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पृथ्वी की निचली कक्षा सैटेलाइट और मलबे से इतनी भरी जा रही है कि अंतरिक्ष अब रोमांच से ज़्यादा जोखिम का इलाका बन चुका है. चीन के अंतरिक्ष यात्रियों का LEO में फंसा रह जाना बताता है कि भारत का प्रस्तावित अंतरिक्ष स्टेशन भी एक ऐसे माहौल में काम करेगा जहां तकनीक से ज़्यादा चुनौती मलबा, टकराव और बीमा संकट की होगी.
चीन के तीन अंतरिक्ष यात्रियों (जो शेनझोउ-20 अंतरिक्ष यान के चालक दल के सदस्य हैं) को 5 नवंबर 2025 को तियानगोंग अंतरिक्ष स्टेशन से वापस चीन आना था लेकिन अब वो पृथ्वी की निचली कक्षा (लो-अर्थ ऑर्बिट या LEO) में अनिश्चितकाल के लिए फंस गए हैं. चीन की मानवयुक्त अंतरिक्ष एजेंसी के मुताबिक, अंतरिक्ष यात्रियों को वापस लाने वाला कैप्सूल संभवत: अंतरिक्ष के एक छोटे मलबे से प्रभावित हुआ है और इसकी वजह से कैप्सूल पृथ्वी तक बिना अंतरिक्ष यात्रियों के लौटेगा. ये पहला मौका नहीं है जब तियानगोंग को इस तरह की कठिनाई का सामना करना पड़ा है. 2023 में चीन के अंतरिक्ष स्टेशन के सोलर पैनल से मलबा टकराया था जिसकी वजह से आंशिक रूप से बिजली चली गई थी. अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) (जो LEO में काम करता है) तेज़ी से असुरक्षित होता जा रहा है. पिछले दशक में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को अंतरिक्ष के मलबे से बचाने के लिए कई मौकों पर सावधानी बरतनी पड़ी. अगले कुछ वर्षों में LEO और अधिक सैटेलाइट से भर जाएगा और भारत के अंतरिक्ष स्टेशन- भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन- को और भी ख़तरनाक LEO में काम करना होगा क्योंकि अंतरिक्ष के मामले में सक्षम कोई भी सरकार सैटेलाइट मेगाकॉन्स्टेलेशन (सैकड़ों या हज़ारों उपग्रहों का एक समूह) को बढ़ाने के मामले में अपनी भूख पर नियंत्रण पाने के लिए उत्सुक नहीं है.
कॉन्स्टेलेशन स्पेस इकोनॉमी की रीढ़ बन चुका है.
चीन के अंतरिक्ष यात्री LEO में फँस जाना बताता है कि खतरा सिर्फ तकनीकी नहीं—मलबे का भी है.
आने वाले वर्षों में LEO के और भीड़भाड़ होने से भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन बड़ी चुनौतियों में काम करेगा.
बीते कुछ वर्षों के दौरान दुनिया भर में प्राइवेट अंतरिक्ष कंपनियों के उदय के दौरान एक बाज़ार से जुड़ी परिस्थिति उत्पन्न हुई है जो अंतरिक्ष एजेंसी के नेतृत्व वाले पहले के ज़माने के अंतरिक्ष कार्यक्रमों से पूरी तरह अलग है. बाज़ार से जुड़ी ये परिस्थिति है सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन पर ज़ोर. कॉन्स्टेलेशन अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाता है. ये स्पेस लॉन्च उद्योग, इन-ऑर्बिट ऑपरेशन उद्योग, स्पेस डेटा प्रोसेसिंग कंपनियों और अंतिम उपयोगकर्ताओं को लाभ पहुंचाता है. मैनेजमेंट कंसल्टिंग कंपनियों के बीच अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था ने एक प्रतिष्ठित स्थान हासिल कर लिया है और दुनिया भर की सरकारों पर उनका ज़बरदस्त प्रभाव ये सुनिश्चित करता है कि ‘सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन’ कई ट्रिलियन डॉलर वाली दुनिया की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के केंद्र में बना रहे. इसकी वजह से वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी को उन कमर्शियल स्पेस कंपनियों में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी लेने की प्रेरणा मिली है जो अपने निवेशकों और अंतिम उपयोगकर्ताओं को सेवा देने के लिए तैयार हैं. फायदा उठाने वालों में से कोई भी कॉन्स्टेलेशन के उपयोग की समीक्षा नहीं करेगा क्योंकि ये उनके व्यवसाय का मूल आधार है और इससे उन्हें अप्रत्याशित वित्तीय लाभ हासिल होगा. स्थिरता को लेकर झूठी बातें अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रवेश कर गई हैं. ये नीतिगत मंचों और बोर्डरूम में अनिर्णायक दिखावटीपन का हिस्सा बनी हुई है लेकिन ये मूल मुद्दे को हल करने के बदले वुडेन सैटेलाइट (नए प्रकार का अंतरिक्ष यान), अंतरिक्ष से जुड़ी स्थिति के अनुसार जागरूकता और क्लीन प्रोपल्शन जैसे सतही समाधान पर ज़्यादा ज़ोर लगा रही है. मूल बात ये है कि LEO सैटेलाइट और दूसरे LEO एसेट्स तेज़ी से बीमा के लिए अयोग्य होते जा रहे हैं.
