Expert Speak Health Express
Published on Jul 17, 2025 Updated 0 Hours ago

आज जब दुनिया में प्रजनन दर घट रही है और आबादी की उम्र बढ़ रही है, तो रूस से लेकर अमेरिका तक बहुत से देश, जनसंख्या की ताक़त दोबारा हासिल करने के लिए वंशवृद्धि को बढ़ावा देने वाली नीतियां फिर से लागू कर रहे हैं

ज़्यादा बच्चे, अधिक ताक़त: दुनिया में आबादी बढ़ाने पर ज़ोर के चलन के पीछे यही वजह है?

Image Source: Getty

आबादी में गिरावट को रोकने के लिए रूस के कम से कम दस क्षेत्रों ने गर्भवती स्कूली छात्राओं को बच्चे पैदा करने और उनकी परवरिश के लिए प्रोत्साहित करने के लिए प्रति छात्रा एक लाख हज़ार रूबल (लगभग 900 पाउंड) का भुगतान करना शुरू किया है. ये एक असाधारण नीति है, जिसने आम जनता की राय को बांट दिया है; एक सर्वे में 43 प्रतिशत रूसी नागरिकों ने इस नीति का समर्थन किया, तो 40 फ़ीसद ने इसका विरोध किया, और इसकी नैतिकता पर तमाम तरह के सवाल उठाए. इन सबसे इतर, ये क़दम ये दिखाता है कि रूस की सरकार अपने यहां आबादी के संकट को कितनी गंभीरता से ले रही है. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जनसंख्या वृद्धि को अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकता बना लिया है और वो खुलकर ज़्यादा आबादी का संबंध देश की शक्ति से जोड़ते हैं और आबादी को रूस की वैसी ही ताक़त बताते हैं, जैसे उसकी सेना या क्षेत्रफल है. विडम्बना ये है कि पुतिन ने यूक्रेन में जो युद्ध छेड़ रखा है, उसने रूस की आबादी के भविष्य को और बिगाड़ दिया है. कुछ आकलनों के मुताबिक़ इस युद्ध में अब तक लगभग ढाई लाख रूसी सैनिक मारे जा चुके हैं. वहीं, जबरन सेना में भर्ती किए जाने के डर से भविष्य में पिता बनने की संभावना रखने वाले लाखों युवा देश छोड़कर भाग गए हैं. रूस की जन्म दर पिछले 25 सालों के सबसे निचले स्तर तक गिर गई है. रूस की सरकार इसे खुलकर ‘देश के भविष्य के लिए क़यामत वाली तबाही’ कहती है. इसलिए, किशोर उम्र में मां बनने वाली लड़कियों को कैश में बोनस देने से लेकर ‘बच्चा मुक्त’ वाली विचारधारा पर पाबंदी लगाने जैसे क़दम उठाकर रूस ने आबादी बढ़ाने का प्रचार करने के लिए खुली मुहिम छेड़ दी है. ये दुनिया में वंशवृद्धिवाद के उभार का सबसे बड़ा उदाहरण है.

रूस में आबादी बढ़ाने पर ज़ोर देने वाला बदलाव

रूस का जनसंख्या वृद्धि पर ज़ोर देने वाला ये रुख़ एक तब्दीली का उदाहरण है. सोवियत संघ के विघटन के बाद से रूस की घटती आबादी को लेकर पहले भी चिंता जताई जाती रही थी. लेकिन, अब तक इससे निपटने के लिए मातृत्व का बोझ उठाने वाली महिलाओं को थोड़े बहुत पैसे देने जैसे क़दम ही उठाए जा रहे थे. 2025 में युद्ध और प्रतिबंधों के बीच अब रूस की सरकार घटती आबादी से बेहद परेशान हो गई है. 2024 के आख़िर में देश की संसद ने ‘बच्चे न पैदा करने के प्रचार’ को ग़ैर-क़ानूनी बना दिया था, जिसके बाद बच्चे नहीं पैदा करने वाले रहन-सहन की बात मीडिया में या सामान्य बातचीत में भी कहने पर पाबंदी लग गई थी.

