मौजूदा समय में महामारी से पैदा हुई परिस्थितियों की पहचान कर उनसे निपटने के लिए कॉरपोरेट क्षेत्र, परोपकार के काम से जुड़े संगठनों और प्राथमिक तौर पर सरकारों को आगे आकर साझा तौर पर काम करना होगा.
कोविड-19 महामारी ने प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर असंख्य लोगों के जीवन को प्रभावित किया है. इस महामारी ने भारत में सीधे तौर पर अब तक 2,60,000 से ज़्यादा लोगों की जान ले ली है. हज़ारों लोग इस महामारी के चलते आई भयंकर मुसीबतों के शिकार हुए हैं. इनमें स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े बुनियादी ढांचे का अभाव, आर्थिक सुस्ती, प्रवासी संकट, घरेलू हिंसा, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं आदि शामिल हैं. बहरहाल, महामारी के इस दौर में जिस एक मुद्दे पर अपेक्षाकृत काफ़ी कम चर्चा हुई है वो है लोगों का गिरता मानसिक स्वास्थ्य. अतीत में आई तमाम महामारियों के वक़्त भी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य में इसी तरह की गिरावट देखी गई थी. 2003 में एशिया में आई सार्स महामारी के दौरान ठीक हो चुके करीब 50 प्रतिशत मरीज़ों में अवसाद और उदासी के लक्षणों में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. इसी प्रकार 2013 में अफ़्रीका में इबोला वायरस के प्रकोप के समय भी स्वस्थ हो चुके 47.2 फ़ीसदी लोगों में अवसाद के संभावित लक्षण देखे गए थे.
स्वास्थ्य से जुड़ी व्यवस्थाओं में आई रुकावटों से आपूर्ति श्रृंखला को नुकसान पहुंचा. नतीजतन एक के बाद एक कई देशों को संपूर्ण तालाबंदी की अवस्था में जाना पड़ा. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा 130 देशों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि 93 प्रतिशत देशों को मानसिक स्वास्थ्य, स्नायुतंत्रीय और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं की आपूर्ति में गंभीर रुकावटों का सामना करना पड़ा. इन देशों में ऐसी सेवाओं की आपूर्ति में बढ़ोतरी की पूरी शिद्दत से ज़रूरत महसूस की गई. इतना ही नहीं, 67 प्रतिशत देशों को मनोचिकित्सा और परामर्शदात्री सेवाओं में किसी न किसी तरह की बाधा से दो-चार होना पड़ा. 30 फ़ीसदी देशों को मानसिक और स्नायु-संबंधी विकारों के लिए नियमित दवाइयों का अभाव झेलना पड़ा.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा 130 देशों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि 93 प्रतिशत देशों को मानसिक स्वास्थ्य, स्नायुतंत्रीय और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं की आपूर्ति में गंभीर रुकावटों का सामना करना पड़ा.
पारंपरिक तौर पर मानवीय आबादी के एक बड़े हिस्से में अवसादजनक अवस्था के प्रसार के पीछे कई कारण रहे हैं. इनमें संक्रमित होने और मृत्यु का डर, किसी क़रीबी की मौत, एकाकीपन, नशीले पदार्थों के सेवन की आदत को छोड़ते वक़्त होने वाली परेशानियां, हिंसा, पुरानी और असाध्य बीमारियां आदि कारण शामिल रहे हैं. बहरहाल, मौजूदा डिजिटल युग में मनोवैज्ञानिक तनाव के कई अन्य कारक भी पैदा हो गए हैं. इनमें सोशल मीडिया का दबाव, डिजिटल तकनीकी कौशल का अभाव, प्रवासी जीवन से जुड़ा तनाव, वित्तीय असुरक्षा, डिजिटल साधनों तक पहुंच न होना और क़रीबी रिश्ते-नातों और संबंधों से अलगाव जैसे कारक शामिल हैं. ऐसे में चिरकालिक अवसाद का मौजदा माहौल हमारे लिए भविष्य में जनस्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की नई और अपार संभावनाओं के द्वार खोल रहा है. ये सुधार तभी मुमकिन हैं जब हम न केवल उसके इच्छुक हों बल्कि ख़ुद को उसके हिसाब से ढालने को तैयार भी हों.
