Expert Speak Raisina Debates
Published on Oct 25, 2024 Updated 0 Hours ago

भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए MQ-9B ड्रोन ख़रीद समझौते से न केवल भारत की ISR क्षमताओं, यानी ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने, निगरानी एवं टोही क्षमताओं में बढ़ोतरी होगी, बल्कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग भी मज़बूत होगा. इस ड्रोन ख़रीद समझौते के तहत अमेरिका द्वारा न केवल भारत को तकनीक़ का हस्तांतरण किया जाएगा, बल्कि UAV विकसित करने में भी मदद की जाएगी.

MQ-9B ड्रोन समझौता: भारत-अमेरिका संबंधों में नई ताकत का संचार

Image Source: Getty

भारत ने अमेरिका के साथ 31 MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन ख़रीदने के लिए समझौता किया है. यह ड्रोन ख़रीद समझौता 4 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है. इसके अंतर्गत अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स द्वारा बनाए गए और रिमोट संचालित ड्रोन की आपूर्ति भारत को की जाएगी. इन प्रीडेटर ड्रोन की ख़रीद के लिए दोनों देशों के बीच सरकार-से-सरकार समझौता किया गया है. दोनों देशों के बीच वर्ष 2023 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे और इसे हाल ही में सुरक्षा पर कैबिनेट कमेटी ने मंज़ूरी प्रदान की है. अगर क़ीमत के लिहाज़ से देखा जाए तो, यह अब तक भारत और अमेरिका के बीच हुए सबसे बड़े रक्षा समझौतों में से एक है. समझौते के तहत भारत में इन ड्रोन्स के मेंटेनेंस, मरम्मत और ओवरहाल सुविधाएं (MRO) स्थापित करना भी शामिल है. इसके अलावा, अमेरिका की ड्रोन निर्माता कंपनी जनरल एटॉमिक्स भारतीय कंपनी भारत फोर्ज के साथ साझेदारी करेगी और भारत में ड्रोन के उपकरणों एवं दूसरे घटकों का निर्माण करेगी, साथ ही भारत को वैश्विक ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित करने में भी मदद करेगी. इसके अतिरिक्त, अमेरिकी एवं भारतीय कंपनियों के बीच हुई यह साझेदारी भारत में अगली पीढ़ी के लड़ाकू ड्रोन के निर्माण में अमेरिका की ओर से परामर्श उपलब्ध कराने का मार्ग भी प्रशस्त करेगी. ज़ाहिर है कि भारत-अमेरिका साझा डिफेंस टेक्नोलॉजी में लड़ाकू ड्रोन का निर्माण एक तेज़ी से विकसित होने वाला क्षेत्र है. गौरतलब है कि यूरोप और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्धों में लड़ाकू ड्रोन्स का जमकर इस्तेमाल किया गया है और अब इनकी मांग में वृद्धि हो रही है.

 अमेरिका की ड्रोन निर्माता कंपनी जनरल एटॉमिक्स भारतीय कंपनी भारत फोर्ज के साथ साझेदारी करेगी और भारत में ड्रोन के उपकरणों एवं दूसरे घटकों का निर्माण करेगी, साथ ही भारत को वैश्विक ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित करने में भी मदद करेगी.

अमेरिका से ख़रीदे जाने वाले 31 प्रीडेटर ड्रोन भारत की तीनों सेनाओं को दिए जाएंगे. इन 31 ड्रोन में सबसे अधिक 15 ड्रोन्स भारतीय नौसेना को दिए जाने की संभावना है, जबकि बाकी बचे 16 ड्रोन्स में से थल सेना एवं वायु सेना 8-8 ड्रोन्स दिए जाएंगे. गौरतलब है कि भारतीय नौसेना द्वारा पहले से ही दो MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन का उपयोग किया जा रहा है, जिनमें से एक ड्रोन सितंबर महीने में बंगाल की खाड़ी में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. भारतीय नौसेना के लिए ये ड्रोन बेहद कारगर साबित हुए हैं, क्योंकि नौसेना का निगरानी इलाक़ा काफ़ी बड़ा है और हिंद महासागर में दूर-दूर तक फैला हुआ है. इन ड्रोन से नौसेना को समुद्री क्षेत्र में होने वाली हर हलचल पर नज़र रखने में बहुत मदद मिलती है. जब से नेवी द्वारा इन ड्रोन को लीज़ पर लिया गया है, तभी से नौसेना के साथ-साथ थल सेना और वायु सेना द्वारा इनकी कार्यप्रणाली और परिचालन क्षमता को बारीक़ी से परखा गया है. ये ड्रोन न केवल बहुत कारगर हैं, बल्कि अपने मकसद को पूरा करने में भी सफल है, यह इससे साबित होता है कि नौसेना ने इन ड्रोन की लीज़ को एक साल के लिए बढ़ा दिया था. इतना ही नहीं, जिस प्रकार से हाल ही में इनमें से एक ड्रोन बंगाल की खाड़ी में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, उसके बाद भी भारत की ओर से इस ड्रोन्स के सौदे को अंज़ाम दिया गया है, यानी रक्षा क्षेत्र के सबसे बड़े सौदों में से एक को पूरा किया गया है. इससे भी यह साबित होता है कि ये ड्रोन बहुत क़ामयाब हैं और भारत के लिए ज़रूरी भी हैं. ड्रोन के दुर्घटनाग्रस्त होने के लिए दूसरी वजहों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है, जबकि इसकी क्षमता और उपयोगिता पर कोई सवाल नहीं उठाया गया है.

