म्यांमार में तख्तापलट को पांच साल हो चुके हैं लेकिन हालात अब भी अस्थिर हैं. देश की राजनीति, संघर्ष और चुनावों की पूरी कहानी जानने के लिए पढ़ें यह लेख.
फरवरी 2021 में म्यांमार की लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर सेना ने सत्ता अपने हाथ में ले ली थी. अब उस तख्तापलट को पांच साल हो चुके हैं लेकिन देश आज भी राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा से जूझ रहा है. हालात सामान्य होने के कोई साफ संकेत नहीं दिखते. 25 जनवरी 2026 को तीन चरणों में चुनाव खत्म हुए मगर इन चुनावों पर शुरुआत से ही शक रहा. आम राय यही है कि नतीजे पहले से तय थे. इन्हें ज्यादा से ज्यादा सेना के शासन को वैध दिखाने की कोशिश माना जा रहा है. इससे न तो सरकार की साख लौटने की उम्मीद है और न ही देश में शांति आने की.
इन चुनावों में सेना समर्थित मानी जाने वाली यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) ने बड़ी जीत हासिल की. 29 और 30 जनवरी को आए नतीजों के मुताबिक पार्टी ने निचले सदन पिथू हलुट्टॉ की 263 में से 232 सीटें जीत लीं. ऊपरी सदन अम्योथा हलुट्टॉ की अब तक घोषित 157 सीटों में से 109 सीटें भी उसके खाते में गई. इतनी बड़ी जीत ने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल और गहरे कर दिए हैं.
उम्मीद है कि मार्च में संसद की बैठक होगी. वहां राष्ट्रपति चुना जाएगा. अप्रैल में नई सरकार काम संभाल सकती है लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव तख्तापलट का अंत नहीं है, बल्कि यह सेना की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके जरिए वह अपने शासन को सामान्य और स्वीकार्य दिखाना चाहती है.
तख्तापलट के तुरंत बाद लोगों ने शांतिपूर्ण विरोध शुरू किया. सड़कों पर प्रदर्शन हुए. लोगों ने चुपचाप अपना गुस्सा जताया. तब जातीय हथियारबंद संगठन, यानी EAOs, एकजुट नहीं थे। वे सेना से सीधे लड़ने को तैयार भी नहीं थे. धीरे-धीरे हालात बदलने लगे. बैन की जा चुकी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) के नेताओं ने सेना का विरोध करने वाले नागरिकों के साथ मिलकर नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (NUG) बनाई. इसका मकसद था सेना के नियंत्रण को चुनौती देना.
25 जनवरी 2026 को तीन चरणों में चुनाव खत्म हुए मगर इन चुनावों पर शुरुआत से ही शक रहा. आम राय यही है कि नतीजे पहले से तय थे. इन्हें ज्यादा से ज्यादा सेना के शासन को वैध दिखाने की कोशिश माना जा रहा है.
वक्त के साथ EAOs के बीच तालमेल बढ़ा. अक्टूबर 2023 में ‘ऑपरेशन 1027’ शुरू हुआ. इसका लक्ष्य था सैन्य शासन को कमजोर करना. पीपुल्स डिफेंस फोर्स (PDFs) भी इन संगठनों के साथ जुड़ती गई. धीरे-धीरे यह संघर्ष पूरे देश में फैल गया. सेना की पुरानी ‘फूट डालो और राज करो’ वाली नीति कमजोर पड़ने लगी. प्रतिरोधी समूहों ने कई इलाकों में सीधे सैन्य ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए. इसका असर जमीन पर साफ दिखा.कई बड़े इलाके सेना के हाथ से निकल गए.
दिसंबर 2025 तक 91 टाउनशिप पूरी तरह प्रतिरोधी ताकतों के कब्जे में थीं. 144 टाउनशिप पर उनका आंशिक नियंत्रण था. जिन इलाकों में चुनाव कराए गए, वहां भी सेना की पकड़ पूरी नहीं है. नियंत्रण वापस पाने के लिए सेना ने उत्तरी शान राज्य और राजधानी के आसपास फिर से हवाई हमले शुरू किए. 2025 में सेना ने कुछ अहम शहरों पर दोबारा कब्जा किया. इनमें लाशियो सबसे महत्वपूर्ण था.
