Author : Shairee Malhotra

Expert Speak Raisina Debates
Published on Feb 19, 2024 Updated 0 Hours ago

पूरे युद्ध के दौरान स्टोल्टेनबर्ग ने नैटो की एकजुटता बनाए रखी और रूस को जवाब देने के मामले में आम सहमति से काम लिया. इसके चलते उनकी जगह की भरपाई कर पाना मुश्किल होगा.

कौन बनेगा नैटो (NATO) का नया सेक्रेटरी जनरल?

2014 से लेकर पूरे एक दशक तक नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री जेन्स स्टोल्टेनबर्ग, NATO के महासचिव बने रहे हैं. स्टोल्टेनबर्ग के कार्यकाल को अक्टूबर 2024 तक विस्तार दिए जाने जाने से पहले उनके कार्यकाल को पहले ही तीन बार बढ़ाया जा चुका था. इससे नैटो में उनके वारिस की नियुक्ति राह में रही चुनौतियों और आम सहमति के अभाव का पता चलता है.

एक ज़माने में नैटो को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों नेब्रेन डेडक़रार दिया था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस के युद्ध ने नैटो को उसके अस्तित्व की एक और वजह दे दी. इस पूरे युद्ध के दौरान, स्टोल्टेनबर्ग ने इस गठबंधन की एकजुटता और रूस से मुक़ाबले की रणनीति पर आम सहमति को क़ायम रखा, जिससे अब उनकी जगह ले पाना मुश्किल हो गया है.

युद्ध को लेकर बढ़ती थकान, घरेलू सियासत की मजबूरियों और इज़राइल हमास के युद्ध जैसे ध्यान भटकाने वाले मुद्दों को देखते हुए महासचिव का पद यूक्रेन को लगातार सैन्य समर्थन सुनिश्चित करने और ताक़त का प्रदर्शन करने के लिहाज़ से बेहद अहम हो जाता है.

कार्यकारी ताक़त भले ही कम हो, लेकिन NATO के चेहर के तौर पर महासचिव की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. युद्ध को लेकर बढ़ती थकान, घरेलू सियासत की मजबूरियों और इज़राइल हमास के युद्ध जैसे ध्यान भटकाने वाले मुद्दों को देखते हुए महासचिव का पद यूक्रेन को लगातार सैन्य समर्थन सुनिश्चित करने और ताक़त का प्रदर्शन करने के लिहाज़ से बेहद अहम हो जाता है. यूरोपीय संघ (EU) की तरह ही नैटो भी आम सहमति के तहत काम करता है, जहां हर फ़ैसले पर सभी सदस्य देशों की मंज़ूरी ज़रूरी होती है. ऐसे में हंगरी और तुर्की जैसे ख़लल डालने वाले देशों की मौजूदगी, इसकी निर्णय प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं. इसीलिए, महासचिव पद के किसी भी संभावित उम्मीदवार को 31 सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनाने में, उनकी मांगों के बीच तालमेल बिठाने, उनकी चिंताओं से सभी देशों को परिचित कराने और एक विशाल अफ़सरशाही के प्रबंधन में कुशल होना चाहिए.

नैटो के नए महासचिव बेहद निर्णायक दौर में पद संभालने वाले होंगे. 1949 के 12 मूल सदस्यों से बढ़कर अब इस गठबंधन के सदस्य देशों की संख्या आज 31 पहुंच चुकी है और निकट भविष्य में स्वीडन भी नैटो में शामिल होने वाला है. सदस्यों की तादाद बढ़ने के साथ साथ नैटो के सामने खड़े ख़तरों का मिज़ाज भी बदला है. आज, वैसे तो रूस से निपटना इसकी मुख्य ज़िम्मेदारी बना हुआ है. इसके साथ साथ पहले अलग समझे जाने वाले दूसरे इलाक़ों के ख़तरों- जैसे कि यूरोप अटलांटिक और हिंद प्रशांत-के नोटों की सुरक्षा से जुड़ जाने ने उसकी चुनौतियों का दायरा बढ़ा दिया है और अब इसमें दक्षिणी चीन सागर जैसे इलाक़े भी शामिल हो गए हैं. यही नहीं, उभरती हुई तकनीकें, ग़लत सूचनाएं फैलाने के अभियान और व्यापार पर निर्भरता को हथियार बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति नए युग की चुनौतियां पैदा कर रही हैं.

