भारत के स्कूलों ने नई शिक्षा नीति लागू करने की दिशा में शुरुआती क़दम तो उठाए हैं. लेकिन, इनको लागू करने की कमियां छात्रों के कल्याण के व्यापक वादे को पूरा करने की राह में बाधा बनी हुई है.
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ये लेख हमारी सीरीज़, ‘फाइव ईयर्स ऑफ NEP 2020: फ्रॉम विज़न टू रियलिटी’ का एक भाग है
2020 में आई नई शिक्षा नीति (NEP) एक ऐसी एकीकृत और छात्रों पर केंद्रित शिक्षा व्यवस्था की परिकल्पना करती है, जिसमें अकादेमिक शिक्षण को शारीरिक और मानसिक तंदुरुस्ती के साथ जोड़ा गया है. इस शिक्षा नीति में ये भी माना गया है कि स्वस्थ और अच्छे से पोषित बच्चे ज़्यादा बेहतर ढंग से सीखते हैं. नीति को लेकर इस परिकल्पना में पोषक सप्लीमेंट्स देने (सार्वभौमिक मिड-डे मील योजना) से लेकर सामाजिक आर्थिक सहायता देना भी शामिल है, जो भारत के स्कूलों में चहुंमुखी सुधार लाने की दिशा में किया गया एक क्रांतिकारी बदलाव है. ये नीति आने के पांच साल बाद, तंदुरुस्ती को लेकर शिक्षा नीति के महत्वाकांक्षी मक़सदों को भारत में स्कूलों के विशाल नेटवर्क में अलग अलग स्तरों पर लागू किया गया है और इस दौरान इसमें प्रगति भी देखी गई है और चुनौतियों से भी सामना हुआ है.
नई शिक्षा नीति 2020 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सभी स्कूली बच्चों का साल में एक बाहर हेल्थ चेक-अप किया जाएगा और उनका 100 प्रतिशत टीकाकरण होना चाहिए और इसकी निगरानी के लिए हर छात्र/छात्रा का व्यक्तिगत ‘हेल्थ कार्ड’ बनाया जाना चाहिए. ज़मीनी स्तर पर इसके साथ साथ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) द्वारा नियमित रूप से चलाए जाने वाले अभियानों का भी फ़ायदा उठाया जा रहा है. बच्चों की सेहत के लिए चलाए जा रहे राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के तहत सरकारी स्कूलों में 6 से 18 साल तक के बच्चों के वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण के लिए मोबाइल टीमें भेजी जाती हैं. ये टीमें बच्चों की सेहत से जुड़ी सामान्य जांच-परख (आंखों की रौशनी, सुनने की क्षमता, पोषण के स्तर और एनीमिया वग़ैरह) करती हैं. इसके बाद वो शुरुआती स्तर पर ही ज़रूरत के मुताबिक़ छात्रों के आगे इलाज के सुझाव देती हैं. इस योजना के अंतर्गत साल 2022-23 के दौरान लगभग 20 करोड़ बच्चों की सेहत की स्कूल स्तर पर जांच की गई थी. नई शिक्षा नीति की स्वास्थ्य की वार्षिक जांच की अपील के लिहाज से ये बहुत बड़ा काम था.
नई शिक्षा नीति सुझाव देती है कि मिड-डे मील योजना को बढ़ाकर प्री-प्राइमरी स्तर के बच्चों तक ले जाना चाहिए और इसमें लंच के साथ साथ ब्रेकफास्ट को भी शामिल किया जाना चाहिए. केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित पीएम पोषण (मिड-डे मील) योजना का 2021 में पुनर्गठन किया गया था, जिसमें पोषण पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया. हालांकि, इसमें ब्रेकफास्ट वाले पहलू को बहुत व्यापक स्तर पर लागू नहीं किया जा सकता है.
स्कूलों का उपयोग टीकाकरण केंद्रों के रूप में भी किया जा रहा है; मिसाल के तौर पर ख़सरा-रुबेला के ख़िलाफ़ स्कूलों के माध्यम से बड़े पैमाने पर बच्चों का टीकाकरण किया गया है, जो नई शिक्षा नीति के तहत सभी बच्चों के टीकाकरण कराने के लक्ष्य के मुताबिक़ ही है. वैसे तो स्कूलों में संस्थागत तरीक़े से बच्चों की टीकाकरण का काम अनियमित रहा है. लेकिन, नियमित रूप से फॉलो-अप करने की व्यवस्था, स्कूलों और रोकथाम के लिए किए जाने वाले उपायों के बीच कड़ी बन गया है. नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद की गई पहल के तहत अकेले जम्मू-कश्मीर में ही सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 12 लाख से अधिक बच्चों को हेल्थ कार्ड जारी किए गए हैं, ताकि उनकी प्रगति, टीकाकरण और जांच पर नज़र रखी जा सके.