 

MQ-9B ड्रोन की विशेषताएं

सामरिक और परिचालन नज़रिए से देखा जाए तो MQ-9B ड्रोन बेहद कारगर हैं और कई ख़ूबियों से लैस हैं. निसंदेह तौर पर ये ड्रोन भारतीय सशस्त्र बलों के लिए हर लिहाज़ से बेहद उपयोगी हैं. इन ड्रोन में सैटेलाइट कम्युनिकेशन (SATCOM) स्थापित करने की क्षमता है, जो इन्हें एक व्यापक इलाक़े में संचालन की सुविधा प्रदान करता है. यानी चाहे ज़मीन पर हो या फिर समुद्र के ऊपर, ये ड्रोन एक बड़े क्षेत्र में लंबे समय तक अपनी गतिविधियों को सुगमता से संचालित करने में सक्षम हैं. MQ-9B रीपर ड्रोन ओपन आर्किटेक्चर प्रणाली के साथ बनाए जाते हैं, यानी इनमें ज़रूरत के मुताबिक़ बदलाव किया जा सकता है. जैसे की इन ड्रोन को कई तरह के विदेशी और यहां तक कि भारत में निर्मित पेलोड के साथ जोड़ा जा सकता है. जैसे कि इन्हें सेंसर्स, काइनेटिक पेलोड, ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने और उसके मुताबिक़ कार्रवाई करने वाली तकनीक़ से लैस किया जा सकता है. कहने के मतलब है कि अगर भारत इन ड्रोन को अपनी रणनीतिक एवं परिचालन ज़रूरतों के अनुसार कुछ बदलाव करना चाहता है, तो ऐसा कर सकता है. इसके अलावा, MQ-9B ड्रोन 40,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है और एक बार में 40 घंटे तक अपनी गतिविधियों को अंज़ाम दे सकता है. इस प्रकार से देखा जाए तो ये प्रीडेटर ड्रोन हिंद महासागर और हिमालय की ऊंचाइयों पर निगरानी के लिए एकदम मुफ़ीद है. इतना ही नहीं, ये ड्रोन समुद्र और सतह पर लगातर निगरानी करने के अलावा लक्ष्यों का भी पता लगा सकते हैं और बगैर चूके उन लक्ष्यों पर सटीक निशाना भी साध सकते हैं. MQ-9B ड्रोन कई अत्याधुनिक हथियारों से भी लैस होते हैं, जैसे कि ये 4 हेलफायर मिसाइलों, 450 किलोग्राम GBU-39B गाइडेड ग्लाइड बमों, नेविगेशन सिस्टम, सेंसर सुइट्स एवं मोबाइल ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम से सुसज्जित हैं. ज़ाहिर है कि भारतीय वायु सेना और थल सेना फिलहाल वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) एवं तिब्बत के पहाड़ों के दूसरी तरफ लगातार नज़र रखने में अक्षम हैं, कह सकते हैं कि यह सेना की एक बड़ी कमज़ोरी है. MQ-9B ड्रोन का स्काई गार्डियन वेरिएंट भारतीय सशस्त्र बलों की आईएसआर क्षमताओं, यानी ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने, निगरानी एवं टोही क्षमताओं की कमी को दूर करने का काम करेगा. ज़ाहिर है कि भारतीय सशस्त्र बल सीमा पर चीन की गतिविधियों पर सटीक नज़र नहीं रख पाते हैं. इन ड्रोन्स से वायु सेना और आर्मी को एलएसी के आसपास के क्षेत्रों में और उससे भी आगे के इलाक़ों में चीनी गतिविधियों पर नज़र रखने में मदद मिलेगी और साथ ही वहां मौजूद चीनी सैन्य ठिकानों और गश्ती दलों पर अचूक निशाना साधने में सहायता मिलेगी. कहने का मतलब है कि भारत और चीन सीमा के बीच पड़ने वाले पहाड़ी क्षेत्रों में भारतीय वायु सेना MQ-9B स्काई गार्डियन ड्रोन की मदद से न केवल सटीक निगरानी रख पाने में सक्षम होगी, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर चीनी सैन्य बलों पर निशाना भी साध पाएगी.

