Author : Jemma King

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 05, 2026 Updated 0 Hours ago
जहां मिसाइल फेल हो जाए, दिमाग काम आए

आधुनिक सैन्य-औद्योगिक तंत्र का ध्यान मुख्य रूप से ‘मेटल’ (हार्डवेयर) पर केंद्रित है. रणनीतिक शक्ति को बख्तरबंद बेड़ों, वायुयानों और स्वायत्त प्रणालियों की प्रोसेसिंग क्षमता से मापा जाता है और यदि यूक्रेन के हालिया युद्ध ने हमें कुछ सिखाया है तो वह यह है कि बड़ी मात्रा में संसाधन होना महत्वपूर्ण है लेकिन साइबर-आधारित युद्ध, एआई-चालित दुष्प्रचार और बदलते ‘तरल’ युद्धक्षेत्र के इस दौर में हार्डवेयर पर यह अत्यधिक ध्यान एक खतरनाक अंधा क्षेत्र बना चुका है. हम ‘मेटल’ पर बहुत अधिक निवेश कर रहे हैं जबकि ‘मीट’-यानी मानव मनोविज्ञान-पर खतरनाक रूप से कम निवेश कर रहे हैं जो अंततः जीत या हार का निर्णायक कारक होता है.

मानव मनोविज्ञान और उन्नत तकनीक का संबंध अब केवल इस बात तक सीमित नहीं रहा कि कोई पायलट हेड-अप डिस्प्ले (HUD) से कैसे काम करता है या कोई सैनिक बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) को कैसे पढ़ता है. अब यह उस सैनिक की मानसिक दृढ़ता से जुड़ा है जो बिना किसी निश्चित अंत के खाई में तैनात है. 2026 की वास्तविकता यह है कि सबसे खतरनाक हथियार कोई हाइपरसोनिक मिसाइल नहीं बल्कि सत्य का क्षरण है.

एपिस्टेमिक पतन: साझा वास्तविकता का अंत

सबसे बड़ा खतरा एपिस्टेमिक पतन है-वह स्थिति जब समाज की बुनियादी तथ्यों पर सहमति बनाने की क्षमता ही टूट जाती है. जब डीपफेक, एआई-निर्मित पाठ और बदले हुए ऑडियो जैसी सिंथेटिक सामग्री वास्तविकता से अलग पहचान में नहीं आती, तो हमारी साझा साक्ष्य-आधार समाप्त हो जाती है. किसी कमांडर के लिए यह स्थिति विनाशकारी हो सकती है. कल्पना कीजिए कि ड्रोन का वीडियो फीड वास्तविक समय में डीपफेक कर दिया जाए, या दुष्प्रचार से सैनिकों का मनोबल गिर जाए और वे सोशल मीडिया के कारण अपने ही आदेशों पर संदेह करने लगें. हमने अपनी मशीनों को साइबर हमलों से सुरक्षित करने पर अरबों खर्च किए हैं, लेकिन अपने दिमाग को संज्ञानात्मक हेरफेर के लिए खुला छोड़ दिया है.

हम ‘मेटल’ पर बहुत अधिक निवेश कर रहे हैं जबकि ‘मीट’-यानी मानव मनोविज्ञान-पर खतरनाक रूप से कम निवेश कर रहे हैं जो अंततः जीत या हार का निर्णायक कारक होता है.

बीएमएस विरोधाभास और वायु प्रभुत्व की नई परिभाषा

हमें यह मानना बंद करना होगा कि मिलिट्री-स्पेक तकनीक हमेशा श्रेष्ठ और लगातार उपलब्ध रहेगी. लेकिन यदि समान क्षमता वाले प्रतिद्वंद्वी के बीच A2/AD वातावरण में अंतरिक्ष संपत्तियों का नुकसान हो जाए, तो आधुनिक युद्ध तुरंत 1980 के दशक की क्षमताओं तक सीमित हो सकता है-जबकि सैनिकों को 21वीं सदी के उपकरणों के साथ प्रशिक्षण मिला होता है.

यहाँ तक कि जब तकनीक उपलब्ध भी हो, तब भी यह नई कमजोरियाँ पैदा करती है. BMS टैबलेट का उपयोग करने वाला सैनिक युद्ध क्षेत्र का एक ‘डिजिटल दृश्य’ देखता है-मित्र बल नीले रंग में और शत्रु लाल रंग में. लेकिन गोलीबारी के दौरान हृदय गति तेज हो जाती है और सोचने-समझने की क्षमता कम हो जाती है. इससे खतरे का गलत आकलन हो सकता है. सैनिकों को हथियारों और प्रणालियों को सीखने के लिए सैकड़ों घंटे का प्रशिक्षण दिया जाता है; उन्हें अपने शारीरिक तनाव-प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने का भी उतना ही प्रशिक्षण मिलना चाहिए. इसलिए युद्ध अवसंरचना में निवेश जारी रहना चाहिए, लेकिन उन मनुष्यों को भी बेहतर बनाना होगा जो इसे संचालित करते हैं. 