नई शिक्षा नीति सुझाव देती है कि मिड-डे मील योजना को बढ़ाकर प्री-प्राइमरी स्तर के बच्चों तक ले जाना चाहिए और इसमें लंच के साथ साथ ब्रेकफास्ट को भी शामिल किया जाना चाहिए. केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित पीएम पोषण (मिड-डे मील) योजना का 2021 में पुनर्गठन किया गया था, जिसमें पोषण पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया. हालांकि, इसमें ब्रेकफास्ट वाले पहलू को बहुत व्यापक स्तर पर लागू नहीं किया जा सकता है. एक संसदीय समिति ने स्कूलों में ब्रेकफास्ट देने को हरी झंडी दे दी थी और शिक्षा मंत्रालय ने भी इसका समर्थन किया था. लेकिन, वित्त मंत्रालय ने शुरुआत में इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया था, क्योंकि इसमें चार हज़ार करोड़ रुपए सालाना ख़र्च होने थे. जहां ज़्यादातर राज्य इस मामले में केंद्र सरकार की पहल का इंतज़ार कर रहे हैं, वहीं तमिलनाडु ने अपने यहां के सरकारी स्कूलों में इसे लागू भी कर दिया है. वैसे तो इसको पूरे देश में लागू करने पर बहस चल ही रही है. लेकिन, स्कूलों में बच्चों की लंबाई, वज़न और हीमोग्लोबिन के स्तर की नियमित जांच करके उन पर सेहत या पोषण के कार्ड के ज़रिए नियमित निगरानी करके नई शिक्षा नीति ने बच्चों की सेहत की बेहतर निगरानी के दरवाज़े खोले हैं.
नई शिक्षा नीति ने स्कूलों, स्कूल कॉम्प्लेक्स और ज़िलों के तीन स्तरों पर हेल्थ ऐंड वेलनेस क्लब खोलने का सुझाव दिया था. इसका मक़सद बच्चों को शारीरिक फिटनेस, खेल-कूद और तंदुरुस्ती से जुड़ी दूसरी गतिविधियों में शामिल होने को प्रोत्साहन देना था. इसके बाद सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) ने 2019-20 में अपने सभी स्कूलों को हेल्थ ऐंड वेलनेस क्लब खोलने को अनिवार्य बना दिया था और इसके लिए CBSE ने शारीरिक गतिविधियों को पढ़ाई का हिस्सा बनाने के मैन्युअल भी उपलब्ध कराए थे. अब ज़्यादातर स्कूलों में वेलनेस क्लब काम कर रहे हैं जिनमें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, स्वास्थ्य की जांच के लिए शिविर लगाने और स्वास्थ्य के स्थानीय संगठनों के साथ तालमेल जैसी गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं. मिसाल के तौर पर CBSE के ‘फिट इंडिया स्कूल’ की रैंकिंग ने स्कूलों को प्रोत्साहित किया है कि वो अपने यहां के वेलनेस क्लब और खेल-कूद की गतिविधियों के संचालन को अपलोड करें.
नई शिक्षा नीति ने ‘स्वास्थ्य, पोषण, शारीरिक शिक्षा, फिटनेस, वेलनेस, स्पोर्ट्स, सैनिटेशन एंड हाइजीन’ को छात्रों को पढ़ाए जाने वाले विषयों और हुनरों में भी शामिल कर लिया है. इसीलिए, रोकथाम के लिए देखभाल, स्वस्थ आहार, मानसिक स्वास्थ्य की जागरूकता और ड्रग इस्तेमाल करने के नुक़सान जैसी जानकारियों को बच्चों को उनकी उम्र के मुताबिक़ सिखाया जा रहा है. इसमें एक प्रमुख कार्यक्रम आयुष्मान भारत का ‘स्कूल हेल्थ ऐंड वेलनेस प्रोग्राम (SHWP)’ है जो हर स्कूल के दो अध्यापकों को ‘हेल्थ ऐंड वेलनेस का एंबेसडर’ बनाने का सुझाव देता है, ताकि वो स्वास्थ्य शिक्षा के 11 अहम बिंदुओं पर हर हफ़्ते एक इंटरैक्टिव सेशन चलाएं. ताज़ा आंकड़े ये बताते हैं कि देश के 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 7.12 लाख अध्यापक हेल्थ ऐंड वेलनेस एंबेसडर नियुक्त किए गए हैं और 26 राज्य/ केंद्र शासित प्रदेशों ने इस कार्यक्रम के तहत क्लासरूम में एक्टिविटीज़ करने की शुरुआत की है.