 इस प्रकार से देखा जाए तो ये प्रीडेटर ड्रोन हिंद महासागर और हिमालय की ऊंचाइयों पर निगरानी के लिए एकदम मुफ़ीद है. इतना ही नहीं, ये ड्रोन समुद्र और सतह पर लगातर निगरानी करने के अलावा लक्ष्यों का भी पता लगा सकते हैं

इसी प्रकार से MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन का नेवल वेरिएंट यानी सी गार्डियन ड्रोन भी कई ख़ूबियों से लैस है. इसकी क्षमता 8 मिलियन से ज़्यादा उड़ान घंटे की है, साथ ही इसकी लागत मानवयुक्त विमान की तुलना में 86 प्रतिशत कम है. सी गार्डियन ड्रोन को चलाना बेहद आसान है, इसे हर प्रकार के मौसम में सुगमता से संचालित किया जा सकता है. साथ ही नागरिक हवाई यातायात से सामंजस्य स्थापित करते हुए, ज़मीन पर लड़े जाने वाले युद्ध और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) में भी इसे आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है. जवाबी हवाई हमलों में भी सी गार्डियन ड्रोन बेहद उपयोगी है. इसके अलावा, इस ड्रोन को चुनौतीपूर्ण एवं मुश्किल परिस्थितियों में भी संचालित किया जा सकता है. जैसे कि SATCOM से लैस सी गार्डियन ड्रोन को एंटी सबमरीन युद्ध (ASW) यानी दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने, उन्हें ट्रैक करने और उन पर निशाना साधने में भी बेहतर तरीक़े से इस्तेमाल किया जा सकता है. इन ड्रोन को एकीकृत अभियानों, यानी ASW हेलीकॉप्टरों के साथ भी उपयोग किया जा सकता है. गौरतलब है कि मौज़ूदा समय में भारतीय नौसेना द्वारा पनडुब्बी रोधी अभियानों में MH-60 रोमियो मल्टी-मिशन हेलीकॉप्टर का उपयोग किया जाता है और ये ड्रोन इन चॉपर्स के साथ भी आसानी से तालमेल स्थापित कर सकते हैं. MH-60 रोमियो मल्टी-मिशन चॉपर्स उन समुद्री इलाक़ों में सोनोबॉय को गिरा सकता है, जहां दुश्मन की पनडुब्बी के संचालित होने का अंदेशा हो, वहीं सी गार्डियन ड्रोन अपने सेंसरों की मदद से उस पूरे समुद्री क्षेत्र में निगरानी कर सकता है और दुश्मन की पनडुब्बी की आवाजाही व संचालन पर नज़र रख सकता है. यानी सी गार्डियन ड्रोन द्वारा जो भी आंकड़े जुटाए जाते हैं, उनका इस्तेमाल कर हेलीकॉप्टर से दुश्मन की सबमरीन पर सटीक हमला किया जा सकता है.

 

