Author : Ramanath Jha

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Published on Jan 21, 2026 Updated 0 Hours ago

मुंबई जैसे बड़े शहर में भी नगर निगम चुनाव होता है लेकिन शहरी नियोजन, बजट और प्रशासन में असली सत्ता राज्य सरकार के पास रहती है. इसके विपरीत, विदेशों में सीधे चुने गए मेयर शहर के विकास और संसाधनों पर वास्तविक नियंत्रण रखते हैं. लेख के जरिए जानें कि भारत में शहरी स्वशासन की हकीकत क्या है और उसकी सीमाएं कहाँ तक हैं।

मुंबई नगर निगम चुनावः असली ताकत कहाँ?

15 जनवरी 2025 को महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने राज्य के 29 नगर निगमों में स्थानीय पार्षदों के चुनाव कराए. इनमें पुणे, नागपुर, ठाणे, नासिक और सबसे महत्वपूर्ण बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) शामिल थे. इन चुनावों में 893 वार्डों की कुल 2,869 सीटों के लिए मतदान हुआ जिसमें लगभग 3.48 करोड़ मतदाता शामिल थे. इन नगर निगमों में चुने गए प्रतिनिधियों को पार्षद या कॉरपोरेटर कहा जाता है. ये पार्षद मिलकर नगर निगम की सामान्य सभा बनाते हैं जो नगर निकाय की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था होती है. बाद में इन्हीं निर्वाचित पार्षदों द्वारा महापौर, उपमहापौर और विभिन्न समितियों के अध्यक्षों का अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव किया जाता है. इसके साथ ही प्रत्येक नगर निगम में नियुक्त प्रशासक का शासन समाप्त हो गया. आमतौर पर नगर निगम का पाँच वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राज्य सरकार भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों को प्रशासक के रूप में नियुक्त करती है.

यह स्थिति संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के बावजूद बनी रही. संविधान के अनुच्छेद 243U(3) में स्पष्ट कहा गया है कि किसी नगर पालिका का चुनाव उसके कार्यकाल की समाप्ति से पहले या भंग होने के छह महीने के भीतर कराना अनिवार्य है. इसके बावजूद इस प्रावधान की अनदेखी की गई. बृहन्मुंबई नगर निगम में मार्च 2022 से जनवरी 2026 तक लगभग चार वर्षों तक प्रशासक शासन रहा जो इसके इतिहास में सबसे लंबा था. चुनावों में देरी का मुख्य कारण अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण और वार्ड परिसीमन से जुड़ी कानूनी प्रक्रियाएँ थी. निर्वाचित निकायों की बहाली से कम से कम यह असंवैधानिक स्थिति समाप्त हुई. भारत में नगर निगमों की शासन संरचना तीन स्तरों वाली होती है. सबसे ऊपर नगर निगम होता है जिसमें सभी निर्वाचित पार्षद शामिल होते हैं. प्रत्येक पार्षद अपने वार्ड का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ नगर निगम की बैठकों में भाग लेता है, नीतियों पर चर्चा करता है और मतदान करता है.

नगर निगम चुनाव

नगर निगम शहरी शासन की एक महत्वपूर्ण संस्था है लेकिन उसकी भूमिका सीमित दायरे में ही रहती है. यह स्थानीय नीतियों का निर्माण करता है, नगर का बजट पारित करता है, शहर की आवश्यक सेवाओं को स्वीकृति देता है और नगर कार्यों से जुड़े निर्णय लेता है. इसके अंतर्गत विभिन्न समितियां कार्य करती हैं जो निर्णय प्रक्रिया में सहयोग करती हैं. इनमें स्थायी समिति सबसे अधिक प्रभावशाली मानी जाती है. स्थायी समिति नगर आयुक्त द्वारा प्रस्तुत विकास परियोजनाओं, टेंडरों और वित्तीय प्रस्तावों की समीक्षा करती है और उन्हें मंजूरी देती है. इस प्रकार, नगर निगम नीति निर्धारण और निगरानी की भूमिका निभाता है जबकि कार्यान्वयन में प्रशासनिक तंत्र की भूमिका अधिक रहती है.

भारत में नगर निगमों की शासन संरचना तीन स्तरों वाली होती है. सबसे ऊपर नगर निगम होता है जिसमें सभी निर्वाचित पार्षद शामिल होते हैं. प्रत्येक पार्षद अपने वार्ड का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ नगर निगम की बैठकों में भाग लेता है, नीतियों पर चर्चा करता है और मतदान करता है.

तीन लाख से अधिक आबादी वाले नगर निगमों में वार्ड समितियां भी होती हैं जो अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़े कुछ फैसले ले सकती हैं. इन समितियों में उस क्षेत्र के सभी निर्वाचित पार्षद सदस्य होते हैं. अंत में नगर आयुक्त होता है जो नगर निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है. नगर आयुक्त की नियुक्ति राज्य सरकार करती है और वह आमतौर पर IAS अधिकारी होता है. हाल ही में हुए नगर निगम चुनावों में, पहले की तरह, टिकट पाने के लिए भारी लॉबिंग देखने को मिली. कई ऐसे पूर्व पार्षद, जिनका प्रतिनिधित्व नगर निकाय भंग होने के बाद खत्म हो गया था, फिर से चुनाव लड़ने की कोशिश में थे. टिकट न मिलने पर कई उम्मीदवारों ने दल बदल लिया. कुछ ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा लेकिन उनकी संख्या सीमित रही. इसका कारण यह है कि स्थानीय चुनाव भी महंगे होते हैं और संगठनात्मक संसाधनों की आवश्यकता होती है.