बहुत से उम्मीदवार मगर आम सहमति किसी पर नहीं

पिछले कुछ महीनों के दौरान, शर्तों और प्राथमिकताओं की लंबी सूची के साथ साथ NATO के नए महासचिव के लिए कई नामों की चर्चा चली है. चूंकि, पहले के सारे महासचिव पुरुष ही रहे हैं, ऐसे में इस बार किसी महिला को ये पद दिए जाने को तरज़ीह दी जा रही है. यूक्रेन को समर्थन देने के मोर्चे पर अगुवाई मध्य और पूर्वी यूरोप के देश करते रहे हैं और रूस को लेकर उनकी चेतावनी सही साबित हुई है. इस वजह से बहुत से देश ये चाहते हैं कि इस बार महासचिव इन्हीं देशों में से कोई बने. इस संदर्भ में एस्टोनिया के प्रधानमंत्री काजा कल्लास का नाम सबसे आगे चल रहा है. उनके देश ने 2023 में अपने कुल ख़र्च का 2.85 प्रतिशत हिस्सा रक्षा पर ख़र्च किया था. किसी प्रत्याशी के चुनाव में उम्मीदवार के अपने देश के रक्षा ख़र्च की भूमिका एक महत्वपूर्ण कारण होगी. इसलिए और भी क्योंकि 31 में से केवल 8 देश ही GDP के दो प्रतिशत को रक्षा व्यय में लगाने की शर्त पूरी कर रहे हैं. फिर भी, पश्चिमी देशों के लिए रूस के प्रति बेहद आक्रामक बाल्टिक देश के हाथों में नैटो की कमान देना स्वीकार्य नहीं होगा, क्योंकि ऐसा नेतृत्व भविष्य में रूस के साथ किसी भी तरह के रिश्ते के लिए तैयार नहीं होगा

यूक्रेन को समर्थन देने के मोर्चे पर अगुवाई मध्य और पूर्वी यूरोप के देश करते रहे हैं और रूस को लेकर उनकी चेतावनी सही साबित हुई है. इस वजह से बहुत से देश ये चाहते हैं कि इस बार महासचिव इन्हीं देशों में से कोई बने.

महासचिव पद की कुछ शर्तों को तो डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन पूरी करते हैं, मगर वो यूक्रेन को समर्थन देने के मामले में बहुत आक्रामक रही नहीं हैं. इसके अलावा GDP का केवल 1.38 प्रतिशत रक्षा क्षेत्र पर ख़र्च करने की वजह से डेनमार्क, नैटो के दो प्रतिशत वाली शर्त भी नहीं पूरी करता. वहीं, डेनमार्क के पूर्व प्रधानमंत्री आंद्रेस फॉग रासमुसेन 2009 से 2014 तक नैटो के महासचिव रहे थे. ऐसे में डेनमार्क के किसी नेता (या फिर स्टोल्टेनबर्ग के बाद नॉर्डिक देशों के किसी और नेता) के महासचिव पद पर नियुक्त होने की उम्मीदें कम ही हैं

इस पद के लिए एक और महिला जिनका नाम चल रहा है, वो कनाडा की उप प्रधानमंत्री और पूर्व विदेश मंत्री क्रिस्टिया फ्रीहैंड हैं, जो यूक्रेन का मज़बूती से समर्थन करती रही हैं और यहां तक कि रूस द्वारा प्रतिबंधित व्यक्तियों की सूची में भी उनका नाम है. लेकिन, रक्षा ख़र्च के मामले में कनाडा भी काफ़ी पीछे है और यूरोप के बाहर के किसी उम्मीदवार के नाम को शायद फ्रांस और अन्य देशों द्वारा वीटो कर दिया जाए, क्योंकि नैटो के 31 में से 22 सदस्य तो यूरोपीय संघ (EU) देश हैं और ख़ुद स्टोल्टेनबर्ग पहले ही यूरोपीय संघ के बाहर के देश से थे. यही वजह है कि ब्रेक्जिट के बाद भी ब्रिटेन, यूक्रेन के सबसे बड़े सहयोगियों में से एक है और वो नैटो के रक्षा व्यय के लक्ष्य को भी पूरा करता है. इसलिए, ब्रिटेन के पूर्व रक्षा मंत्री बेन वैलेस की उम्मीदवारी का भी विरोध हो रहा है.

