Author : Ramanath Jha

Expert Speak Raisina Debates
Published on Aug 05, 2025 Updated 0 Hours ago

भारत की शहरी नीति को ढांचों से परे काम करने का समय है - मजबूत वित्तीय साधन, राज्यों को सुधार के लिए तैयार करना और सशक्त शहरी प्रशासन की  तत्काल ज़रुरत है.

शहरी भारत के लिए नीति निर्धारण में केंद्र की निर्णायक भूमिका

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संयुक्त राष्ट्र की शहरी एजेंसी UN-हैबिटेट और OCD (ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट) ने वैश्विक स्तर पर देशों की राष्ट्रीय शहरी नीतियों यानी नेशनल अर्बन पॉलिसी (NUP) पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की. यह रिपोर्ट 78 देशों के सर्वेक्षण पर आधारित थी. इस स्टडी से पता चला है कि प्रत्येक देश की NUP शहरी चुनौतियों के प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में उभर कर सामने आ रही है. यह रुझान इस सर्वेक्षण को जिन देशों में किया गया उसमें से यह बहुत से देशों में तेजी से हो रहे शहरीकरण के रुझान के अनुरूप था. इस शहरीकरण की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप, ये शहर इन देशों की आबादी के एक बड़े भाग को संभाल रहे थे और इसलिए इनके राजनीतिक महत्व में भी बढ़ रहे थे. दुनिया भर के शहर भी तेजी से अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख कारण बनते जा रहे थे. हालांकि इस प्रक्रिया में इन शहरों ने कई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं जैसे कि प्रबंधन,  ट्रैफ़िक कंजेस्शन के कारण बढ़ता सामूहिक लागत का भार, बढ़ता वायु प्रदूषण और आवास की बढ़ती कीमत. इसी तरह जलवायु, डेमोग्राफी और डिजिटलीकरण से जुड़ी अन्य चुनौतियां भी हैं.

यह रुझान इस सर्वेक्षण को जिन देशों में किया गया उसमें से यह बहुत से देशों में तेजी से हो रहे शहरीकरण के रुझान के अनुरूप था. इस शहरीकरण की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप, ये शहर इन देशों की आबादी के एक बड़े भाग को संभाल रहे थे और इसलिए इनके राजनीतिक महत्व में भी बढ़ रहे थे. 

सर्वेक्षण से कई प्रमुख निष्कर्ष निकल कर सामने आए. पहली बात यह कि फ्रांस, लिथुआनिया और सऊदी अरब जैसे कई देशों की NUPs 'बहु-क्षेत्रीय' यानी मल्टी सेक्टरल थी. यह स्वाभाविक था क्योंकि शहर नीतिगत क्षेत्रों और मुद्दों की एक बड़ी श्रृंखला को प्रभावित करते हैं इसलिए NUPs को अन्य क्षेत्रों में प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्यों के साथ तालमेल बिठा कर आगे बढ़ाना आवश्यक है. कुछ देशों जैसे कि कनाडा, कोस्टा रिका और स्वीडन की नीतियां 'एक-क्षेत्रीय' यानी मोनो सेक्टरल पाई गई जो सामान्य सिद्धांतों पर ज़ोर देते हैं और सीमित विषयों को ही प्रभावित करती हैं. दूसरी बात, अधिकांश NUPs में 'सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच नीति को अलाइन और समन्वय बैठाने के लिए औपचारिक तंत्र मौजूद थे. कई विशेषज्ञों ने क्षेत्रीय विकास और उचित ग्रामीण-शहरी संबंधों को संतुलित करने के लिए शहरी स्थानीय निकायों (ULB) और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच हॉरिजॉन्टल कोर्डिनेशन का भी समर्थन किया है. 

