Author : Shoba Suri

Published on Apr 08, 2022 Updated 0 Hours ago

दुनिया भर के लोगों को जलवायु के अनुकूल मोटे अनाज के उत्पादन और खपत के सामान्य फ़ायदों पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि इस फसल का उत्पादन बिना किसी परेशानी के होता है और इसको खाने से लोगों को सेहत के मामले में बहुत लाभ होता है

#Millets: अनाज और पानी के संकट का मुक़ाबला करने के लिए सुपर फूड साबित हो रहे हैं ‘मोटे’अनाज

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने 2023 को ‘मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी इत्यादि) का वर्ष’ घोषित किया है और सभी भागीदारों से कहा है कि पोषण और स्वास्थ्य के मामले में मोटे अनाज की खपत से होने वाले फ़ायदों के साथ-साथ ख़राब और बदलती जलवायु संबंधी परिस्थितियों के तहत उनकी खेती की अनुकूलता के बारे में नीतिगत ध्यान आकर्षण के लिए समर्थन प्रदान करें. मोटे अनाज से सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी)- मुख्य तौर पर एसडीजी 2 (भूख से मुक्ति), एसडीजी 3 (अच्छी सेहत और ख़ुशी), एसडीजी 12 (सतत खपत और उत्पादन) और एसडीजी 13 (जलवायु पर क़दम)- को हासिल करने में मदद की संभावना मिलती है. मोटे अनाज को पैदा करने के कई फ़ायदे हैं: ये न्यूनतम उर्वरक के इस्तेमाल के साथ पानी के लिए बारिश पर निर्भर फसल है; कीड़ों के हमले की कम आशंका की वजह से इनमें कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है; मोटे अनाज के बीज का भंडारण कई वर्षों के लिए किया जा सकता है जिससे सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों के लिए ये लाभदायक है.

.मोटे अनाज को पैदा करने के कई फ़ायदे हैं: ये न्यूनतम उर्वरक के इस्तेमाल के साथ पानी के लिए बारिश पर निर्भर फसल है; कीड़ों के हमले की कम आशंका की वजह से इनमें कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है; मोटे अनाज के बीज का भंडारण कई वर्षों के लिए किया जा सकता है जिससे सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों के लिए ये लाभदायक है. 

अंतर्राष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आईसीआरआईएसएटी) के मुताबिक़ अफ्रीका और एशिया में 9 करोड़ से ज़्यादा लोग अपने आहार में मोटे अनाज पर निर्भर करते हैं. वैसे तो दुनिया भर में मोटे अनाज की खपत में 9 प्रतिशत की दर से गिरावट आई है लेकिन 2022-27 के लिए मोटे अनाज के बाज़ार को लेकर पूर्वानुमान में आशाजनक रुझान दिख रहे हैं. मोटे अनाज के उत्पादन के मामले में 41 प्रतिशत के हिस्से के साथ भारत का वर्चस्व है जबकि खपत साल दर साल गिर रही है. दूसरी तरफ़, 40 प्रतिशत खपत के साथ अफ्रीका सबसे बड़ा बाज़ार बन गया है.

मोटे अनाज बहुउद्देशीय होते हैं: चावल के मुक़ाबले मोटे अनाज 70 प्रतिशत कम पानी की खपत करते हैं; गेहूं के मुक़ाबले आधे समय में तैयार होते हैं; और मोटे अनाज को इस्तेमाल के लिए तैयार करने में 40 प्रतिशत कम ऊर्जा की ज़रूरत होती है. सतत खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए ज़्यादा पोषण के गुण वाले मोटे अनाज से जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी और सूखे की स्थिति जैसी समस्याओं का समाधान होता है (रेखा-चित्र 1). मोटे अनाज में एंटीऑक्सीडेंट पर्याप्त मात्रा में होता है और ये संभावित स्वास्थ्य फ़ायदों के साथ प्रोबायोटिक्स की क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं. ये शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली में एक भूमिका अदा करते हैं और बचपन के कुपोषण एवं आयरन की कमी से एनीमिया को रोकने का समाधान हैं. सबूत संकेत देते हैं कि दूसरे अनाज के मुक़ाबले मोटे अनाज में पोषण के गुण ज़्यादा मात्रा में मौजूद हैं.

कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्यों ने मोटे अनाज को बढ़ावा देकर और कुपोषण का मुक़ाबला करने के लिए स्कूलों में दी जाने वाली मिड-डे मील में शामिल करने के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और आंगनबाड़ी में वितरण के द्वारा एक मिसाल पेश की है. 

Figure 1: Millets: a solution to agrarian and nutritional challenges

सतत आहार जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करते हैं क्योंकि इनका पर्यावरण पर कम असर होता है जिससे खाद्य और पोषण सुरक्षा में मदद मिलती है. मोटे अनाज जैसे दानेदार अन्न को शामिल करके फसल उत्पादन में विविधता लाने से खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित हो सकती है, ग्रीन हाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन में कमी आती है और पोषण से समझौता किए बिना जलवायु अनुकूलता को बढ़ावा मिलता है. भारत में मॉनसून के दौरान अनाज उत्पादन में परिवर्तन को लेकर एक परिमाणात्मक मूल्यांकन में पता चला कि मोटे अनाज खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय अनुकूलता के लिए एक व्यावहारिक विकल्प हैं. दूसरे रेखा-चित्र से मॉनसून अनाज से कैलोरी में योगदान का संकेत मिलता है जिसमें सबसे ज़्यादा प्रोटीन और आयरन की आपूर्ति, पानी, ऊर्जा, ग्रीन हाउस गैस में सबसे ज़्यादा बचत और जलवायु अनुकूलता है.

