समुद्री जहाज दुनिया के व्यापार की रीढ़ माने जाते हैं लेकिन यही उद्योग तेजी से बढ़ते प्रदूषण और ईंधन संकट की बड़ी वजह भी बन रहा है. ऐसे में अब दुनिया की नजर ई-फ्यूल और हरित ऊर्जा पर है. जानिए, कैसे हरित ईंधन समुद्री उद्योग की पूरी तस्वीर बदलने की तैयारी में हैं.
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ये लेख ‘महासागर की व्यवस्था: पहुंच और समानता पर पुनर्विचार’ श्रृंखला का हिस्सा है.
वैसे तो समुद्री उद्योग विश्व व्यापार की जीवनरेखा के रूप में काम करता है (दुनिया में होने वाले व्यापार का 80 प्रतिशत सामान ढोता है) लेकिन ये प्रदूषण में भी भारी योगदान देता है. ये सालाना लगभग 1 अरब टन ग्रीनहाउस गैस (GHG) का उत्सर्जन करता है जो कि वैश्विक GHG उत्सर्जन के करीब 3 प्रतिशत के बराबर है. काम-काज के तौर-तरीकों में भारी बदलाव के बिना भविष्य चिंताजनक है. अनुमानों के मुताबिक समुद्री जहाज से होने वाले उत्सर्जन में 2050 तक 60 प्रतिशत बढ़ोतरी हो सकती है.
पर्यावरण से जुड़ी इन चिंताओं के अलावा भू-राजनीतिक तनाव और जीवाश्म ईंधन की कीमतों में अस्थिरता दुनिया की स्थिरता को तेज़ी से ख़तरे में डालती है. हाल के समय में होर्मुज़ स्ट्रेट से जहाजों के गुज़रने पर रोक और इसकी वजह से कीमत में बढ़ोतरी ने मौजूदा स्थिति के नाज़ुक होने के बारे में बताया. अपने काम-काज के लिए समुद्री परिवहन पर निर्भर आधुनिक कंपनियों के लिए मौजूदा स्थिति को बनाए रखना पर्यावरण और वाणिज्यिक ख़तरों को उत्पन्न करना है.
इस बदलती स्थिति को देखते हुए समुद्री परिवहन का भविष्य नए सिरे से लिखा जा रहा है. स्थापित ईंधन भरने के केंद्र, पारंपरिक ऊर्जा के स्रोत और व्यापार के वर्तमान तरीके- सभी बदल रहे हैं. एक विश्वसनीय, मज़बूत, कम उत्सर्जन वाले समुद्री सेक्टर का निर्माण इनोवेटिव स्वच्छ ऊर्जा के ईंधन को रणनीतिक ढंग से अपनाने पर निर्भर है. ऊर्जा के स्रोतों में विविधता लाकर और उसके टिकाऊ विकल्पों की तरफ बदलाव करके समुद्री उद्योग अपने काम-काज को कार्बनमुक्त करने के साथ-साथ वैश्विक सप्लाई चेन को भविष्य के लिए मज़बूत कर सकता है.
समुद्री उद्योग के विशेषज्ञों का अनुमान है कि काम-काज से जुड़ी अलग-अलग ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भविष्य में कई ईंधन का दृष्टिकोण अपनाना होगा. विशेष रूप से ई-ईंधन पूरी तरह कार्बनमुक्त होने के लिए सबसे टिकाऊ और विस्तार के योग्य मौजूदा उपलब्ध विकल्प है.
एक विस्तारित, आर्थिक रूप से व्यावहारिक मानक की ओर समुद्री क्षेत्र का बदलाव अगली पीढ़ी के ईंधनों के उभरते समूह द्वारा समर्थित है. समुद्री उद्योग के विशेषज्ञों का अनुमान है कि काम-काज से जुड़ी अलग-अलग ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भविष्य में कई ईंधन का दृष्टिकोण अपनाना होगा. विशेष रूप से ई-ईंधन पूरी तरह कार्बनमुक्त होने के लिए सबसे टिकाऊ और विस्तार के योग्य मौजूदा उपलब्ध विकल्प है. ये लंबी दूरी वाले महासागर के पार जहाज परिवहन के लिए ख़ास तौर पर उपयुक्त है जहां विद्युतीकरण एक व्यावहारिक विकल्प नहीं है. नवीकरणीय ऊर्जा से उत्पादित कम कार्बन वाले हाइड्रोजन से निर्मित ई-ईंधन (जैसे कि ई-मेथानोल, ई-अमोनिया और ई-मीथेन) पारंपरिक रूप से ज़्यादा उत्सर्जन वाले ईंधन की तुलना में उत्सर्जन को 90 प्रतिशत कम कर सकते हैं.
समुद्री वैल्यू चेन के सभी भागीदार ई-ईंधन में निवेश कर रहे हैं और कई नए आर्थिक अवसर पैदा कर रहे हैं. ई-ईंधन का उत्पादन कई देशों मे हो सकता है, उन देशों में भी जो अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण पारंपरिक जीवाश्म ईंधन का उत्पादन नहीं कर रहे हैं. उत्पादन के इस विकेंद्रीकरण के कारण उन समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम होगी जिन्होंने मौजूदा समय में वैश्विक सप्लाई चेन को बाधित कर रखा है.