कोविड-19 की दूसरी लहर ने स्वास्थ्य क्षेत्र को घुटनों के बल ला खड़ा किया है. आवश्यक दवाइयों की किल्लत से कालाबाज़ारी में भारी इज़ाफ़ा हुआ है. स्वास्थ्य से जुड़ा बुनियादी ढांचा अपर्याप्त और नाकाफ़ी साबित हुआ है. चारों ओर संसाधनों का कुप्रबंधन देखने को मिला. इतना ही नहीं, अब डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य सेवा से जुड़े तमाम लोगों में थकावट साफ़ दिखने लगी है.
अप्रैल 2021 में कोविड-19 से संक्रमण के नए मामलों में रिकॉर्ड उछाल देखने को मिला. कोरोना के चलते होने वाली मौतों में भी अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई. अपनी आंखों के सामने महामारी का ये विकराल रूप देख रही एक बड़ी आबादी के मन में भय, दहशत और स्थायी अवसाद ने डेरा जमा लिया. हालांकि ये केवल पिछले महीने की बात नहीं है. पिछले साल से जारी महामारी के हालात के चलते दुनिया भर में स्नायु तंत्र से जुड़े कई विकार देखने को मिले हैं. देश-विदेश में लोगों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है.
इस विषाणु-जनित महामारी की शुरुआत से ही ऐसे अनेक वैज्ञानिक साक्ष्य देखने को मिले हैं जिनसे पता चलता है कि मानवीय आबादी के संपूर्ण स्वास्थ्य पर इसका कैसा कुप्रभाव पड़ा है. इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित एक शोध अध्ययन के मुताबिक, भारत में कोरोना महामारी के पहले 45 दिनों में 338 ग़ैर-कोविड मृत्यु की ख़बरें आई थीं. इन मौतों की मुख्य वजहों में एकाकीपन और कोरोना पॉजिटिव आने का डर शामिल है. इसके अलावा नशीले पदार्थों के सेवन की आदत से छुटकारा पाने में होने वाली परेशानियां, ख़ासकर शराब की दुकानों के अचानक बंद हो जाने के बाद शराब न मिलने से नशे की लत झेल रहे लोगों की मौत भी इसी श्रेणी में आती है. इसके साथ ही बेहद थकावट, भूख और वित्तीय परेशानियों के चलते हुई मृत्यु भी इनमें शामिल हैं. गुजरात की 108 इमरजेंसी हेल्पलाइन को लेकर ऐसी ही दूसरी मीडिया रिपोर्टों में लॉकडाउन के बेहद शुरुआती दिनों (अप्रैल से जुलाई 2020 के बीच) में ही खुद को चोटिल करने के 800 मामले और आत्महत्या के 90 केसों के बारे में बताया गया था. महाराष्ट्र में बीएमसी-एमपॉवर 1 ऑन 1 मानसिक स्वास्थ्य सहायता केंद्र ने महामारी के पहले दो महीनों के दौरान ही करीब 45000 फ़ोन कॉल दर्ज किए. फ़ोन करने वाले 82 फ़ीसदी लोगों ने चिंता, एकाकीपन, घबराहट और अवसाद जैसी परेशानियों की शिकायत की. जबकि बाक़ी लोगों ने अनियमित नींद और पहले से चली आ रही मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के और विकराल रूप ले लेने की बात कही.
मौजूदा डिजिटल युग में मनोवैज्ञानिक तनाव के कई अन्य कारक भी पैदा हो गए हैं. इनमें सोशल मीडिया का दबाव, डिजिटल तकनीकी कौशल का अभाव, प्रवासी जीवन से जुड़ा तनाव, वित्तीय असुरक्षा, डिजिटल साधनों तक पहुंच न होना और क़रीबी रिश्ते-नातों और संबंधों से अलगाव जैसे कारक शामिल हैं.