संज्ञानात्मक खाई: जोखिम-भय कैसे नवाचार को रोकता है

आधुनिक सेनाएँ कमान और अग्रिम मोर्चे के बीच एक ‘संज्ञानात्मक खाई’ विकसित कर रही हैं. निर्णय लेने वाले अधिकारी, जो शांतिकालीन नौकरशाही में पले-बढ़े हैं, अक्सर नीचे से आने वाले नवाचार को संस्थागत जोखिम के दृष्टिकोण से देखते हैं. लेकिन आज सैनिक इसलिए जीत रहे हैं क्योंकि उन्हें प्रयोग करने और समाधान बनाने की स्वतंत्रता है-न कि इसलिए कि वे कॉरपोरेट खरीद प्रक्रियाओं पर निर्भर हैं.

BMS टैबलेट का उपयोग करने वाला सैनिक युद्ध क्षेत्र का एक ‘डिजिटल दृश्य’ देखता है-मित्र बल नीले रंग में और शत्रु लाल रंग में. लेकिन गोलीबारी के दौरान हृदय गति तेज हो जाती है और सोचने-समझने की क्षमता कम हो जाती है. इससे खतरे का गलत आकलन हो सकता है.

जब कोई सैनिक किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को स्वयं संशोधित करना चाहता है, कोई व्यावसायिक ऐप इस्तेमाल करना चाहता है, उपग्रह चित्रों का उपयोग करना चाहता है या ड्रोन में बदलाव करना चाहता है, तो मुख्यालय अक्सर प्रमाणन या संभावित साइबर जोखिम के कारण इसे अस्वीकार कर देता है.

यदि किसी कमांडर की बातचीत ‘जोखिम’ से शुरू होती है, तो वह नवाचार को पहले ही समाप्त कर देता है. ड्रोन युद्ध रोज बदल रहा है. यहाँ वास्तविक जोखिम यह नहीं है कि सैनिक स्वयं कोई समाधान बनाए; बल्कि यह है कि वह वर्षों तक किसी प्रमाणित समाधान का इंतजार करे जो अंततः आने तक पुराना हो जाए. इसलिए हमें ‘सैंडबॉक्स्ड संप्रभुता’ की दिशा में बढ़ना होगा-जहाँ सामरिक इकाइयों को स्थानीय स्तर पर प्रयोग करने, असफल होने और नवाचार करने की स्वतंत्रता मिले.

ब्रेन ड्रेन: मूल्य का संकट

आज सैन्य नवाचार को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक ब्रेन ड्रेन है. अनुभवी इंजीनियर और तकनीकी रूप से दक्ष सैनिक देश छोड़ रहे हैं. इसका कारण केवल पैसा नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक असंतोष भी है. तेज तनाव में स्मृति-स्मरण क्षमता 80 प्रतिशत तक कम हो सकती है. आपके पास लगभग 99 सेकंड होते हैं ताकि आप अपनी हृदय गति को कम करके उच्च-स्तरीय सोच को वापस पा सकें.

आधुनिक युद्ध में 99 सेकंड की मानसिक शून्यता एक जीवन के बराबर हो सकती है. उच्च भावनात्मक बुद्धिमत्ता वाला नेता तनाव को नियंत्रित कर टीम को संज्ञानात्मक हेरफेर से बचाते हुए ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाता है जहाँ लोग खुलकर नवाचार कर सकें.

प्रतिभाशाली लोग ऐसे वातावरण में नहीं टिकते जहाँ उनकी विशेषज्ञता को नज़रअंदाज़ किया जाए. जब तक हम ऐसी व्यवस्था नहीं बनाएंगे जो तकनीकी नवाचार का नेतृत्व करने वालों को अधिकार और सम्मान दे, तब तक हम महंगे ‘मेटल’ को ऐसे लोगों से संचालित कराते रहेंगे जिनकी संख्या और क्षमता दोनों घटती जा रही हैं.

भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EI) एक हथियार प्रणाली के रूप में

अनुसंधान बताता है कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EI) का प्रशिक्षण तनाव नियंत्रण और उच्च-दबाव वाले कामों में प्रदर्शन को बेहतर बनाता है. सैन्य संदर्भ में यह जीवन-रक्षक है. अत्यधिक तनाव की स्थिति में स्मृति-स्मरण 80 प्रतिशत तक गिर सकता है. आपके पास लगभग 99 सेकंड होते हैं ताकि आप अपनी हृदय गति को नियंत्रित कर सकें और फिर से स्पष्ट सोच सकें. इसके बाद स्मृति लगभग टूट जाती है. आधुनिक युद्ध में 99 सेकंड की मानसिक शून्यता एक जीवन के बराबर हो सकती है. उच्च भावनात्मक बुद्धिमत्ता वाला नेता तनाव को नियंत्रित कर टीम को संज्ञानात्मक हेरफेर से बचाते हुए ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाता है जहाँ लोग खुलकर नवाचार कर सकें.

यदि हम स्वीकार करते हैं कि आधुनिक संघर्ष का केंद्र धीरे-धीरे संज्ञान, धारणा और भावनात्मक नियंत्रण की ओर स्थानांतरित हो रहा है, तो लोगों को इसके लिए तैयार करना अब वैकल्पिक नहीं रहा. भविष्य उन्हीं संगठनों का होगा जो मनोवैज्ञानिक क्षमता को शारीरिक क्षमता और तकनीकी दक्षता जितनी ही गंभीरता से लेंगे-और उसे प्रशिक्षण, मापन और संगठनात्मक संस्कृति का हिस्सा बनाएँगे, संकट आने से बहुत पहले.


जेम्मा किंग क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में रिसर्च फेलो हैं. 

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