पांच साल के बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मुख्य स्तंभ यानी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा को राज्यों को अनदेखा करने और नए सिरे से संघीय तनाव को बढ़ावा देने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.
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भारत में शिक्षा के परिदृश्य को आधुनिक बनाने की अपनी क्षमता के साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 पांच वर्ष पूरे कर रही है. ऐसे में ये NEP के ध्यान वाले कुछ प्रमुख क्षेत्रों में हुई प्रगति पर एक नज़र डालने का सही समय है. NEP का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF) का विकास और कार्यान्वयन है जो स्कूली शिक्षा के अलग-अलग चरणों में बच्चों को शिक्षा के लिए एक दिशा प्रदान करती है (व्यापक दिशा-निर्देश, संरचना, पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या, शिक्षण सामग्री और समीक्षा के तौर-तरीके/पद्धति मुहैया कराती है). दो साल से ज़्यादा समय के बाद 23 अगस्त 2023 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-SE) जारी की थी. NCF का उद्देश्य स्कूली शिक्षा की प्रणाली को बुनियादी चरण से माध्यमिक शिक्षा तक उत्प्रेरित करना और उसमें सुधार लाना है, विशेष रूप से 3 से 18 साल के छात्रों की शैक्षिक आवश्यकताओं को.
NCF की तैयारी एक विशाल संघीय कवायद थी जिसमें अलग-अलग स्तरों पर हितधारकों की एक जटिल श्रृंखला को शामिल किया गया था.
NEP 2020 के तहत NCF कोई नई चीज़ नहीं है. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने 1975 में NCF को तैयार किया था. 2005 में इसमें बड़े स्तर पर सुधार लाया गया था जिसके तहत भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति को बदलने पर विशेष ज़ोर दिया गया. चूंकि NEP 2020 का परिवर्तनकारी दृष्टिकोण शिक्षा को अलग-अलग विषयों और 21वीं शताब्दी की शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुसार प्रासंगिक बनाना है, ऐसे में प्रमुख हितधारकों के द्वारा इस बात पर विचार किया गया कि एक उचित पाठ्यचर्या तैयार की जाए. इन हितधारकों में 4,000 विशेषज्ञ शामिल थे जिन्हें अन्य के अलावा शिक्षा मंत्रालय, NCERT, संबंधित मंत्रालयों एवं राज्यों के शिक्षा बोर्ड, राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों (UT) के द्वारा गठित राज्य फोकस समूहों से लिया गया था. इन समूहों ने NCF से जुड़े 25 विषयों पर स्थिति पत्र (पोजीशन पेपर) तैयार किए. इसके अलावा राज्यों/UT के द्वारा 500 से ज़्यादा दस्तावेज़ तैयार किए गए. 25 राष्ट्रीय फोकस समूहों ने भी राष्ट्रीय विषयों पर स्थिति पत्र तैयार करने में योगदान दिया. इसके अलावा ज़िला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) ने लगभग 1,500 परामर्श रिपोर्ट सौंपी. संक्षेप में कहें तो NCF की तैयारी एक विशाल संघीय कवायद थी जिसमें अलग-अलग स्तरों पर हितधारकों की एक जटिल श्रृंखला को शामिल किया गया था.
तैयारी की पद्धति और पाठ्यचर्या के विषय से लेकर कार्यान्वयन के तौर-तरीकों तक NCF ने अलग-अलग मुद्दों पर बड़े विवादों को जन्म दिया है. शिक्षा के जानकारों ने 2023 में NCF को अंतिम रूप देने में शामिल तौर-तरीकों और साधनों को लेकर आपत्ति जताई थी. NEP 2020 का उद्देश्य NCF को तैयार करने में परामर्श की प्रक्रिया को बढ़ावा देना है जिसमें राज्यों की पाठ्यचर्या की रूपरेखा (SCF) को निर्धारित करने में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी लेकिन वास्तविकता ये है कि भागीदारी की प्रक्रिया को अलग-अलग तरीकों से कमज़ोर किया गया है. उदाहरण के लिए, 25 स्थिति पत्रों और SCF को तैयार करने में न केवल पूरे अभ्यास को एक केंद्रीकृत तकनीक के दृष्टिकोण से पूरा किया गया बल्कि उन्हें ये निर्देश भी दिया गया कि कागज़ रहित सर्वे और परामर्श किया जाए (ई-टेंपलेट और हर सवाल पर शब्दों की सीमा के साथ). जैसा कि बताया गया है, सर्वे के कई प्रमुख सवाल “अपेक्षित प्रतिक्रियाओं” से भरे हुए थे. इससे भी आगे, स्थिति पत्र और SCF को राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में शामिल करने के लिए पहले से तय कोड के साथ मशीन द्वारा पढ़ा गया. संक्षेप में कहें तो ये प्रक्रिया मशीनी रही है जिसमें गंभीर पाठ्यक्रम और शिक्षा से जुड़ी चर्चाओं का अभाव रहा है जहां राज्यों को बराबर भागीदार के रूप में देखा जा सके.