अनुसंधान और विकास से आगे वाणिज्यिक उपयोग तक पहुंचने के लिए लक्ष्य आधारित, रणनीतिक समर्थन और सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों से निवेश की आवश्यकता होगी. ज़ीरो एमिशन मैरिटाइम बायर्स अलायंस (ZEMBA) जैसी पहल इस बात का एक प्रमुख उदाहरण है कि किस तरह प्राइवेट सेक्टर का नेतृत्व उत्प्रेरक के रूप में काम कर सकता है और इस तरह के इनोवेटिव ईंधन के तरीकों को वास्तविकता में बदल सकता है. ईं-ईंधन जैसी स्वच्छ ऊर्जा और तकनीकों के लिए बाज़ार प्रतिबद्धता बनाने में सहयोग करके ZEMBA के अग्रणी कॉरपोरेट ख़रीदार सदस्य दीर्घकालिक बाज़ार मांग प्रदर्शित कर रहे हैं. ये दृष्टिकोण पहले से ही वाणिज्यिक उपयोग को गति दे रहा है और इसके अच्छे परिणाम मिल रहे हैं: ZEMBA का पहला टेंडर 2025-26 से कम-से-कम 82,000 टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन कम करने वाला है.
दुर्भाग्य की बात है कि IMO का शून्य उत्सर्जन का ढांचा जैसी वैश्विक नीतियों (जो 2050 या उसके आसपास मैरीटाइम सेक्टर को पूरी तरह कार्बनमुक्त करने के लक्ष्य का समर्थन करती हैं) को भू-राजनीतिक चुनौतियां का लगातार सामना करना पड़ रहा है. ये चुनौतियां कार्बनमुक्त विश्व की तरफ जाने से रोक रही हैं.
निजी क्षेत्र की पहल एक महत्वपूर्ण प्रेरणा है लेकिन इस बदलाव का समर्थन करने या दूसरे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए इसके कई फायदों को बढ़ावा देने में वो अकेले पर्याप्त नहीं है. बदलाव का समर्थन करने के लिए समुद्री क्षेत्र को एक स्पष्ट, महत्वाकांक्षी और एकसमान रेगुलेटरी वातावरण की आवश्यकता है. लेकिन वर्तमान में ये उद्योग कई तरह की नीतियों से थमा हुआ है. इनमें जहाज परिवहन के वैश्विक रेगुलेटर, अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) से स्पष्टता की लगातार कमी शामिल है. रेगुलेटरी एकरूपता में कमी और अनिश्चितता के कारण भ्रम और निवेशकों में झिझक पैदा हो रही है. कार्बन प्राइसिंग और फ्यूल स्टैंडर्ड जैसे मानक प्राइवेट सेक्टर के लिए प्रतिस्पर्धा करने और समय के साथ धीरे-धीरे महत्वाकांक्षा बढ़ाने के हिसाब से ज़रूरी हैं. इससे व्यवसायों को बदलाव करने और आविष्कार में मदद मिलती है. लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि IMO का शून्य उत्सर्जन का ढांचा जैसी वैश्विक नीतियों (जो 2050 या उसके आसपास मैरीटाइम सेक्टर को पूरी तरह कार्बनमुक्त करने के लक्ष्य का समर्थन करती हैं) को भू-राजनीतिक चुनौतियां का लगातार सामना करना पड़ रहा है. ये चुनौतियां कार्बनमुक्त विश्व की तरफ जाने से रोक रही हैं.
लोकतांत्रिक देशों में भारत इस दिशा में एक मज़बूत नेतृत्व के रूप में उभर रहा है. वित्त वर्ष 2029-2030 तक भारत के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का बजट 19,744 करोड़ रुपये (2.09 अरब अमेरिकी डॉलर) है ताकि अलग-अलग क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जा सके. इसमें 115 करोड़ रुपये (12.18 मिलियन अमेरिकी डॉलर) 2025-2026 तक समुद्री परिवहन के पायलट प्रोजेक्ट के लिए है.
जिस समय मैरीटाइम सेक्टर हरित ईंधन की तरफ बदलाव कर रहा है, उस समय बाज़ार को स्थिर करने और समानता के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए एक वैश्विक और एकीकृत दृष्टिकोण ही एकमात्र रास्ता है. नीति और प्राइवेट सेक्टर की महत्वाकांक्षा के बीच की खाई को पाटने के लिए अभी कदम उठाने से वैश्विक व्यापार और धरती- दोनों के लिए एक टिकाऊ भविष्य की दिशा में बदलाव आ सकता है.
इंग्रिड इरिगोयेन जीरो एमिशन मैरीटाइम बायर्स एलायंस (ZEMBA) की अध्यक्ष और सीईओ हैं.
लेखिका टेलर गोएल्ज़, मिशेली हेस, ऋश्मा वोरा और डॉ. चार्ली मैकिनले को धन्यवाद देती हैं.
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Ingrid Irigoyen is the Senior Director, Market Innovation, for the Aspen Institute Energy and Environment Program (EEP), where she leads EEP’s work designing and implementing ...
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