दूरदृष्टि वाला नज़रिया होने के बावजूद, नई शिक्षा नीति के स्वास्थ्य से जुड़े प्रावधानों को स्कूलों में लागू करना एक बहुत बड़ी चुनौती रही है. शिक्षा मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच आयुष्मान भारत स्कूल हेल्थ प्रोग्राम के तहत आपसी तालमेल बिठा पाना एक समस्या रही है, ख़ास तौर से सरकार के अलग अलग स्तरों पर प्राथमिकताओं और संरचनाओं के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी समस्या बनकर उभरी है. ज़्यादातर राज्यों ने इन्हें लागू करने में देरी की है, क्योंकि वो नोडल अफसर तैनात कर रहे थे और उनके प्रशिक्षण, वित्तीय संसाधन और जानकारी देने के ढांचे खड़े करने में व्यस्त हैं. जहां कर्मचारियों की किल्लत एक स्थायी समस्या है. वहीं, दिल्ली में मौजूदा अध्यापकों को स्वास्थ्य संबंधी आदेशों का पालन करने के साथ ही साथ, ‘ख़ुशी और देशभक्ति के कार्यक्रमों’ जैसे पाठ्यक्रम के अतिरिक्त बोझ से भी निपटना पड़ रहा है. व्यवहारिक तौर पर हेल्थ एंबेसडर की भूमिका कोई ठोस परिणाम लाने के बजाय दिखावे वाली ज़्यादा रही है और बहुत गिने चुने स्कूल ही हैं, जिन्होंने स्वास्थ्य के नियमित सबक़ पढ़ाने शुरू किए हैं या फिर इन व्यवस्थाओं को छात्रों तक पहुंचाना सुनिश्चित करने की औपचारिक जवाबदेही तय की है.
जहां शहरी और निजी क्षेत्र के स्कूल स्वास्थ्य के विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं और अभिभावकों के दान से काम चला सकते हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्र इसमें पिछड़ जाते हैं. ये फ़र्क़ बहुत परेशान करने वाला है: हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों ने अपने यहां के 90 प्रतिशत से अधिक अध्यापकों को प्रशिक्षित कर लिया है. वहीं, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य काफ़ी पीछे हैं.
चिंता की एक और बड़ी बात, फंड की भयंकर कमी और राज्यों के बीच भारी अंतर की रही है, जिसकी वजह से पूरे देश में NEP 2020 के स्वास्थ्य संबंधी क़दमों को लागू करना सीमित रहा है. वैसे मिड-डे मील और RBSK जैसे कार्यक्रम हैं, जो कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं. लेकिन, NEP के दूसरे स्वास्थ्य कार्यक्रमों को लागू करने के लिए फंड का आवंटन नहीं किया गया है. इसी वजह से फिर ये योजनाएं वेलनेस क्लब या फिर स्वास्थ्य के रिकॉर्ड रखने लागू करने के लिए स्थानीय अस्थायी प्रावधानों या फिर कॉरपोरेट फंडिंग पर निर्भर हो जाती हैं. इसके अलावा, जहां शहरी और निजी क्षेत्र के स्कूल स्वास्थ्य के विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं और अभिभावकों के दान से काम चला सकते हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्र इसमें पिछड़ जाते हैं. ये फ़र्क़ बहुत परेशान करने वाला है: हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों ने अपने यहां के 90 प्रतिशत से अधिक अध्यापकों को प्रशिक्षित कर लिया है. वहीं, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य काफ़ी पीछे हैं. इससे छात्रों की स्वास्थ्य शिक्षा मोटे तौर पर इस बात पर निर्भर हो गई है कि वो कहां रहते हैं या फिर उनके परिवारों की आमदनी का स्तर क्या है.
हालांकि, ऊपर जिन कमियों और चुनौतियों की पहचान की गई है, लो ये बताते हैं कि सिर्फ़ सदिच्छा से काम नहीं चलने वाला है: स्कूलों में तंदुरुस्ती वाले पहलू पर प्रभावी रूप से काम हो, इसके लिए समर्पित सहयोग और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है. स्वास्थ्य में समानता लाने के लिए स्कूलों का उपयोग हो सके, इसके लिए कुछ नीतिगत सुझाव इस तरह से हैं:
स्वास्थ्य के रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण और एकीकरण हो: अगर सभी छात्रों की सेहत के रिकॉर्ड रखने के लिए काग़ज़ के बजाय इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड (EHR) पर ज़ोर दिया जाए, तो देख-भाल में काफ़ी सुधार हो सकता है. राष्ट्रीय ABHA डिजिटल हेल्थ ID का इस्तेमाल करते हुए हर छात्र को हेल्थ ID दी जा सकती है, जिससे उनकी जांच के नतीजों, टीकाकरण के स्तर और आगे के इलाज के सुझाव का इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड रखा जा सकेगा और फिर सुरक्षित रूप से स्कूल से स्वास्थ्य कर्मियों को दिया जा सकेगा. कंप्यूटर में रिकॉर्ड दर्ज होने से उन छात्रों का पता लगा पाना आसान होगा, जो एक स्कूल से दूसरे स्कूल भेजे गए हैं और फिर उनका नियमित इलाज हो सकेगा. रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण होने से उनका विश्लेषण करके बीमारियों के चलन (जैसे कि किसी स्कूल के बच्चों में एनीमिया या फिर नज़र के दोष) का पता लगाया जा सकेगा और इसकी सूचना सही जगह पहुंचाई जा सकेगी.
