Author : Varya Srivastava

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jul 15, 2024 Updated 0 Hours ago

युद्ध का विस्तार अब आमने-सामने के संघर्ष से लेकर अदृश्य तकनीकी हमलों तक हो गया है. ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस युग में सुरक्षा, शक्ति और सैन्य-औद्योगिक परिसर को लेकर हमारी समझ को भी नया आकार मिल रहा है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स की स्थितियों का आकलन

अमेरिकी राष्ट्रपति आइज़नहावर ने 1960 के दशक में सबसे पहले 'सैन्य-औद्योगिक परिसर' शब्द का इस्तेमाल किया. इसका उद्देश्य रक्षा प्रौद्योगिकी के निर्माताओं और सरकार के बीच पारस्परिक सहजीवी संबंधों को परिभाषित करना था. मिलिट्री-इंडस्ट्रीयल कॉम्प्लेक्स शब्द बीसवीं सदी की अस्थिर भू-राजनीतिक स्थितियों के दौरान आक्रामक अमेरिकी विदेश नीति के संदर्भ में उभरा था. ये सैन्य-औद्योगिक परिसर उस दौर में बनाए गए, जब बाज़ार की स्थितियां अनुचित थी. ये कुछ चुनिंदा निजी कंपनियों और मज़बूत सरकारी नियंत्रण का पक्ष लेती थी. तब जवाबदेही और निगरानी सीमित थी लेकिन उसके बाद से अब हालात बहुत बदल चुके हैं.

एकध्रुवीय पश्चिमी प्रभुत्व और 'इतिहास के अंत' के नैरेटिव ने बहुध्रुवीय वास्तविकताओं का रास्ता साफ कर दिया है. बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के उदय ने हमारे अपने राज्यों (यानी राष्ट्रीय सरकारों) के साथ हमारा सामाजिक अनुबंध बदल दिया है.


एकध्रुवीय पश्चिमी प्रभुत्व और 'इतिहास के अंत' के नैरेटिव ने बहुध्रुवीय वास्तविकताओं का रास्ता साफ कर दिया है. बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के उदय ने हमारे अपने राज्यों (यानी राष्ट्रीय सरकारों) के साथ हमारा सामाजिक अनुबंध बदल दिया है. युद्ध और युद्धक्षेत्र की प्रकृति भी बदल रही है. अब इसका विस्तार 'हॉट' माने जाने वाले आमने-सामने के संघर्ष से लेकर 'कोल्ड' माने जाने वाले अदृश्य तकनीकी हमलों और अस्तित्व संबंधी ख़तरों तक हो रहा है. परिवर्तन का ये बिंदु सुरक्षा और शक्ति को लेकर हमारी समझ बदल रहा है. लेकिन इसके साथ ही ये हमें एक ऐसा मौका मुहैया करवा रहा है, जहां हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के युग में मिलिट्री-इंडस्ट्रीयल कॉम्प्लेक्स की धारणा पर पुनर्विचार कर सकते हैं.



‘रक्षा’ और नई खोज



आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर हमारी शुरूआती धारणा विज्ञान कथाओं की किताबों और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान निर्मित टेक्नोलॉजी के डिक्रिप्शन से बनी है. एआई के क्षेत्र में विज्ञान कथाएं ठोस कार्रवाई की बजाए प्रेरणा देने के ही काम आती हैं लेकिन डिक्रिप्शन तकनीकी पर किए जाने वाले काम से ही वो आधार बनता है, जिस पर हमारा आधुनिक एआई सिस्टम आधारित है. इस डिक्रिप्शन टेक्नोलॉजी के इनोवेशन पर शुरूआती काम करने वाले लोगों में एलन टर्निंग, मार्विन मिंस्की और जॉन मैककैथी शामिल रहे हैं. मिंस्की ने अमेरिकी नौसेना और मैककैथी ने अमेरिकी सेना में काम किया था. वहीं एलन टर्निंग ने अपना ज़्यादातर शोध ब्रिटिश सरकार और रक्षा विभाग के साथ किया था.

नवप्रवर्तन के क्षेत्र का व्यावसायीकरण और लोकतंत्रिकरण हो गया है. इन दोनों चीजों के मेल से तैयार इकोसिस्टम से टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन का निजीकरण किया जा रहा है.


यहां रक्षा और सुरक्षा का मतलब हार्ड पावर और युद्ध की तैयारियों के संदर्भ में है. एक विरोधी समुदाय, देश या फिर विचारधारा को 'शत्रु' समझा जाता है. हिंसा को सत्ता बनाए रखने और 'दुश्मन' को प्रभावहीन करने के माध्यम के रूप में देखा जाता है. आइज़नहावर के लिए ये 'दुश्मन' अमेरिका के अभिजात्य वर्ग ने तैयार किया था, जिससे ये सुनिश्चित किया जा सके कि कुछ निजी कंपनियां लाभ कमाती रहें और सत्ता बरकरार रखने में इलीट क्लास का समर्थन कर सकें. एक-दूसरे की सेवा करते रहने का यही रिश्ता मिलिट्री-इंडस्ट्रीयल कॉम्प्लेक्स था.