विडम्बना ये है कि पुतिन ने यूक्रेन में जो युद्ध छेड़ रखा है, उसने रूस की आबादी के भविष्य को और बिगाड़ दिया है. कुछ आकलनों के मुताबिक़ इस युद्ध में अब तक लगभग ढाई लाख रूसी सैनिक मारे जा चुके हैं.

इस सांस्कृतिक चाबुक के साथ साथ रूस की सरकार ने कुछ ठोस प्रोत्साहन देने भी शुरू किए. स्कूल जाने की उम्र वाली लड़कियों को एक बार में रक़म का भुगतान हैरान करने वाला उपाय लगता है, जो सोवियत संघ के दौर की उस सोच को ज़िंदा करता है, जिसमें मातृत्व को हर क़ीमत पर सम्मान दिया जाता है. पुतिन ने स्टालिन के दौर केमदरहुड मेडल की भी फिर से शुरुआत की है, जिसमें दस या इससे ज़्यादा बच्चों वाली माताओं को सम्मानित किया जाता है. रूस में 1940 के दशक में मदरहुड मेडल दिए जाते थे. 2024 में रूस की प्रजनन दर प्रति महिला 1.41 बच्चे तक गिर गई थी, जो स्थिर आबादी के लिए ज़रूरी 2.1 की प्रजनन दर से काफ़ी कम है. इसी वजह से अब सरकार आबादी बढ़ाने के लिए ज़ोर-शोर से क़दम उठा रही है. 

अमेरिका में फिर सेबेबी बोनसशुरू करने की मांग

अमेरिका में भी परिवार बढ़ाने की मांग करने वाली मुहिम अभी नई नई शुरू हुई है. रूढ़िवादी नीतिगत हलकों में इसकी काफ़ी चर्चा हो रही है. जिसमें तर्क दिया जा रहा है कि अमेरिका की घटती प्रजनन दर (प्रति महिला औसतन 1.6 बच्चे), उसके आर्थिक भविष्य और सांस्कृतिक पहचान के सामने ख़तरा है. इस बात पर शायद ही हैरानी हो कि ये मुद्दा राजनीति के शीर्ष स्तर तक जा पहुंचा है. अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बच्चों की डिलीवरी करने वाली नई माओं को 5,000 डॉलर का ‘बेबी बोनस’ देने का प्रस्ताव रखा है. इस परिकल्पना का कुछ हिस्सा अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से उधार लिया गया है. जैसे कि, हंगरी में बड़े परिवारों को सब्सिडी दी जाती है. पोलैंड बच्चों के नाम पर भत्ता देता है. अमेरिका के दक्षिणीपंथी वर्ग के बीच ये सुर उठ रहे हैं जिसमें तकनीकी उद्योग के अरबपति और ‘पारिवारिक मूल्यों’ के समर्थक, दोनों ही शामिल हैं. दोनों गुटों को लगता है कि ज़्यादा बच्चों का मतलब एक मज़बूत भविष्य है. कुछ लोगों ने तो ये सुझाव भी दिया है कि मां-बाप बन चुके छात्रों के लिए स्कॉलरशिप आरक्षित की जाए, या फिर छह या उससे भी ज़्यादा बच्चों वाली माओं को ‘नेशनल मेडल ऑफ मदरहुड’ दिया जाए (जिस तरह पुतिन ने मदरहुड मेडल को फिर से ज़िंदा किया है).

