Author : Roshni Kapur

Published on Aug 23, 2022 Updated 26 Days ago

शांति वार्ता की प्रगति के बीच सीमावर्ती इलाकों में चल रही भूमि और हवाई घुसपैठ के साथ तकनीकी विवरण की कमी के कारण यह आलोचना हो रही है कि यह वार्ता सतही और खोखली है.

म्यांमार में शांति प्रयास: सशस्त्र संगठनों की तरफ तातमाडॉ का हाथ बढ़ाना, दोस्ती का न्योता?

शांति वार्ता के लिए म्यांमार में नस्ली सशस्त्र संगठनों (ईएओ) के लिए तातमाडॉ के प्रस्ताव ने काफी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया है. विद्रोही समूहों के साथ सुलह के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण ही सुलह को लेकर दुर्लभ स्वर सुनाई दे रहे हैं, क्योंकि इन समूहों के साथ लगातार लड़ाई के परिणामस्वरूप भारी नुकसान हो रहा है. हालांकि 2021 में जब से सेना ने कमान संभाली है तब से कुछ विद्रोही समूहों ने ‘ठहरो और इंतजार करो’ की नीति बनाई है. इसके बावजूद सैनिक सरकार ने 21 में से 10 ईएओ (इसमें 2015 में हुए युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले और हस्ताक्षर करने से इंकार करने वाले शामिल हैं) को युद्धविराम के लिए तैयार कर लिया है. इसमें से अधिकांश वो समूह हैं, जो सैनिक सरकार के साथ सीधे टकराव में शामिल नहीं हैं.

ईएओ के साथ तातमाडॉ अनुबंध व्यक्तिगत स्तर पर ज्यादा दिखाई देता है, और सामूहिक स्तर पर कम. देश की सेना के जनरल मिन आंग हलिंग ने मई 2022 में रिस्टोरेशन कौंसिल ऑफ शान स्टेट (आरसीएसएस), द शान स्टेट आर्मी-साऊथ (एसएसए-एस) तथा यूनाइटेड वा स्टेट पार्टी (यूडब्ल्यूएसपी) के नेताओं के साथ व्यक्तिगत तौर पर बातचीत की थी. एक ओर जहां एसएसए को राज्य के अन्य विद्रोही गुटों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सीमा पार बीजिंग से मिल रही सहायता की वजह से यूडब्ल्यूएसपी ने अपने कब्जे वाले क्षेत्रों पर पकड़ मजबूत बना रखी है. सैनिक सरकार को ईएओ के नेताओं के साथ व्यक्तिगत बातचीत इस बात का अवसर प्रदान करती है कि वह उनकी अलग और विशिष्ठ मांगों पर ध्यान दे सकें.

एक ओर जहां एसएसए को राज्य के अन्य विद्रोही गुटों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सीमा पार बीजिंग से मिल रही सहायता की वजह से यूडब्ल्यूएसपी ने अपने कब्जे वाले क्षेत्रों पर पकड़ मजबूत बना रखी है. 

हालांकि कुछ ईएओ, जिसमें कारेन नेशनल यूनियन (केएनयू), काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी (केआईए) तथा चिन नेशनल आर्मी (केएनए) शामिल हैं की सैनिक सरकार के साथ हाल के कुछ महीनों में हिंसक झड़पें हुई हैं, इस वजह से उन्होंने शांति वार्ता के ताजा दौर में शामिल होने से इंकार कर दिया है. उनका कहना है कि इसमें चूंकि नेशनल यूनिटी गर्वमेंट ऑफ म्यांमार (एनयूजी) और पिपुल्स डिफेंस फोर्स (पीडीएफ) को आमंत्रित नहीं किया गया, अत: बातचीत समावेशी नहीं है. सैनिक सरकार ने पीडीएफ, एनयूजी तथा कमेटी रिप्रेजेंटिंग पाइदाउंगसु ह्लुटाव (सीआरपीएच) को आतंकवादी समूह निरुपित करते हुए उन्हें शांति वार्ता में शामिल करने से इनकार कर दिया है. कारेन राज्य में जून 2022 में की गई ताजा सैन्य कार्रवाई भी केएनयू को शांति वार्ता में शामिल न होने से खुद को रोकने का एक कारण हो सकता है. अरकान आर्मी (एए) ने भी बातचीत को लेकर संदेह व्यक्त किया है, क्योंकि उसके अनुसार तातमाडॉ ने आक्रमण करते हुए धार्मिक इमारतों पर कब्जा किया और रखाइन राज्य में सार्वजनिक स्थानों पर सैन्य चौकियां स्थापित कर ली है.