अमेरिकी कंपनी द्वारा भारत को इन ड्रोन्स की आपूर्ति करने में कम से कम चार से छह साल का वक़्त लगेगा. साथ ही भविष्य में इनके उपयोग और इनके प्रदर्शन के मुताबिक़ इन ड्रोन्स की लॉजिस्टिक्स से संबंधित फैसलों को अमल में लाया जाएगा. गौरतलब है कि ये उन्नत ड्रोन ऐसे क्षेत्रों में, जहां आने वाले दशकों में भारत के सामने व्यापक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं, वहां अपनी क्षमता एवं काबिलियत के बल पर देश की सशस्त्र सेनाओं को मज़बूती प्रदान कर सकते हैं. ज़ाहिर है कि हाल ही में भारत कंबाइंड मैरीटाइम फोर्स यानी संयुक्त समुद्री बल (CMF) का सदस्य बना है. अमेरिका के नेतृत्व में 45 देशों वाला संयुक्त समुद्री बल फिलहाल बहुत मज़बूत स्थिति में नहीं है. यह संयुक्त समुद्री बल देखा जाए तो पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में एक सुरक्षा सहयोग की तरह है, जो इस समुद्री इलाक़े में सदस्य देशों के हितों की रक्षा करने का काम करता है. भारत MQ-9B ड्रोन्स की तैनाती के ज़रिए क्वाड देशों एवं हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में शांति बनाए रखने और स्थिरता के लिए संकल्पित विभिन्न लोकतांत्रिक राष्ट्रों के साथ क़दमताल कर सकता है. यानी भारत अपनी मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) गतिविधियों, तलाशी एवं बचाव अभियानों, दुश्मन की तरफ से पैदा होने वाले हवाई एवं समुद्री ख़तरों से आगाह करने, एंटी सबमरीन युद्ध और ऐसे तमाम दूसरे कार्यों में अपना भरपूर योगदान दे सकता है. इतना ही नहीं, MQ-9B ड्रोन्स से भारत की अरब सागर एवं उत्तर-पश्चिमी हिंद महासागर जैसे दूरदराज के इलाक़ों में हमला करने की क्षमता में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हो सकती है. ज़ाहिर है कि खाड़ी क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर हूती विद्रोहियों द्वारा किए गए हमलों के दौरान भारतीय नौसेना ने अपनी ताक़त का प्रदर्शन किया है. ऐसे में जब MQ-9B ड्रोन्स नौसेना के बेड़े में शामिल हो जाएंगे, तो निश्चित तौर पर खाड़ी क्षेत्र के समुद्री इलाक़े में भारत की निगरानी एवं हमले की क्षमता में इज़ाफा होगा.

 स्पष्ट होता है कि भारत को इन ड्रोन से जुड़ी संवेदनशील तकनीक़ के हस्तांतरण में कोई दिक़्क़त नहीं होगी, क्योंकि इसके लिए अमेरिका को भारत के साथ न तो कोई विशेष सहयोग स्थापित करने की ज़रूरत होगी और न ही अलग से किसी रणनीतिक समझौते की ज़रूरत होगी.

अमेरिका के साथ ड्रोन ख़रीद समझौते पर मुहर लगने से जहां भारत को अपनी ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने, निगरानी एवं टोही क्षमताओं को बढ़ाने में, यानी आईएसआर से जुड़ी कमियों को दूर करने में मदद मिलेगी, वहीं ड्रोन्स के रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल सुविधाएं (MRO) भारत में ही विकसित करने का समझौता भविष्य में देश के भीतर यूएवी सेक्टर में घरेलू क्षमताओं को सशक्त करने में बेहद मददगार साबित हो सकता है. एक और बात है कि भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्तों में टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण (ToT) एक बड़ा मसला बना हुआ है. देखा जाए तो अफ़सरों के ढुलमुल रवैये और किसी भी सहयोगी गठजोड़ में अनिवार्य माध्यमों की गैरमौज़ूदगी के चलते तकनीक़ के ट्रांसफर में तमाम दिक़्क़तें बनी हुई हैं. ज़ाहिर है कि अगर ड्रोन्स के निर्माण और उनकी मरम्मत व रखरखाव से जुड़े इकोसिस्टम का विकास किया जाता है, तो टेक्नोलॉजी के हस्तांतरण में आने वाली रुकावटों को आसानी से दूर किया जा सकता है. दूसरी ओर, अमेरिका द्वारा पहले ही भारत को प्रमुख रक्षा भागीदार (MDP) का दर्ज़ा दिया गया है और इसी के तहत भारत के साथ यह ड्रोन सौदा किया गया है. इससे स्पष्ट होता है कि भारत को इन ड्रोन से जुड़ी संवेदनशील तकनीक़ के हस्तांतरण में कोई दिक़्क़त नहीं होगी, क्योंकि इसके लिए अमेरिका को भारत के साथ न तो कोई विशेष सहयोग स्थापित करने की ज़रूरत होगी और न ही अलग से किसी रणनीतिक समझौते की ज़रूरत होगी. ज़ाहिर है कि कई बार इस तरह के सौदों में तकनीक़ के हस्तांतरण के लिए अमेरिकी कांग्रेस की स्वीकृति ज़रूरी होती है, जो कि भारत के साथ हुए इस ड्रोन समझौते में कतई आवश्यक नहीं है.


विवेक मिश्रा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में डिप्टी डायरेक्टर हैं.

कार्तिक बोमाकान्ति ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.

Authors

Vivek Mishra

Vivek Mishra

Vivek Mishra is Deputy Director – Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. His work focuses on US foreign policy, domestic politics in the US, ...

Read More +
Kartik Bommakanti

Kartik Bommakanti

Kartik is a Senior Fellow with the Strategic Studies Programme. He is currently working on issues related to land warfare and armies, especially the India ...

Read More +