मरीचिका बनासिल्वर डिविडेंड

सवाल ये है कि दुनिया भर में ज़्यादा बच्चे पैदा करने पर ये ज़ोर क्यों दिया जा रहा है? इसकी एक बड़ी वजह उम्रदराज़ होती आबादी का मंडराता ख़ौफ़ है. बहुत से विकसित देश और यहां तक कि मध्यम आमदनी वाले देशों में भी ऐतिहासिक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. लोग लंबी उम्र तक जी रहे हैं, वहीं जन्म दर में गिरावट आ रही है. ऐसे में जनसंख्या में बुज़ुर्ग लोगों की हिस्सेदारी बढ़ रही है, तो कामकाजी उम्र वाले वयस्कों की संख्या में गिरावट आ रही है. राजनेताओं को डर है कि उम्रदराज़ होती आबादी से आर्थिक विकास ठहर जाएगा. पेंशन फंडों पर बोझ बढ़ेगा और स्वास्थ्य सेवाएं बीमारों के दबाव से ठहर जाएंगी. समृद्ध सामाजिक कार्यक्रमों या फिर सबके लिए स्वास्थ्य सेवा (UHC) देने वाले देशों में हर रिटायर होने वाले के पीछे भुगतान करने वालों की घटती तादाद, इन सुविधाओं की फंडिंग के लिए ख़तरे की घंटी बजा रही है. रूस का शासक वर्ग ये डर महसूस करता है कि अगली पीढ़ी की घटती संख्या से सैनिकों और कामगारों की तादाद में भी गिरावट आएगी; वहीं, अमेरिका के रूढ़िवादियों को इस बात का डर है कि आबादी में कमी आने से चीन जैसे दुश्मनों के ख़िलाफ़ अमेरिका की हैसियत कमज़ोर हो जाएगी. ये चिंताएं बेबुनियाद नहीं हैं: जापान और यूरोप के कुछ देशों में पहले ही कामगारों की क़िल्लत है और पेंशन की लागत बेक़ाबू होती जा रही है.

राजनेताओं को डर है कि उम्रदराज़ होती आबादी से आर्थिक विकास ठहर जाएगा. पेंशन फंडों पर बोझ बढ़ेगा और स्वास्थ्य सेवाएं बीमारों के दबाव से ठहर जाएंगी. 

अर्थशास्त्रियों द्वारा जो एक और विचार आगे बढ़ाया जा रहा है, वो ये है कि समाज, बढ़ती उम्र के लोगों की बढ़ती संख्या से निपटना सीख सकते हैं और यहां तक कि इसे ‘सिल्वर डिविडेंड’ यानी अपने फ़ायदे में भी तब्दील कर सकते हैं. सिल्वर डिविडेंड का मतलब उम्रदराज़ होता समाज है जिसमें अगर बुज़ुर्ग लोग सक्रिय होते हैं, तो पूरे समाज को आर्थिक और सामाजिक लाभ होते हैं. लंबे और स्वस्थ जीवन से कामकाजी उम्र का दायरा भी बढ़ेगा, जिससे अनुभवी मार्गदर्शकों की बहुतायत होगी और बुज़ुर्ग लोगों पर केंद्रित ‘सिल्वर इकॉनमी’ को बढ़ावा मिलेगा. लेकिन, इस डिविडेंड का लाभ उठाने के लिए स्वास्थ्य, वयस्क शिक्षा और बढ़ती उम्र वालों के लिए मूलभूत ढांचे की सुविधाएं बढ़ाने में निवेश करना होगा. जापान की तरह बुज़ुर्गों की देखभाल की नीतियां लागू करनी होंगी. जहां पिछली पीढ़ी के लोगों को सामुदायिक कार्यों और पार्ट टाइम कामों की सुविधा दी जाती है और उनकी मदद के लिए मज़बूती से स्थापित पेंशन व्यवस्था आर्थिक ‘निर्भरता के अनुपात’ की समस्या को युवाओं की आबादी से हटाकर कम कर सकती है.

पश्चिम के कई देश अप्रवासियों को मौक़ा देकर भी कम जन्म दर की समस्या से निपटते हैं; अगर साल 2000 से 2020 के दौरान इटली और जर्मनी ने अपने यहां अप्रवासियों की बाढ़ को दाख़िला नहीं दिया होता, तो उनकी आबादी में भी भारी गिरावट देखने को मिलती. भारत देश के भीतर श्रमिकों के अप्रवास की वजह से एक अलग तरह का आबादी का संतुलन देखने को मिलता है: बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से केरल जैसे कम जन्म दर वाले राज्यों में भारी संख्या में कामगार जाते हैं, जिससे आबादी के क्षेत्रीय अंतर वाले दबाव से निपटने में मदद मिलती है. 