Figure 2: Calorie share of monsoon cereal crops in India

जलवायु परिवर्तन से लड़ने में कारगर

जब बात फसल को लेकर किसानों की पसंद की आती है तो आर्थिक कारण महत्वपूर्ण है और ये संभवत: चावल और गेहूं की खेती की तरफ़ ऐतिहासिक बदलाव में भूमिका अदा करते हैं. लेकिन सरकार के द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की वजह से गेहूं और धान के उत्पादन के पक्ष में बात चली जाती है. इन दोनों कारणों की वजह से किसानों को दूसरी फसल जैसे कि दालों के उत्पादन के लिए प्रोत्साहन नहीं मिलता है. गेहूं और धान पानी पर निर्भर फसल हैं जिसकी वजह से भू-जल स्तर पर और ज़्यादा बोझ पड़ता है. भारत और दूसरे देशों में ज़्यादातर लोग चावल की खपत को इसलिए प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इसे बनाने में आसानी होती है और ये उनकी आदत में भी शुमार है. लेकिन इस बात पर ध्यान देना होगा कि मोटे अनाज को ज़्यादा समय तक उपयोग के लिए नहीं रखा जा सकता है और ये नमी, तापमान और छोटे बाज़ार पर निर्भर करते हैं. इसे देखते हुए मोटे अनाज के पोषण गुणों को लेकर और भी ज़्यादा जागरुकता अभियान चलाने और लंबे समय तक इसके इस्तेमाल के लिए बेहतर भंडारण सुविधा का निर्माण करने की ज़रूरत है. कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्यों ने मोटे अनाज को बढ़ावा देकर और कुपोषण का मुक़ाबला करने के लिए स्कूलों में दी जाने वाली मिड-डे मील में शामिल करने के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और आंगनबाड़ी में वितरण के द्वारा एक मिसाल पेश की है. वैसे तो पहले के समय में परंपरागत रूप से मोटे अनाज की खपत होती रही है और इसकी वजह से ज़रूरी विटामिन और खनिज लोगों को मिले और महिलाओं में एनीमिया की व्यापकता में कमी आई है लेकिन अब लागत, स्वाद, सोच और उपलब्धता जैसी बाधाओं के कारण मोटे अनाज की खपत में कमी आई है.

 इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि मोटे अनाज में जो पोषक तत्व होते हैं वो ऊर्जा, कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, घुलनशील एवं अघुलनशील फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट, आयरन, ज़िंक और विटामिन के अच्छे स्रोत हैं और भारत एवं दूसरे विकासशील देशों में विटामिन एवं खनिज तत्वों की कमी को ख़त्म करने में मदद कर सकते हैं.

मोटे अनाज अपेक्षाकृत ज़्यादा तापमान में फल-फूल सकते हैं और सीमित पानी की आपूर्ति में भी इनकी उत्पादन होता है. एक समीक्षा से पर्यावरणीय संसाधनों पर, ख़ास तौर पर जलवायु परिवर्तन से प्रभावित क्षेत्रों में, दबाव में कमी के ज़रिए मोटे अनाज की खेती के सकारात्मक असर का संकेत मिलता है. पानी के हिसाब से देखें तो मोटे अनाज को वृद्धि के लिए धान के मुक़ाबले छह गुना कम पानी की ज़रूरत होती है. धान के लिए जहां औसत 120-140 सेमी बारिश की आवश्यकता होती है वहीं मोटे अनाज के लिए सिर्फ़ 20 सेमी. कुछ मोटे अनाज को तैयार होने में 45-70 दिन का समय लगता है जो कि चावल (120-140 दिन) के मुक़ाबले आधा है. अनाज के सी4[i] ग्रुप का होने की वजह से मोटे अनाज ज़्यादा मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन में बदलते हैं और इस तरह ये जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में योगदान देते हैं. साथ ही मोटे अनाज बेहद गरम तापमान से लेकर सूखे और खारापन को भी बर्दाश्त कर सकते हैं. इस तरह ये जलवायु अनुकूल फसल की श्रेणी में आते हैं.

इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि मोटे अनाज में जो पोषक तत्व होते हैं वो ऊर्जा, कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, घुलनशील एवं अघुलनशील फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट, आयरन, ज़िंक और विटामिन के अच्छे स्रोत हैं और भारत एवं दूसरे विकासशील देशों में विटामिन एवं खनिज तत्वों की कमी को ख़त्म करने में मदद कर सकते हैं. मोटे अनाज कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करते हैं क्योंकि इनमें पॉलीअनसैचुरेटेड एसिड और ओमेगा-3 एसिड भरपूर मात्रा में होते हैं. 2021 में भारत में ‘पोषण सुरक्षा के लिए मोटे अनाज को मुख्यधारा में लाने’ पर एक श्वेत पत्र पूरे वैल्यू चेन को मज़बूत करने के लिए विस्तृत रूप-रेखा प्रदान करता है. इस श्वेत पत्र में दिक़्क़तों का समाधान किया गया है और देश के अलग-अलग राज्यों में मोटे अनाज को बढ़ावा देने के लिए एक मापनीय मॉडल को दोहराने की बात इसमें कही गई है. अब वक़्त है मोटे अनाज की संभावना को बढ़ावा देने का और इसके लिए इसके पोषण के गुणों के बारे में जागरुकता बढ़ाई जाए ताकि लोगों की खाने-पीने की पसंद में बदलाव हो सके.

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