इतना ही नहीं, लगातार सदमा, शोक और परेशान करने वाले हालातों से दो-चार होने वाले फ़्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों और कानून का पालन सुनिश्चित कराने वाली एजेंसियों से जुड़े लोगों के संदर्भ में भी चिंताजनक प्रवृति देखी गई. उनमें पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी), एकाकीपन, ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी), क्रोध से जुड़े मामले, आत्महत्या की प्रवृति आदि लक्षण पाए गए. ये सामूहिक संकट बढ़ता ही जा रहा है. शुरुआती दौर में कहीसुनी बातों के आधार पर जो साक्ष्य देखने को मिले उनसे पता चलता है कि ख़ुद के या किसी क़रीबी के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद अवसाद के मामलों में 70 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इन लोगों में अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने की एक मज़बूत प्रवृत्ति भी देखी गई. पारंपरिक तौर पर संकट के समय लोगों को मानवीय स्पर्श और सामाजिकता के ज़रिए नियमित रूप से जो मरहम पट्टी या सहानुभूतिपूर्ण माहौल मिला करता था वो इस महामारी के दौर में पूरी तरह से नदारद रहा. ऐसे में लोगों के मन-मस्तिष्क में ऐसी विनाशकारी भावनाएं भड़कने लगीं. पहले से ही समाज के जो तबके अतिसंवेदनशील या असुरक्षित रहे हैं उनमें ये ख़तरे साफ़ तौर पर ज़्यादा देखने को मिले हैं. इनमें महिलाएं, छोटे बच्चे, कलहपूर्ण हालातों का सामना करने वाले लोग, जाति और वर्ग के हिसाब से अल्पसंख्यक समाज के लोग आदि शामिल हैं. इंसानी समाज में भौतिक रूप से होने वाले संवादों के अचानक बंद हो जाने से मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं और इन समस्याओं से उबरने वाले तंत्र तक पहुंच पाना और कठिन हो गया. पहले ही हमारे देश में इन सेवाओं तक लोगों की पहुंच मुश्किल से होती रही है और इसमें भारी विषमता व्याप्त है.
घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, घरेलू कार्यों और देखभाल करने से जुड़ी ज़िम्मेदारियों के बढ़ जाने, बच्चों के पालन-पोषण और वित्तीय मोर्चे पर असुरक्षा की भावनाओं में चिंताजनक बढ़ोतरी ने तनाव और अवसाद को कई गुणा बढ़ा दिया है. भारत की जनसंख्या पर किए गए एक सर्वेक्षण में 66 फ़ीसदी महिलाओं ने ये स्वीकार किया है कि कोरोना के चलते लागू लॉकडाउन के दौरान उन्हें पहले से ज़्यादा तनावपूर्ण हालात झेलने पड़े हैं. वहीं दूसरी ओर सिर्फ़ 34 प्रतिशत पुरुषों को ही ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के सर्वेक्षण में भी युवाओं (15-29 वर्ष) में अवसाद के बढ़ते ख़तरे की पुष्टि हुई है. सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि वैश्विक स्तर पर इस आयु वर्ग का हर दूसरा व्यक्ति विषादग्रस्त है. टालमटोल करने, तनाव, रोज़गार से जुड़ी असुरक्षा, घर से काम करने, डिजिटल माध्यमों के बेतहाशा इस्तेमाल से होने वाली थकान और डिजिटल जुड़ाव का अभाव जैसे दीर्घकालिक कारक युवाओं को बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं.
ग़ौरतलब है कि उच्च-आय वाले देशों में मानसिक विकारों की शिकार 40 प्रतिशत आबादी को कभी भी ज़रूरी सहायता नहीं मिल पाती. मध्य और निम्न आय वाले देशों में ये तादाद 75-80 प्रतिशत तक है. मानसिक विकार के लक्षण दिखने और वास्तव में उनका इलाज शुरू होने में औसतन 11 साल का अंतर पाया गया है.
इस वर्ष मानसिक स्वास्थ्य के विषय पर जानकारियां जुटाने और इसके बारे में पूछताछ करने की प्रवृति में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई. ज़ाहिर तौर पर अनिश्चितता भरे इस दौर में लोग स्वयं-सहायता और भावनाओं पर नियंत्रण पाने के तरीके की तलाश में हैं. भारत में अवसाद यानी ‘डिप्रेशन’ को लेकर एक आम गूगल ट्रेंड्स रिपोर्ट में पिछले साल के दौरान निम्नलिखित 10 खोज और जिज्ञासाएं सामने आती हैं (चित्र 1). जिन विषयवस्तुओं की खोजबीन की गई उनमें अवसाद, चिंता, इनसे जुड़े वर्णन और जून 2020 में कथित तौर पर आत्महत्या करने वाले भारतीय अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत से जुड़े मुद्दे शामिल हैं. जिज्ञासाओं से जुड़ी सूची में उल्लिखित शब्दावलियों के साथ विवरण में जो ‘खंडवार’ जानकारियां दी गई हैं उनसे पता चलता है कि इस तरह की खोजों और उनकी पुनरावृति में अचानक भारी तेज़ी देखने को मिली. सर्च लिस्ट से साफ़ है कि अवसाद की जांच पड़ताल करने और अवसाद के शिकार व्यक्ति की तत्काल मदद करने की ज़रूरत आज के समय में कितनी बढ़ गई है.