भारत सरकार की भूमिका 

जलवायु संबंधी घटनाओं के प्रकोप ने दुनिया भर के शहरों के NUPs पर खासा असर डाला है. क्लाइमेट (जलवायु) रेसिलिएंस पर ध्यान उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है और इसके परिणामस्वरूप जलवायु संबंधी नीतियों में बढ़ोत्तरी दिख रही है. इसी प्रकार, NUPs में यह बात बहुत हद तक स्वीकार की गई है कि लोगों को रहने के लिए किफ़ायती घर एक बहुत बड़ी चुनौती बन रही है. यह बात इस तथ्य से साफ़ होती है कि वैश्विक शहरी आबादी का 23 प्रतिशत हिस्सा अभी भी अपर्याप्त आवास के साथ ख़राब परिस्थितियों में रह रहा है. आवास के विषय में कई अन्य बातें भी उल्लेखनीय हैं जैसे की संपत्ति की बढ़ती कीमतें, ऊर्जा लागत और आवास आपूर्ति लक्ष्य जैसे मुद्दे वित्त और भूमि संबंधी नीतियों के साथ पर्याप्त रूप से जुड़े हुए नहीं पाए गए. वित्त आपूर्ति शहरी विकास के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है. अधिकांश शहरी परियोजनाओं का वित्तपोषण राष्ट्रीय प्रत्यक्ष निवेश द्वारा किया गया पाया गया जिसमें सब-नेशनल (उप-राष्ट्रीय) स्तर पर अपर्याप्त स्वयं के राजस्व स्रोत और निजी निवेश को सुगम बनाने के लिए अपर्याप्त राजकोषीय साधन मौजूद थे. तीन-चौथाई देशों में यह पाया गया की NUPs के प्रदर्शन की निगरानी और मूल्यांकन के लिए तंत्र मौजूद थे. 

सर्वेक्षण को गौर से अवलोकन के चलते कई सिफ़ारिशें निकल कर सामने आई. पहली सिफ़ारिश यह थी कि आर्थिक और सामाजिक नीतियों से संबंधित क्षेत्रीय मंत्रियों को NUPs में अधिक भागीदारी रखनी चाहिए और विशेष शहरी समस्याओं जैसे की आवास की बढ़ती चुनौतियों से निपटने में मदद करनी चाहिए.

इस स्टडी से पाई गई एक अन्य सिफ़ारिश यह थी कि NUPs एक संतुलित क्षेत्रीय विकास के लिए काम करें. NUPs को चाहिए कि वह शहरी-ग्रामीण संबंधों यानि अर्बन-रूरल लिंकेजेस को पहचाने और इस  आकलन की आवश्यकता है कि सार्वजनिक निवेश और कार्यक्रम इस तरह एकीकृत किए जाए जिससे इन संबंधों को पहचान कर कार्य किए जाए. NUPs को शहरी विकास लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से पूरा करने के लिए शहरों के लिए पर्याप्त वित्तीय प्रावधानों, जिसमें स्वयं के स्रोतों से प्राप्त राजस्व और अंतर-सरकारी हस्तांतरण दोनों शामिल है, की आवश्यकता पर भी ज़ोर देना चाहिए. साथ ही, NUPs  को निजी निवेश का भी लाभ उठाना चाहिए और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए, जिसका वर्तमान समय में शहरों द्वारा पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है.  अंत में, NUPs के क्रियान्वयन की नियमित निगरानी और NUPs के प्रभाव का मूल्यांकन करने की आवश्यकता भी पाई गई. 

NUPs  को निजी निवेश का भी लाभ उठाना चाहिए और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए, जिसका वर्तमान समय में शहरों द्वारा पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है.

ऊपर बताए गए सर्वेक्षण का भारत हिस्सा नहीं था. हालांकि, मिनिस्ट्री ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स (MoHUA) ने लगभग पाँच साल पहले अपना राष्ट्रीय शहरी नीति ढ़ांचा यानी नेशनल अर्बन पालिसी फ्रेमवर्क (NUPF) प्रकाशित किया था. ऊपर बताए गए वैश्विक सर्वेक्षण के संदर्भ में NUPF की जांच करने पर, NUPF के फोकस और जोर में महत्वपूर्ण समानताएं हैं और अंतर दोनों ही हैं. उदाहरण के लिए, NUPs भारतीय शहरों में अन्य देशों के शहरों की तरह किफायती आवास की कमी को दुखद रूप से प्रस्तुत करता है.  इसी प्रकार, स्थानीय वित्त यानी लोकल फाइनेंस एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया है और अर्बन-रूरल  लिंकेजेस की बात को विशेष रूप से कही गई है.  हालांकि, NUPs शहरी उद्देश्यों को अन्य क्षेत्रों के साथ जोड़ने की आवश्यकता का उल्लेख करता है, लेकिन शहरी चुनौतियों से संबंधित बहु-क्षेत्रीय मुद्दों का कोई निश्चित और व्यापक समाधान नहीं बताता. जबकि वैश्विक स्तर पर शहर जलवायु संबंधी समस्याओं को अपनी शीर्ष चुनौतियों के रूप में प्राथमिकता दे रहे हैं, NUPs इस चुनौती का संक्षेप में कहता है. 