स्कूलों के वेलनेस क्लब को मज़बूत बनाना: हेल्थ और वेलनेस क्लबों की स्थापना केवल मन बहलाव के लिए नहीं, बल्कि भागीदारी के लिए होनी चाहिए, जिसमें छात्रों की अगुवाई वाले मंच सक्रिय हों जो स्वस्थ रहन-सहन को ‘कूल’ और स्कूल की संस्कृति का अहम हिस्सा बना सकें. स्कूलों को फंड आवंटित करने और सुबह में योग की कक्षाएं, खेल के मैच, सफाई के अभियान और स्थानीय डॉक्टरों से बातचीत जैसी साप्ताहिक गतिविधियां चलाने के लिए समय देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.
स्वास्थ्य शिक्षा और सलाह देने की क्षमता का विकास करना: स्कूलों के ज़रिए लोगों की सेहत में वास्तविक बदलाव लाने और समता के लिए हमें अग्रिम मोर्चे पर खड़े पेशेवर लोगों यानी स्कूल के कर्मचारियों और अध्यापकों का कौशल विकास करना चाहिए, उनकी जानकारी और क्षमता बढ़ानी चाहिए. इसकी शुरुआत प्रशिक्षण से हो सकती है. उनको सलाह और स्वास्थ्य शिक्षा देने के बुनियादी सबक़ सिखाए जा सकते हैं. इस पहलू को अध्यापकों के प्रशिक्षण के मॉड्यूल का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए और नौकरी के दौरान भी ट्रेनिंग देने की व्यवस्था की जानी चाहिए. मिसाल के तौर पर निर्देशकों को सिखाया जाना चाहिए कि वो बच्चों के बीच कुपोषण या तनाव के सबसे प्रचलित संकेतों की पहचान कैसे करें और फिर उनको शुरुआत में सलाह दें या फिर आगे के इलाज के लिए भेजें. वैसे तो निकट भविष्य में हर स्कूल में एक पूर्णकालिक कांउसलर या फिर नर्स बहाल करना मुश्किल होगा. लेकिन, हर स्कूल कॉम्प्लेक्स या फिर स्कूलों के समूह के लिए एक पेशेवर सलाहकार की नियुक्ति की जा सकती है, जो बुलाए जाने पर या फिर नियमित दौरे के ज़रिए बच्चों को सलाह दे सके. केंद्रीय योजनाएं ख़ास तौर से उच्च प्राथमिकता वाले स्कूलों में राज्यों को काउंसलर नियुक्त करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं. इसके अलावा, भारत टेली मेडिसिन और तकनीक का इस्तेमाल करके भी काउंसलिंग की सेवाएं दे सकता है. नेशनल टेली-मेंटल हेल्थ प्रोग्राम (Tele-MANAS) की शाखाएं पहले ही 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में काम कर रही हैं और अब तक 20 लाख से ज़्यादा कॉल का निपटारा कर चुकी हैं. स्कूलों को इस नेटवर्क से जोड़ा जा सकता है, ताकि छात्र या फिर अध्यापक मुश्किल भरे मामलों या आपातकालीन स्थिति में काउंसलर्स से मदद ले सकें.
आज जब भारत आगे बढ़ रहा है, तो नतीजों पर आधारित एक निरपेक्ष तरीक़ा अहम है: नई नीति का शोर मचाने के बजाय इसको प्रभावी ढंग से लागू करने और स्थानीय स्तर पर नए तरीक़े अपनाने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए. आपसी तालमेल बढ़ाकर, तकनीक और लोगों में निवेश करके और राज्यों के बीच अच्छी मिसालों को साझा करते हुए स्कूल वास्तव में स्वास्थ्य की समता लाने के इंजन बन सकते हैं.
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Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow with the Health Initiative at the Observer Research Foundation. He writes and researches on how India’s ...
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