चारों ओर फैले दहशत के माहौल और इंसानी जान के भारी नुकसान के बावजूद सामाजिक विश्वास वैश्विक स्तर पर मृत्यु दर को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक बनकर उभरा है. वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट, 2021 में ये पाया गया कि जिन लोगों में सामाजिक और संस्थागत विश्वास का स्तर ऊंचा होता है वो अपेक्षाकृत ज़्यादा ख़ुशहाल जीवन जीते हैं. वहीं दूसरी ओर अविश्वास से भरे माहौल में जीने वाले लोगों का जीवन उतना ख़ुशहाल नहीं रह पाता. सार्वजनिक रूप से पारस्परिक विश्वास से भरपूर माहौल मुहैया कराने वाले देशों में मृत्यु दर कम होती गई है. रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया है कि एशिया और अफ्रीका के दूसरे विकासशील देशों की तरह भारत ने अपनी जनसंख्या की जीवन प्रत्याशा बढ़ाने में तो कामयाबी पाई है लेकिन इन देशों की तरह भारत अपनी आबादी का स्वास्थ्य सुनिश्चित करने में सफल नहीं हो सका है.
इस तरह की चिंताओं का स्वभाव दीर्घकालिक होता है. दुनिया की अर्थव्यवस्था को इनके चलते प्रतिवर्ष करीब 1 खरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान झेलना पड़ता है. विश्व बैंक का अनुमान है कि अगले 10 वर्षों में किसी दूसरी बीमारी की अपेक्षा अवसाद दुनिया के देशों के लिए ज़्यादा बड़ी परेशानी का सबब साबित होगा. हालांकि इतने बड़े ख़तरे के बावजूद कोरोना महामारी के पहले तक दुनिया के देश अपने स्वास्थ्य बजट का सिर्फ़ 2 प्रतिशत हिस्सा मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मद के लिए रखते आ रहे थे. 2030 के लिए सतत विकास एजेंडे के लक्ष्य (2015 में स्वीकृत) में मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देकर समय से पहले होने वाली मौतों की संख्या में एक-तिहाई कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है. इसके बावजूद मानसिक स्वास्थ्य के लिए अंतरराष्ट्रीय विकास सहायता, स्वास्थ्य के क्षेत्र में दी गई कुल सहायता के एक फ़ीसदी से भी कम है.
भारत पिछले कई वर्षों से दुनिया के सबसे अवसादग्रस्त देशों में से एक बना हुआ है. इस समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए पर्याप्त मदद के अभाव में लोग इससे उबरने के लिए घातक तरीकों का सहारा लेने लगते हैं. इनमें नशीले पदार्थों या दवाइयों का दुरुपयोग, नशे की लत और हिंसा जैसी बुराइयों का प्रसार होता है. मानसिक स्वास्थ्य की लगातार जारी अनदेखी के पीछे इसे लांछन की तरह समझने की प्रवृति और इसके बारे में लोगों के बीच जागरूकता का अभाव है. इनपर नज़दीक से निगाह दौड़ाएं तो हम पाते हैं कि वितरण से जुड़ा मौजूदा घिसा पिटा तौर-तरीका और मानव संसाधन को लेकर हमारा रवैया इस समस्या को और गहरा कर रहा है. 2019 तक प्रति 10 हज़ार की जनसंख्या पर फिज़िशयनों, डॉक्टरों और मिडवाइफ़ की औसत तादाद महज 35.4 थी. इसी कड़ी में हर एक लाख की आबादी पर मनोचिकित्सकों की संख्या मात्र 0.75 थी जबकि उच्च आय वाले देशों में ये तादाद 6 है.