NCF को उसकी सभी चुनौतियों के साथ अंतिम रूप देना जहां NEP के महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण को हासिल करने में एक बड़ी प्रगति दिखाता है, वहीं विशेषज्ञों ने इसकी तैयारी की पद्धति और इसे लागू करने के तौर-तरीकों को लेकर कई चिंताएं व्यक्त की हैं. NCF का एक उल्लेखनीय पहलू इसकी विषय-वस्तु का केंद्रीकृत स्वभाव है. विषय के जानकारों के अनुसार अलग-अलग कक्षाओं के लिए NCERT और SCERT के द्वारा अपना पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तक तैयार करने में NCF को एक व्यापक और मार्गदर्शन करने वाला दस्तावेज़ माना जाता है, वहीं वास्तविकता ये है कि 600 से ज़्यादा पन्नों का NCF दस्तावेज़ इन संस्थानों को पालन करने के लिए हर विवरण मुहैया कराता है. केवल इतना ही नहीं, NCF पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने के साथ-साथ प्रतिरूप पाठों (सैंपल लेसन) के लिए योजना तैयार करने की हद तक जाता है, यहां तक कि हर स्कूल के लिए समय भी आवंटित किया गया है (उदाहरण के तौर पर, एक सभा के लिए 25 मिनट और वहां तक पहुंचने के लिए 5 मिनट का समय भी). पाठ्यचर्या की तैयारी और उसे लागू करने में छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने के अपने उत्साह में संचालन समिति ने NCF की प्रक्रिया को काफी हद तक केंद्रीकृत कर दिया है जो विविधता और समावेशन के बड़े लक्ष्यों के विरुद्ध है जहां राज्यों को बराबर के साझेदार के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए.
इसके अलावा, अलग-अलग राज्यों में एकरूपता थोपने का NCF का रवैया 2005 के NCF के ख़िलाफ़ है जिसमें पाठ्यचर्या की रूपरेखा तैयार करने में एक विकेंद्रित और सलाह वाला दृष्टिकोण अपनाया गया था. इसकी वजह से कई राज्यों, विशेष रूप से विपक्ष के द्वारा शासित राज्यों, ने NCF का विरोध किया है. कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों ने तो स्थानीय आवश्यकताओं और पढ़ाई की ज़रूरतों पर आधारित पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की अपनी समिति भी बनाई है.
NCF, जिसने कक्षा आठ तक के छात्रों के लिए तीन भाषा के फॉर्मूले की सिफारिश की है, ने 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति को ही काफी हद तक बरकरार रखा है. इसके अलावा, 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने जहां दक्षिण भारत समेत पूरे देश में हिंदी पढ़ाने की वकालत की थी, वहीं 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ऐसी कोई ख़ास बात नहीं जोड़ी गई है.
पाठ्यचर्या को लेकर ज़्यादा बड़ा राजनीतिक विवाद NCERT के द्वारा मनमाने ढंग से पाठ्यक्रम को हटाने और जोड़ने का फैसला है. भारत जैसे अत्यधिक बहुलतावादी और विविधतापूर्ण देश में NCERT के द्वारा आठवीं कक्षा की इतिहास की किताब से कई अध्यायों को हटाने के निर्णय के कारण 2024 में शिक्षण और पाठ्यचर्या को लेकर राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया. पिछले दिनों कक्षा सात की पाठ्यपुस्तक को लेकर भी विवाद उठा जिसमें मध्यकालीन भारत के इतिहास के कुछ हिस्सों को हटा दिया गया है. इतिहासकारों और शिक्षकों ने पाठ्यचर्या तैयार करने में एकतरफा फैसलों, जो NCF-SE 2023 के सिद्धांतों का उल्लंघन है, के लिए NCERT को ज़िम्मेदार ठहराया है.
