के लिए चीन के साथ संबंध आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं. आर्थिक संबंधों की मजबूती काठमांडू की रणनीतिक स्थिति को भी प्रभावित करती है-जिसका उद्देश्य भारत पर निर्भरता कम करना और दोनों पड़ोसियों के बीच संतुलन बनाना है.
चीन के लिए, नेपाल में राजनीतिक दलों और नेताओं के साथ संबंध मजबूत करना एक अहम नीति प्राथमिकता है. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच वैचारिक समानता ने गहरे संबंध और बेहतर पहुँच सुनिश्चित की है. RSP को जीत की बधाई देने वाला CPC का पत्र इसी का उदाहरण है.
चीन के साथ व्यापार और निवेश बढ़ाकर नेपाल अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है और भारत पर अपनी निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है. इससे उसे दोनों पड़ोसी देशों-भारत और चीन-के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है. दो बड़ी शक्तियों के बीच स्थित छोटे देशों के लिए यह एक व्यावहारिक और समझदारी भरी रणनीति मानी जाती है.
चीन ने नेपाल के राजनीतिक विवादों में भी दखल दिया है और अक्सर अपने पसंदीदा नेताओं का संकेत देने से नहीं हिचकिचाया, खासकर कम्युनिस्ट एकता पर जोर देते हुए. हालांकि RSP और CPC के बीच कुछ संपर्क रहा है, लेकिन सरकार में किसी कम्युनिस्ट दल की अनुपस्थिति चीन के लिए महत्वपूर्ण होगी. नेपाली दल CPC के साथ आदान-प्रदान, यात्राओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए जुड़े रहे हैं. वहीं, कुछ गैर-कम्युनिस्ट नेता भी चीन से जुड़ाव को ‘प्रो-इंडिया’ छवि से दूरी बनाने के रूप में देखते हैं. RSP को अब ‘कम समझौता करने वाला और अधिक आक्रामक’ माना जा रहा है, इसलिए उसके नेतृत्व पर CPC का प्रभाव कितना होगा, यह देखना बाकी है.
नेपाल के लिए चीन के साथ संबंध केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण हैं. चीन के साथ व्यापार और निवेश बढ़ाकर नेपाल अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है और भारत पर अपनी निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है. इससे उसे दोनों पड़ोसी देशों-भारत और चीन-के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है. दो बड़ी शक्तियों के बीच स्थित छोटे देशों के लिए यह एक व्यावहारिक और समझदारी भरी रणनीति मानी जाती है. नई सरकार के लिए संतुलित विदेश नीति अपनाना सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी, लेकिन नेपाल की भौगोलिक स्थिति नीति-निर्माण को हमेशा जटिल बनाए रखेगी.
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Shivam Shekhawat is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. Her research focuses primarily on India’s neighbourhood- particularly tracking the security, political and economic ...
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