ऐतिहासिक रूप से अधिकांश ईएओ की तख्तापलट का विरोध करने वाले आंदोलनों में बेहद कम भूमिका रही है, क्योंकि न तो वे तातमाडॉ के प्रति समर्पित हैं और न ही नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) का साथ देते हैं. अनेक विद्रोही समूहों का मानना है कि एनएलडी ने उनके हितों को प्राथमिकता पर नहीं रखा और 2015 में वह सैनिक सरकार के साथ सत्ता में भागीदारी के समझौते में शामिल हुआ था. इसी वजह से 2021 के तख्तापलट को लेकर ईओए ने विरोधाभासी प्रतिक्रिया दी, जहां कुछ ने तातमाडॉ के खिलाफ एनयूजी के संघर्ष में साथ देने का फैसला किया वहीं कुछ ने पलटी मारते हुए उसके खिलाफ जाने का निर्णय लिया. उदाहरण के तौर पर जहां एसएसए-एस ने 2021 के तख्तापलट के बाद सिविल डिसओबीडियंस मूवमेंट (सीडीएम) का समर्थन किया, वहीं अब वह पलटी मारते हुए सैनिक सरकार के युद्धविराम की पहल को स्वीकार करने वाला पहला ईएओ बन गया है. ऐसे में साफ है कि ईएओ अपनी नीतियों को अपना स्वार्थ साधने के हिसाब से बदलते रहेंगे.

फिगर 1 : नस्ली सशस्त्र संगठनों (ईएओ) के बीच विवाद वाले प्रमुख क्षेत्रों को दर्शाने वाला म्यांमार का नक्शा.

स्त्रोत : ‘म्यांमार स्टडी ग्रुप’, पी.23, अंतिम रिपोर्ट, फरवरी 2022, यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ पीस (यूएसआईपी) 

टेबल 1:

स्त्रोत : मिज्जिमा म्यांमार न्यूज एंड इनसाइट , रिलीफवेब, म्यांमार नाउ, म्यांमार पीस मॉनिटर, ग्लोबलसिक्योरिटी. ओआरजी, दी ईरावेड्डी, अल जजीरा 

मौलिक प्रस्ताव के बजाय सतही अनुबंध

शांति वार्ता की प्रगति के बीच सीमावर्ती इलाकों में चल रही भूमि और हवाई घुसपैठ के साथ तकनीकी विवरण की कमी के कारण यह आलोचना हो रही है कि यह वार्ता सतही और खोखली है. शांति वार्ता का प्रस्ताव देने के तीन संभावित कारण हो सकते हैं. पहला यह कि सैनिक सरकार शांति वार्ता की आड़ में अपने खिलाफ परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से काम करने वाले पीडीएफ के सैनिकों अथवा राजनीतिक विद्रोहियों या सैनिक सरकार की खिलाफत करने वाले नेटिजन्स के खिलाफ अपने दमन चक्र को जारी रखना चाहती है. दूसरा कारण यह हो सकता है कि ऐसा करके सैनिक सरकार विद्रोही समूहों के बीच फूट डालने का बहाना खोज रही है, ताकि ईएओ को एनयूजी के साथ जाने से रोका जा सके. यह एक “फूट डालो और शासन करो” की नीति भी हो सकती है, जो विवाद को वैध ठहराने और भड़काने के उपयोग में लायी जा रही है, क्योंकि इनमें से कुछ ईएओ के एक दूसरे के साथ लगातार बनावटी संबंध हैं, यह संभवत: उन्हें एनयूजी के साथ जाने से रोकने की एक व्याकुल कोशिश भी हो सकती है. तीसरा यह कि भूमि और हवाई हमलों की वजह से सैनिक सरकार यह चाहती है कि वह शांति वार्ता की टेबल पर बैठने से पहले ही खुद को मजबूत और शक्तिशाली बना ले. वह अपने विद्रोही लड़ाकों और नागरिकों के खिलाफ अपनी सैन्य उग्रता का उपयोग कर इस बातचीत में खुद के लिए बढ़त बनाने की कोशिश कर रही है.