NUPs भारतीय शहरों के समक्ष आने वाली समस्याओं और चुनौतियों का एक सक्षम और व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है. इसमें शहरी अर्थव्यवस्था, शहरी प्लानिंग, भौतिक और सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आवास की किफ़ायत, परिवहन और गतिशीलता, शहरी वित्तपोषण, शहरी शासन, शहरी सूचना प्रणाली और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर शामिल हैं. समाधानों के संबंध में NUPs के सुझाव बहुत हद तक  व्यापक और ठोस हैं. सुझाए गए 'सम्मरी ऑफ़ एक्शन्स’ को शहर, राज्य और केंद्र-स्तरीय कार्यों में उचित रूप से तीन भागों में बाटा गया हैं. इससे यह स्पष्ट रूप से स्वीकार्य होता है कि शहरों के कल्याण में सरकार के प्रत्येक स्तर की एक महत्वपूर्ण भूमिका हैं.

हालांकि चर्चा के अंत में NUPs में कहा गया है कि शहरी विकास के लिए राज्य सरकारों की प्रमुख संवैधानिक जिम्मेदारी है. NUPs यह बात  स्वीकार करता है कि सुधार और काम मुख्य रूप से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में हैं. यह बात संवैधानिक स्थिति के अनुरूप है क्योंकि भारत में शहरी विकास को राज्य का विषय मानता है.  बहरहाल, यह बेहद चिंताजनक है कि देश भर की राज्य सरकारें 74वें संविधान संशोधन द्वारा सुझाए गए सुधारों का विरोध कर रही हैं और दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग तथा राष्ट्रीय शहरीकरण आयोग के निर्देशों की भी उपेक्षा कर रही हैं.

आगे की राह 

भारतीय शहरों की बिगड़ती स्थिति मुख्य रूप से राज्यों द्वारा दिखाए जा रहे शहरी सुधारों के प्रति लगभग पूर्ण निष्क्रियता के कारण है.  अगर इसे बढ़ते शहरीकरण और शहरों के बढ़ते आर्थिक और जनसांख्यिकीय महत्व के साथ जोड़ दिया जाए, तो यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि भारत सरकार (GoI) क्या शहरी स्थानीय निकायों के अधिकार हीनता को दूर करने के लिए क्या कदम उठाने पर विचार कर रही है? इसमें गलत  प्लानिंग, किफायती आवास की कमी, पुरानी शासन संरचना और वित्तीय दुर्बलता जैसी चिंताएँ शामिल हैं. 

इसे अपने सुझावों को लागू करने के लिए वित्त मंत्रालय जैसे अन्य सरकारी मंत्रालयों के साथ मिलकर काम करना होगा. और स्थानीय गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST) का एक हिस्सा सीधे शहरों को हस्तांतरित किया जाना चाहिए. साथ ही MoHUA को  राज्यों के साथ बातचीत करनी चाहिए और उनसे लंबित सुधारों को लागू करने का आग्रह करना चाहिए.

इस स्थिति को सुधारने में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) की भूमिका बहुत अहम और सक्रिय है.  शहरी मामलों की देखरेख के लिए जिम्मेदार देश के सर्वोच्च मंत्रालय के रूप में MoHUA की दोहरी भूमिका है. इसे अपने सुझावों को लागू करने के लिए वित्त मंत्रालय जैसे अन्य सरकारी मंत्रालयों के साथ मिलकर काम करना होगा. और स्थानीय गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST) का एक हिस्सा सीधे शहरों को हस्तांतरित किया जाना चाहिए. साथ ही MoHUA को  राज्यों के साथ बातचीत करनी चाहिए और उनसे लंबित सुधारों को लागू करने का आग्रह करना चाहिए. अपने स्तर पर, वह अर्बन लोकल बॉडी (ULBs) की कैपेसिटी बिल्डिंग के लिए भारत सरकार से बड़े बजट की मांग कर सकता है. ULB के लिए राज्यों और शहरों को दी जाने वाली धनराशि का हस्तांतरण राज्यों और शहरों द्वारा संविधान और भारत सरकार द्वारा निर्धारित सुधार एजेंडे के क्रियान्वयन के प्रदर्शन के आधार पर किया जाना चाहिए. भारत सरकार की तरफ से इस तरह की ठोस कार्रवाई और दबाव के अभाव में बड़े वित्तीय बजट के साथ केंद्रीय योजनाओं को शहरी क्षेत्रों में लागू करने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे और शायद शहर ज़्यादा  बेहाल हो जाएंगे.

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