शुरूआती दौर में अविष्कारकर्ताओं और तकनीकीविदों को सबसे पहले वित्तीय मदद सामान्य तौर पर सरकार और मुख्य रूप से सेना की तरफ से मिलती थी. सरकार और सेना ही परीक्षण की ऐसी सुविधाएं (सैंडबॉक्स) मुहैया कराते थे, जिसमें नई प्रौद्योगिकी की कल्पनाएं की जाती थी. उन्हें ऐसी तकनीकी खोज के लिए प्रोत्साहित किया जाता, जिससे ये सुनिश्चित किया जा सके कि अपने देश के नागरिकों को 'दुश्मन' देश, समुदाय और विचारधारा के लोगों की जान की कीमत पर बचाया जा सके. यहां तक कि 2021 में भी दुनियाभर की सरकारें रिसर्च और इनोवेशन पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का औसतन 2.6 प्रतिशत खर्च करती हैं. हालांकि अब सरकारें और सेना नई खोज करने वाली कंपनियों की प्राथमिक फाइनेंसर नहीं रहीं.

नवप्रवर्तन के क्षेत्र का व्यावसायीकरण और लोकतंत्रिकरण हो गया है. इन दोनों चीजों के मेल से तैयार इकोसिस्टम से टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन का निजीकरण किया जा रहा है. इसने दुनियाभर में जीवन की गुणवत्ता और जीवन अवधि को सुधारने में मदद की है. भोजन, आवास और शिक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतों तक ज़्यादा लोगों की पहुंच बढ़ी है. आज के दौर में अधिकतर नई खोजें रक्षा प्रयोगशालाओं की बजाए निजी कंपनियों में हो रही हैं. ज़्यादातर सरकारें नई प्रौद्योगिकी के विकास में पिछड़ने लगी हैं और उनकी भूमिका सिर्फ नियामक के तौर पर सीमित होती जा रही है. कोरोना वैक्सीन का निर्माण और वितरण इस बात का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है.



'रक्षा' पर पुनर्विचार


इनोवेशन सेक्टर में सरकार और निजी कंपनियों के बीच शक्ति संतुलन में ये बदलाव हमें 'रक्षा' पर पुनर्विचार करने का एक महत्वपूर्ण अवसर मुहैया कराता है. अभी तक हम 'सुरक्षा' को एक देश के हितों और नागरिकों की रक्षा के संकीर्ण नज़रिए से देख रहे थे, जहां राजनीतिक अवधारणाओं के हिसाब से एक 'दुश्मन' तैयार किया जाता है. सोचिए अगर हम सुरक्षा को इस संकीर्ण दृष्टिकोण से देखने की बजाए ऑटोमेशन, जलवायु परिवर्तन, बीमारियों से बचाव और मानव के सम्मान की रक्षा के नज़रिए से देखें तो कितना बेहतर होगा. आज ज़्यादातर इंसान मिसाइल और बम के ख़तरों का सामना नहीं करते. इसकी बजाए वो लू, महामारी, कैंसर के नई रूपों, आर्थिक असुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी तक पहुंच नहीं हो पाने जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं.

अगर मौजूदा दौर की बात करें तो ज़्यादातर प्राइवेट टेक्नोलॉजी कंपनियां आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर ही इनोवेशन करती हैं. इस वजह से इन कंपनियों का उन व्यक्तियों और सरकारों से हितों को लेकर टकराव होता है, जिनके लिए नई तकनीकी का निर्माण होता है.


अगर मौजूदा दौर की बात करें तो ज़्यादातर प्राइवेट टेक्नोलॉजी कंपनियां आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर ही इनोवेशन करती हैं. इस वजह से इन कंपनियों का उन व्यक्तियों और सरकारों से हितों को लेकर टकराव होता है, जिनके लिए नई तकनीकी का निर्माण होता है. एक तरह से देखें तो इससे भी वही चुनौतियां पैदा होती हैं, जो मिलिट्री-इंडस्ट्रीयल कॉम्प्लेक्स से होती थीं. ये चुनौती है शक्ति का कुछ लोगों तक केंद्रित हो जाना और बहुसंख्यक जनता का शोषण. आखिर सैन्य-औद्योगिक परिसर भी एक बाज़ार सरंचना ही है.

अगर हम ‘रक्षा’ (रक्षा व्यय) पर पुनर्विचार करें तो ऐसी नई बाज़ार प्रोत्साहन संरचनाओं का निर्माण किया जा सकता है, जिन्हें मानव गरिमा और सुरक्षा की रक्षा के हिसाब से डिज़ाइन किया गया हो. 

इसका ये मतलब नहीं है कि युद्ध और सेनाएं ख़त्म हो जाएंगी. रूस-यूक्रेन युद्ध और इज़रायल-फिलीस्तीन की जंग ने हमें ये दिखा दिया है कि हम चाहे कितनी भी प्रगति कर लें, युद्ध हमारे दौर की वास्तविकता है. लेकिन अगर हमारे बाज़ार और निजी कंपनियां ‘रक्षा’ की नई परिभाषा को अपना लेते हैं तो ये युद्ध की पारंपरिक अवधारणाओं के लिए एक प्रतिरोध का काम करेगा और इसका विकल्प भी मुहैया कराएगा.


(वार्या श्रीवास्तव नेटवर्क कैपिटल में प्रोडक्ट और गवर्नमेंट मामलों की वाइस प्रेसिडेंट हैं.)

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