इतना ही नहीं मानसिक विकारों के लिए परामर्श और बचाव की दूसरी सहायक सेवाएं लांछित समझी जाने वाली संस्थाओं जैसे मनोचिकिसा अस्पतालों में ही उपलब्ध हो पाती हैं. समाज में ऐसे अस्पतालों और केंद्रों को लेकर जो हिकारत का भाव है उसके चलते कई लोग इन सेवाओं तक पहुंच ही नहीं पाते. दुर्भाग्यवश मरीज़ों की निजता भंग होने की घटनाएं भी अक्सर देखने को मिलती हैं. मानसिक स्वास्थ्य सेवा अधिनियम 2017 में निजता के अधिकार को कड़ाई से लागू करने के प्रावधान हैं. इसके अलावा इस कानून में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से पीड़ित लोगों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव किए बिना समानता के बर्ताव की बात कही गई है. बहरहाल जागरूकता और व्यवस्था पर भरोसा बनाए बिना मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े लांछनों और उनके शिकार लोगों के साथ शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है. स्वास्थ्य बीमा प्रदाता कंपनियां मानसिक स्वास्थ्य और स्नायु तंत्र से जुड़े विकारों से जुड़ी मेडिकल सेवाओं पर किसी भी प्रकार का दावा देने से अब भी इनकार करती हैं. ऐसे में मानसिक विकार काफ़ी महंगी सेवाओं की श्रेणी में आ जाते हैं. हाल में शिखा निश्चल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (एनआईसीएल) के मुक़दमे में दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला इस संदर्भ में अहम हो जाता है. हाईकोर्ट ने कानून की धारा 21(4) पर बल देते हुए एनआईसीएल को बीमा पॉलिसी की शर्तों के हिसाब से लागत वहन करने को कहा.
भारत पिछले कई वर्षों से दुनिया के सबसे अवसादग्रस्त देशों में से एक बना हुआ है. इस समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए पर्याप्त मदद के अभाव में लोग इससे उबरने के लिए घातक तरीकों का सहारा लेने लगते हैं.
इसमें कोई शक़ नहीं कि बीते साल मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समग्र सेवाओं की बेतहाशा बढ़ती ज़रूरतों और उन सेवाओं की वास्तविक मौजूदगी के बीच की खाई साफ़ तौर से हमारे सामने उभरकर आई. इसके बावजूद 2021 के बजट में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को आवंटित कुल धनराशि (712.69 अरब रु) में से एक फ़ीसदी से भी कम (0.8 प्रतिशत यानी 5.97 अरब रु) मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं के नाम किया गया है. भारत में 9 करोड़ से ज़्यादा लोग किसी न किसी तरह के मानसिक विकार से ग्रसित हैं. कोविड-19 ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है. इसके बावजूद 2020-21 के बजट में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिए महज 40 करोड़ रु ही आवंटित किए गए हैं. इसका मतलब ये है कि भारत सरकार मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रत्येक मरीज़ पर सालभर में करीब 1 अमेरिकी सेंट के बराबर खर्च करेगी. सार्स-कोव-2 संक्रमण से ग्रसित हर तीसरे मरीज़ में अवसाद, मनोभाव और चिंता से जुड़े विकार, मानसिक रूप से विक्षिप्त अवस्था या दूसरी मनोवैज्ञानिक समस्याओं के लक्षण पैदा होने की आशंका है. ऐसे में संसाधनों के लिए पहले से ज़्यादा मारामारी होना तय है. व्यवस्था पर इसका दबाव पड़ना लाजिमी है. वहीं दूसरी ओर, देश में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े केवल दो बड़े संस्थानों- राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और स्नायु विज्ञान संस्थान (एनआईएमएचएनएस), बेंगलुरु और लोकप्रिय गोपीनाथ क्षेत्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान, तेज़पुर को मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित कुल कोष का 93 प्रतिशत हिस्सा आवंटित किया गया है. इन दोनों संस्थानों के नाम क्रमश: 5 अरब और 57 करोड़ रु की रकम दी गई है.
ये बात सही है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े इन कार्यक्रमों के लिए हमेशा से ही काफ़ी कम धनराशि आवंटित की जाती रही है. बहरहाल, मौजूदा समय में महामारी से पैदा हुई परिस्थितियों की पहचान कर उनसे निपटने के लिए कॉरपोरेट क्षेत्र, परोपकार के काम से जुड़े संगठनों और प्राथमिक तौर पर सरकारों को आगे आकर साझा तौर पर काम करना होगा.
दुनिया कोविड-19 जैसी विकराल आपदा का सामना करने के लिए कतई तैयार नहीं थी. मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी किसी महामारी से निपटने की हमारी तैयारी तो और भी लचर है. दुनिया भर में लंबे समय से व्याप्त इस ख़ामोश महामारी से निपटने के लिए लक्षित, बहुपक्षीय प्रयासों के साथ-साथ इससे जुड़े सभी संबद्ध पक्षों द्वारा पर्याप्त निवेश किए जाने की सख्त आवश्यकता है.
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Mona is a Junior Fellow with the Health Initiative at Observer Research Foundation’s Delhi office. Her research expertise and interests lie broadly at the intersection ...
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