“मूल बात ये है कि LEO सैटेलाइट और दूसरे LEO एसेट्स तेज़ी से बीमा के लिए अयोग्य होते जा रहे हैं.”
दुनिया में अंतरिक्ष बीमा में कंपनियों और अंडरराइटरर्स का एक बहुत छोटा और ख़ास बाज़ार शामिल है जो मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप में स्थित है. वो बीमा के अलग-अलग पहलुओं को शामिल करने वाली सेवाएं प्रदान करते हैं. अंतरिक्ष बीमा से जुड़ी कंपनियां अंतरिक्ष आधारित सिस्टम के जीवनचक्र का ध्यान रखती हैं और उन्हें लॉन्च की नाकामी, कक्षा में खराबी और थर्ड पार्टी को होने वाले नुकसान के बहुत ज़्यादा ख़तरों से बचाती हैं. लॉन्च से पहले बीमा के माध्यम से स्पेस सिस्टम के निर्माण, परीक्षण और परिवहन का ध्यान रखा जाता है; लॉन्च के दौरान बीमा इस पूरे मिशन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से की रक्षा करता है यानी सिस्टम के इग्निशन से लेकर ऑर्बिट में इसके अलग होने तक. इसके अलावा ऑपरेशनल बीमा इस सिस्टम के ऑपरेशन से जुड़े हिस्से का ध्यान रखता है और थर्ड पार्टी बीमा लॉन्च की नाकामी, सैटेलाइट में खराबी या मलबे के फिर से प्रवेश करने समेत अंतरिक्ष की गतिविधियों से किसी दूसरे पक्ष को होने वाले नुकसान या चोट के दावे से इन सिस्टम की रक्षा करता है. ये बीमा प्रोडक्ट वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं. उनके बिना कंपनियों को फंड, लॉन्च का स्लॉट और अंतर्राष्ट्रीय साझेदार हासिल करने में जूझना पड़ता है.
“अगर कक्षा में भीड़ का बढ़ना जारी रहता है तो LEO बीमा के लिए अयोग्य और अधिक ख़तरे वाला ऑर्बिटल ज़ोन बनने की तरफ बढ़ेगा.”
एक्सा XL, ग्लोबल एयरोस्पेस, म्यूनिख री, इंटरनेशनल स्पेस ब्रोकर्स, मार्श, लॉयड और बेज़ले जैसी अंतरिक्ष बीमा कंपनियों का व्यवसाय मानकों और संभावित ख़तरों पर चलता है. बढ़ता कॉन्स्टेलेशन, उनसे निकलने वाले खराब सैटेलाइट और ऑर्बिट का मलबा इस हिसाब-किताब के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां पैदा करते हैं. इसकी वजह से अंतरिक्ष बीमा कंपनियां प्रीमियम बढ़ा रही हैं, मलबे से जुड़े नुकसान या अनजानी वस्तुओं को बीमा से बाहर कर रही हैं. साथ ही कक्षा से बाहर निकलने और टकराव से बचने की मज़बूत योजनाओं वाले सैटेलाइट तक कवरेज सीमित कर रही हैं और कुछ मामलों में तो ज़्यादा ख़तरे वाले ऑर्बिटल ज़ोन में अंडरराइटिंग से पूरी तरह पीछे हट रही हैं. अगर कक्षा में भीड़ का बढ़ना जारी रहता है तो LEO बीमा के लिए अयोग्य और अधिक ख़तरे वाला ऑर्बिटल ज़ोन बनने की तरफ बढ़ेगा.