जुलाई में चीन की मध्यस्थता के बाद यह शहर वापस लिया गया. बताया जाता है कि चीन ने म्यांमार नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस आर्मी (MNDAA) पर दबाव बनाया था. इसके अलावा नौंगखियो, सिपॉ और क्याउकमे भी सेना ने अपने नियंत्रण में ले लिए. इससे चीन जाने वाले व्यापारिक रास्तों पर उसकी पकड़ मजबूत हुई.
फिर भी देश का बड़ा हिस्सा अब भी प्रतिरोधी ताकतों के कब्जे में है. खासकर रखाइन राज्य में सेना की स्थिति कमजोर है. चीन के समर्थन से सेना को कुछ राहत जरूर मिली है लेकिन वह अब तक सिर्फ सात शहर ही वापस ले पाई है. दूसरी ओर, 2025 में प्रतिरोधी समूहों ने फालाम, इंडॉ और बनमौक जैसे तीन शहरों पर कब्जा कर लिया. भामो, हपासॉन्ग और वॉवले म्याइंग पर लड़ाई अब भी जारी है. साफ है कि चुनावी नतीजों के बावजूद संघर्ष खत्म होने वाला नहीं है.
USDP की जीत ऐसे माहौल में हुई जहां चुनाव प्रक्रिया पर सख्त नियंत्रण था. तख्तापलट के बाद सेना ने दर्जनों राजनीतिक पार्टियों पर रोक लगा दी. 30 हजार से ज्यादा राजनीतिक कैदियों को हिरासत में रखा गया. जुलाई 2025 में ‘इलेक्शन प्रोटेक्शन’ कानून पास किया गया. जनवरी 2026 में इसी कानून के तहत 400 से ज्यादा लोगों पर कार्रवाई शुरू हुई. यह कानून चुनाव प्रक्रिया की लगभग हर तरह की आलोचना को अपराध बना देता है. कोई भी बयान, संगठन या विरोध अगर वोटिंग में बाधा डालता दिखे, तो उसे गैरकानूनी ठहराया जा सकता है. इससे पूरा चुनाव कड़ी निगरानी वाले माहौल में हुआ.
जिन इलाकों में चुनाव कराए गए, वहां भी सेना की पकड़ पूरी नहीं है. नियंत्रण वापस पाने के लिए सेना ने उत्तरी शान राज्य और राजधानी के आसपास फिर से हवाई हमले शुरू किए. 2025 में सेना ने कुछ अहम शहरों पर दोबारा कब्जा किया.
चुनाव के दौरान सेना प्रमुख मिन आंग ह्लाइंग ने कई बड़े सैन्य पदों में फेरबदल किया. भरोसेमंद अधिकारियों को अहम जिम्मेदारियां दी गईं. माना जा रहा है कि यह कदम उन्हें राष्ट्रपति पद तक पहुंचाने की तैयारी का हिस्सा था. जनवरी की शुरुआत में लेफ्टिनेंट जनरल जॉ हेन को एडजुटेंट जनरल बनाया गया. उनकी जगह लेफ्टिनेंट जनरल जॉ म्यो टिन को लाया गया, जिन्हें करेननी राज्य के मुख्यमंत्री पद से वापस बुलाया गया था. दोनों को सेना प्रमुख का करीबी माना जाता है.
यह चुनाव सेना की वैधता हासिल करने की कोशिश भी है. इससे उसे अपने विरोधियों को ‘आतंकवादी’ बताने का आधार मिलता है. इससे हवाई हमले जारी रखना आसान हो जाता है। चीन का असर म्यांमार के कई जातीय संगठनों पर बना हुआ है. माना जाता है कि ऑपरेशन 1027 की शुरुआत में भी बीजिंग की भूमिका रही. बाद में उसी ने समझौते करवाकर कुछ इलाके सेना को वापस दिलवाए.
चीन-म्यांमार आर्थिक कॉरिडोर (CMEC) के तहत कई बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं. चीन चाहता है कि ये प्रोजेक्ट बिना रुकावट चलते रहें इसलिए वह म्यांमार में कम से कम स्थिरता बनाए रखना चाहता है. 29 जनवरी को बदनाम मिंग परिवार के 11 सदस्यों को फांसी दिए जाने की घटना भी चीन की गहरी भागीदारी दिखाती है. यह गिरोह म्यांमार में ऑनलाइन ठगी चलाता था. ऑपरेशन 1027 के बाद इसके कुछ सदस्यों को पकड़कर चीन को सौंप दिया गया था.