सैनिक सरकार की ओर से आए शांति वार्ता के प्रस्ताव को स्वीकार करने से न केवल उन्हें वैधता मिलती है, बल्कि यह भी साफ हो जाता है कि विद्रोही समूहों के पास केंद्र-परिधीय संबंधों में ज्यादा प्रतिनिधित्व नहीं है. सरकार की राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता के दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप अल्पसंख्यक समूहों को लेकर भेदभाव और अधीनता की प्रक्रिया शुरू हो गई. अब देखना है कि वह आने वाले वर्षो में क्या भूमिका अदा करते हैं और क्या उन्हें देश के भीतर अधिक स्वायत्तता हासिल हो सकेगी. आखिरकार तातमाडॉ खुद को संगठित देश के संरक्षक के रूप में देखते हैं और संघवाद अथवा केंद्र और परिधियों के बीच अधिकारों के समान बंटवारे की किसी भी कोशिश का विरोध करते हैं. यह भी अभी स्पष्ट नहीं है कि देश पर अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद सैनिक सरकार ईएओ को लेकर अपनी मैत्रिपूर्ण तथा समझौतापरक नीति को जारी रखेगी या नहीं. बातचीत की वजह से स्थायी और नए युद्धविराम समझौता होने की संभावना कम ही है, क्योंकि सैनिक सरकार पहले भी अपनी बात पर कायम नहीं रही है और न ही इन वार्ताओं में शामिल होने वाले समूहों के बीच एकता ही दिखाई दी है.

हाल की घटनाओं को एनयूजी के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह ईएओ को साथ लेकर चलना चाहता है. भले ही यह बात उनके साथ गठजोड़ करने अथवा निष्पक्ष बने रहने के चलते ही क्यों न संभव हो. ऐसे में सत्ता से बेदखल हुई सरकार के सामने विद्रोही समूहों को अपने साथ मिलाने की कोशिशों को लेकर कड़ी चुनौती खड़ी है, क्योंकि दोनों ही पक्षों को एक दूसरे पर भरोसा नहीं है. हाल के वर्षो में अधिकांश ‘शांति सम्मेलनों’ के आयोजन के बावजूद बामर और अन्य नस्ली समूहों के बीच द्वेष और अविश्वास को कम करने में सफलता नहीं मिली है. इसी प्रकार ऐसे ईएओ, जो एनयूजी और पीडीएफ के साथ शांति वार्ता में शामिल होने को तैयार नहीं है, उन्हें वार्ता करने के लिए बढ़ावा देने की केआईओ की कोशिशों को भी सफलता नहीं मिली है. ऐसे में एनयूजी के साथ सकारात्मक बातचीत के अभाव में बेदखल हुई सरकार की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता को कायम रखने की कोशिशों को लेकर सवालिया निशान लग गया है. फिलहाल बर्मा के कुछ नागरिकों का मानना है कि एनयूजी ही उनकी मान्यता प्राप्त सरकार है, जिसके साथ कुछ पश्चिमी देश अनौपचारिक रूप से बातचीत कर रहे हैं. इस बात को लेकर भी चिंताएं हैं कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय, इन लोकतंत्र समर्थक ताकतों को पर्याप्त समर्थन प्रदान कर रहा है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यूक्रेन संकट को देखते हुए म्यांमार भी उपेक्षा, उदासीनता और चुप्पी के क्षेत्र में न फिसल जाए.

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