जनसंख्या को लेकर दोराहे पर खड़ा भारत

भारत एक ज़माने में अपने जनसंख्या विस्फोट को लेकर बदनाम था. कई दशकों तक भारत ने आबादी नियंत्रित करने की आधिकारिक नीति चलाई, जिसका प्रतीक 1970 के दशक का मशहूर नारा ‘हम दो, हमारे दो’ था, जिसमें मां-बाप से अपील की गई थी कि वो दो से ज़्यादा बच्चे न पैदा करें. परिवार नियोजन के कार्यक्रमों में से कुछ ज़बरन नसबंदी की वजह से बदनाम भी हुए. पर इनके कारण 1960 के दशक में जो प्रजनन दर पांच बच्चे प्रति महिला थी, वो घटकर 1990 के दशक में तीन बच्चों के औसत तक गिर गई. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य के ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक़, इस वक़्त कुल प्रजनन दर घटकर 2.0 बच्चे प्रति महिला तक गिर गई है, जो 1990 के दशक की 3.4 की दर से काफ़ी कम है.

हालांकि, ये राष्ट्रीय तस्वीर बड़े पैमाने वाले क्षेत्रवार फ़र्क़ को छुपाने वाली है. दक्षिण और तटीय इलाक़ों के कई राज्यों में प्रजनन दर यूरोपीय देशों के स्तर (1.7 या इससे भी कम) है. जबकि, बिहार जैसे उत्तर के कई राज्यों में प्रति महिला 3.0 बच्चों की औसत दर है. राज्यों के बीच प्रजनन दर में फ़र्क़ का सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर पूर्व का छोटा सा राज्य सिक्किम है. सिक्किम की आबादी सात लाख के आस-पास है और वहां प्रजनन दर देश में सबसे कम यानी प्रति महिला 1.1 कम बच्चे है, जो लगभग जापान के बराबर है और आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए ज़रूरी 2.1 की दर से काफ़ी कम है. आधुनिक भारत के एक अभूतपूर्व क़दम के तौर पर सिक्किम की सरकार अब परिवारों को ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन दे रही है. दो बच्चों पर रुकने के नारे के उलट सिक्किम के मुख्यमंत्री ने दंपत्तियों से अपील की है कि वो तीन बच्चे पैदा करें. इस मुहिम को बढ़ाने के लिए सिक्किम ने परिवार बढ़ाने के लिए कई प्रोत्साहनों का भी एलान किया है: महिलाओं को एक साल की मैटरनिटी लीव पूरी तनख़्वाह के साथ दी जा रही है. राज्य सरकार पुरुषों को एक महीने की पैटरनिटी लीव और टेस्ट ट्यूब (IVF) से बच्चे पैदा करने का इलाज कराने वालों को भी वित्तीय सहायता दे रही है. 

आधुनिक भारत के एक अभूतपूर्व क़दम के तौर पर सिक्किम की सरकार अब परिवारों को ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन दे रही है. दो बच्चों पर रुकने के नारे के उलट सिक्किम के मुख्यमंत्री ने दंपत्तियों से अपील की है कि वो तीन बच्चे पैदा करें.

अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ के मुताबिक़, अभी भारत के सामने फ़ौरी तौर पर आबादी घटने का जोखिम नहीं है. और, बुज़ुर्ग होती जनसंख्या की चिंता करने से पहले देश की आबादी के युवा होने का फ़ायदा उठाने के लिए काफ़ी समय है. भारत इस वक़्त ‘डेमोग्राफ़िक डिविडेंड’ का लाभ उठा रहा है, जिसकी आबादी में कामकाजी उम्र वालों की संख्या अधिक है. अगर इनको अच्छा रोज़गार दिया जा सके, तो आने वाले कई वर्षों तक आर्थिक विकास को तेज़ किया जा सकता है.