इस वजह से पर्यवेक्षकों के बीच बेहद लोकप्रिय, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन का नाम चर्चा में आता है. क्योंकि उनके पास, यूक्रेन को समर्थन समेत यूरोपीय संघ के स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण विषयों पर आम सहमति बनाने का लंबा अनुभव है, पर उनका देश जर्मनी, यूरोप का आर्थिक पावर हाउस कहे जाने के बावजूद, रक्षा व्यय के मामले में पीछे रहा है. वहीं, अपने देश की रक्षा मंत्री के तौर पर उर्सुला का कार्यकाल पक्षपात और भ्रष्टाचार के इल्ज़ामों की वजह से अलोकप्रिय साबित हुआ था.

नैटो के अन्य सदस्य देश इस बार क्षेत्रीय विविधता के हित में ‘डच उम्मीदवार’ के पक्ष में शायद न जाना चाहें, क्योंकि नीदरलैंड के तीन नेता पहले ही NATO के महासचिव रह चुके हैं.

नैटो महासचिव की उम्मीदवारी की रेस में एक प्रमुख नाम नीदरलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री मार्क रट का भी है. उनके अमेरिका से नज़दीकी रिश्ते रहे हैं और नवंबर 2023 के आम चुनाव से पहले तक उनके पास 13 साल तक प्रधानमंत्री रहने का भी लंबा तजुर्बा रहा है. हालांकि, नैटो के अन्य सदस्य देश इस बार क्षेत्रीय विविधता के हित मेंडच उम्मीदवारके पक्ष में शायद जाना चाहें, क्योंकि नीदरलैंड के तीन नेता पहले ही NATO के महासचिव रह चुके हैं. इसके अलावा, यूक्रेन को दिल खोलकर मदद करने के बावजूद, रक्षा व्यय के मामले में मार्क रट के देश का रिकॉर्ड बेहद ख़राब रहा है. 2023 में नीदरलैंड ने GDP का केवल 1.7 प्रतिशत रक्षा क्षेत्र पर ख़र्च किया था. ये बातें मार्क रट के ख़िलाफ़ जा सकती हैं.

इसलिए, NATO के तमाम संभावित उम्मीदवारों के बावजूद, ज़्यादातर कुछ शर्तें तो पूरी करते हैं, मगर कुछ में फिसड्डी हैं. इसके अलावा, इस मामले में चर्चा में बने रहने के बावजूद, ये साफ़ नहीं है कि इन संभावित उम्मीदवारों में से कुछ ये ज़िम्मेदारी निभाने में दिलचस्पी रखते हैं, या उपलब्ध हैं कि नहीं.

ये चुनाव प्रक्रिया इसलिए और पेचीदा हो जाती है, क्योंकि यूरोपीय संघ (EU) और अमेरिका में इस साल चुनाव होने वाले हैं. यूरोप में आशंकाएं इस बात की हैं कि EU के संस्थानों के अधिक प्रभावी पदों की तुलना में NATO महासचिव का पद एक सांत्वना पुरस्कार बन सकता है. इनके साथ ही ट्रम्प के दोबारा चुनाव जीतने का भय भी शामिल है, जिनके बारे में सबको पता है कि वो नैटो के प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं और अमेरिका को इसकी सदस्यता से बाहर निकालने की धमकी दे चुके हैं. यूरोप में साथी देशों के सुप्रीम कमांडर (SACEUR) का पद स्थायी तौर पर रखने की वजह से अमेरिका के प्रभाव को देखते हुए, नैटो के किसी भी प्रमुख को उसकी मंज़ूरी मिलनी ज़रूरी होगा और उसको अटलांटिक के आर-पार के देशों के रिश्तों में संतुलन बनाने में सक्षम होना होगा.

ख़तरों का दायरा लगातार बढ़ते जाने और यूरोप महाद्वीप में युद्ध जारी रहने की वजह से NATO के सदस्य देशों को एक निर्णायक विकल्प चुनने की ज़रूरत है.

 

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