भारत के लिए म्यांमार एक बेहद अहम पड़ोसी है. दोनों देशों के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा है। यह सीमा भारत के चार पूर्वोत्तर राज्यों से लगती है. इसी वजह से म्यांमार भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का अहम हिस्सा है. इस नीति का मकसद दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ संपर्क, सुरक्षा सहयोग और व्यापार बढ़ाना है. म्यांमार को भारत के पूर्वोत्तर को मजबूत करने और उसे दक्षिण-पूर्व एशिया का दरवाजा बनाने में जरूरी माना जाता है.
भारत लगातार म्यांमार में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव की बात करता रहा है लेकिन भारत शायद इन चुनावों को स्थिरता की दिशा में कदम कम और वैधता हासिल करने की कोशिश ज्यादा मानता है क्योंकि प्रक्रिया काफी हद तक नियंत्रित रही इसलिए इससे जमीन पर हालात में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद नहीं है. उल्टे, इससे भारत की कूटनीतिक चुनौती बढ़ गई है। अब एक औपचारिक लेकिन विवादित राजनीतिक व्यवस्था सामने है.
मार्च-अप्रैल में नई संसद बनने की उम्मीद है. राजनीतिक खींचतान, कूटनीतिक दबाव और क्षेत्रीय समीकरण लगातार बदल रहे हैं. फिलहाल एक बात साफ है. चुनाव होने भर से म्यांमार का संकट खत्म नहीं होने वाला. असली चुनौती अब भी यही है कि देश को स्थिरता और शांति की राह पर कैसे लाया जाए.
कलादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और ट्राइलेटरल हाईवे जैसे भारत के समर्थन वाले बड़े प्रोजेक्ट बेहद जरूरी हैं लेकिन रखाइन और चिन राज्यों में असुरक्षा, कमजोर स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक अनिश्चितता इनकी रफ्तार रोक रही है. इन प्रोजेक्ट्स का भविष्य सिर्फ निर्माण पर निर्भर नहीं है. यह भी देखना होगा कि संघर्ष किस दिशा में जाता है और भारत जमीन पर मौजूद अलग-अलग पक्षों से कितना तालमेल बना पाता है.
भारत फिलहाल सावधानी से अपने कदम बढ़ा रहा है. सीमाई इलाकों में सैन्य शासन के अलावा दूसरे समूहों से भी अनौपचारिक बातचीत हो रही है. हालांकि इसे किसी बड़े नीति बदलाव के बजाय व्यावहारिक कदम माना जा रहा है. निकट भविष्य में भारत का रुख ‘देखो और इंतजार करो’ वाला ही रहने की संभावना है.
अमेरिका, ब्रिटेन और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन ASEAN ने इन चुनावों को भरोसेमंद मानने से इनकार कर दिया है इसलिए बदलते कूटनीतिक हालात पर करीबी नजर रखना जरूरी है. ASEAN, अपने अंदरूनी मतभेदों के बावजूद म्यांमार से बातचीत जारी रख सकता है ताकि फाइव-पॉइंट कंसेंसस पर अमल हो सके.
वहीं इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) रोहिंग्या समुदाय से जुड़े नरसंहार मामले में सैन्य शासन की दलीलें सुन रहा है. म्यांमार इन आरोपों को बेबुनियाद बता रहा है. ICJ का अंतिम फैसला 2026 के आखिर तक आने की उम्मीद है. भले ही इसे सीधे लागू कराना आसान न हो, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय दबाव जरूर बढ़ सकता है.
आने वाले महीने बेहद अहम होंगे. मार्च-अप्रैल में नई संसद बनने की उम्मीद है. राजनीतिक खींचतान, कूटनीतिक दबाव और क्षेत्रीय समीकरण लगातार बदल रहे हैं. फिलहाल एक बात साफ है. चुनाव होने भर से म्यांमार का संकट खत्म नहीं होने वाला. असली चुनौती अब भी यही है कि देश को स्थिरता और शांति की राह पर कैसे लाया जाए.
श्रीपर्णा बनर्जी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.
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Sreeparna Banerjee is an Associate Fellow in the Strategic Studies Programme. Her work focuses on the geopolitical and strategic affairs concerning two Southeast Asian countries, namely ...
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