वित्तीय रूप से संपन्न अंतरिक्ष कंपनियां जहां नुकसान के ख़तरे को ख़ुद ही उठा सकती हैं, वहीं छोटी कंपनियों को मुश्किल फैसला लेना पड़ता है: विनाशकारी जोखिम उठाएं या काम-काज बंद करें. चूंकि बीमा न होने के मामले बढ़ रहे हैं, ऐसे में कई छोटी अंतरिक्ष कंपनियां फंडिंग, लॉन्च का कॉन्ट्रैक्ट या अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी हासिल करने में नाकाम हो सकती हैं. इसके अलावा, लगातार करेंसी छापने वाले देशों द्वारा समर्थित अंतरिक्ष का इकोसिस्टम कृत्रिम तरीके से नुकसान को बट्टा खाते में डाल देता है. छोटी अंतरिक्ष कंपनियों और कुशल एवं स्वच्छ अर्थव्यवस्था वाले देशों के लिए इस तरह नुकसान को बट्टा खाते में डालना संभव नहीं है.
दुनिया की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था बहुत ज़्यादा असमान है जिसमें केवल भू-राजनीतिक दिग्गज या बहुत ज़्यादा पूंजी वाले किरदार ही भीड़-भाड़ वाले ऑर्बिट से जुड़े रह सकते हैं या काम कर सकते हैं. बीमा में कम हिस्सेदारी से ऑर्बिट के ख़तरे बढ़ जाते हैं जिससे बीमा और महंगा एवं कम सुलभ हो जाता है. इस वित्तीय असुरक्षा की वजह से पूंजीपति इन छोटी कंपनियों को ख़रीद लेंगी. अगर छोटी कंपनियां अकेले रहना चुनती हैं तो ऑर्बिट में भौतिक और आर्थिक ख़तरों का मेल-जोल होगा जो एक ख़तरनाक फीडबैक सिस्टम बनाएगा: मलबे में बढ़ोतरी से बीमा लागत बढ़ेगी जिससे कवरेज की हिस्सेदारी कम होती है और अंतरिक्ष में गैर-ज़िम्मेदार किरदार बढ़ जाते हैं जो मलबा और टक्कर का ख़तरा और बढ़ाता है.
“भारत को अपना अंतरिक्ष स्टेशन शुरू करने की तैयारी से काफी पहले उसके ऑर्बिट में बढ़ते मलबे को रोकने के लिए उसे चुस्त-दुरुस्त बनाना चाहिए.”
भारत को अपना अंतरिक्ष स्टेशन शुरू करने की तैयारी से काफी पहले उसके ऑर्बिट में बढ़ते मलबे को रोकने के लिए उसे चुस्त-दुरुस्त बनाना चाहिए. इसके अलावा अंतरिक्ष स्टेशन के आसपास ख़तरनाक रूप से मंडरा रहे हज़ारों अंतरिक्ष सैटेलाइट और उनके टुकड़ों की वजह से वित्तीय असुरक्षा से भी बचना चाहिए. अंतरिक्ष तक पहुंच के मामले में अधिक समानता आने के साथ LEO में राजनीतिक और कूटनीतिक टकराव का मक़सद अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में दबाव के ज़रिए ख़तरा (केसलर सिंड्रोम के माध्यम से भौतिक ख़तरा और LEO को वित्तीय रूप से असुरक्षित बनाकर आर्थिक ख़तरा) बढ़ाकर दूसरों को पहुंच से रोकना है.
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Dr. Chaitanya Giri is a Fellow at ORF’s Centre for Security, Strategy and Technology. His work focuses on India’s space ecosystem and its interlinkages with ...
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