आबादी बढ़ने-घटने के कारक और तल्ख़ सच्चाइयां

परिवार बढ़ाने की नीतियां अक्सर एक ख़ास तरह के समाज का दृष्टिकोण लेकर आती हैं, जिन्हें नेता बढ़ाने की तमन्ना रखते हैं. अक्सर ये सामाजिक रूप से पुरातनपंथी सोच होती है; जिसमें महिलाओं और पुरुषों के उनकी पारंपरिक भूमिकाओं में वापस जाने, सिर्फ़ पुरुषों और महिलाओं के बीच शादी करने और ‘अच्छे’ समझे जाने वाले नागरिकों की जन्म दर बढ़ाने पर ज़ोर दिया जाता है. यही नहीं, परिवार बढ़ाने के तर्क आम तौर पर ऐसी नीतियों के साथ आते हैं, जिसमें बच्चे पैदा करने की आज़ादी सीमित हो जाती है, जिसका मतलब महिलाओं के चुनाव और उनकी हस्ती को नियंत्रित करना होता है. हम इसका उदाहरण रूस के उस अनिवार्य प्रतिबंध के रूप में देख सकते हैं, जिसके तहत बच्चे पैदा नहीं करने के प्रचार पर रोक लगी है, या फिर गर्भपात पर पाबंदी लगाई गई है.

दूसरी समस्या किशोरों और महिलाओं की सेहत और उनके कल्याण की होती है. जिस तरह रूस ने स्कूल जाने वाली माओं के लिए नक़दी देने की योजना शुरू की है, उस तरह की कम उम्र की गर्भवती महिलाएं डॉक्टरों के लिए चुनौतियां खड़ी करती हैं. किशोर उम्र में गर्भ धारण करने वाली लड़कियों की सेहत के लिए तमाम तरह की जटिलताएं पैदा होती हैं, जिसके होने वाले बच्चे के लिए बेहद बुरे परिणाम निकलते हैं.

इससे लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक और चुनौती पैदा होती है. जब परिवार बढ़ाने की नीतियों को रूढ़िवादी संस्कृति के चलन के साथ जोड़ा जाता है, तो इसका नतीजा महिलाओं के फ़ैसलों को नियंत्रित करने के तौर पर नज़र आता है. अमेरिका में वंशवृद्धि के पुनर्जागरण के समर्थन का संबंध, रो बनाम वेड के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से बच्चे पैदा करने की आज़ादी को लगे झटके से जोड़ा जा रहा है. इसके परिणाम स्वरूप ऐसे समाज का निर्माण होगा, जिसमें महिलाओं की क़ीमत केवल बच्चे पैदा करने के लिए होगी. जो पुरुषों और महिलाओं को समानता का अधिकार देने, महिलाओं की भूमिकाओं का विस्तार करने के दशकों के संघर्ष और उसके फ़ायदों को उल्टा कर देगा.

निष्कर्ष

परिवार बढ़ाने की नीतियों से कुछ वक़्त के लिए तो जन्म दर बढ़ सकती है, जिससे कुछ ख़ास सियासी तबक़ों को तुष्ट किया जा सकता है. लेकिन, ऐसी नीतियों से आबादी के विस्तार के अर्थपूर्ण दूरगामी परिणाम शायद ही देखने को मिलें. ऐसी नीतियां आबादी में आ रहे परिवर्तन से निपटने के लिए जुड़ी कड़ी मेहनत करने से भी ध्यान भटका सकती हैं: जैसे कि पेंशन व्यवस्था में सुधार, स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाना, अप्रवासियों को स्वीकार करना और महिलाओं को सशक्त बनाना (यानी उन्हें सिर्फ़ मां बनने की भूमिका तक सीमित नहीं रखना). वंशवृद्धि करने का तर्क, संख्या बल पर ज़ोर देता है. ये अक्सर ऐसा जज़्बाती मुद्दा होता है, जो ख़ास तौर से राष्ट्रवादी नेताओं को बहुत लुभाता है. लेकिन, बिना गुणवत्ता के संख्या कोई मायने नहीं रखती है.

किसी भी देश के भविष्य का वास्तविक आकलन ऐसे हालात तैयार करने में निहित है, जिसमें लोग अपनी मर्ज़ी से बच्चों को इस दुनिया में लाना चाहें और उन्हें सुरक्षा और सम्मान के साथ परवरिश दे सकें. इस मामले में ‘ज़्यादा बच्चे, अधिक ताक़त’ का जुमला अधिक से अधिक आंशिक बयां करता है. पारिवारिक जीवन की बुनियादों को मज़बूत बनाकर और महिलाओं और पुरुषों को बच्चे पैदा करने की मशीन समझने के बजाय उन्हें मूल्यवान समझकर ही समाज, घटती आबादी के दौर में प्रगति की उम्मीद लगा सकते हैं.


The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.