यह भी साफ दिखाई दिया कि ये चुनाव भले ही स्थानीय कहे जाते हों लेकिन असल में ये राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला थे. फर्क सिर्फ इतना था कि चुनाव का मैदान स्थानीय था. जैसे विधानसभा या लोकसभा चुनावों में होता है, वैसे ही यहां भी उम्मीदवारों का चयन राष्ट्रीय और राज्य स्तर के नेताओं द्वारा किया गया. प्रचार सामग्री और घोषणापत्रों में स्थानीय मुद्दों से ज्यादा बड़े नेताओं की तस्वीरें और पार्टी चिन्ह दिखाई दिए. चुनाव जीतने वाली पार्टी की राज्य इकाई महापौर और समिति अध्यक्षों के चयन में निर्णायक भूमिका निभाती है. यदि किसी एक पार्टी को बहुमत न मिले और गठबंधन बनाना पड़े तो महापौर और समितियों के पदों को लेकर गठबंधन दलों के बीच बातचीत होती है.

चुनावों के बाद पार्षद नगर निगम के रोजमर्रा के कामकाज में भाग लेते हैं और कुछ स्थानीय मामलों को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन नगर प्रशासन से जुड़े बड़े फैसलों में वास्तविक शक्ति अब भी राज्य सरकार के पास ही रहती है. यह शक्ति या तो राज्य के निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से या राज्य द्वारा नियुक्त नगर आयुक्त के जरिए प्रयोग की जाती है. नगर निगमों में पार्षद आमतौर पर पार्टी के निर्देशों के अनुसार मतदान करते हैं, चाहे मामला महापौर के चुनाव का हो या किसी नीति का.

शहर की वित्तीय व्यवस्था का बड़ा हिस्सा भी राज्य के नियंत्रण में होता है. अतीत में राज्य सरकार स्थानीय करों की दरें और नगर निकायों को मिलने वाले राजस्व का हिस्सा भी तय करती रही है.

चुनावों के दौरान उठे कई मुद्दों का नगर प्रशासन से सीधा संबंध नहीं था. उदाहरण के लिए, मुंबई के महापौर पद को लेकर काफी चर्चा हुई. जबकि वास्तविकता यह है कि मुंबई के महापौर की भूमिका अधिकतर औपचारिक और समन्वयकारी होती है. BMC अधिनियम की धारा 37 के अनुसार, नगर निगम अपनी पहली बैठक में अपने ही पार्षदों में से एक को महापौर चुनता है. यानी मुंबई के महापौर का चुनाव प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष होता है, जो विकसित देशों के शहरों से अलग है. धारा 36 के अनुसार महापौर की जिम्मेदारी नगर निगम की मासिक बैठक बुलाने की होती है. यदि लगातार दो बैठकों का आयोजन न हो, तो राज्य सरकार महापौर को पद से हटा सकती है.

निष्कर्ष

भले ही नगर निगम में सत्तारूढ़ दल राज्य सरकार से अलग हो, फिर भी राज्य सरकार का प्रभाव बना रहता है. शहर की विकास योजना नगर निगम तैयार करता है लेकिन उसे अंतिम मंजूरी राज्य सरकार से लेनी होती है, जो उसमें बदलाव भी कर सकती है. शहर की वित्तीय व्यवस्था का बड़ा हिस्सा भी राज्य के नियंत्रण में होता है. अतीत में राज्य सरकार स्थानीय करों की दरें और नगर निकायों को मिलने वाले राजस्व का हिस्सा भी तय करती रही है.

यह कहा जा सकता है कि निर्वाचित निकाय होने से कुछ छोटे स्थानीय निर्णय नगर स्तर पर लिए जा सकते हैं. नागरिक अपनी समस्याएँ पार्षदों के माध्यम से उठा सकते हैं और सेवा वितरण में थोड़ी तेजी आ सकती है. लेकिन शहरी नियोजन, वित्त, प्रशासन और कर्मचारियों से जुड़े बड़े और दूरगामी फैसलों में राज्य की शक्ति लगभग अप्रतिबंधित बनी रहती है. इसी कारण नगर निगम चुनावों को लेकर होने वाला अत्यधिक उत्साह अक्सर वास्तविकता से अधिक होता है. निर्वाचित नगर निकाय हाशिए पर रहता है, जबकि वास्तविक और निर्णायक सत्ता राज्य सरकार के हाथ में ही होती है.


रामनाथ झा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक विशिष्ट फेलो हैं.

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Dr. Ramanath Jha is Distinguished Fellow at Observer Research Foundation, Mumbai. He works on urbanisation — urban sustainability, urban governance and urban planning. Dr. Jha belongs ...

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