हालांकि ज़्यादा बड़ा विवाद ‘त्रिभाषा नीति’ को लेकर छिड़ गया है. यहां ये उल्लेख करने की आवश्यकता है कि NCF, जिसने कक्षा आठ तक के छात्रों के लिए तीन भाषा के फॉर्मूले की सिफारिश की है, ने 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति को ही काफी हद तक बरकरार रखा है. इसके अलावा, 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने जहां दक्षिण भारत समेत पूरे देश में हिंदी पढ़ाने की वकालत की थी, वहीं 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ऐसी कोई ख़ास बात नहीं जोड़ी गई है. इसमें कहा गया है कि “बच्चों के द्वारा सीखी जाने वाली तीन भाषाएं राज्यों, क्षेत्रों और निश्चित रूप से छात्रों की अपनी पसंद की होंगी लेकिन शर्त ये है कि तीन में से कम-से-कम दो भाषाएं भारत की मूल भाषाएं हों.” इसके बावजूद, हिंदी थोपे जाने के पुराने डर और NEP की केंद्रीयकृत प्रवृत्ति ने तमिलनाडु और दूसरे विपक्ष के शासन वाले राज्यों में बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. विडंबना ये है कि हिंदी का विरोध अब महाराष्ट्र, जहां सत्ताधारी पार्टी गठबंधन सरकार चला रही है, में भी सिर उठाने लगा है. हिंदी थोपे जाने को लेकर बड़े राजनीतिक टकराव के बाद राज्य सरकार ने भाषा नीति को लागू करने पर रोक लगा दी है. अब विशेषज्ञ समिति की सिफारिश का इंतज़ार किया जा रहा है. संक्षेप में कहें तो NCF की कई बातें केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक विवाद का विषय बन गई हैं जिसका शिक्षा क्षेत्र पर बड़ा असर पड़ रहा है.
सामान्य रूप से 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति और विशेष रूप से राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा पाठ्यक्रम और शिक्षा से जुड़े क्षेत्रों के इर्द-गिर्द स्वायत्तता को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच लड़ाई में एक केंद्र बिंदु बनकर उभरी है. चूंकि भारतीय संविधान के तहत शिक्षा एक समवर्ती विषय है, ऐसे में राज्यों की ये दृढ़ सोच है कि NEP के कार्यान्वयन के सभी पहलुओं, जिनमें पाठ्यक्रम तैयार करना और उन्हें लागू करना शामिल है, में उन्हें बराबर के साझेदार के रूप में माना जाना चाहिए. वैसे तो NEP ने शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तनकारी दृष्टिकोण को साकार करने में महत्वपूर्ण हितधारकों के रूप में राज्यों और दूसरे स्थानीय किरदारों की भागीदारी के लिए तौर-तरीका तैयार किया है लेकिन NCF प्रकरण, जिसका उदाहरण ऊपर दिया गया है, वास्तविक इरादे के बारे में गंभीर सवाल उठाता है. काफी हद तक NCF का कार्यान्वयन पहले से निर्धारित था (संचालन समिति और NCERT के द्वारा) जबकि राज्यों के बोर्ड और ज़िला स्तर के संस्थानों की भागीदारी अधिक-से-अधिक औपचारिक थी. संक्षेप में कहें तो, NCF विविधता और समावेशन के व्यापक लक्ष्यों के विरुद्ध है जहां राज्यों को समान साझेदार के रूप में माना जाना चाहिए.
NCF को लेकर कई विवाद (स्थानीय मुद्दों को पेश करना, पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखना, भाषा नीति) खड़े होने के साथ उम्मीद करनी चाहिए कि शिक्षा नीति बनाने वाले आवश्यक सुधार करेंगे और NEP की प्रक्रिया को अधिक समावेशी और सहभागी बनाएंगे. इस बात पर विचार करते हुए कि NEP 2020 एक बहुत बड़ी कवायद थी, जिसमें व्यापक क्षेत्रीय, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के साथ एक महाद्वीप के आकार का देश शामिल था, NCF की प्रक्रिया और उसका कार्यान्वयन केंद्र और राज्यों के बीच एक अत्यधिक सहयोगात्मक प्रयास होना चाहिए.
निरंजन साहू ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.
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Niranjan Sahoo, PhD, is a Senior Fellow with ORF’s Governance and Politics Initiative. With years of expertise in governance and public policy, he now anchors ...
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